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पाकिस्तानी शियाओं को क्यों निकाल रहा UAE?

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अफ्रीका में एक कहावत है जब दो हाथी लड़ते हैं तो सबसे ज्यादा नुकसान घास का होता है। आज यूएई में रहने वाले पाकिस्तानी शिया समुदाय वही घास बन गया है। अमेरिका ईरान युद्ध, यूएई और पाकिस्तान के बिगड़ते रिश्ते और शिया समुदाय को लेकर खाड़ी देशों के पुराने डाउट्स के बीच पाकिस्तानी शियाओं पर दबाव बढ़ गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरानी हमलों के बाद यूएई ने हजारों पाकिस्तानी शियाओं को देश से निकालना शुरू कर दिया है। यूएई में बड़ी संख्या में पाकिस्तानी मजदूर रहते और काम करते हैं। एसोसिएशन ऑफ ओवरसीज पाकिस्तानीज के मुताबिक करीब

18 लाख पाकिस्तानी यूएई में रहते और वहां कामगार की तरह काम करते हैं। वे वहां दूसरे सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय हैं। यह लोग पाकिस्तान की कमजोर अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है। इन्होंने पिछले साल करीब $8 अरब डॉलर पाकिस्तान भेजे थे। लेकिन अब खासतौर पर शिया पाकिस्तानी यूएई के निशाने पर आ गए हैं। अब तक यह साफ नहीं है कि कितने पाकिस्तानी शियाओं को निकाला गया है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने बड़े पैमाने पर डिपोर्टेशंस की खबरों से इंकार किया है। मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंध्राबी ने न्यूयॉर्क टाइम से कहा सिर्फ उन्हीं लोगों को निकाला गया है जिन्होंने यूएई में अपराध किया था। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि क्या शियाओं को अलग से निशाना बनाया जा रहा है। दूसरी तरफ पाकिस्तानी शिया नेता इस दावे से सहमत नहीं है।

इस्लामाबाद के शिया धर्म गुरु मोहम्मद अमीन शाहदी ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया कि उनकी संस्था अब तक 5000 डिपोर्ट किए गए परिवारों को रिकॉर्ड कर चुकी है। उन्होंने दावा किया कि असली संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है। पिछले कुछ महीने में करीब 15,000 पाकिस्तानी शियाओं को या तो यूएई से निकाला गया या उन्हें दोबारा एंट्री नहीं दी गई। यूएई का यह रवैया सिर्फ मौजूदा तनाव की वजह से नहीं है बल्कि इसके पीछे पुरानी सोच भी जुड़ी है। खाड़ी के दूसरे देशों की तरह ही यूएई में भी लंबे समय से शिया समुदाय को शक की नजर से देखा जाता रहा है। इसकी जड़े 1979 की ईरान इस्लामिक क्रांति तक जाती हैं। जिसके बाद से खाड़ी देशों में शियाओं को अक्सर ईरान के प्रभाव से जोड़कर देखा जाता है। फिर चाहे वे किसी भी देश के हो। दशकों से यूएई और सऊदी अरब जैसे देश शिया धार्मिक नेटवर्क को ईरान के प्रभाव से जोड़कर देखते रहे हैं। 1979 की क्रांति और फिर 2011 के अरब स्प्रिंग के बाद यह शक और बढ़ गया। इसी वजह से पाकिस्तान, लेबनान, इराक और अफगानिस्तान से आए शिया प्रवासियों पर क्षेत्रीय संकट के समय ज्यादा निगरानी रखी जाती रही है। इन चिंताओं के केंद्र में है विलायत ए फकीह का सिद्धांत। इसे आयतुल्लाह रूहला खुमैनी ने विकसित किया था।

यह ईरान की वैचारिक नीव मानी जाती है। इसके तहत ईरान के सर्वोच्च नेता को दुनिया भर के शिया मुसलमानों पर धार्मिक और राजनीतिक अधिकार देने की बात कही जाती है। हालांकि कई शिया मुस्लिम और धर्मुरु इस सिद्धांत को नहीं मानते। लेकिन खाड़ी देशों की सुरक्षा एजेंसियों को डर है कि इससे शियाओं की निष्ठा राष्ट्रीय सीमाओं से ऊपर जाकर ईरान की तरफ बढ़ जाती है। यही चिंता 20 अप्रैल को और बढ़ गई जब यूएई की स्टेट सिक्योरिटी डिपार्टमेंट ने दावा किया कि उसने ईरान और विलायत फकीर विचारधारा से जुड़े एक गुप्त संगठन का भंडाफोड़ किया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तानी शियाओं की बड़ी संख्या में डिपोर्टेशन के पीछे युद्ध और पाकिस्तान का कूटनीतिक रुख दोनों वजह हो सकती हैं। ईरान के यूएई पर हमले के बाद अबू धाबी पाकिस्तान से नाराज हो गया है। यूएई चाहता था कि पाकिस्तान खुलकर ईरान की निंदा करे। लेकिन इस्लामाबाद ने तठस्थ रहते हुए दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थ बनने की कोशिश की। यही रुख यूएई को पसंद नहीं आया। ईरान हमलों की वजह से खाड़ी देशों में सबसे ज्यादा नुकसान यूएई का ही हुआ है।

यूएई के रक्षा मंत्रालय का दावा है कि उसने करीब 3000 ईरानी हमलों को रोका जिनमें एयरपोर्ट्स, रिहााइशी इलाके और फजेरा ऑयल टर्मिनल जैसे अहम ठिकाने निशाने पर थे। यूएई अब ईरान से बदला लेने के मूड में है और उसने दूसरे खाड़ी देशों के साथ मिलकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप पर युद्ध जारी रखने का दबाव भी डाला है। यहां तक कि ब्रिक्स के एक जॉइंट स्टेटमेंट में भी यूएई ने ईरान के हमलों की साफ निंदा करवाने की कोशिश की थी। ऐसे माहौल में पाकिस्तान की युद्ध खत्म कराने और मध्यस्थ बनने की कोशिश यूएई को बिल्कुल पसंद नहीं आई। फाइनेंसियल टाइम्स की रिपोर्ट की मानें तो यूएई ने पाकिस्तान से ईरान के खिलाफ ज्यादा सख्त रुख अपनाने को कहा था। लेकिन पाकिस्तान नहीं माना। इसके बाद असर तुरंत देखने को मिला। अबू धाबी ने पाकिस्तान को दिया 3.5 अरब डॉलर का कर्ज वापस मांग लिया जो पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग पांचवा हिस्सा था।

हालात संभालने के लिए सऊदी अरब को $3 अरब डॉलर जमा कराकर पाकिस्तान की मदद करनी पड़ी। इसी दौरान शिया नेताओं का आरोप है कि यूएई ने व्यवस्थित तरीके से पाकिस्तानी शियाओं को निकालना शुरू कर दिया। इस कारवाही से हजारों पाकिस्तानी प्रवासियों की सालों की कमाई और रोजगार पर असर पड़ा है। कई लोगों का आरोप है कि उन्हें आखिरी समय में फोन, नकदी और बैंक कार्ड तक से वंचित कर दिया गया। उन्हें ना तो अपने मालिकों से संपर्क करने दिया गया और ना ही बकाया वेतन लेने या अपना सामान समेटने का मौका मिला। पाकिस्तानी शिया समुदाय से मनमाना डिपोटेशन बता रहा है। लेकिन यह भी सच है कि हर देश को अपनी सुरक्षा और स्थिरता को प्राथमिकता देने का अधिकार होता है। खासकर तब जब वो बाहरी हमलों का सामना कर रहा हो। यूएई भी इसी तर्क का इस्तेमाल कर रहा है। फिलहाल इस खबर में इतना ही। मेरा नाम है निकिता। कैमरे के पीछे हैं उदित। देश और दुनिया की बाकी खबरों के लिए देखते रहिए द लन टॉप। वीडियो अच्छा लगा हो तो लाइक कमेंट भी कीजिए और अगर अब तक आपने द ललन टॉप चैनल सब्सक्राइब नहीं किया है तो इसे सब्सक्राइब करना ना भूलें।

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