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कोक और पेप्सी को हराने वाला रसना खुद कैसे हार गया?

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अगर हम आपसे पूछे कि 90ज में भारत का सबसे फेमस समर ड्रिंक कौन सा था? तो बहुत से लोगों का जवाब एक ही होगा रसना। वो ऑरेंज कलर का पाउडर [संगीत] जिसमें आप पानी मिलाते थे। एक शीशी भी आती थी उसके अंदर। पानी में मिलाया दोनों को पाउडर को शीशी को। चीनी डाली फ्रिज में रखा और पूरा परिवार उसे पीता था। बर्थडे पार्टी हो, मेहमान हो, गर्मी की छुट्टियां हो, हर जगह रस्ता काम करता था। एक पैकेट सिर्फ ₹5 का और उससे बनते थे पूरे 32 गिलास यानी एक गिलास की कीमत 15 पैसे के करीब कोक और पेप्सी से 10 गुना सस्ता और यह सिर्फ एक ड्रिंक ही नहीं थी। एक सक्सेसफुल ब्रांड भी था। 2009 तक रस्ता के पास सॉफ्ट ड्रिंक कंसंट्रेट मार्केट का 93% मार्केट शेयर था। सोचिए 93% 60 से ज्यादा मुल्कों में यह बिकता था। 18 लाख रिटेल आउटलेट्स पर मिल जाता था। और जब CocaC कोलाa ने इसी सेगमेंट में सनफल ल्च किया तो कोक को 2004 में अपना प्रोडक्ट बंद करना पड़ा था।

क्राफ्ट फूड्स ने टैंक ल्च किया वो भी फेल रहा। रसना को कोई नहीं हरा पाया उसकी अपनी कैटेगरी। [संगीत] लेकिन आज रस्ता मार्केट से गायब है लगभगल लगभग। 2023 में एनसीएलटी यानी नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ने कंपनी पर बैंकरप्स प्रोसीडिंग्स चालू कर दी। यानी कंपनी दिवालिया होने को थी। कोर्ट के आदेश के बाद इसे रोका गया। लेकिन दिलचस्प बात यह कि यह सब शुरू हुआ था एक लॉजिस्टिक्स कंपनी के सिर्फ ₹71 लाख के बकाया पेमेंट को लेकर। वह पेमेंट नहीं किया। बैंकरप्स प्रोसीडिंग [संगीत] चालू हो गई। 93% मार्केट शेयर से बैंककरप्स प्रोसीडिंग्स तक [संगीत] रचना कहां गायब हो गई और अब कैसे वापसी की कोशिश कर रही है। कहानी जानेंगे इस वीडियो में। नमस्ते मैं हूं निखिल और आप देख रहे हैं अलिफ लैला जिसमें आज कहानी रसना की। [संगीत] [संगीत] बिल्कुल शुरू से शुरू करते हैं। हम कहानी शुरू होती है अहमदाबाद से। एक पारसी बिजनेस फैमिली थी खंबाटा फैमिली। इस परिवार के फिरोजशाह खंबटा एक छोटा सा बिजनेस चलाते थे। इनके बेटे थे अरीश फिरोजशाह खंबाटा। अरीश ने 1959 में गुजरात कॉलेज से केमिस्ट्री में डिग्री ली और 1962 में अपने पिता के बिजनेस में आए। अब ये जो अररीज थे एक फ्लेवरिस्ट थे। यानी एक ऐसे शख्स जो खानेपीने की चीजों में फ्लेवर और टेस्ट डिजाइन करते थे। उन्होंने [नाक से की जाने वाली आवाज़] अपने स्किल का इस्तेमाल करते हुए एक सॉफ्ट ड्रिंक कंसंट्रेट बनाया जिसको पानी में मिला के आप पी सको। इसका नाम रखा गया

जेफी और यह नाम जाफना के आम से आया था और इसे मार्केट में उतारा उनकी कंपनी पियोमा इंडस्ट्रीज ने 1976 में। अब वो जमाना इमरजेंसी का था। 1977 में क्या होता है? इमरजेंसी हट जाती है, चुनाव होते हैं और जनता पार्टी सरकार में आती है। मोरारजी देसाई बनते हैं प्रधानमंत्री और नई सरकार एक बहुत बड़ा फैसला लेती है कि एफईआरए यानी फॉरेन एक्सचेंज रेगुलेशन एक्ट के तहत विदेशी कंपनियों को आदेश दिया जाता है कि अपनी इक्विटी 40% तक कम करो। यानी अगर 100% फॉरेन ओन कंपनी है तो 60% उसको हिस्सेदारी मार्केट को बेचनी पड़ेगी। इंडियन इन्वेस्टर्स को 40% पर अपना स्टेक लाना पड़ेगा। अपना जो ट्रेड सीक्रेट है, अपनी टेक्नोलॉजी कोर इंडियन पार्टनर्स को शेयर करना होगा। और अगर यह दो चीजें नहीं करते हैं, तो फिर मुल्क छोड़ना पड़ेगा। अब कोका कोला तब दुनिया की दूसरी ही जगहों की तरह हिंदुस्तान में भी बहुत सफल थी। तब के उद्योग मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस ने बाद में एक बड़ा चर्चित बयान दिया था कि भारत के 90% गांवों में साफ पानी नहीं पहुंचा था। लेकिन कोका कोला हर गांव में पहुंच गया था। अब कोक के लिए सरकार की शर्त मानना असंभव था क्योंकि कोक खुद सॉफ्ट ड्रिंक्स नहीं बनाती। वह बस एक कंसंट्रेट बनाती है। एक गाढ़ा सिरप सा जिसमें पानी वगैरह मिलाकर सॉफ्ट ड्रिंक तैयार होती है। है ना? कार्बोनेटेड। कोक के कंसंट्रेट बॉटलिंग प्लांट्स को बेचता है जो लाइसेंस फीस देते हैं।

उसकी बॉटलिंग करते हैं। कोक की बॉटल तैयार करते हैं। मार्केट को सप्लाई करते हैं। अगर कोक अपने कंसंट्रेट की रेसिपी दे देती तो सिर्फ इंडिया ही नहीं पूरी दुनिया में उसके पास करने को कुछ बचता ही नहीं। तो कोक के पास बिल्कुल क्लेरिटी थी। उन्होंने अपना झोला चिमटा उठाया और वह यहां से चलते बने। अब जैसे जॉर्ज फर्नांडिस ने कहा था कोक भारत के 90% गांव तक पहुंच गया था। तो कंपनी ने जब वड़कम कह दिया तो भारत के अंदर जो सॉफ्ट ड्रिंक मार्केट था उसमें एक बड़ा वैक्यूम आया और इस खालीपन को भरने के लिए कई ब्रांड्स आ गए। Ple ग्रुप ने थम्स अप ल्च किया। लिमका ल्च किया। इनके ही ब्रांड्स थे ये। जनता पार्टी सरकार चल रही थी। वह अपना कोला लेके आई। डबल7 77 में सरकार बनी थी। प्योर ड्रिंक्स ग्रुप कैंपा कोला लेकर आए। लेकिन ये सब कार्बोनेटेड ड्रिंक्स थे। यानी सोडे वाले कोल्ड ड्रिंक्स जो कोक जैसा दिखना चाहते थे वैसा ही स्वाद चाहते थे। रसना इनसे बिल्कुल अलग थी। कार्बोनेटेड ड्रिंक नहीं थी। एक सॉफ्ट ड्रिंक कंसंट्रेट थी। यानी एक पाउडर और एक लिक्विड जिसे आप घर पर पानी और चीनी में मिलाकर खुद तैयार करते थे। एक डीआईवाई ड्रिंक बहुत सस्ती थी। जहां एक बोतल कोल्ड ड्रिंक की कीमत ₹5 ₹10 होती थी। 77 में सोचिए बड़ी रकम है। वही रसना का एक पैकेट ₹5 में आ जाता था। लेकिन वो 32 गिलास बनाता था फिर क्योंकि कस्टमर खुद चीनी डालता था तो पीओ इंडस्ट्रीज का प्रोडक्शन कॉस्ट का जो 60% हिस्सा था वो बच जाया करता था जो दूसरे फ्लेवर ड्रिंक्स को शुगर पे खर्च करना पड़ता था जो लोग एडेड शुगर के साथ बेचते हैं। लेकिन शुरुआत में जैफी सिर्फ़ पश्चिमी भारत में दिखती थी आपको बॉम्बे अहमदाबाद जब कंपनी ने पूरे भारत में ल्च की सोची तो उनकी जो ऐड एजेंसी थी ओगेलवी एंड मैथ उन्होंने सलाह दी कि जैफी नाम बहुत यूरोपियन लगता है। आपको कुछ इंडियन सोचना चाहिए। तब 1979 में नाम बदलकर रसना किया गया।

रसना बनाया गया था रस से जिसका मतलब आप जानते हैं जूस होता है। 1980 में अहमदाबाद में एक नई ऐड एजेंसी खुली थी मुद्रा कम्युनिकेशंस जिसे शुरू किया था एजी कृष्णमूर्ति ने। अब [नाक से की जाने वाली आवाज़] ये जो मुद्रा थी वो Reliance Industries की इन हाउस एजेंसी लेकिन जब पीओमा इंडस्ट्रीज ने अप्रोच किया तो धीरूभाई अंबानी ने कृष्णमूर्ति को एक बाहर से भी क्लाइंट लेने की इजाजत दे दी कि आप करो रसना का काम और रसना मुद्रा का पहला एक्सटर्नल ब्रांड बना जिसके लिए उन्होंने काम किया वरना Reliance का इनह हाउस काम देखते थे मुद्रा वाले हरीश खंबाटा के बेटे पीयूष खंबटा ने बाद में बताया कि मुद्रा को जो ब्रीफ दिया गया था वो यह था कि ब्रांड को बच्चों के इमोशन से जोड़ना है। मुद्रा ने पहले मार्केट रिसर्च किया और पाया कि घरों में सबसे ज्यादा पिए जाने वाले ड्रिंक्स होममेड थे। हिंदुस्तान में नींबू पानी कोकम शरबत वेस्ट में आपको मिलेगा। घर पर बनाया हुआ जूस हो जाएगा और ब्रांडेड ड्रिंक्स में किसान स्कश और रुबजा लीडर्स थे। तो मुद्रा ने फिर एक प्रिंट कैंपेन बनाया जिसमें दिखाया गया कि एक पैकेट से 32 गिलास बन जाएंगे। लेकिन असली धमाका अगर रचना के लिए कोई हुआ था तो वह उसकी टीवी कमर्शियल से हुआ था। समुद्रा ने एक छोटी सी बच्ची को कास्ट किया अंकिता जवेरी नाम की। अब ये किस्सा कितना सही है हमें नहीं पता लेकिन चलाया तो जाता है कि ऑडिशन में कई बच्चे आए लेकिन कोई सेट नहीं बैठा। टीम पैकअप करने वाली थी कि किसी ने कहा कि एक और बच्ची को आप देख लीजिए। एक लास्ट और यह बच्ची थी अंकिता जवेरी। अगले दिन उसके पेरेंट्स को कॉल किया गया कि पूरा कैंपेन अंकिता पर ही फोकस करेगा। कांसेप्ट बहुत सिंपल था। एक छोटी सी बच्ची अपनी गुड़ियों के साथ खेल रही है। खिलौने गुड्डे उसके उन्हें रसना पिलाने की कोशिश कर रही है। उनसे बात भी कर रही है। अब ऑब्वियसली जो सॉफ्ट टॉयज हैं वो पी नहीं सकते रसना। तो बच्ची कहती है कि वो जो दोनों गिलास है मैं खुद पी लूंगी और फिर कैमरे की तरफ देखकर कहती है वो आई लव यू रसना। सिंपल ऐड यह कमर्शियल 1984 में दूरदर्शन पर रिलीज हुआ। है ना? तब कलर टीवी आ गया था। और ध्यान दीजिए उस जमाने में दूरदर्शन इकलौता टीवी चैनल था। तो जो भी दूरदर्शन पर आप देख रहे हैं उसको आप अकेले नहीं पूरा मुल्क साथ में देख रहा है। तो इफेक्ट इसका तुरंत दिखा। रसना रातों रात एक रीजनल प्रोडक्ट से नेशनल ब्रांड बन गया। लोग रसना मांगने लगे दुकान पे जाके। अब यह कैंपेन एक और वजह से अहम था। रसना संभवत भारत का पहला ब्रांड था जिसने बच्चों को एक इन्फ्लुएंसरर की तरह इस्तेमाल किया। इस चीज को आज हम पेस्टर पार कहते हैं। यानी बच्चा या बच्ची मां-बाप से जिद करेगी कि यह ले आओ और फिर वो पेरेंट्स जाकर के मार्केट से वो प्रोडक्ट खरीदेंगे। रसना [नाक से की जाने वाली आवाज़] ने ये चीज तब समझ ली थी जब ज्यादातर इंडियन ब्रांड्स बच्चों को टारगेट ऑडियंस नहीं मानते थे। वैसे हम इन ज्यादातर ब्रांड्स की भावना को समझते हैं क्योंकि तब बच्चों की चलती गिरती थी। टीवी देखकर कुछ बच्चों ने ट्राई किया था कि और मारो और मारो मुझे तो सही में मार पड़ती थी और तब तक मार पड़ती थी जब तक रोना बंद नहीं करते थे। खैर रना ने बच्ची को बड़ी जिम्मेदारी दी और यह दांव जो उन्होंने चला वह सफल रहा। आप नंबर्स देख सकते हैं। 1984 तक रचना ने सॉफ्ट ड्रिंक मार्केट का 17% शेयर लिया। 1986 तक भारत का सबसे ज्यादा बिकने वाला सॉफ्ट ड्रिंक कंसंट्रेट बन गया। 88 तक रूअब्स और किसान दोनों को पीछे छोड़ दिया और 80 के आखिर तक नॉन इरेटेड ड्रिंक्स में रसना का वॉल्यूम शेयर 75% यानी जो टोटल प्रोडक्ट बिक रहा है उसका 75% और वैल्यू शेयर 50% से ऊपर चला गया कि जितना अगर ₹100 का काम होता है सॉफ्टन कंसंट्रेट में तो 50 रना की जेब में जाते हैं।

डिस्ट्रीब्यूशन भी उनका समय के साथ मजबूत हुआ। शुरू में रसना का डिस्ट्रीब्यूशन vol्टs के पास था। Tata वाली Vols जब चलने लगी कंपनी तो 2 साल बाद खंबटा ने फैसला किया कि अपना खुद का डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क बनाएंगे। तो पीओ ने फिर पूरे देश में 24 वेयर हाउस खोले। 24 डिस्ट्रीब्यूटर्स बनाए और 2000 स्टॉकिस्ट का नेटवर्क खड़ा किया जो 2 लाख से ज्यादा रिटेल आउटलेट्स तक सीधे माल देते थे और 2 लाख से ज्यादा आउटलेट्स को वह होलसेलर्स के जरिए सर्व करते थे। एक और बात थी जो रस्ता ने बड़ी चतुराई से की ब्रांड ने कभी खुद को सस्ता ड्रिंक नहीं कहा। इसकी बजाय ऐड में फोकस इस बात पर रहता था कि एक पैकेट से कितने गिलास बनते हैं? 32 अब फर्क बारीक है लेकिन बहुत अहम है। सस्ता कहने से आपका ब्रांड चीप लगता है। लोग कहेंगे यार सस्ती चीज क्यों पिएंगे? 32 गिलास कहने से ब्रांड वैल्यू फॉर मनी लगता है कि आप जितना खर्च कर रहे हैं उतना मिल भी रहा है सामान। और [नाक से की जाने वाली आवाज़] मिडिल क्लास फैमिलीज़ के लिए यह एक बहुत बड़ा सेलिंग पॉइंट था तब। तो 80 में रचना की कहानी सिर्फ सक्सेस नहीं डोमिनेंस की कहानी थी। पूरा मार्केट ही उनका था। लेकिन 1991 के बाद सब कुछ बदलने वाला था। बदला भी। 1991 में भारत की अर्थव्यवस्था में एक ऐतिहासिक बदलाव आया। देश विदेशी मुद्रा संकट के कगार पर था। प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने लिबरलाइजेशन की शुरुआत की। विदेशी कंपनियों के लिए भारत के दरवाजे खोले। एफडीआई के नियम ढीले हुए और जो एमएसी 1977 में भारत छोड़कर गई थी वह वापस आने लगी। पेप्सी 1989 में हिंदुस्तान आ गई थी और 1993 में कोक वापस लौटी जो असल मायने में बड़ी प्लेयर थी। कोक ने जो सेकंड एंट्री थी कोक 2.0 उसको एक मास्टर स्ट्रोक के साथ में प्लान किया। उन्होंने क्या किया? जितने ब्रांड्स इस्टैब्लिश हुए थे इन कुछ सालों में उनको खरीदा। Parle ग्रुप से थम्स अप लिया। लिमका लिया, गोल्ड स्पॉट भी लिया और सिट्रा चारों खरीद लिए।

इसका मतलब यह हुआ कि CocaC कोलाa को पहले दिन से ही भारत के सॉफ्ट ड्रिंक मार्केट का 50% शेयर मिल गया बिना मार्केट क्रिएट किए। जो Parle के पास बिजनेस था रातोंरात इनका हो गया। अब कोक और Pepsi दोनों भारत में आ गए और इनके पास ऐसा कुछ था जो रसना के पास नहीं हो सकता था। अकूत दौलत अनलिमिटेड मार्केटिंग बजट। बॉलीवुड सेलिब्रिटीज, क्रिकेट स्पॉन्सरशिप, टीवी पर एक के बाद एक ऐड और सबसे अहम इन कंपनियों ने कोल्ड ड्रिंक्स को अफोर्डेबल बनाया। प्लास्टिक की बोतलें और पाउच आए। ₹5 ₹10 की छोटी बोतलें भी मार्केट में लाई गई। ₹5 ₹10 77 के कुछ और थे। 91 के बाद के कुछ और थे। इसलिए हमने कहा अफोर्डेबल। [नाक से की जाने वाली आवाज़] सोचिए पहले एक मिडिल क्लास परिवार के लिए कोल्ड ड्रिंक की बोतल खरीदना एक लग्जरी आइटम था 70 में। तब रचना की पॉपुलैरिटी का एक कारण बना कि उसका दाम कम था। लेकिन जब कोल्ड ड्रिंक ही सस्ती हो गई तो रचना का जो यूएसपी था कमजोर पड़ा। एक एडवरटाइजिंग प्रोफेशनल ने कहा था कि पहले रना का मैसेज था कि एक पैकेट से इतने ग्लास बनते हैं। इतना सस्ता पड़ता है। लेकिन जब कोका कोला की कीमत भी गिर गई तो यह फायदा खत्म हो गया। एक गिलास कोला सिर्फ 20% महंगा रह गया था रसना से। लेकिन कोला के साथ एक इमेज जुड़ी थी कि वो यंग है, हिप है। एस्पिरेशनल लोगों की ड्रिंक है और रसना के साथ तो वो इमेज नहीं थी। वो अभी भी बच्चों की ही ड्रिंक थी जो बच्चे मांगते हैं पेरेंट्स से। 90ज के बीच तक सॉफ्ट ड्रिंक कंसंट्रेट कैटेगरी मुश्किल में आने लगी। कार्बोनेटेड ड्रिंक्स और फ्रूट जूस मार्केट में छाने लगे। रना का मार्केट सिकुड़ने लगा। हर साल वॉल्यूम में 7% से ज्यादा की गिरावट आने लगी। और फिर रना से एक बड़ी गलती भी हुई। 90ज के आखिर और सन 2000 की शुरुआत जो थी है ना पहला दशक उसमें रसना ने बहुत कुछ ट्राई किया लेकिन लगभग हर प्रयोग फेल हुआ या अपने टारगेट को तो उसने मिस ही किया 1999 में क्रिकेट वर्ल्ड कप का बुखार चढ़ा हुआ था रना ने दो फ्लेवर्स एक साथ लॉन्च किए रना योकर और रना एकवाफिन कपिल देव को रना योकर के लिए ब्रांड एंबेसडर बनाया गया था अब योकर तो कुछ ठीक चला अभी लेकिन एक्वाफिन पूरी तरह फ्लॉप हुआ क्योंकि इसका रंग नीला था और इंडियन कंज्यूमर्स को फूड प्रोडक्ट में नीला रंग पसंद नहीं आया।

फिर सन 2000 में आया ऑरेंज एक एरेटेड फूड ड्रिंक थी जो 1ढ़ लीटर की पेट बोतल में आती थी। रसना की कोशिश थी कि वो कोक और पेप्सी की तरह रेडी टू ड्रिंक सेगमेंट में एंट्री करें। लेकिन ऑरेंज एक डिजास्टर साबित हुआ रसना के लिए। दो बड़ी प्रॉब्लम्स पहली यह कि ऑरेंज साल्ट में कार्बोनेशन को प्रिजर्वेटिव की तरह इस्तेमाल किया गया था। मतलब जो फ़िज़ है वही उसको बचा कर रखता है। तो मतलब क्या हुआ? आपको हर वक्त फ्रिज में रखना पड़ेगा। अब भारत के ज्यादातर रिटेलर्स रात को फ्रिज बंद कर देते थे। तो प्रोडक्ट खराब जल्दी होता था। दूसरी तरफ शेलफ लाइफ भी इसकी तीन से चार हफ्ते थी। जबकि ज्यादातर सॉफ्ट ड्रिंक्स की शेलफ लाइफ 10 से 12 हफ्ते होती है। है ना? 3 महीने तक। अब भारत का डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम इतने जल्दी रिप्लेसमेंट के लिए तैयार ही नहीं था। आप खुद कर लीजिए vots से करवा लीजिए। इतनी जल्दी आप माल स्टॉकिस्ट के यहां से नहीं उठाकर ला सकते। तो Pepsi और कोक जैसी बड़ी कंपनीज़ भी जो थी तब 10 हफ्ते में एक बार स्टॉक बदलती थी। अब भारत जैसे सबक्टिनेंटल साइज वाले देश में डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम इतनी जल्दी रिप्लेसमेंट के लिए तैयार तब नहीं था। अभी भी बहुत जल्दी नहीं हो पाता है। Pepsi और कोक जैसी बड़ी कंपनियां 10 हफ्ते में एक बार स्टॉक बदलती हैं। फास्ट रिप्लेसमेंट सिर्फ जो दवाएं होती हैं जिनको आप पोस्ट एक्सपायरी यूज़ ही नहीं कर सकते उनके केस में होते हैं। तो नतीजा क्या हुआ? ऑरेंज बाजार में आने से पहले ही मर गया। सबसे बड़ी गलती शायद प्रोडक्ट लेवल पर नहीं हुई थी लेकिन ब्रांड लेवल पर हुई थी। रसना ने अपनी कोर पहचान बदलने की कोशिश की। जो ब्रांड बच्चों की वजह से बना था उसने सन 2000 और उसके बाद का जो दशक था उसमें कहना शुरू किया कि हम किड्स ड्रिंक नहीं हैं। हम सबके लिए हैं। 2002 में नई टैगलाइन आई प्रीलिश अगेन। फिर टेस्ट द मैडनेस आया। फिर बाद में लाइफ में रसना मिलाफाई आया। अब जब रचना ने बच्चों से अपना फोकस हटाया तो कोक ने अपना कंसंट्रेटेड ब्रांड सनफिल ल्च किया और सीधे बच्चों को टारगेट किया। सनफिल [नाक से की जाने वाली आवाज़] का ऐड था कि एक बच्चा भूख हड़ताल पर बैठा है। लेकिन सनफिल देखकर वह टूट जाता है। यानी रचना ने जो स्पॉट खाली किया उसमें एक कॉम्पिटिट की एंट्री हुई। हालांकि सनफिल ज्यादा टिक नहीं पाया और 2004 में बंद हुआ। टैंक भी रचना को नहीं रिप्लेस कर पाया और क्राफ्ट फूड्स को 2003 में अपना हैदराबाद प्लांट तो बंद ही करना पड़ा। तो रचना ने अपनी कैटेगरी में मोनोपोली बनाकर रखी। 90% से ऊपर मार्केट शेयर रखा। लेकिन असली समस्या यह थी कि यह कैटेगरी ही खुद सिकुड़ रही थी। नंबर्स आप देखिए 1982 में भारत का पूरा सॉफ्ट ड्रिंक मार्केट 13 करोड़ का था। 2014 तक ये बढ़कर 14000 करोड़ का हो गया। लेकिन सॉफ्ट ड्रिंक कंसंट्रेट कैटेगरी इसका सिर्फ 4.2% थी। 2003 में ये कैटेगरी 250 करोड़ की थी। 2008 में 400 करोड़ और 2014 में 600 करोड़। ग्रोथ 8% जबकि ओवरऑल मार्केट जो है डबल डिजिट में बढ़ रहा था। 10% से प्लस। यानी रसना एक ऐसी कैटेगरी की रानी थी जो खुद धीरे-धीरे मर रही थी। 90% मार्केट शेयर रखने का कोई मतलब नहीं अगर वो सेगमेंट ही इररेिलेवेंट होने वाला है मार्केट में। रचना की एक और बड़ी समस्या थी। उसकी एडवरटाइजिंग। 80ज और 90ज में रचना के ऐड आइकॉनिक थे। सिंपल इनोसेंट फैमिली सेटिंग वाली चीजें। गर्मी का दिन है। थका हुआ आदमी घर पे आता है। जो होम मेकर है, वाइफ है, रस्ता बना के उसको देती है। पति भी खुश, बच्चा भी खुश। ये ऐड उस दौर के प्रोग्राम्स जितने ही पसंद किए जाते थे।

है ना? क्योंकि उस टाइम इसी तरह का कंटेंट हम कंज्यूम भी करते थे। लेकिन जैसे-जैसे वक्त बदला रचना की एडवरटाइजिंग कमजोर हुई। नए ऐड बिल्कुल आए लेकिन कोई भी आई लव यू रचना जैसा इमोशनल कनेक्ट नहीं कर पाया लोगों से। सेलिब्रिटी इंडोर्समेंट बिल्कुल थे लेकिन कोई भी स्टिक नहीं किया। करिश्मा कपूर आई ऋितिक रोशन आए। अनुपम खेर, परेश रावल, कपिल दे, वीरेंद्र सहवाग, जेनेलिया डिसूजा है ना साइना नेहवाल बाद में अक्षय कुमार और करीना कपूर भी आए लेकिन किसी ने वर्क नहीं किया। एक मार्केटिंग एक्सपर्ट ने यहां तक लिखा कि रचना की एडवरटाइजिंग आइकॉनिक होती थी। अब रेडिकुलस हो गई है, इररेलेवेंट हो गई है। एक ऐड में बच्चे एक गोरिल्ला से बात करते हैं जो बाद में अक्षय कुमार निकलते हैं। तो यह ऐड उस लेवल का इमोशनल कनेक्शन से दूर था जो उस बच्ची ने बनाया था कभी। सबसे बड़ी बात मिलनेस यानी 90ज और 200 में बढ़े हुए बच्चे इनके लिए रचना का कोई इमोशनल कनेक्शन दोबारा नहीं बना। आज 40 साल के करीब ये लोग हैं। उनके लिए रसना नस्टाल्जिया की चीज है। लेकिन जो 25 साल के लोग हैं उनके लिए रसना बस एक पुराना प्रोडक्ट है जो उनकी मां बनाती थी या दादी बनाती थी। जनरेशन गैप आ गया और इसको रसना पार्ट नहीं पाया। 2011 तक रसना का टर्नओवर करीब 350 करोड़ था। कंपनी अभी भी सॉफ्ट ड्रिंक कंसंट्रेट में 90% से ऊपर का मार्केट शेयर रखती थी। लेकिन कैटेगरी से कुड़ रही थी और कंपनी नए प्रोडक्ट्स में सफल हो नहीं पा रही थी। नवंबर 2022 में फिर एक बड़ी खबर आती है। रसना के फाउंडर अररीत पिरोज शाह खंबाटा का 85 साल के उम्र में निधन हो जाता है। वो शख्स जिन्होंने 1976 में एक छोटे से प्रोडक्ट से शुरुआत की और उसे 60 देशों तक पहुंचाया अब नहीं रहे। 2023 में उन्हें मरणोपरांत पद्मश्री से सम्मानित किया गया। इनके जाने के बाद कंपनी की हालत और खराब हुई। सितंबर 2023 में एनसीएलटी अहमदाबाद ने एक आदेश दिया जिसने सबको चौंकाया। एक लॉजिस्टिक्स कंपनी भारत रोड कैरियर प्राइवेट लिमिटेड ने 2019 में एनसीएलटी में अर्जी दाखिल की थी। कहना था उस कंपनी का कि रचना का सामान हमने ट्रांसपोर्ट किया। अप्रैल 2017 से अगस्त 2018 के बीच कई इनवॉइस इशू किए। रना पर करीब ₹71,30,000 बकाया था हमारा लेकिन रस्ता ने पैसा नहीं दिया। अब एनसीएलटी ने आईबीसी यानी इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड के सेक्शन नौ के तहत रना प्राइवेट लिमिटेड को सीआईआरपी में डाल दिया। रना के प्रमोटर्स ने इस आदेश को गुजरात हाईकोर्ट में चैलेंज किया। कोर्ट ने एनसीएलटी के आदेश पर स्टे भी लगाया। कोर्ट ने कहा कि जब तक एनसीएलएटी में रचना की अपील सुनवाई के लिए लिस्ट नहीं होती है। तब तक इस आदेश पर अमल नहीं होगा।

यानी दिवालिया प्रक्रिया फिलहाल रुकी हुई। लेकिन यह बात कम नहीं है कि एक कंपनी जिसका मार्केट शेयर कभी 93% था। ₹71 लाख के पेमेंट पर एनसीएलटी में घसीट ली जाती है। हालांकि कहानियां खत्म नहीं होती है। रचना आज भी जिंदा है। हाल में रचना ने हर्ष इंडिया से जंप इन ब्रांड ₹350 करोड़ में एक्वायर किया है। जंप इन एक रेडी टू ड्रिंक जूस ब्रांड है जो ₹5 ml और 200 ml के पैक में आता है। रसना की इन दिनों में सबसे अग्रेसिव चाल है क्योंकि इसके ज़रिए कंपनी 20,000 से 25,000 करोड़ के जो रेडी टू ड्रिंक मार्केट है उसमें एंट्री करने का सपना देख रही है। जहां पे आपको फ्रूटी, Mazza, स्लाइस जैसे ब्रांड्स मिलते हैं। पीूज [नाक से की जाने वाली आवाज़] खंबाटा ने सीआईए के वेस्टर्न रीजनल कॉन्फ्रेंस में कहा भी था कि रेडी टू ड्रिंक कंपनी के लिए बड़ा मार्केट है और रस्ता और जंप इन दोनों ग्रोथ के कॉम्प्लीमेंट्री इंजंस होंगे। कंपनी का टारगेट है कि अगले 2 साल में आरटीडी मार्केट में 5 से 7% शेयर हासिल कर ले। साथ ही रसना पाटन में 45 से 50 करोड़ का एक नया लीची कंसंट्रेट प्लांट लगा रही है जो बिहार, झारखंड और नॉर्थ ईस्ट जैसे मार्केट्स में लॉजिस्टिक्स कॉस्ट कम करेगा। एक्सपोर्ट्स अब भी कंपनी के रेवेन्यू का 40% है और इसे 45% तक ले जाने का प्लान है। खासकर अफ्रीका में कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। रचना डूबी नहीं है। लेकिन वो तैर रही है बहुत तेज बहते पानी में। अगले दो-ती साल बताएंगे कि आई लव यू रचना कहने वाली जनरेशन का नस्टाल्जिया और जंप इन का 350 करोड़ का दांव मिलकर एक नई कहानी लिख पाते हैं या नहीं। रसना की यह कहानी आपके लिए लिखी थी रवि सुमन ने और इरशाद ने इसे अलिफ लेला के एपिसोड के रूप में रिकॉर्ड किया। आप देखते रहिए खबरगां।

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