Cli

राजेश खन्ना का सबसे बड़ा दुश्मन कौन वक्त, अहंकार या अमिताभ?

Uncategorized

[संगीत] हम क्यों [संगीत] शिकवा करें झूठा कोई कोई शख्स होता है फलक पर चमकते चांद की मानिंद जिसके छुप जाने के बाद भी उसका वजूद बना रहता है और उसके इर्दगिर्द बुनी जाती है बेशुमार कहानियां और यह अनोखी कहानी जो अंत से शुरू होकर आरंभ तक जाती है इस कहानी के सदाबहार किरदार हैं राजेश खन्ना जिनकी अदाओं का जादू जवा दिलों में इस कदर बस गया कि हर लड़का राजेश खन्ना बनना चाहता था और लड़कियों के किताबों में राजेश खन्ना की तस्वीर हुआ करती थी। ऐसे में राजेश खन्ना और उनके स्टारडम के बीच ऐसा क्या हुआ जिसने राजेश खन्ना के दीवानगी में डूबे प्रशंसकों का सम्मोहन तोड़ कर रख दिया और अपनी बेपरवाह दुनिया में खोए राजेश खन्ना ने बदलते परिदृश्य को समझने में देर कर दी। राजेश खन्ना जिसने इंडस्ट्रीज को लगातार सात हिट फिल्में देकर एक सुपरस्टार का मकाम हासिल किया जिसका अंदाजा 1971 में बनी फिल्म अंदाज से लगाया जा सकता है

जिसमें राजेश खन्ना के मैज 10 मिनट के रोल ने ही फिल्म को हिट बना दिया। जिंदगी एक सफर है सुहाना। [संगीत] जिस सुपरस्टार के पोस्टर में तस्वीर तथा फिल्म में उसका नाम ही दर्शकों को सिनेमा तक खच लाने की सामर्थ्य रखता था। वह शख्स सपनों की दुनिया बुनते बुनते जब हकीकत के धरातल पर उतरा तो उसके आसपास की दुनिया बदल चुकी थी और इस असहनीय पीड़ा के चलते इन्होंने फिल्मी पर्दे के साथ-साथ जिंदगी से भी दूरी बना ली और एक ढलती शव के साथ ही यह सितारा भी हमेशा के लिए डूब गया। इस सितारे का उदय हुआ था अमृतसर में। सन था 1942 और नाम था जतिन कुमार। मगर माया नगरी बंबई तक पहुंचतेपहुंचते यह बन गए राजेश खन्ना। इनके जीवन साथी की तलाश भी दिलचस्प रही। इनकी पहली चाहत थी रंगमंच के आर्टिस्ट अंजू महेंद्रू अपनाना चाहा था अपनी नई नवेली एक्ट्रेस टीना मुनीम को और अपना हक जताया करते थे अभिनेत्री मुमताज पर। मगर शादी के बंधन में बंधे डिंपल कपाडिया के संग। सन 1966 में निर्देशक चेतना आनंद द्वारा जतिन कुमार को पहली बार फिल्म इंडस्ट्रीज में उतारा गया। राजेश खन्ना के नाम से और फिल्म थी आखिरी खत। इसमें राजेश खन्ना ने रंगमंच से मिले अपने अनुभव को बखूबी पर्दे पर उतारा और फिल्म के क्लाइमेक्स में जो खुशी, आश्चर्य तथा पीड़ा का

भाव दर्शाया वो किसी भी अभिनेता की कल्पना से भी ज्यादा कठिन था। फिल्म के इस बेबसी तथा पश्चाताप भरा अंत दर्शाने के लिए राजेश खन्ना को 3 दिन तक भूखा प्यासा रहना पड़ा। मगर यह फिल्म एक छोटे से बच्चे को केंद्र में रखकर बनाई गई थी जो अपनी मां से बिछड़ जाता है और दर्शक बच्चे को मां से मिलवाने की फिक्र में ज्यादा रहे और इस फिल्म के बाकी किरदारों को नजरअंदाज कर दिया गया। इस फिल्म को मिले ठंडे रिस्पांस के कारण आने वाली फिल्मों में चर्चित अभिनेत्रियां राजेश खन्ना के साथ काम करने में कतराने लगी। इसके बाद सन 1967 में बनी फिल्म राज में राजेश खन्ना को डबल रोल में उतारा गया। मगर कमजोर संवाद और कहानी के चलते इस फिल्म की तकदीर पहले ही लिखी जा चुकी थी।

बड़ी मुश्किल से इनकी तीसरी फिल्म बहारों के सपनों में आशा पारक को काम करने के लिए राजी किया गया। मगर एक रोमांटिक स्टोरी की आस में आए दर्शक सामाजिक संदेश लिए निराश लौट गए। इन तीन फ्लॉप फिल्मों के चलते इस नए कलाकार को फिल्म इंडस्ट्रीज में उतारना बहुत बड़ी चुनौती थी। सो आखिर में फिल्मों के नीरसता भरे अंत को बदलने का निर्णय लिया गया। फिर एक शाम राजेश खन्ना शक्ति सामंत के साथ बैठे एक ऐसी फिल्म साइन कर रहे थे जो उनकी जिंदगी बदलने वाली थी जिसकी सफलता का अंदाजा तो फिल्म बनाते वक्त खुद शक्ति सामंत को भी नहीं था और राजेश खन्ना के युवा जोश से भरी सदाबहार गीतों से सजी यह फिल्म थी आराधना [संगीत] [गाना गाने की आवाज़] कोरा [गाना गाने की आवाज़] कागज था ये मन मन मेरा [गाना गाने की आवाज़] [संगीत] मेरा यह फिल्म तो राजेश खन्ना की अदाकारी का परिचय मात्र थी। राजेश खन्ना की दिल जीत लेने वाली मुस्कुराहट पलकें झुकाकर सर को झटका देने वाली अदा और संवाद बोलते हुए राजेश खन्ना का सदा हुआ स्वर जिसके लोग दीवाने हो गए।

यूं ही तू मुझसे बात करती हूं या कोई प्यार और इसी के साथ राजेश खन्ना की हिट फिल्मों का एक सिलसिला शुरू हो गया जिसमें है सन 1970 में बनी फिल्म आनंद और इसी वर्ष बनी एक और फिल्म कटी पतंग [संगीत] वो हीरोइंस जो कल तक राजेश खन्ना के साथ काम करने में कतराती थी। अब वह राजेश खन्ना के साथ आने में फक्र महसूस करने लगी। राजेश खन्ना ने फिल्म हाथी मेरे साथी सिर्फ इसलिए साइन की क्योंकि राजेंद्र कुमार का बंगला आशीर्वाद खरीदने के लिए राजेश खन्ना के पास पैसे कम पड़ गए थे। यह बंगला खरीद लेने के बाद राजेश खन्ना का बादशाह होने का दिखावा पूरा हो गया। इस बंगले के बाहर राजेश खन्ना को एक नजर देखने वालों का तांता लगा रहता। इस कारण राजेश खन्ना का सुबह-समय पर शूटिंग पर ना पहुंच पाना रोज की बात हो गई। कभी-कभी तो शूटिंग रद्द भी करनी पड़ जाती। जिस कारण निर्माताओं के साथ राजेश खन्ना के रिश्ते तलक हो गए। जबकि राजेश खन्ना फिल्मों में अपना रोल निहायत मेहनत तथा ईमानदारी से किया करते। सन 1973 को आई फिल्म नमक हराम में अपने साथ आए एक नए हीरो अमिताभ बच्चन को लेकर पहली बार राजेश खन्ना का माथा ठनका और अमिताभ बच्चन को एक प्रतिद्वंदी के तौर पर पाया। करके आपको रोटी खिलाइए। हमें खिलाने वाले हाथ अभी पैदा नहीं हुए। हमने वही किया जो कानून है। अब अमिताभ बच्चन के एक्शन फिल्म, दीवार, शोले और काला पत्थर जैसी फिल्मों के समक्ष राजेश खन्ना का क्रेज कुछ कम होता दिखाई दे रहा था। ऐसे में आई राजेश खन्ना की फिल्म आखिरी कसम में बुझती लो की एक आखिरी चमक दिखाई दी।

[संगीत] इसके बाद राजेश खन्ना का ना सिर्फ स्वास्थ्य खराब रहने लगा बल्कि जिंदगी के प्रति इनकी उदासीनता भी झलकने लगी। किस्मत और वक्त मेरा मजाक है। और बदलते परिदृश्यों के चलते इस कलाकार ने स्वीकार कर लिया कि पर्दे पर सदा एक सा मंजर नहीं रहता। [संगीत] और इसी के साथ यह सुपरस्टार एक ढलती शाम अपनी अदाओं का जादू बिखेरता हुआ पर्दे के पीछे जाकर कहीं गुम हो गया। और सबसे बड़ी बात यह कि जिस शख्स को राजेश खन्ना ने अपने रास्ते की रुकावट समझा अकेला वही शख्स आखिरी वक्त पर उनके साथ रहा और यह था आज की फिल्मी दुनिया का बेताज बादशाह अमिताभ बच्चन। तो यह थी पेशकश एक ऐसे अभिनेता के नाम जो अपने 46 साल के फिल्मी सफर को सफलतापूक तय करते हुए वर्ष 2012 में इस दुनिया से रुखसत हो गया और हमें दे गया अपने मनमोहक गीतों का नायाब गुलदस्ता जिसके हर रंग और खुशबू में अमर है यह सदाबहार कलाकार मेरे सपनों की रानी [संगीत] कब आएगी तू तेरा माना प्यार मेरा तेरी हया तेरी शर्म तेरी कसम यार दीवाना होता है। ओ मेरे [गाना गाने की आवाज़][संगीत] धाव लगाए। तो यह जानकारी थी फिल्मी दुनिया के एक महान हस्ती की। तो अब मैं आपसे इजाजत लेता हूं। अगर आपको यह वीडियो पसंद आई हो तो इसे लाइक करें, शेयर करें तथा सब्सक्राइब करें ताकि आने वाली हर वीडियो सबसे पहले पहुंचे आपके पास। धन्यवाद। [संगीत]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *