जनवरी 1977 फिल्म का पहला दिन तो धूम धड़ाके में बीता मगर रात कई लोगों की नींद उड़ाने वाली थी। अगली सुबह जब बॉक्स ऑफिस के कच्चे पक्के आंकड़े आने शुरू हुए। प्रोड्यूसर, डायरेक्टर और डिस्ट्रीब्यूटर के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी। प्रोड्यूसर प्रेम जी ने डायरेक्टर देश मुखर्जी को फोन मिलाया। लगता है यह फिल्म तो गई। फिल्म ने पहले दिन मात्र ₹4 लाख की कमाई की थी। पहला वीकेंड 11 लाख कलेक्शन लेकर आया तो लगा कि चलो अब फिल्म पिकअप पकड़ेगी लेकिन पहले हफ्ते का कुल कलेक्शन मात्र 19 लाख पर जा टिका तो अब कोई शको सुभा ना रहा कि यह फिल्म नाकाम होने वाली है। फिल्म कटिक्स और मीडिया रिव्यु ने तो पहले ही जजमेंट दे रखा था। तीसरे हफ्ते बॉक्स ऑफिस पर छड़ती भीड़ और नई फिल्मों के चसपा होते पोस्टरों ने भी बता दिया कि यह फिल्म फ्लॉप हो गई। फिल्म का फ्लॉप होना इसके शुरुआती धूमधड़ा से कहीं बड़ा धमाका लेकर आया। इसलिए नहीं कि इसे उस प्रेम जी ने प्रोड्यूस किया था जिन्होंने कभी मेरा सा जैसी कल्ट फिल्में बनाई थी। इसलिए भी नहीं कि इन फिल्मों में उन्हें सपोर्ट करने वाले और दीवार जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्म के आर्ट डायरेक्टर देश मुखर्जी की यह डायरेक्टोरियल डेब्यू फिल्म थी।
बल्कि धमाका तो इस बात पर हुआ कि यह उस दौर की सबसे सफल सबसे महंगी लेखक जोड़ी सलीम जावेद की पहली फ्लॉप फिल्म थी। 1971 से अंदाज हाथी मेरे साथी जैसी फिल्मों से आगाज करने वाली लेखक जोड़ी ने अब तक लगातार आठ हिट फिल्में दी थी। जिनमें दीवार और शोले जैसी ब्लॉकबस्टर और कालजई कल्ट फिल्में भी थी। राजेश खन्ना के रोमांटिसिज्म की जगह एंग्री यंग मैन के रूप में एक नया सुपरस्टार ला खड़ा करने का श्रेय भी इसी लेखक जोड़ी को जाता था। ऐसे में पटकथा के मोर्चे पर यह जोड़ी खुद को किसी सुपरस्टार से कम नहीं समझती थी। कई प्रोड्यूसर तो इनके डस्टबिन में पड़ी स्क्रिप्ट के लिए भी नोटों का बंडल लिए इनके दरवाजे पर खड़े मिलते। और तब सलीम जावेद ना ऐसे प्रोड्यूसरों को भाव देते थे और ना ही किसी डायरेक्टर को स्क्रिप्ट में कोई फेरबदल करने देते। जाहिर है उनके ऐसे रवैया ने बॉलीवुड में ऐसे फिल्मकारों और कलाकारों की फौज खड़ी कर रखी थी
जो सलीम जावेद से ईर्ष्या करने लगे थे और हमले के लिए ऐसे ही किसी मौके की तलाश में थे। ऐसे लोगों के निशाने पर अमिताभ बच्चन भी थे। जंजीर, दीवार और शोले जैसी फिल्मों ने जिस एंग्री यंग मैन को सफलता के शीर्ष पर पहुंचा दिया था, उसके लिए ईमान धर्म एक बड़ा झटका थी। एक हफ्ते पहले ही ए के नाडियाडवाला के प्रोडक्शन और नरेंद्र बेदी के डायरेक्शन में चुपचाप पर्दे पर आई अदालत ईमान धर्म से कहीं ज्यादा कमाई कर रही थी। ऐसे में यह फ्लॉप फिल्म उन सितारों के लिए भी जश्न का फ्लैकशिप बन गई जिनके स्टारडम में अमिताभ बच्चन ने रातोंरात आग लगाई थी। किसी के सुपरस्टारडम की कुर्सी खिसक गई थी तो किसी को रातोंरात लीड हीरो से साइड हीरो बनना पड़ा। किसी पर अमिताभ का खौफ इस कदर हावी था कि साल की सबसे बड़ी हिट और कमाऊ फिल्म देने के बाद भी उसने फिल्मफेयर के लिए मोटी रिश्वत दे डाली कि कहीं यह अवार्ड अमिताभ को ना मिल जाए। ऐसे में ईमान धर्म शायद बॉलीवुड की पहली फिल्म थी जिसके फ्लॉप होने पर पार्टियां दी गई। जश्न माने जाम छलके और गेट टुगेदर भी हुए। खुद जावेद अख्तर ने माना कि कई लोग इतने खुश थे कि मानो कोई खजाना हाथ लग गया हो। और हमसे वो ऐसे मिलते मानो हमने कोई अपराध किया हो। हमारी तो एक ही फिल्म फ्लॉप हुई थी। जबकि इस जश्न में शामिल लोगों की कई फिल्में लगातार फ्लॉप होती आ रही थी। ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है
कि हम तो इस फ्लॉप फिल्म से इतने खुश थे कि एक रात हम जावेद अख्तर को चिढ़ाने के लिए शैंपेन की बोतलें लेकर उनके घर पहुंच गए और उन पर खूब छींटाकशी की। लेकिन दोस्तों ऐसे जश्न ज्यादा दिन नहीं टिकते जो दूसरों के मातम पर मनाए जाएं। वही हुआ और बहुत जल्द हुआ। सलीम जावेद ने बतौर लेखक जो धमाकेदार वापसी की सोकी। जिस अमिताभ बच्चन के स्टारडम का मर्सिया पढ़ा जा रहा था, पर्दे के पीछे उसका सुपरस्टारडम गढ़ा जा रहा था। माय नेम इज ऑन सर्विस। जो लोग यह समझते थे कि अमिताभ बच्चन एंग्री यंग मैन की हवा से फूला एक गुब्बारा भर है। अब उन्हें इसके एक्टिंग टैलेंट का गुब्बार दिखने वाला था। लेकिन यह सब दिखने और दिखाने के पीछे फिल्म ईमान धर्म एक बड़ी वजह थी। सलीम जावेद से चिढ़ने वालों में कई ऐसे फिल्म मेकर भी थे जो अमिताभ बच्चन की एक्टिंग के कायल थे और उन्हें एंग्री यंग मैन की छवि से निकालकर भी सुपरहिट फिल्में देने का मादा रखते थे।
और वक्त के इसी मोड़ पर सलीम जावेद से खार खाया एक डायरेक्टर एंग्री यंग मैन को कॉमिक एक्शन ड्रामा के मसाले में सर्व करने की तैयारी कर चुका था। नाम तो आप समझ चुके होंगे लेकिन शायद यह कहानी नहीं जानते होंगे जो अब सुनाने वाला हूं। हुआ यह था कि सलीम जावेद ने ईमान धर्म की स्क्रिप्ट सबसे पहले डायरेक्टर मनमोहन देसाई को सुनाई थी। देसाई को पहले ही शोले फिल्म की स्क्रिप्ट खारिज करने का मलाल रहा होगा। उन्होंने झट से हां कर दी और प्रोड्यूसर एजी नाडियाडवाला से कहा कि वे कहानी खरीद लें। नाडियार्ड वाला ने सलीम जावेद को बड़ी रकम देकर यह फिल्म खरीद ली जिसे देसाई डायरेक्ट करने वाले थे। इस बीच प्रोड्यूसर प्रेम जी ने सलीम जावेद को इस फिल्म के एवज में और बड़ी रकम देने की पेशकश कर डाली। और क्रिटिक्स की मानें तो सलीम जावेद का ईमान डोल गया। जबकि सलीम जावेद की माने तो वह देसाई के हाइपर दखलअंदाजी से खुश नहीं थे। इस लेखक जोड़ी ने फिल्म प्रेम जी को बेचने का फैसला कर डाला। सलीम जावेद मनमोहन देसाई के पास पहुंचे और कहा कि इस स्क्रिप्ट में एक बड़ा डिफेक्ट है और अब हम इसे डेवलप करने की हालत में नहीं हैं। इसलिए आप यह फिल्म ड्रॉप कर दीजिए। नाडियाडवाला और देसाई के पीठ पीछे सलीम जावेद ने प्रोड्यूसर प्रेम जी और डायरेक्टर देश मुखर्जी के साथ मिलकर स्टोरी थोड़ी और डेवलप की और फिल्म बननी शुरू हो गई। जब यह बात देसाई को पता चली तो वह जल भुन गए।
उन्हें इस फिल्म में नायकों का डिफरेंट फेथ वाला होना जच गया था और अब वह ऐसे ही प्लॉट की तलाश में जुट गए। फिर उन्हें एक दिन अखबारी कतरन में एक शराबी के अपने तीन बच्चों को एक पार्क में छोड़कर भाग जाने की खबर हाथ लगी और उन्होंने कादर खान, प्रयागराज और केके शुक्ला के साथ मिलकर एक ऐसी कहानी डेवलप की जिसमें यह तीनों बच्चे अलग-अलग धर्मों के लोगों के हाथ लगते हैं और उन्हीं के द्वारा पोसे पाले जाते हैं। इस तरह फिल्म अमर अकबर, एंथनी की कहानी वजूद में आई। खुद के प्रोडक्शन डायरेक्शन में देसाई ने अपनी सारी कारीगरी इस फिल्म में उड़े दी। मानो वो मैसेज देना चाहते हो कि ब्लॉकबस्टर फिल्में किसी एक राइटर या डायरेक्टर की पेटेंट नहीं है। कल्ट क्लासिक ऐसे भी बनाई जा सकती हैं। मनमोहन देसाई ईमान धर्म की नाकामी पर खुलकर जश्न मनाने वालों में तो शामिल नहीं थे। शायद वह जानते थे कि जश्न का असली मौका 6 महीने बाद आने वाला है। अकबर ये तो आप सब जानते हैं कि अमर अकबर एंथनी ना केवल 1977 की टॉप ग्रॉसर फिल्म थी बल्कि कमाई के मामले में यह मुगले आजम शोले जैसी फिल्मों की कतार में आ खड़ी हुई। एक रिकॉर्ड तो ऐसा कि कई लोग भरोसा नहीं करते तो खुद अमिताभ बच्चन का यह पुराना ट्वीट देख लीजिए। अकेले मुंबई रीजन में इस फिल्म ने 25 सिनेमाघरों में सिल्वर जुबली मनाकर इतिहास रच दिया। यही नहीं इसने अमिताभ बच्चन को पहली बार बेस्ट एक्टिंग का फिल्मफेयर भी दिलाया और उन्हें सुपरस्टारडम के एक पायदान ऊपर ले जाकर दिखाया कि अमिताभ सिर्फ एंग्री यंग मैन नहीं बल्कि एक्शन कॉमिक ड्रामा से भरपूर एक कंप्लीट एक्टिंग मैन है।
लेकिन दोस्तों दूसरी ओर सलीम जावेद भी कच्चे खिलाड़ी नहीं थे। एक फिल्म की नाकामी ना तो उन्हें तोड़ गई और ना ही जलने वालों का जश्न टिक पाया। अगले साल डॉन और त्रिशूल जैसी फिल्मों से जो कमबैक किया उसकी कोई मिसाल नहीं मिलती। यह बात सलीम जावेद भी मानते हैं और क्रिटिक्स ने भी खूब लिखा है कि ईमान धर्म एक कमजोर फिल्म थी जिसे फ्लॉप होना ही था। कहानी दर्शकों को बांध नहीं पाई क्योंकि इसमें नैतिक आधार नहीं। जंजीर, दीवार या शोले के एंग्री यंग मैन किरदारों में लाख बुराइयां थी। उनका काम धंधा भी गंदा था लेकिन उनमें एक तरह की नैतिक ईमानदारी थी। यहां अमिताभ बच्चन को जिस अहमद रजा के रोल में पिरोया गया था वो पिछले किरदारों की ऊंचाई को छूना तो दूर उनके आगे टिकता नहीं था। यह नमक हराम के बाद दूसरी फिल्म थी जिसमें रेखा तो थी, लेकिन अमिताभ की हीरोइन नहीं। फिल्म का गीत संगीत भी कोई खास छाप नहीं छोड़ पाया। ऐसे में ईमान धर्म यही अंजाम डिर्व करती थी। खैर, सलीम जावेद और नॉन सलीम जावेद फिल्मों की टक्कर में अमिताभ को सबसे ज्यादा फायदा हुआ। जिसने जो भी कहानी दी उन्होंने जी जान से प्ले किया। नतीजा कोई ऐसा साल नहीं जब अमिताभ ने एक या दो ब्लॉकबस्टर फिल्म ना दी हो। सलीम जावेद की कहानियों पर अमिताभ की एक्टिंग का सफर डॉन त्रिशूल काला पत्थर होता हुआ दोस्ताना शान और शक्ति तक पहुंचा। दूसरी ओर प्रकाश मेहरा और मनमोहन देसाई ने कादर खान प्रयागराज जैसों की कलम से अमिताभ को जो किरदार दिलाए उनका करिश्मा भी इतिहास रचता गया। आज एक नाकाम फिल्म के बहाने कुछ अनकहे अनसुने किस्सों के साथ बस इतना ही। चलते-चलते वीडियो लाइक और शेयर तो कीजिए ही। अगर चैनल सब्सक्राइब नहीं किया है तो वह भी करते चलिए। कमेंट बॉक्स में आपकी हर राय का स्वागत है। शुक्रिया नमस्ते आभार।