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जया बच्चन की वो ‘श्राप’ जैसी भविष्यवाणी, और देश के पहले सुपरस्टार का पतन!

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साल 1971 का बेंगलुरु एक लॉटरी का ड्रॉ निकलना था। शहर की सड़कों पर ऐसा सन्नाटा था जैसे कोई बड़ा तूफान आने वाला हो और वो तूफान आया एक स्टेडियम में जहां करीब 500 लोग जमा थे। वो किसी इनाम के लिए नहीं आए थे। वो आए थे उस शख्स के लिए जो इनाम का ऐलान करने वाला था। जैसे ही वो शख्स मंच पर पहुंचा एक पल के लिए 500 लोगों की सांसे थम गई। और फिर जो शोर उठा उसने आसमान हिला दिया। लोग चिल्ला रहे थे, रो रहे थे, एक दूसरे पर गिर रहे थे। यह पागलपन देखकर मंच पर खड़ा वो शख्स खुद भी एक बच्चे की तरह रो पड़ा। उस दिन उसे पहली बार एहसास हुआ कि वो सिर्फ एक एक्टर नहीं, एक जादू बन चुका है। एक ऐसा भगवान जिसे उसके भक्त पूज रहे थे।

वो सुपरस्टार कोई और नहीं वो थे राजेश खन्ना। अब सीन बदलते हैं। वक्त का पहिया घूम चुका है। साल है 1990 के दशक का। जगह दिल्ली का एक ट्रैफिक सिग्नल। एक सरकारी गाड़ी लाल बत्ती पर आकर रुकती है। अंदर वही शख्स बैठा है। लेकिन अब वह एक सुपरस्टार नहीं एक सांसद है। उसकी नजर सामने वाली गाड़ी में बैठी एक 7 साल की बच्ची पर पड़ती है। वो बच्ची उसे नहीं पहचानती। लेकिन राजेश खन्ना को अपनी पुरानी आदत खींच लाती है। वो मुस्कुराते हैं। गर्दन को उसी खास अंदाज में हल्का सा झुकाते हैं और आंखें चपकाते हैं। यह वही अंदाज था जिसने कभी लाखों दिलों को पिघला दिया था। लेकिन बच्ची पर कोई असर नहीं पड़ता। वह मुंह बनाकर दूसरी तरफ देखने लगती है। तभी ट्रैफिक सिग्नल ग्रीन हो जाता है और गाड़ी आगे बढ़ जाती है और राजेश खन्ना हिंदुस्तान का पहला सुपरस्टार अकेला बैठा रह जाता है। एक वो दिन था जब 500 लोग उसे देखकर रोए और एक यह दिन जब एक बच्ची ने उसे पहचाना तक नहीं। अर्श से फर्श का यह सफर कैसे तय हुआ। वो कौन सी गलतियां थी जिसने एक सितारे को गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिया। जतिन नाम का लड़का कैसे राजेश खन्ना बना और कैसे यह लड़का 10,000 एक्टर्स की भीड़ को चीर कर सफलता के पायदान चढ़ा। क्या थी कहानी उस बंगले की जिसे राजेश खन्ना ने राजेंद्र कुमार से खरीदा था और साथ ही बात होगी उस वाक्य की भी जब उन्हीं के दरबार के दो प्यादों ने उनका पासा पलट दिया। नमस्कार, मैं हूं भूपेंद्र सोनी और आप देख रहे हैं खबरगांव और यह किस्सा है हिंदुस्तान के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना का जहां हम सुनाएंगे उनकी शोहरत और तन्हाई की अनकही कहानी।

[संगीत] यह कहानी सिर्फ एक सितारे के बनने और टूटने की नहीं है। यह कहानी है शोहरत के उस नशे की जो इंसान को भगवान तो बना सकता है लेकिन आखिर में उसे अकेला छोड़ देता है। तो चलिए शुरुआत से शुरू करते हैं उस लड़के की कहानी से जिसका नाम राजेश नहीं जतिन था। [संगीत] कहानी शुरू होती है एक लड़के से नाम था जतिन खन्ना लेकिन घरवाले उसे काका बुलाते थे। उनकी पैदाइश 29 दिसंबर 1942 को अमृतसर में हुई। लेकिन परिवार असल में लाहौर का था। खन्ना परिवार रेलवे के बड़े ठेकेदारों में से था जो बंटवारे से कुछ साल पहले ही बॉम्बे आकर बस गया था। ठाकुर द्वार के सरस्वती निवास में एक बड़ा सा घर था। जहां दादा अकरूमल खन्ना, उनके तीन बेटे, बहुएं और ढेर सारे नातीपोते एक साथ रहते थे। एक भरा पूरा समृद्ध और खुशहाल परिवार। जतिन अपने असली मां-बाप नंदलाल और चंद्रानी खन्ना के दूसरे बेटे थे। लेकिन उनकी किस्मत में एक बड़ा मूड़ लिखा था। परिवार में जतिन के चाचा चाची, चुन्नी लाल और लीलावती बेऔलाद थे। कहते हैं कि जतिन की मां चंद्रानी ने अपने बेटे को उसके पैदा होने से पहले ही अपनी देवरानी को देने का वादा कर दिया था और वह वादा निभाया भी गया। बहुत छोटी उम्र में जतिन को उनके चाचा-चाची ने गोद ले लिया। अब जतिन के दो मां-बाप थे और दोनों का बेशुमार प्यार था। खासकर उनकी नई मां लीलावती का। वो जतिन को एक राजकुमार की तरह पाल रही थी। सुबह जब तक जतिन खुद ना उठे उनके कमरे के पास किसी को जाने की इजाजत नहीं थी। उनके लिए खास जरी वाले रेशमी कपड़े सिलवाए जाते। हर जिद पूरी होती। एक बार जतिन ने साइकिल की ज़िद पकड़ ली। जब तक साइकिल नहीं मिली वो रोता रहा। कुछ महीने बाद उसने कंपाउंड से बाहर साइकिल चलाने का वादा तोड़ा तो पिता चुन्नी लाल ने डांटा मगर मां लीलावती ढाल बनकर खड़ी हो गई। इस लाड़ प्यार ने जतिन के मन में एक बात बैठा दी थी कि वह खास है। बाकियों से अलग। वह बाद में खुद मजाक में कहते थे,

मेरी परवरिश ही गलत हुई है। वह बताते थे कि अगर वह ₹5 मांगते तो उन्हें ₹10 मिलते थे। स्कूल जाना है या नहीं यह भी अक्सर वही तय करते थे। इसी परवरिश की वजह से वह वक्त और पैसे की कीमत कभी समझ ही नहीं पाए। एक दिन जब वो करीब 10 साल के थे, वह अपने पिता के दफ्तर पहुंचे और उनकी कुर्सी पर बैठकर कॉमिक्स पढ़ने लगे। तभी उनके मामा केके तलवार वहां आ गए और उन्हें डांटते हुए बोले किसी और की कुर्सी पर बैठने से पहले यह सोचो कि तुम उसके लायक हो भी या नहीं। यह बात जतिन के दिल में तीर की तरह चुभ गई। उस दिन घर आकर जब उन्होंने अपनी मां लीलावती से इसका मतलब पूछा तो उन्होंने समझाया कि मेहनत ही इंसान को किसी चीज के लायक बनाती है। यह जतिन की जिंदगी का पहला और सबसे बड़ा सबक था। परिवार का बड़ा बिजनेस था। तय था कि जतिन भी एक दिन यही काम संभालेंगे। लेकिन उनके दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। थिएटर का कीड़ा लग चुका था। स्कूल कॉलेज के नाटकों में वह पूरी जान लगा देते। बॉम्बे के केसी कॉलेज में उन्हें एक दोस्त और कॉम्पिटिट दोनों मिला। नाम था रवि कपूर। वही रवि कपूर जिन्हें दुनिया बाद में जितेंद्र के नाम से जानेगी। दोनों अक्सर एक ही रोल के लिए ऑडिशन देते। कभी एक जीतता तो कभी दूसरा। जतिन ऑडिशन देने उस जमाने की सबसे लेटेस्ट स्पोर्ट्स कार में जाते थे। उनकी जेब में महीने का ₹1000 का भत्ता होता था। यह वो रकम थी जो दूसरे स्ट्रगलर्स शायद साल भर में भी नहीं कमा पाते थे। वक्त तेजी से निकल रहा था। एक दिन उनके पिता चुन्नी लाल ने आखिरी फरमान सुना दिया। तुम्हारे पास 5 साल है। या तो कुछ बनकर दिखाओ वरना फैमिली बिजनेस में लग जाओ। किस्मत से जल्द ही रवि कपूर को वी शांताराम की फिल्म गीत गाया पत्थरों ने में लीड रोल मिल गया और उन्होंने अपना स्क्रीन नेम रख लिया जितेंद्र। यह वही नाम था जो जतिन अपने लिए चाहते थे। अब जतिन को एक नए नाम की जरूरत थी। कहते हैं केके तलवार ने उन्हें यह नाम दिया। एक ऐसा नाम जो जितेंद्र से भी बड़ा हो। जितेंद्र यानी इंद्र को जीतने वाला। तो जतिन का नया नाम हुआ राजेश यानी देवताओं का भी राजा। अब बस इस नाम को अपनी किस्मत बनाना बाकी था। [संगीत] 1965 में हिंदी सिनेमा के बड़े-बड़े नाम एक साथ आए। जीपी सिपी, बी आर चोपड़ा, शक्ति सामंत और नासिर हुसैन जैसे दिग्गज। मकसद था नए चेहरे की तलाश। इसके लिए फिल्मफेयर मैगजीीन के साथ मिलकर एक टैलेंट कॉन्टेस्ट रखा गया। नाम था यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स फिल्मफेयर टैलेंट हंट। ऐलान हुआ कि जो जीतेगा उसे यह सभी बड़े प्रोड्यूसर्स अपनी फिल्म में बतौर हीरो लेंगे। यह खबर आग की तरह फैल गई। देश भर से 10,000 से ज्यादा नौजवानों ने अपनी किस्मत आजमाने के लिए फॉर्म भर दिए। राजेश ने भी बस यूं ही फॉर्म भर दिया था। उन्हें ज्यादा उम्मीद नहीं थी

। लेकिन हजारों की भीड़ को पीछे छोड़ते हुए वो टॉप सिक्स फाइनलिस्ट में पहुंच गए। अब मुकाबला कांटे का था। सामने एक और दमदार कलाकार था विनोद मेहरा। सबको लग रहा था कि बाजी इन्हीं दोनों में से कोई एक मारेगा। फाइनल ऑडिशन का दिन आया। जजों की कुर्सी पर इंडस्ट्री के वही बड़े-बड़े नाम बैठे थे। सभी फाइनलिस्ट को एक सीन दिया गया। सीन था एक बेटे का जो अपनी मां से अपने प्यार का इजहार कर रहा था। सब अपनी-अपनी तैयारी में लग गए। लेकिन राजेश खन्ना चुपचाप खड़े थे। कागज उनके हाथ में था। पर दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। वो सीधे जज जीपी सिप्पी के पास पहुंचे और पूछा यह जो किरदार है यह अमीर है या गरीब मां के साथ रहता है या अकेला इसका स्वभाव कैसा है सिप्पी साहब हैरान रह गए यह थिएटर वाला लड़का फिल्मी दुनिया का तरीका कहां जानता था उन्होंने झुंझला कर कहा अरे भाई तुम थिएटर से हो जो मर्जी हो वो कर दो यह सुनना था कि राजेश खन्ना के अंदर का कलाकार जाग गया जब उनकी बारी आई तो उन्होंने जजों के दिए हुए सीन को एक तरफ रख दिया और अपने ने एक पुराने नाटक का मोनोलॉग सुनाना शुरू कर दिया। कहानी थी एक ऐसे गरीब लड़के की जिसे यकीन नहीं हो रहा था कि कोई लड़की उससे प्यार कर सकती है। आखिर में पता चलता है कि वह लड़की अंधी है। इसलिए उसे लड़के की बाहरी शक्ल सूरत से फर्क नहीं पड़ता। इस परफॉर्मेंस ने जजों को हिला कर रख दिया। राजेश खन्ना सिर्फ एक वोट से विनोद मेहरा को हराकर वह कॉन्टेस्ट जीत गए। 10,000 की भीड़ में से एक लड़का अब रातोंरात 12 बड़ी फिल्मों का हीरो बन चुका था। लेकिन किस्मत का खेल अभी बाकी था। कॉन्टेस्ट जीतने के बावजूद किसी भी बड़े प्रोड्यूसर के पास उनके लिए कोई स्क्रिप्ट तैयार नहीं थी। इंतजार लंबा होने लगा। इसी बीच उन्हें एक ऐसी फिल्म मिली जो कॉन्टेस्ट का हिस्सा थी ही नहीं। डायरेक्टर थे चेतन आनंद देवानंद के बड़े भाई। फिल्म का नाम था आखिरी खत जो 1966 में आई थी। यह एक एक्सपेरिमेंटल फिल्म थी। इसके क्लाइमेक्स के लिए चेतन आनंद चाहते थे कि राजेश के चेहरे पर असली थकान और बेबसी दिखे। इसके लिए उन्होंने राजेश खन्ना को 3 दिन तक सोने नहीं दिया और ठीक से खाना भी नहीं खाने दिया। जब शॉट लिया गया तो नतीजा पर्दे पर साफ नजर आया। यह फिल्म बुरी तरह फ्लॉप हो गई। फिर आई उनकी ऑफिशियल लॉन्च फिल्म जीपी सिप्पी की राज जो 1967 में आई। इसमें राजेश का डबल रोल था। फिल्म के क्रेडिट में बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था जीपीसीपी प्राउडली इंट्रोड्यूसेस राजेश खन्ना। यह फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर ओंधे मुंह गिरी। इसके बाद आई नासिर हुसैन की बहारों के सपने। यह भी 1967 में आई। यह एक गंभीर फिल्म थी जिसे नासिर हुसैन ने ब्लैक एंड वाइट में बनाया था। दर्शकों ने उनकी गंभीर फिल्म को सिरे से नकार दिया। यह राजेश खन्ना की लगातार तीसरी फ्लॉप थी। जिस लड़के ने 10,000 लोगों को हराकर फिल्मों में एंट्री ली थी, उसका किरदार शुरू होने से पहले ही खत्म होता दिख रहा था। इंडस्ट्री में कानाफूसी होने लगी थी। क्या यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स का फैसला गलत था? राजेश खन्ना के सिर पर नाकामी की तलवार लटक रही थी। उन्हें एक हिट की सख्त जरूरत थी। [संगीत] राजेश खन्ना का करियर एक ऐसी नाप बन चुका था जिसमें तीन बड़े छेद हो चुके थे। आखिरी खत, राज, बहारों के सपने, तीन फिल्में, तीनों फ्लॉप। इंडस्ट्री में फुसफुसाहट शुरू हो गई थी। लड़के में वह बात नहीं है। टैलेंट कॉन्टेस्ट जीतना एक बात है और स्टार बनना दूसरी। राजेश खन्ना के पास वक्त कम था और साबित करने के लिए बहुत कुछ था। उन्हें एक मौके की तलाश थी। एक ऐसे मौके की जो या तो उन्हें हमेशा के लिए डुबो देता या फिर सीधे आसमान पर पहुंचा देता। यह मौका उन्हें मिला डायरेक्टर शक्ति सामंत की वजह से। शक्ति सामंत उन दिनों शमी कपूर के साथ अपनी अगली बड़ी फिल्म जाने अनजाने की तैयारी कर रहे थे। लेकिन अपनी पत्नी गीता बाली की मौत के बाद शमी कपूर डिप्रेशन में थे और शूटिंग के लिए तैयार नहीं थे। सामंत साहब इंतजार नहीं करना चाहते थे। उन्होंने फैसला किया कि इस खाली वक्त में एक छोटी कम बजट की फिल्म बना लेते हैं। हीरो के लिए उन्होंने उसी लड़के को चुना जिसे उन्होंने टैलेंट हंट में जिताया था। राजेश खन्ना। फिल्म का नाम था आराधना। लेकिन किस्मत यहां भी राजेश खन्ना का इम्तिहान ले रही थी। आराधना की कहानी असल में हीरोइन की कहानी थी। हीरो का रोल काफी छोटा था। वो एक एयरफोर्स पायलट था जो इंटरवल से पहले ही एक प्लेन क्रैश में मर जाता था। कहानी का दूसरा हिस्सा हीरोइन और उसके बेटे के संघर्ष का था। राजेश खन्ना सिर्फ पिता का रोल करने वाले थे। लेकिन शूटिंग शुरू होने से ठीक एक दिन पहले एक ऐसा ड्रामा हुआ जिसने सब कुछ बदल दिया। शक्ति सामंत अपने दोस्त और प्रोड्यूसर सुरिंदर कपूर की एक फिल्म देखने गए। नाम था एक श्रीमान एक श्रीमती। फिल्म देखतेदेखते उनके होश उड़ गए। उस फिल्म का क्लाइमेक्स हूबहू आराधना जैसा था। वजह दोनों फिल्मों के राइटर एक ही थे। सचिन भौमिक। सामन साहब को लगा कि उनकी फिल्म रिलीज होने से पहले ही पिट जाएगी।

उन्होंने गुस्से में आराधना को बंद करने का फैसला कर लिया। उसी शाम मशहूर नोवेलिस्ट गुलशन नंदा उनसे मिलने आए। सामंत साहब ने उन्हें अपनी परेशानी बताई। गुलशन नंदा और उनके साथी राइटर्स ने सामंत साहब को समझाया कि स्क्रिप्ट अच्छी है। इसे बंद मत करो। बस क्लाइमेक्स बदल दो। उस रात करीब 10:00 बजे तक तीनों लोग स्क्रिप्ट पर बैठे रहे और वहीं उस कमरे में एक ऐसा आईडिया निकला जिसने राजेश खन्ना की तकदीर बना दी। तय हुआ कि फिल्म में हीरो का एक बेटा भी होगा और उसकी शक्ल बिल्कुल अपने पिता जैसी होगी। यानी राजेश खन्ना अब डबल रोल में होंगे। जो हीरो इंटरवल में मरने वाला था वो अब क्लाइमेक्स में दोबारा एंट्री करने वाला था। एक मामूली सा रोल अब फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण बन चुका था। स्क्रिप्ट की तरह फिल्म के संगीत के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। सामंत साहब गानों के लिए मोहम्मद रफी को लेना चाहते थे। लेकिन रफी साहब 3 महीने के लंबे वर्ल्ड टूअर पर थे और सामंत साहब के पास इंतजार करने का वक्त नहीं था। तब एसडी बर्मन ने उन्हें किशोर कुमार का नाम सुझाया। किशोर कुमार उस वक्त तक एक बड़े सिंगर नहीं माने जाते थे। वो अपनी कॉमेडी और एक्टिंग के लिए ज्यादा मशहूर थे। लेकिन जब किशोर कुमार ने मेरे सपनों की रानी और रूप तेरा माना जैसे गाने गाए तो एक नया इतिहास बन गया। यह एक एक्सीडेंट था। लेकिन इसी एक्सीडेंट ने राजेश खन्ना किशोर कुमार की उस अमर जोड़ी को जन्म दिया जिसने दशकों तक हिंदुस्तान के दिलों पर राज किया। फिल्म के रिलीज से पहले डिस्ट्रीब्यूटर्स ने एक और अड़ंगा लगा दिया। उन्हें यह बात हजम नहीं हो रही थी कि फिल्म का हीरो हीरोइन को मां कहेगा। उन्होंने सामंत साहब से बेटे का रोल किसी और एक्टर से करवाने को कहा, लेकिन शक्ति सामंत अड़े रहे। फिल्म रिलीज हुई और पहले हफ्ते कुछ खास नहीं चली। राजेश खन्ना की सांसे अटकी हुई थी। लेकिन फिर जो हुआ वो हिंदी सिनेमा के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था। दूसरे हफ्ते से थिएटर्स के बाहर भीड़ लगनी शुरू हो गई। आधा-आधा किलोमीटर लंबी लाइनें। लोग बस एक ही नाम ले रहे थे। राजेश खन्ना उनकी मुस्कान, उनका गर्दन झुकाने का अंदाज, उनका पलकें झपकाना देश पागल हो गया था। लड़कियों ने उन्हें खून से खत लिखने शुरू कर दिए। कुछ ने उनकी तस्वीर से शादी कर ली। उनकी सफेद गाड़ी लिपस्टिक्स के निशानों से लाल हो जाती थी। कुछ लड़कियां तो उनकी गाड़ी के टायरों से लगी धूल को अपनी मांग में सिंदूर की तरह भर लेती थी। आराधना के बाद राजेश खन्ना ने जो किया वो एक रिकॉर्ड है। 1969 से 72 के बीच उन्होंने लगातार 15 सोलो हिट फिल्में दी। यह वो कारनामा था जिसके लिए इंडस्ट्री तैयार नहीं थी। यह सिर्फ एक एक्टर का उदय नहीं था। यह एक फिनोमिना का जन्म था। एक ऐसा तूफान जिसने पुराने सारे बादशाहों के तख्त हिला दिए थे। जतिन खन्ना अब वाकई राजेश बन चुका था। [संगीत] 1970 का दशक शुरू हो चुका था। राजेश खन्ना अब सिर्फ एक नाम नहीं थे। वो एक एहसास बन चुके थे। एक ऐसा नशा जो पूरे हिंदुस्तान के सर चढ़कर बोल रहा था। अब उन्हें एक ऐसे घर की जरूरत थी जो उनकी इस नई हैसियत से मेल खाता हो। उनकी नजर पड़ी काटर रोड पर समंदर किनारे बने एक बंगले पर। यह बंगला मशहूर एक्टर राजेंद्र कुमार का था। इसका नाम था डिंपल। लेकिन इंडस्ट्री में यह बंगला भूत बंगला के नाम से मशहूर था। कहते हैं कि जब राजेंद्र कुमार ने इसे खरीदा था तब यह एक भूतिया हवेली मानी जाती थी। लेकिन इस घर में आने के बाद ही उनकी किस्मत चमक पड़ी थी। वह जुबली कुमार कहलाए जाने लगे। राजेश खन्ना को लगा कि यह घर राजेंद्र कुमार के लिए लकी साबित हुआ है तो उनके लिए भी होगा। ऐसे में राजेंद्र कुमार से बंगला खरीदा गया और खन्ना ने कुमार से घर का नाम डिंपल ही रखने की गुजारिश की। लेकिन राजेंद्र कुमार ने मना कर दिया क्योंकि उन्होंने अपने नए घर का नाम भी डिंपल ही रखा था। तब राजेश खन्ना के पिता ने एक अनोखा नाम सुझाया। आशीर्वाद। इसके पीछे सोच यह थी कि अगर कोई दुश्मन भी उन्हें चिट्ठी लिखेगा तो उसे पते में आशीर्वाद लिखना ही पड़ेगा। इस तरह हर नफरत भी दुआ बनकर उन तक पहुंचेगी। उन्होंने फिल्म हाथी मेरे साथी सिर्फ इसलिए साइन की ताकि उस पैसे से वह यह बंगला खरीद सके। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक उस वक्त राजेश खन्ना ने ₹3.5 लाख में यह बंगला खरीदा था। आशीर्वाद अब राजेश खन्ना की सल्तनत का किला बन चुका था और इस किले में हर शाम एक दरबार सजता था। बंगले का गैराज एक बड़े से बार में तब्दील कर दिया गया था। जहां रेड लेबल स्कॉच पानी की तरह बहती थी और बाहर बड़े-बड़े प्रोड्यूसर्स और डायरेक्टर्स घंटों लाइन में खड़े रहते थे। बस अपने बादशाह की एक झलक पाने के लिए। राजेश खन्ना अपने मशहूर रेशमी लुंगी कुर्ते में दरबार में हाजिर होते। उनकी कुर्सी बाकी सबसे ऊंची रखी जाती थी ताकि राजा और प्रजा का फर्क साफ नजर आए। इस दरबार के नियम सख्त थे। जो राजेश खन्ना की हां में हां मिलाता वो उनका खास बन जाता और जो कोई सवाल उठाने की हिम्मत करता उसे दरबार से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता। उनका तकिया कलाम था। आपको हमारा दरबार छोड़ना पड़ेगा। इस दरबार में सिर्फ चापलूसों की जगह थी जो रात भर किंग काका की शान में कसीदे पड़ते थे। यह नशा अब राजेश खन्ना पर पूरी तरह हावी हो चुका था। वो सेट पर घंटों लेट पहुंचते। आलम यह था कि वह अपनी पहली फिल्म राज के पहले दिन की शूटिंग पर भी लेट पहुंचे थे। लेकिन अब कोई उनसे सवाल नहीं कर सकता था। वह जानते थे कि डायरेक्टर इंतजार करेगा क्योंकि फिल्म का चलना उनके नाम से तय था। यह वो दौर था जब एक नया नारा गूंजने लगा था। ऊपर आका नीचे काका। यानी आसमान में भगवान है और जमीन पर राजेश खन्ना। बेंगलुरु के उस स्टेडियम वाले किस्से के बाद जो हमने शुरुआत में बताया था राजेश खन्ना को भी यकीन हो चला था कि वह कोई मामूली इंसान नहीं है। वो खुद को भगवान समझने लगे थे। इसी दौर में एक फिल्म आई जिसने उनके इस यकीन को और पुख्ता कर दिया। नाम था आनंद। यह कहानी थी कैंसर से जूझ रहे एक ऐसे इंसान की जो मौत की आंखों में आंखें डालकर जिंदगी जीना सिखा रहा था। इस फिल्म का डायलॉग बाबू मुशाय जिंदगी बड़ी होनी चाहिए लंबी नहीं। लोगों के जहन में हमेशा के लिए बस गया। इस फिल्म ने उन्हें सिर्फ एक रोमांटिक हीरो नहीं बल्कि एक बेहद संजीदा एक्टर के तौर पर स्थापित कर दिया। लेकिन आनंद ने राजेश खन्ना को सिर्फ शोहरत नहीं दी। उसने उनके सामने एक ऐसा एक्टर खड़ा कर दिया था जो आगे चलकर उनकी सल्तनत के लिए सबसे बड़ा खतरा बनने वाला था। नाम था अमिताभ बच्चन। [संगीत] राजेश खन्ना अपनी सल्तनत के खुदा बन चुके थे। लेकिन हर सल्तनत में बगावत के बीज भी पनपते हैं। राजेश खन्ना के दरबार में भी दो ऐसे लोग थे जो जल्द ही एक नई सल्तनत की बुनियाद रखने वाले थे। उनके नाम थे सलीम खान और जावेद अख्तर। वही सलीम जावेद जिन्हें हाथी मेरे साथी में पहला बड़ा मौका दिलाने में राजेश खन्ना का बड़ा हाथ था। लेकिन काका का बर्ताव अब बदल चुका था। उनके साथ काम करना बेहद मुश्किल था क्योंकि कोई नहीं जानता था कि वह अगले पल क्या करेंगे। वो इस यकीन में जीने लगे थे कि उनकी फिल्में सिर्फ उनके नाम से ही चलती हैं। राइटर या डायरेक्टर की वजह से नहीं। नतीजा यह हुआ कि जिस जोड़ी ने उनके लिए सबसे बड़ी हिट लिखी थी, अब वो उनसे दूर होती जा रही थी। इसी दौरान बॉम्बे की फिल्मी दुनिया में एक और लड़का संघर्ष कर रहा था। लंबा कद, गहरी आवाज लेकिन किस्मत साथ नहीं दे रही थी। एक के बाद एक करीब 13 फिल्में फ्लॉप हो चुकी थी। उसका नाम था अमिताभ बच्चन। सलीम जावेद ने एक स्क्रिप्ट लिखी थी। एक ऐसे पुलिस वाले की कहानी जो ईमानदार था लेकिन वो सैल था जो सिस्टम से नहीं अपने तरीके से लड़ता था। उस दौर के हर बड़े सितारे ने वो स्क्रिप्ट ठुकरा दी। धर्मेंद्र, देवानंद, राजकुमार सब ने मना कर दिया। तब सलीम जावेद ने उस लंबे फ्लॉप एक्टर पर दांव लगाया। उन्होंने प्रकाश मेहरा को बॉम्बे टू गोवा में अमिताभ का एक एक्शन सीन दिखाया और कहा यह है हमारा हीरो। 1973 में जब वो फिल्म रिलीज हुई तो उसने हिंदी सिनेमा का व्याकरण ही बदल दिया। फिल्म का नाम था जंजीर। हिंदुस्तान को अपना एंग्री यंग मैन मिल चुका था। उसी साल डायरेक्टर ऋषिकेश मुखर्जी अपनी अगली फिल्म नमक हराम बना रहे थे। उन्होंने एक बार फिर अपनी आनंद वाली जोड़ी को साथ लिया। राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन। राजेश खन्ना को अब तक एक अंधविश्वास हो चला था। उन्हें लगता था कि जिस फिल्म में उनके किरदार की मौत होती है वो सुपरहिट हो जाती है। नमक हराम की असली कहानी में मौत अमिताभ बच्चन के किरदार की होनी थी। लेकिन राजेश खन्ना अड़ गए। उन्होंने ऋषिकेश मुखर्जी से जिद करके स्क्रिप्ट बदलवा दी और मौत का सीन अपने लिए लिखवा लिया। फिल्म के सेट पर दोनों के बीच की टक्कर साफ दिख रही थी। बावर्ची के सेट पर जहां जया भादुड़ी भी थी, राजेश खन्ना अक्सर अमिताभ को देखकर ताना मारते थे। वह जया से कहते थे, “क्यों तुम इस आदमी के साथ घूमती हो। तुम्हारा कुछ नहीं होगा।” एक दिन जया ने पलट कर जवाब दिया, एक दिन देखना यह कहां होगा और तुम कहां होगे? और जया की भविष्यवाणी सच साबित हुई। नमक हराम में पासा उल्टा पड़ गया। फिल्म में राजेश खन्ना का किरदार तो मर गया लेकिन क्लाइमेक्स में सारी बाजी अमिताभ बच्चन मार ले गए। उनका गुस्सा, उनका दर्द पर्दे पर ऐसा छाया कि राजेश खन्ना की मौत फीकी पड़ गई। एक्टर सचिन पिलगांवकर याद करते हैं कि जब उन्होंने थिएटर में फिल्म देखी तो लोग राजेश खन्ना के लिए नहीं बल्कि अमिताभ बच्चन के डायलॉग्स पर तालियां बजा रहे थे।

यह इशारा था कि हवा का रुख बदल रहा है। कहते हैं इस फिल्म के प्रीमियर पर राजेश खन्ना ने खुद ऋषिकेश मुखर्जी से कहा था यह है कल का सुपरस्टार। इस टकराव का आखिरी कील साबित हुई दीवार फिल्म। प्रोड्यूसर गुलशन राय ने राजेश खन्ना को साइन किया हुआ था। इसलिए वह चाहते थे कि विजय का रोल काका करें। लेकिन सलीम जावेद अड़ गए। उन्होंने साफ कह दिया विजय का रोल या तो अमिताभ बच्चन करेंगे या कोई नहीं। हम स्क्रिप्ट नहीं देंगे। यश चोपड़ा को झुकना पड़ा। वह फिल्म अमिताभ बच्चन को मिली और उसने उन्हें सुपरस्टार बना दिया। जिस बादशाह ने कभी सलीम जावेद को मौका दिया था, उसी बादशाह के लिए अब उनकी नई सल्तनत के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो चुके थे। रोमांस का दौर खत्म हो रहा था और गुस्से का तूफान दस्तक दे रहा था। [संगीत] राजेश खन्ना की शोहरत का तूफान जितना तेज था उनकी निजी जिंदगी में भी उतना ही बड़ा बवंडर चल रहा था। 7 साल से उनके साथ एक ही नाम जुड़ा था अंजू महेंद्रू। अंजू सिर्फ उनकी गर्लफ्रेंड नहीं थी। वो उनकी हमरास भी थी। उनकी ताकत थी। जब जतिन खन्ना स्ट्रगल कर रहे थे तब अंजू उनके साथ थी। वो एक मॉडर्न आजाद ख्यालों वाली लड़की थी जो फिल्मी दुनिया से ताल्लुक रखती थी। राजेश खन्ना उनके प्यार में इस कदर डूबे थे कि वह बेहद पज़ेसिव हो गए थे। अंजू अगर दोस्तों के साथ बाहर जाती तो वह बेचैन हो जाते। अगर अंजू स्कर्ट पहनती तो वह टोकते साड़ी क्यों नहीं पहनती हो? और जब वो साड़ी पहनती तो कहते यह भारतीय नारी वाला लुक क्यों अपना रखा है? यह रिश्ता अजीब था। राजेश खन्ना चाहते थे कि अंजू उनकी दुनिया में सिमट कर रह जाए। लेकिन अंजू की अपनी एक पहचान थी। अपने सपने थे। वो एक कामयाब मॉडल थी और एक्ट्रेस बनना चाहती थी। लेकिन राजेश खन्ना को यह मंजूर नहीं था। वो एक पारंपरिक पत्नी चाहते थे और अंजू एक पारंपरिक पत्नी बनने को तैयार नहीं थी। जब राजेश खन्ना सुपरस्टार बने तो यह टकराव और बढ़ गया। हजारों लड़कियां उन पर मरती थी और इस बात ने राजेश के अंदर की असुरक्षा को और हवा दे दी।

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