आपने आज के द्वार के सितारों के बंगले तो बहुत देखे होंगे लेकिन आज जिस खंडहर होती जा रही हवेली को हम आपको दिखाने जा रहे हैं वो एक ऐसे दिग्गज की थी जिसने 10 या 20 फिल्मों में नहीं बल्कि अपने पूरे जीवन काल में 250 से भी ज्यादा फिल्मों में काम करके इतिहास रच दिया था। जाने कहां lमेरा जिगर जी अभी-अभी यहीं था किधर गया जी। हैरानी की बात तो यह है कि उस दौर में जहां कॉमेडियन सिर्फ साइड रोल में सिमट कर रह जाते थे। यह इकलौता ऐसा फनकार था जो ज्यादातर फिल्मों में मुख्य भूमिका यानी लीड रोल में ही नजर आता था। मर गया बड़ी अंखियों से डर गया जी। दोस्तों आपकी स्क्रीन पर दिख रहा यह वीरान बंगला घर था बॉलीवुड के सबसे पहले और सबसे बड़े कॉमेडी किंग जॉनी वॉकर साहब का।
वो जॉनी वॉकर जिन्होंने 50, 60 और 70 के दशक में अपनी मुस्कान और अपनी अदाकारी से पूरी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री पर एक चित्र राज किया था। कहीं सट्टा, कहीं पत्ता, कहीं चोरी, कहीं, कहीं फाका, कहीं ठोकर, कहीं ठो। दोस्तों, अलीबाग के खूबसूरत किनारों पर मौजूद यह आलीशान बंगला आज किसी भुताहा खंडहर की तरह वीरान पड़ा है। पर याद रखिए, एक दौर वो भी था जब यहां की दीवारें महफिलों की रोशनी से जगमगाती थी और यहां बॉलीवुड के बड़े-बड़े दिग्गजों का जमावड़ा लगा रहता था।
लेकिन आज सबसे बड़ा और चुभता हुआ सवाल यह है कि आखिर सालों बाद इस घर की हालत ऐसी जजर कैसे हो गई? आखिर बॉलीवुड के उस पहले कॉमेडी सम्राट के साथ वक्त ने ऐसा क्या क्रूर खेल खेला कि आज की पीढ़ी उन्हें याद करना तो दूर उनका नाम तक फूलती जा रही है। जाने कहां मेरा जिगर जी अभी अभी [संगीत] यहीं था किधर गया जी। आखिर उनके बेटे नासिर खान ने अपने पिता की इस सबसे बड़ी निशानी को इस यादगार आलीशान बंगले को ऐसे तन्हा और लावारिस क्यों छोड़ दिया? क्या यह सिर्फ लापरवाही है या इसके पीछे कोई गहरा पारिवारिक राज छिपा है? और दोस्तों, सबसे हैरान कर देने वाला सच तो अब सुनिए। जिस इंसान ने 250 से ज्यादा फिल्मों में का किरदार निभाकर दुनिया को लौटपोट कर दिया।
जिसने अपनी पूरी जिंदगी में कभी शराब को हाथ तक नहीं लगाया। आखिर उस परहेज करने वाले इंसान का नाम एक विदेशी शराब की बोतल की वजह से क्यों पूरी दुनिया में मशहूर हो गया? क्यों उन्हें अपना असली नाम बदलकर एक बोतल का नाम अपनाना पड़ा? ऐसे ही अनगिनत अनसुलझे सवाल हैं और कुछ ऐसे कड़वे सच जिनका जवाब आज की इस बेहद खास और मसालेदार वीडियो में हम आपको देने वाले हैं।
हम आपको सिर्फ जॉनी वॉकर साहब की कहानी ही नहीं सुनाएंगे बल्कि इस आलीशान बंगले के कोने-कोने में छिपे उन राज्यों से भी पर्दा उठाएंगे जिन्हें आज तक दुनिया से छिपा कर रखा गया है। तो बस अपनी सांसे थाम कर बने रहिए हमारे चैनल बॉलीवुड बायो के साथ वीडियो के आखिर तक क्योंकि ऐसी अनोखी और रहस्यमई दास्तान बार-बार सुनने को नहीं मिलती। ।इसे जॉनी वॉकर साहब ने साल 1965 में एक मामूली सी कीमत पर खरीदा था। यह वो सुनहरा दौर था जब जॉनी वॉकर के नाम का सिक्का पूरी इंडस्ट्री में चलता था। उनके सबसे अजीज दोस्त और महान फिल्मकार गुरुदत्त साहब की जिद थी कि उनकी हर फिल्म में जॉनी वॉकर का होना उतना ही जरूरी है जितना कि फिल्म में कैमरा कहा तो यहां तक जाता था कि गुरुदत्त साहब बिना जॉनी के अपनी फिल्म का मुहूर्त तक नहीं करते थे। जब इन दोनों की जोड़ी पर्दे पर आग लगा रही थी।
तभी गुरुदत्त साहब के कहने पर जॉनी साहब ने अलीबाग के इस किनारे पर इस खूबसूरत बंगले को अपना बनाया था। दोस्तों, पहले यह बंगला एक अमीर पारसी परिवार की मिल्कियत हुआ करता था। लेकिन जब गुरुदत्त अपनी कालचई फिल्म प्यासा की शूटिंग के लिए लोकेशन ढूंढ रहे थे। तब उनकी नजर इस जन्नत जैसी जगह पर पड़ी। शूटिंग खत्म हुई, और गुरुदत्त जी की सलाह मानकर जॉनी वॉर्कर साहब ने इसे फौरन खरीद लिया। अगले 25 सालों तक यहां रौनक का वह आलम था कि बॉलीवुड की हर बड़ी फिल्म की शूटिंग के लिए प्रोड्यूसर्स की लाइन लगी रहती थी। यहां महफिलें सजती थी, ठहाके गूंजते थे और जॉनी साहब की कामयाबी का परचम लहराता था।
लेकिन दोस्तों वक्त का पहिया जब घूमता है तो राजा को रंक बनाने में देर नहीं लगती। साल 1980 के बाद जॉनी वॉकर साहब की जिंदगी में एक ऐसा भयानक तूफान आया जिसने सब कुछ तहस-नहस कर दिया। उनके हमदर्द दोस्त गुरुदत्त साहब इस दुनिया को अलविदा कह चुके थे और फिल्म इंडस्ट्री का मिजाज बदल चुका था।
सोचिए दोस्तों वो सुपरस्टार जिसके लिए कभी रोल लिखे जाते थे वो 80 के दशक में एक-एक काम के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हो गया। पैसा उन्होंने बहुत कमाया था। लेकिन वह कहावत सच साबित हुई कि बैठे-बैठे तो कुबेर का खजाना भी खाली हो जाता है। फिर यह तो एक कलाकार की मेहनत की कमाई थी।
जब जॉनी साहब का बुरा वक्त शुरू हुआ तो उन्होंने अपनी साख बचाने के लिए कई छोटी फिल्मों में बेहद मामूली और साधारण से किरदार भी निभाए। लेकिन अफसोस वह पुरानी कामयाबी की चमक उन्हें दोबारा कभी नसीब नहीं हुई। खराब सेहत और सर पर चढ़ते कर्ज के भारी दबाव ने उन्हें वह कदम उठाने पर मजबूर कर दिया जिसे उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। भारी मन से उन्होंने अपने इस बेशकीमती बंगले को एक फिल्म इंस्टट्यूट के ब्रोकर के पास गिरवी रख दिया।
जॉनी साहब का दुर्भाग्य तो देखिए ना तो वह कभी कामयाबी की सीढ़ी दोबारा चढ़ पाए और ना ही उनके बेटे नासिर खान वह कमाल दिखा सके। नतीजा आपके सामने है। वह बंगला जो कभी खुशियों से चहकता था। आज एक लावारिस खंडहर बनकर अपनी किस्मत पर रो रहा है। दोस्तों, 80 के दशक तक आते-आते बॉलीवुड में कॉमेडी का सुल्तान बदल चुका था।
अब दौर था महमूद अली साहब का जिन्होंने कॉमेडी की पूरी परिभाषा ही बदल कर रख दी थी। जॉनी वॉकर की सादगी वाली कॉमेडी के सामने महमूद की कड़क और लाउड कॉमेडी ने ऐसा कब्जा जमाया कि पुराने सितारे धीरे-धीरे धुंधले होते चले गए। सारी दुनिया हमको बोलती है चाय बना को दो लेकिन हमें बना को नहीं देते। हमें इनको बना को दिए तो इन्हो हमको बना के चले गए ना। ये टैक्सी वाले नाचलों को समझते।
आखिर क्या कारण था कि जॉनी वॉकर साहब का नाम एक विदेशी की बोतल की वजह से पूरे भारत में एक ब्रांड बन गया। क्यों एक ऐसा इंसान जिसने अपनी पूरी जिंदगी में कभी की एक बूंद को भी गले से नीचे नहीं उतारा। उसका नाम सुनते ही लोगों को महखाने याद आ जाते थे। यह कहानी शुरू होती है बस कंडक्टरी से फिल्मी पर्दे तक के उस सफर की जहां उनका असली नाम बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी था। लेकिन जब महान फिल्मकार गुरुदत्त ने उनकी वह वाली जबरदस्त एक्टिंग देखी तो वह दंग रह गए।
गुरुदत्त साहब को लगा कि इस कलाकार का नाम कुछ ऐसा होना चाहिए जो जुबान पर चढ़ते ही नशा कर दे। उस दौर में स्कॉटिश विस्की जॉनी वॉकर का नाम पूरी दुनिया में गूंज रहा था। बस फिर क्या था गुरुदत्त साहब ने बदरुद्दीन को नाम दिया जॉनी वॉकर। हैरानी की बात तो यह है दोस्तों कि जॉनी साहब ने फिल्मों में शराब पीकर इतने ड्रामे किए। इतनी लड़खड़ाती चाल चली कि असली शराबी भी उन्हें अपना गुरु मानने लगे थे। पर हकीकत यह थी कि वह एक बेहद धार्मिक और परहेज करने वाले इंसान थे।
ऑनलाइन क्लियर आगे बढ़ो आगे चलो छोटी सी ये अल्ट मेरे घर की साथ हमारे तोप का गोला बात नहीं है डर की दोस्तों जॉनी वॉकर साहब का असली नाम बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी था। उनका जन्म 11 नवंबर 1926 को मध्य प्रदेश के इंदौर में एक बेहद साधारण परिवार में हुआ था। घर की माली हालत इतनी खराब थी कि पूरा परिवार काम की तलाश में मुंबई आ गया। गुजारा करने के लिए जॉनी साहब ने मुंबई की बेस्ट बसों में कंडक्टरी करना शुरू कर दिया।
लेकिन दोस्तों उनकी कंडक्टरी भी कोई मामूली नहीं थी। वो बस में सवारियों को चुटकुले सुनाकर और अलग-अलग आवाजें निकालकर उनका मनोरंजन करते थे। वक्त ने करवट तब बदली जब बलराज साहनी साहब की नजर इस हुनरमंद कंडक्टर पर पड़ी। उन्होंने ही बदरुद्दीन को महान फिल्मकार गुरुदत्त से मिलवाया। गुरुदत्त साहब उनकी एक्टिंग खासकर बिना पिए की एक्टिंग देखकर इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मौके पर ही उन्हें अपनी फिल्म बाजी के लिए साइन कर लिया और यहीं से बदरुद्दीन काजी बन गए जॉनी वॉकर गुड मॉर्निंग गुड मॉर्निंग का जवाब तुमने दिया था?
जॉनी साहब की निजी जिंदगी भी किसी फिल्म से कम नहीं थी। फिल्म आरपार के सेट पर उनकी मुलाकात खूबसूरत अभिनेत्री नूरजहां से हुई। दोनों में प्यार हुआ और साल 1955 में इन्होंने निकाह कर लिया। उनके परिवार की बात करें तो उनके छह बच्चे हैं। तीन बेटे और तीन बेटियां। उनके एक बेटे नासिर खान ने भी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी किस्मत आजमाई। लेकिन वह अपने पिता जैसी कामयाबी हासिल नहीं कर सके।
जॉनी वॉकर साहब ने अपने करियर में 250 से ज्यादा फिल्में की। प्यासा, सीआईडी, 14वियों का चांद, कागज के फूल और मेरे महबूब जैसी फिल्मों में उनके किरदारों ने उन्हें अमर बना दिया। वो हिंदी सिनेमा के पहले ऐसे कॉमेडियन थे जिनके लिए फिल्मों में अलग से गाने लिखे जाते थे। जैसे सर जो तेरा चकराए या जाने कहां मेरा जिगर गया जी। दोस्तों, अब बात करते हैं उस कड़वे सच की कि आज जॉनी वॉकर साहब कहां है। बड़े दुख के साथ कहना पड़ता है कि बॉलीवुड का यह अनमोल हीरा 29 जुलाई 2003 को इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह गया। वह आज हमारे बीच शारीरिक रूप से तो नहीं है लेकिन उनकी फिल्में और उनकी वह बेमिसाल कॉमेडी आज भी जिंदा है।
हालांकि जैसा कि हमने आपको दिखाया उनका अलीबाग वाला बंगला आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है और उनका परिवार चकाचौंध से दूर अपनी निजी जिंदगी जी रहा है। दोस्तों जॉनी वॉकर साहब की कहानी हमें सिखाती है कि टैलेंट कभी छिपता नहीं है। चाहे वो बस की कंडक्टरी में ही क्यों ना हो लेकिन क्या हम एक समाज के तौर पर अपने दिग्गजों को वह सम्मान दे पा रहे हैं?