मई महीने के आखिरी दिन हैं और सर्दी का मौसम धीरे धीरे शुरू हो रहा है और इसके साथ ही स्मॉग की चादर शहर को अपनी चपेट में ले रही है. चकरा गए ना? अरे भाई! मई-जून में गर्मी आपके इलाके में पड़ती है. मतलब भारत में और यहां यूरोप में भी. लेकिन चिली में इन दिनों सर्दी का मौसम दस्तक देता है. चिली ही नहीं दक्षिणी गोलार्ध में पड़ने वाले दूसरे देशों में भी मौसम यूरोप और भारत के उलट चलता है. यानी जब यहां गर्मी होती है तो वहाँ सर्दी और जब यहाँ सर्दी तो वहाँ गर्मी. अभी जिन देशों में सर्दी का मौसम शुरू हो रहा है उनमें चिली के अलावा दक्षिणी अमेरिका में अर्जेंटीना, उरुग्वे और पराग्वे जैसे देश हैं तो उधर दक्षिणी अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड भी हैं. फिलहाल तापमान गिरने के साथ ही चिली की राजधानी सैंटियागो पर स्मॉग की मोटी चादर घिरने लगी है. हालात यह हैं कि वहां इमरजेंसी का ऐलान कर दिया गया है. सड़कों पर वाहनों को सीमित किया जा रहा है. लकड़ी से चलने वाले हीटरों पर रोक लगाई जा रही है
और लोगों से अपनी सेहत का ध्यान रखने को कहा जा रहा है. यानी हालात वैसे ही हैं जैसे दिल्ली और उत्तर भारत के शहरों में दिसंबर और जनवरी में होते हैं. तो आइए अब बढ़ते हैं आगे और जानते हैं कि आज हम आपके लिए क्या क्या लेकर आए हैं. पृथ्वी घूमती है, लेकिन हमें इसका पता क्यों नहीं चलता? हिमालय की तेजी से पिघलती बर्फ ने खड़ा किया पानी का संकट. बात करेंगे भारत की सबसे रहस्यमयी जगह नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड की भी. और आखिर में मिलेंगे एक नन्हे से आर्डवार्क से. हमारी पृथ्वी गोल है, यह बात तो हम सब जानते हैं और यह भी कि यह लगातार एक तरफ तो अपनी धुरी पर घूमती है और दूसरी तरफ सूरज का चक्कर लगाती है, लेकिन इसका घूमना और इसकी रफ्तार को हम महसूस नहीं कर पाते. आखिर क्यों? चलिए आज इस पहेली को सुलझाते हैं. पृथ्वी हमें घूमती हुई क्यों महसूस नही होती? पृथ्वी को अपनी धुरी पर एक पूरा चक्कर लगाने में 24 घंटे का समय लगता है.
इक्वेटर पर यह 1,670 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार तक पहुंच जाती है. तो फिर हम चक्कर खा कर क्यों नहीं गिरते? इसके तीन कारण हैं. पहला, तुलना करने को कुछ नहीं है. गति को हम तभी महसूस करते हैं जब कोई चीज हमारे सापेक्ष बदलती है. जैसे कि जब हम चलती ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हैं तो शहर या गांव का दृश्य तेजी से पीछे जाता हुआ दिखता है. इसी से हमें अपनी गति का एहसास होता है. लेकिन पृथ्वी पर तो सब कुछ हमारे साथ चल रहा है यानी कुछ पीछे नहीं छूट रहा है तो गति का पता कैसे चलेगा? दूसरा कारण, एक समान रफ्तार. इसकी वजह से हमें कुछ भी बदलता हुआ नहीं दिखता. हमें अंतर तभी नज़र आता है जब कुछ बदल रहा हो, जैसे कि रफ्तार का तेज होना या कम होना. विमान यात्रा पर हम सिर्फ टेकऑफ और लैंडिंग को महसूस करते हैं. हमें यह महसूस नहीं होता कि विमान एक हज़ार किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चल रहा है. यही बात पृथ्वी के घूमने पर लागू होती है. यह गति इतनी स्थिर है कि कुछ पता ही नहीं चलता. तीसरा कारण है, गुरुत्वाकर्षण. घूमने वाला झूला पृथ्वी पर कार्य करने वाले सेंट्रीफ्यूगल फोर्स की अच्छी मिसाल है. यह हमें बाहर की ओर फेंकता है, लेकिन पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल हमें नीचे बनाए रखता है. भूमध्यरेखा पर गुरुत्वाकर्षण सेंट्रीफ्यूगल फोर्स से करीब 300 गुना शक्तिशाली होता है.
तभी हमें पृथ्वी के घूमने का एहसास नहीं होता. यह सिर्फ एक मिसाल है. हम तो यह भी महसूस नहीं करते कि पृथ्वी सूरज के चारों तरफ घूम रही है, वह भी ज्यादा स्पीड से. हम इस तरह की रफ्तार को महसूस करने के लिए बने ही नहीं हैं. इस धरती पर आज भी ऐसे बहुत से कोने हैं, जो हमारी पहुंच से दूर हैं. ऐसी ही एक अनछुई जगह है भारत में और इसका नाम है नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड. यहां पर मुट्ठी भर लोग रहते हैं बेहद आदिम तरीके से. हमारी, आपकी दुनिया से बहुत दूर और बहुत अलग. उन्हें पूरी तरह संरक्षित रखने के प्रयासों के बावजूद उनका इलाका अतिक्रमण का खतरा झेल रहा है. नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड. यह भारत ही नहीं, दुनिया की सबसे रहस्यमयी जगहों में से एक है. यह टापू अंडमान निकोबार की राजधानी पोर्ट ब्लेयर से 50 से 60 किलोमीटर दूर है. लेकिन यहां पर किसी को जाने की अनुमति नहीं है और न ही यहां रहने वाले लोगों का बाहर की दुनिया से कोई वास्ता है. आज भी यह लोग वैसे ही आदिम तरीके से जीते हैं जैसे इंसान करीब 10,000 साल पहले जीते थे. इन्हें खेती नहीं आती. पेट भरने के लिए ये शिकार और जंगली भोजन पर निर्भर हैं.
इन लोगों को बाहरी दुनिया की बीमारियों से बचाने और इनके संरक्षण के लिए भारत सरकार ने इस टापू को. नो कॉन्टैक्ट जोन घोषित किया है. मानवविज्ञानी एनस्टिस जस्टिन उन लोगों में से एक हैं, जो सरकार की तरफ से नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड पर भेजे गए कुछ अभियानों में शामिल रहे. जस्टिन बताते हैं कि जब वह 1986 में पहली बार वहां गए तो उन्होंने क्या देखा भी. हम आपस में बात कर रहे थे कि वहां से धुआं निकल रहा है तो वहां लोग हो सकते हैं. इसके बाद हमने सेंटिनली लोगों को जंगल से बाहर आते देखा तो यह पहला अनुभव था, जो हमने वहां देखा. जो हमने महसूस किया, वह यह था कि उनकी तरफ से कोई बैर का भाव नहीं था. इसका मतलब है कि उन्होंने हमें आने दिया. कुछ मिनटों के बाद हमने उनसे कहा, हम आपको नारियल के कुछ थैले देना चाहते हैं. वे बोले ठीक है आ जाओ. माना जाता है कि नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड के लोग दुनिया से संपर्क नहीं करना चाहते. 2004 में सुनामी के बाद आखिरी बार भारतीय तट रक्षक और हेलिकॉप्टरों ने दूर से हवाई निगरानी की थी, ताकि देखा जा सके कि नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड के लोग सुरक्षित हैं या नहीं. उसके बाद इन लोगों से कोई संपर्क नहीं किया गया और न ही किसी को वहां जाने की अनुमति है. जहां तक नॉर्थ सेंटिनल का सवाल है, तो प्रशासन की नीति है कि उससे दूर रहो, निगरानी रखो. इस टापू के पांच किलोमीटर के दायरे में किसी को जाने की अनुमति नहीं है. लेकिन हाल में एक अमेरिकी यूट्यूबर ने गैरकानूनी तरीके से इस टापू पर जाने की कोशिश की, जिसे गिरफ्तार कर लिया गया. बताया जाता है कि वह करीब पांच मिनट तक वहां रहा. उसने सीटी बजाई ताकि वहां
के आदिवासियों को तट के पास बुला सके. पुलिस के मुताबिक वह वहां नारियल और कोला का कैन भी छोड़ कर आया. इस तरह इस यूट्यूबर ने न सिर्फ अपनी जिंदगी को बल्कि वहां के लोगों की सेहत को भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश की. इससे पहले 2018 में एक अमेरिकी मिशनरी भी गैरकानूनी तरीके से नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड जा पहुंचा. लेकिन बाद में उसकी लाश मिली. इन आदिवासियों के संरक्षण के लिए इस टापू पर जाने की मनाही है. लेकिन जस्टिन सवाल करते हैं कि आखिर कब तक हम इन लोगों को दुनिया से काटकर रखेंगे. यह अपने आप को मूर्ख बनाने वाली बात होगी. अगर हम कहें कि सेंटिनली लोग अपनी स्थिति से खुश हैं और उन्हें परेशान क्यों करना? पूरे सम्मान के साथ… पूरे सम्मान के साथ, मैं कहूंगा कि यह खुद को मूर्ख बनाने वाली बात है, अगर हम मानें कि वह अपनी जिंदगी जी रहे हैं. नहीं, मैं कहता हूं कि उनसे संपर्क होने दीजिए. लेकिन सवाल यह है कि हमारी दुनिया से कटे हुए लोग एकदम से इतने बड़े बदलावों के लिए कितने तैयार हैं? उनसे संपर्क बेहद सावधानी और संवेदनशीलता वाला काम है. इसमें गैरकानूनी रूप से वहां घुसने जैसे तरीकों का कोई स्थान नहीं हो सकता. हिमालय को दुनिया की सबसे विशाल पर्वत श्रृंखलाओं में गिना जाता है, जो लगभग दो हज़ार 400 किलोमीटर लंबी है और यह पर्वतमाला पांच देशों में फैली है, जिनमें भारत, पाकिस्तान, चीन, नेपाल और भूटान शामिल हैं. यहीं से गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी बड़ी नदियां निकलती हैं. लेकिन अब यहां पर तेजी से पिघलते ग्लेशियर एक बड़े संकट की आहट दे रहे हैं. बर्फ से ढकी हिमालय की चोटियां इस धरती पर मौजूद एक चौथाई मानवता की प्यास बुझाती हैं. लेकिन इन पर्वतों की तलहटी में जमीन सूख रही है. देखिए कुछ नहीं बचा, सब खत्म. लाहौल घाटी में विजय कपूर की गोभी की आधी फसल बर्बाद हो गई, क्योंकि खेतों को सींचने के लिए पानी ही नहीं मिला. पत्तियां एकदम सूख गई हैं. देखिए, इसे देखिए. गोभी बिल्कुल सूख गई है. विजय कपूर बताते हैं कि हिमालय से आने वाला पानी कभी इन खेतों की प्यास बुझाता था, लेकिन अब यहां की सच्चाई कुछ और है.
बहुत पुरानी बात नहीं है, जब यहां खूब पानी होता था. यहां जलधारा आती थी, जिसे हम लोग यहां घाटी में सभी झरनों की माँ कहा करते थे. आप सोचेंगे कि मैं झूठ बोल रहा हूं, लेकिन मेरा यकीन मानिए यहां बहुत पानी होता था. अब बिलकुल सूखा है. इस इलाके में सूखे की स्थिति का जायजा लेने के लिए वैज्ञानिक साल में एक बार यहां चार हजार मीटर की ऊंचाई पर आते हैं. पहले ग्लेशियर जो है यहां पर हुआ करता था. अब जो ग्लेशियर काफी पीछे चला गया है. हिमालय के ग्लेशियर गंगा बेसिन को पानी मुहैया कराते हैं, जो दुनिया के सबसे सघन आबादी वाले इलाकों में से एक है. लेकिन ग्लेशियर तेजी से सिमट रहे हैं. दो स्टेज जो है काफी मेल्ट हो गई. यह जो है लास्ट स्टेज है. यहां पर गड़े ये बांस यह समझने में मदद करते हैं कि बर्फ कितनी तेजी से पिघल रही है. जो अक्टूबर की रीडिंग हमने ली हैं उसमें जो यहां पर. बिल्कुल यह नीचे थी, बर्फ के नीचे थी. इन वैज्ञानिकों की गणना बताती है कि इस इलाके में बर्फ की मोटाई में 5.5 मीटर की कमी आई है. बहुत ही मेल्टिंग हुआ है एक साल में तो उस ग्लेशियर की मेल्टिंग इतनी तेजी से हो रही है और यहां पर जो है, स्नो की जो कंडिशन है, जो ग्लेशियर को स्नो मिलनी चाहिए, वो नहीं मिल रही है तो जिसके कारण इसका नेगेटिव मास बैलेंस हो रहा है. लेकिन यहां रहने वाले लोगों को समाधान चाहिए. वो कृत्रिम ग्लेशियर बना रहे हैं. इसके जरिए वो पानी को संरक्षित कर रहे हैं ताकि अपने इलाके में पानी की कमी से निपट सकें. सर्दियों में ये लोग ऐसी जगहों पर जाते हैं जहां तापमान -15 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है. वहां वो पेड़ की शाखाओं और सामान्य पाइप की मदद से ऐसे ग्लेशियर बनाते हैं
. ऊपर लगा पाइप पहाड़ों से आ रहे पानी की बूंदों को इन शाखाओं पर छिड़कता है और फिर वे जमकर बर्फ बन जाती हैं. और इससे इन लोगों को साल के सबसे सूखे और सबसे मुश्किल दिनों में पानी मिलता है. जून और जुलाई में यह कृत्रिम ग्लेशियर पिघलने लगता है और पानी हम तक पहुंचता है. जितना यह पिघलेगा उतना ज्यादा पानी मिलेगा. इस तरह नीचे मौजूद गांव में पानी की कमी नहीं होगी. जलवायु परिवर्तन लगातार हमारी धरती को बदल रहा है और नाटकीय बदलावों के बीच ठोस समाधान तलाशने की चुनौती हमारे सामने है. और अब बारी है आज के नन्हे मेहमान से मिलने की. इंग्लैंड के चेस्टर जू में जन्मा ये बेबी आर्डवार्क नर या मादा, इस बात का अभी तक पता नहीं चला है. क्यों? क्योंकि ये बहुत छोटा है. दरअसल कुछ जानवरों में जन्म के तुरंत बाद लिंग संबंधी अंतर स्पष्ट नहीं दिखते. उनके लिए कुछ समय इंतजार करना पड़ता है. लेकिन हां, इसे अपना नाम जरूर मिल गया है, वोम्बल. अभी 3 अप्रैल को इसका जन्म हुआ है. चिड़ियाघर का कहना है कि यह उनके यहां बीते 94 साल में जन्म लेने वाला दूसरा आर्डवार्क है. यह जीव मूल रूप से सब सहारा अफ्रीका में पाया जाता है, लेकिन वहां जंगलों में अब इनके बसेरे लगातार सिमट रहे हैं. इंसानों से उनका टकराव भी बढ़ता जा रहा है और मीट के लिए इनका शिकार किया जाता है. लेकिन इस बेबी आर्डवार्क को यहां बहुत प्यार और देखभाल के साथ पाला जाएगा, यह बात पक्की है. तो आज के वीडियो में बस इतना ही. वीडियो अगर आपको अच्छा लगा हो तो इसे दूसरे लोगों के साथ साझा भी करिए. होगी आपसे जल्द मुलाकात. अपना ध्यान रखें. आपका बहुत बहुत धन्यवाद.