90ज का बॉलीवुड फार्मूला फिल्मों का दौर। वो वक्त जब किसी फिल्म की कामयाबी उसकी कहानी से कम और उसमें मौजूद हीरो से ज्यादा तय होती थी। कहानियां लगभग एक जैसी होती थी। हीरो प्यार करेगा, बर्फीली वादियों में गाना गाएगा, विलेन को मारेगा और फिल्म खत्म हो जाएगी। हीरो कहानी का केंद्र था और फीमेल कैरेक्टर अक्सर बस उसे सजाने के लिए मौजूद होती थी। मगर सिनेमा की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि बने हुए फार्मूलों को कभी भी तोड़ा जा सकता है। साल 1993 में एक फिल्म आती है दामिनी। फिल्म में ऋषि कपूर है, सनी देओल है, अमरीश पुरी जैसे बड़े नाम हैं। मगर इन तमाम सितारों के बीच एक चेहरा ऐसा था जिसने पूरी फिल्म को अपने कांधों पर उठा दिया। वो चेहरा था मीनाक्षी शेषादरी का। दामिनी एक ऐसी औरत की कहानी थी जो दूसरी औरत पर हो रहे जुल्म के खिलाफ खड़ी होती है। जो अपने घर, अपने रिश्ते, अपने समाज से लड़ जाती है। जो तमाम तानों, दबावों और लांछनों के बावजूद सच का साथ नहीं छोड़ती। नतीजे दामिनी हिट होती है। सालों से चले आ रहे फार्मूलों के बीच एक कल्ट क्लासिक बन जाती है। लेकिन पेशेवर जिंदगी में कामयाबी की मिसाल बनी यह फिल्म मीनाक्षी की निजी जिंदगी में कौन सा तूफान ले आई? क्यों डायरेक्टर राजकुमार संतोषी बीच फिल्म की शूटिंग से मीनाक्षी को निकाल देना चाहते थे और तब मीनाक्षी की सबसे बड़ी राइवल माधुरी दीक्षित ने कैसे उनका साथ दिया? एक ना कहने की कौन सी कीमत मीनाक्षी शेषाद्री को चुकानी पड़ी। नमस्कार, मेरा नाम है अमन और आप देख रहे हैं
खबरगांव का साहित्य, सिनेमा और कला का विशेष कार्यक्रम रफ कॉपी। आज बात उस अभिनेत्री की जो मैं 17 साल की उम्र में मिस इंडिया बनी जिसके लिए मनोज कुमार ने कहा अगर हीरोइन होगी तो यही होगी। एक ऐसी लड़की जिसका कोई फिल्म बैकग्राउंड नहीं था। लेकिन जिसने 80 और 90 के दशक की सबसे बड़ी फिल्मों में अपनी मौजूदगी दर्ज करवाई और फिर अपने करियर के सबसे ऊंचे मुकाम पर बॉलीवुड को इस तरह अलविदा कह दिया कि दोबारा कभी मुड़कर नहीं देखा। आखिर ऐसा क्या हुआ था? क्यों एक सफल, मशहूर और अपने दौर की सबसे प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों में गिने जाने वाली मीनाक्षी शेषाद्री ने अचानक फिल्मी दुनिया छोड़ दी। और सबसे बड़ा सवाल क्या बॉलीवुड का एक सच जिसे इंडस्ट्री अक्सर पर्दों के पीछे छुपा देती है। मीनाक्षी शेषाद्री की जिंदगी को भी अंदर तक प्रभावित कर चुका था। मीनाक्षी शेषाद्री की कहानी बॉलीवुड से शुरू नहीं होती। यह कहानी शुरू होती है
झारखंड के सिंधरी से। उस दौर का सिंधरी जहां फैक्ट्रियों की सायरने रोज सुबह का वक्त तय करती थी। जहां उर्वरक कारखानों के क्वार्टरों में अलग-अलग राज्यों से आए लोग साथ रहते थे। उसी सिंधरी में 16 नवंबर 1963 को एक तमिल ब्राह्मण परिवार में जन्म हुआ शशला शेषादरी का। उनके पिता फर्टिलाइजर फैक्ट्री में काम करते थे। घर में पढ़ाई वाला माहौल था। साथ में कला की मौजूदगी भी उतनी ही थी। उनकी मां भरत नाट्यम जानती थी और उन्होंने अब बहुत छोटी उम्र से ही अपनी बेटियों को नृत्य सिखाना शुरू कर दिया था। घर में दो बहनें थी निम्मी और शशिकला। मां ने दोनों के नाम इस तरह रखे थे कि आगे चलकर दोनों एक साथ भरनाट्यम की जोड़ी बने। मगर घर के भीतर एक और नाम चल पड़ा। मीनाक्षी। उनके दादा ने उनका नाम मदुरई की देवी मीनाक्षी के नाम पर रखा। उसी साल मीनाक्षी मंदिर के शिखर पर स्वर्ण कलश चढ़ाया गया था। परिवार ने इसे एक संकेत की तरह देखा और शश कला धीरे-धीरे मीनाक्षी बन गई। फिर भी घर के भीतर पुराने पड़ोसियों के बीच करीबी दोस्तों में उनका एक और नाम था चेरी। बाद में करोड़ों लोग उन्हें मीनाक्षी शेषादरी के नाम से जानेंगे। लेकिन सिंधरी के उस दायरे में वह लंबे समय तक सिर्फ चेरी रही। मीनाक्षी की साधना संगीत की दुनिया में भी शुरू हो चुकी थी। जिस उम्र में बच्चे शब्दों के आकार को अपनी जुबान पर जमाना सीखते हैं, उस उम्र में मीनाक्षी सुर और ताल का रियास करने लगी थी। भरत नाट्यम से शुरुआत हुई। फिर कुच्चीपुड़ी, ओडसी और कथक बाद के दौर में दर्शकों के ज़हन में मीनाक्षी शेषादरी के डांस स्टेप की छाप पड़ गई। असल में वो छाप बरसों की ट्रेनिंग का नतीजा थी। जिसे मीनाक्षी के तलवे की रेखाओं को समतल कर दिया था। स्कूल में भी मीनाक्षी पढ़ाई और सांस्कृतिक कार्यक्रम दोनों का हिस्सा रहती थी। तास प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेती, मंच पर जाती, लौट कर फिर सामान्य स्कूल लाइफ में शामिल हो जाती।
उनकी सहेलियां अक्सर उनसे कहती थी कि उन्हें मॉडलिंग में जाना चाहिए। उस वक्त तक मीनाक्षी का रास्ता फिल्मों की तरफ नहीं मुड़ा था। उनके जीवन में कैमरा अभी दाखिल नहीं हुआ था। दिलचस्प बात यह थी कि उनकी परवरिश दो संस्कृतियों के बीच हुई। परिवार दक्षिण भारत का था। लेकिन बचपन और युवावस्था उत्तर भारत में बीती। घर के भीतर एक दुनिया थी। बाहर दूसरी दुनिया भाषा अलग खानपान अलग माहौल अलग आगे चलकर शायद यही वजह बनी है कि पर्दे पर मीनाक्षी किसी एक दायरे में बंधी हुई अभिनेत्री नहीं लगी इसी बीच बेहतर पढ़ाई के लिए उनका परिवार दिल्ली आ गया सिंधरी का माहौल पीछे छूट चुका था अब नई जगह थी नया शहर था दिल्ली में भी पढ़ाई और रयास साथ-साथ जारी रहा स्कूल डांस क्लास हो प्रतियोगिताएं हो और उसके बाद फिर वापस घर उनकी दुनिया लंबे समय तक इसी दायरे में रही। 12वीं के आसपास एक छोटी सी घटना हुई जिसने आगे की पूरी कहानी बदल दी। छुट्टियों के दिन में उनकी नजर एक मैगजीन में छपे ब्यूटी कॉन्टेस्ट के विज्ञापन पर पड़ी। यह ई वीकली मिस इंडिया कॉन्टेस्ट था। मीनाक्षी ने उसमें हिस्सा लेने का फैसला किसी बड़े प्लान के साथ नहीं किया था। उनके लिए यह बस एक नया अनुभव था। टाइम पास जैसा था। लेकिन वही टाइम पास धीरे-धीरे पूरे देश में उनकी पहचान बन गया। साल 1981 में सिर्फ 17 साल की उम्र में मीनाक्षी शेषाद्री ने मिस इंडिया का खिताब जीता। उस समय वो यह टाइटल जीतने वाली सबसे कम उम्र की प्रतिभागियों में शामिल थी। कुछ ही समय पहले तक जो लड़की स्कूल और डांस प्रतियोगिताओं के बीच अपनी दुनिया में थी। अब वही चेहरा अखबारों, मैगजीनों और मंचों पर दिखाई देने लगा। इसके बाद उन्होंने भारत को मिस इंटरनेशनल में भी रिप्रेजेंट किया और यहीं से उनकी जिंदगी पहली बार कैमरो ग्लैमर और फिल्मी दुनिया के करीब आने लगी। मिस इंडिया जीतने के बाद मीनाक्षी के पास मॉडलिंग के ऑफर आने लगे। मैगजीन शूट हो, विज्ञापन हो, इवेंट्स हो, धीरे-धीरे उनका चेहरा लोगों की नजर में आने लगा था। इसी बीच वह पढ़ाई के सिलसिले में कुछ समय के लिए मुंबई में अपनी बहन के पास रुकी हुई थी। मुंबई में ही उनकी एक तस्वीर अखबार में छपी। वही तस्वीर अभिनेता और निर्देशक मनोज कुमार की नजर से गुजरी। उस समय मनोज कुमार अपनी फिल्म पेंटर बाबू बना रहे थे। फिल्म से वह अपने भाई राजीव गोस्वामी को लॉन्च करने वाले थे और उनके सामने एक नए चेहरे की तलाश चल रही थी। मीनाक्षी ने बाद में रेडियो लहरे को दिए एक इंटरव्यू में इस पूरे वाक्य का जिक्र किया था।
उन्होंने बताया कि एक दिन अचानक उनके घर पर मनोज कुमार के असिस्टेंट आए। असिस्टेंट ने कहा कि मनोज कुमार आपसे फिल्म के सिलसिले में मिलना चाहते हैं। मीनाक्षी अपनी बहन के साथ उनके बंगले पहुंची। मुलाकात हुई और फिर कुछ ही मिनटों में मनोज कुमार ने तय कर लिया कि उनकी फिल्म की हीरोइन यही लड़की होगी। दिलचस्प बात यह थी कि मीनाक्षी ने इससे पहले कभी एक्टिंग नहीं की थी। ना कोई एक्टिंग कोर्स, ना फिल्मी बैकग्राउंड, ना इंडस्ट्री में कोई पहचान थी। कैमरे के सामने उनका अनुभव सिर्फ मॉडलिंग तक ही सीमित था। फिर भी मनोज कुमार ने बिना किसी स्क्रीन टेस्ट के उन्हें फिल्म के लिए साइन कर लिया। बाद में उन्होंने खुद एक इंटरव्यू में कहा अगर हीरोइन होगी तो यही होगी। यहीं से पहली बार मीनाक्षी शेषादरी का नाम सीधे बॉलीवुड के दरवाजे तक पहुंच गया। एक लड़की जिसने कुछ समय पहले तक ब्यूटी कंटेस्ट में सिर्फ टाइम पास के लिए हिस्सा लिया था। अब हिंदी फिल्मों की दुनिया में अपना पहला कदम रखने जा रही थी। साल 1983 में मीनाक्षी की पहली फिल्म पेंटर बाबू रिलीज हुई। लेकिन फिल्म बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली। पहली ही फिल्म के बाद मीनाक्षी का फिल्मी दुनिया से मन हटने लगा। उन्हें लगने लगा कि शायद यह दुनिया उनके लिए नहीं है। उनका झुकाव अब भी क्लासिकल डांस की तरफ था। कैमरे, ग्लैमर और फिल्मी माहौल से ज्यादा सुकून उन्हें रियाज में ही मिलता था। इसी दौरान एक और निर्देशक नए चेहरे की तलाश में था। नाम था सुभाष ढाई। वो अपनी फिल्म हीरो बना रहे थे। उन्हें राधा मधुर के किरदार के लिए एक नई लड़की चाहिए थी। उनकी तलाश आकर मीनाक्षी पर रुकी। लेकिन मीनाक्षी इस फिल्म के लिए तुरंत तैयार नहीं हुई। पहली फिल्म के अनुभव के बाद वह कोई नई फिल्म करना ही नहीं चाहती थी। काफी बातचीत और मनाने के बाद मीनाक्षी ने आखिरकार फिल्म के लिए हां कह दी। उनके साथ फिल्म में जैकी श्रॉफ थे। शूटिंग शुरू हुई। लेकिन दिलचस्प बात यह रही कि पर्दे पर जिस जोड़ी की केमिस्ट्री लोगों को इतनी पसंद आई शूटिंग के दौरान दोनों के बीच ज्यादा बातचीत हुई ही नहीं। गुलम्ग के एक शेड्यूल में ग्लिसरीन की वजह से मीनाक्षी की आंखों में जलन हो रही थी। उन्होंने जैकी श्रॉफ से जल्दी शॉट खत्म करने को कहा। लेकिन जैकी नाराज हो गए। पूरी शूटिंग लगभग इसी दूरी के साथ चली। बाद में यूनिट के कैमरामैन की मदद से दोनों में सुलह कराई गई। साल 1983 में हीरो रिलीज होती है और सब कुछ बदल जाता है।
फिल्म ब्लॉकबस्टर साबित होती है। तू मेरा जानू है। लंबी जुदाई डिंग डोंग जैसे गाने पूरे देश में बजने लगते हैं। हीरो सिर्फ एक हिट फिल्म नहीं रह जाती। वो उस दौर की पॉपुलर कल्चर का हिस्सा बन जाती है। इसी फिल्म ने मीनाक्षी शादरी को रातोंरात स्टार भी बना दिया। इतना कि उनकी तुलना उस दौर की बड़ी अभिनेत्रियों से होने लगी। फिल्म की कामयाबी का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस दौर में हीरो ने बॉक्स ऑफिस पर 13 करोड़ से ज्यादा की कमाई की थी। उस समय इतनी कमाई अक्सर अमिताभ बच्चन की फिल्मों से जुड़ी होती थी। आगे चलकर मीनाक्षी की ख्वाहिश अमिताभ बच्चन के साथ काम करने की भी पूरी हुई। शहंशाह में दोनों पहली बार एक साथ नजर आए और उनकी जोड़ी को पसंद किया गया। इसके बाद गंगा जमुना सरस्वती हो तूफान और अकेला जैसी फिल्मों में भी दोनों साथ दिखे। 80 के दशक के आखिर तक मीनाक्षी शशाद्री उन चुनिंदा अभिनेत्रियों में शामिल हो चुकी थी जिनका नाम सीधे स्टारडम के साथ लिया जाने लगा था। हीरो की कामयाबी के बाद मीनाक्षी शेषाद्री के पास फिल्मों की लाइन लग गई। प्रोड्यूसर्स और डायरेक्टर लगातार उन्हें अपनी फिल्मों में साइन करने लगे। कुछ ही सालों में वह हिंदी सिनेमा के सबसे व्यस्त चेहरों में शामिल हो गई। करियर की शुरुआत में ही वह सीधे बड़े सितारों के साथ स्क्रीन शेयर कर रही थी। राजेश खन्ना के साथ आवारा बाप और बेवफाई विनोद खन्ना के साथ जुर्म महादेव और सत्यमेव जयते और फिर अमिताभ बच्चन के साथ शहंशाह, गंगा जमुना सरस्वती और तूफान जैसे फिल्में आई। लेकिन मीनाक्षी का सफर सिर्फ बड़े बैनर और स्टार्स तक सीमित नहीं था। धीरे-धीरे उनके भीतर की अभिनेत्री भी लोगों में नजर आने लगी थी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनी साल 1986 की फिल्म स्वाति। यह निर्देशक के क्रांति कुमार की तेलुगु फिल्म का हिंदी रिमेक था। स्वाति में मीनाक्षी ने एक ऐसी महिला का किरदार निभाया जो अपने फैशनों, रिश्तों और समाज के बीच लगातार संघर्ष करती है। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बड़ी हिट नहीं रही। लेकिन मीनाक्षी की परफॉर्मेंस पर लोगों का ध्यान गया। कई समीक्षकों ने लिखा कि फिल्म में उनका स्क्रीन प्रेजेंस इतना मजबूत था कि कई जगह वो बाकी कलाकारों पर भारी पड़ती दिखी। दिलचस्प बात यह भी थी कि इसी फिल्म में माधुरी दीक्षित भी थी। आगे चलकर माधुरी हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी स्टार्स में शामिल हुई। लेकिन स्वाति के दौर में चर्चा सबसे ज्यादा मीनाक्षी के अभिनय की ही हो रही थी। यहीं से लोगों को समझ आने लगा कि मीनाक्षी शेषादरी सिर्फ गानों और ग्लैमर तक सीमित नहीं है। वह एक अच्छी अभिनेत्री भी हैं। उनके पास वो स्किल्स हैं जो किसी भी अभिनेता को लंबे समय तक याद रखवाती है। स्क्रीन पर किरदार बनकर टिक जाने की क्षमता देती है। मीनाक्षी शेषादरी ने अपने कई इंटरव्यूज में कहा है कि वह निजी तौर पर काफी संकोची भाव की थी। हिंदी फिल्मों में उस दौर के रोमांटिक या इंटिमेट सीन उनके लिए सहज नहीं होते थे। फिल्म डकैत की शूटिंग के दौरान एक किसिंग सीन शूट होना था। मीनाक्षी ने बाद में उसे अपने करियर के सबसे असहज अनुभवों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि उस सीन को लेकर वह बहुत मस्त थी। लेकिन इसी दौरान उन्होंने सनी देओल के व्यवहार का भी जिक्र किया। मीनाक्षी के मुताबिक सनी पूरे समय बेहद शांत और सम्मानजनक तरीके से पेश आए। उन्होंने किसी तरह की जल्दबाजी या दबाव नहीं बनाया जिससे शूटिंग आसान हो गई। शायद यह वजह थी कि आगे चलकर घायल और दामिनी जैसी फिल्मों में दोनों के बीच एक सहज प्रोफेशनल समझ दिखाई देती है। पर्दे पर उनकी जोड़ी लोगों को पसंद आई लेकिन उसके पीछे सेट पर बना वही भरोसा भी था। फिल्म इंडस्ट्री में शत्रुघन सिन्हा की एक आदत काफी मशहूर थी देर से सेट पर पहुंचने की। कई लोग मजाक में कहते थे कि अगर शूट सुबह की हो तो शॉट शाम तक ही शुरू होगा।
इसी बीच चेन्नई में एक फिल्म की शूटिंग चल रही थी। मीनाक्षी को उसी दिन मुंबई की फ्लाइट पकड़नी थी और उससे पहले उनका एक सीन शत्रुघ्न सिन्हा के साथ पूरा होना बाकी था। उन्होंने हिम्मत करके शत्रुघन सिन्हा से कहा कि क्या वे अगले दिन सुबह 6:00 बजे सेट पर आ सकते हैं ताकि शूट जल्दी खत्म हो जाए। यूनिट के ज्यादातर लोगों को लगा कि ऐसा होना मुश्किल है। लेकिन अगले ही दिन शत्रुघ्न सिन्हा समय से सेट पर पहुंच गए। पूरा क्रू हैरान था। शूट खत्म होने के बाद उन्होंने मजाक में मीनाक्षी से कहा किसी को बताना नहीं। कोई यकीन नहीं करेगा कि मैं समय पर आया। साल 1988 में तेजाब रिलीज हुई। माधुरी दीक्षित अचानक हिंदी सिनेमा का बड़ा नाम बन गई। इंडस्ट्री में अब एक नई स्टार आ चुकी थी। इसी दौर में मीनाक्षी शेषाद्री और माधुरी दीक्षित के बीच राइवलरी की बातें भी सुनाई देने लगी। दिलचस्प बात यह थी कि दोनों इससे पहले साथ काम कर चुकी थी। आवारा बाप और स्वाति जैसी फिल्मों में मीनाक्षी मुख्य भूमिका में थी। जबकि माधुरी दूसरे किरदारों में दिखाई देती थी। उस समय इंडस्ट्री में मीनाक्षी का नाम पहले से स्थापित था और माधुरी अपना रास्ता अभी शुरू ही कर गई थी। फिर एक फिल्म को लेकर दोनों के बीच दूरी की चर्चा तेज हुई। निर्देशक टीनू आनंद एक फिल्म बना रहे थे। शुरुआत में फिल्म में डिंपल कपाड़िया मुख्य भूमिका में थी और मीनाक्षी दूसरे अहम किरदार में थी। लेकिन बाद में जब डिंपल को हटाकर लीड रोल माधुरी को देने का ऑफर किया गया तो मीनाक्षी ने इस बदलाव की जानकारी पर उस फिल्म में काम करने से मना कर दिया। यह अलग बात है कि वह फिल्म आगे बन नहीं पाई। इसके बाद मीनाक्षी और माधुरी फिर कभी किसी फिल्म में साथ दिखाई नहीं दी। इंडस्ट्री में इसे राइवलरी की तरह देखा गया। अपने करियर के शुरुआती दौर में मीनाक्षी शेषाद्रे को इंडस्ट्री ने एक और नाम दिया था आइस मेडन का। यह नाम सबसे पहले पत्रकार दिनेश रहजा ने हीरो की शूटिंग के दौरान इस्तेमाल किया था। उस समय ऊटी में फिल्म की शूटिंग चल रही थी और मीनाक्षी सेट पर ज्यादा लोगों से घुलती मिलती नहीं थी। वह अक्सर अपनी मां के साथ ही रहती थी। सेट पर मौजूद लोगों और पत्रकारों को उनका यह व्यवहार दूरी बनाने जैसा लगा। धीरे-धीरे उनके लिए आइस वेडन शब्द इस्तेमाल होने लगा। यानी जिनके बारे में ज्यादा कंट्रोवर्सीज नहीं मिलती। फिल्मी मैगजीन और फिल्मी अखबार जिनके बारे में ज्यादा कुछ छाप नहीं पाते। हालांकि यह टैग उनके साथ लंबे समय तक जुड़ा रहा। इसकी वजह एक निजी जीवन भी था। ना वह पार्टी सर्किट का हिस्सा थी।
ना उनके नाम के साथ उस दौर की तरह लगातार अफेयर्स की कब्रें जुड़ी। फिल्मों के बीच भी उनका बड़ा हिस्सा डांस, पढ़ाई और अपने सीमित दायरों में बीतता था। शायद इसी वजह से इंडस्ट्री ने उनकी चुप्पी को रहस्य की तरह पढ़ना शुरू किया। 90 के दशक के शुरुआती सालों में मीनाक्षी शेषादरी हिंदी सिनेमा का ऑलरेडी बड़ा नाम बन गई थी। इस दौर में निर्देशक राजकुमार संतोषी के साथ उनकी जोड़ी बनी। साल 1990 में दोनों ने फिल्म घायल में साथ काम किया। फिल्म में सनी देओल मुख्य भूमिका में थे और घायल बॉक्स ऑफिस पर बड़ी एट साबित हुई। उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में उसका नाम शामिल हुआ। फिल्म की शूटिंग के दौरान राजकुमार संतोषी मीनाक्षी को पसंद करने लगे थे। इसका नतीजा देखने को मिला संतोषी और मीनाक्षी के अगले कोलैबोरेशन में। 1993 का साल राजकुमार संतोषी शांतनु गुप्ता की लिखी एक कहानी पर फिल्म बनने की तैयारी में जुटे हुए थे। फिल्म का नाम था दामिनी। एक कोर्ट रूम ड्रामा जहां सनी देओल और अमरीश पुरी बतौर वकील टकराते हैं। केंद्र में एक फीमेल कैरेक्टर है। राजकुमार संतोषी ने यह किरदार ऑफर किया अपनी पसंदीदा बन चुकी मीनाक्षी शेषाद्री को। शेषादरी राजी हो गई। डेट लॉक हो गई। शुरू हो गई फिल्म की शूटिंग। इसी दौरान लेकिन एक दिन डायरेक्टर राजकुमार संतोषी ने एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री को प्रपोज कर दिया। खुद मीनाक्षी अपने इंटरव्यूज में इस बात की पुष्टि कर चुकी हैं। संतोषी की शादी का प्रपोजल में मीनाक्षी की दिलचस्पी नहीं थी। उन्होंने सीधे ना कह दिया। नो संतोषी खफा हो गए। नतीजा क्या हुआ? मीनाक्षी ने अपनी एक इंटरव्यू में बताया है। राजकुमार संतोषी को लगा था कि वह मेरे साथ यह फिल्म पूरी कर नहीं पाएंगे। वे किसी दूसरी हीरोइन की तलाश में थे।
लेकिन किसी तरह हमने मिलकर बात सुलझा ली। प्रोड्यूसर्स काउंसिल और आर्टिस्ट काउंसिल सभी ने मिलकर इस मामले को सुलझा लिया। उस दिन हमने यह कसम खाई कि हम इस विवाद के बारे में फिर कभी कोई बात नहीं करेंगे। किसी और एक्ट्रेस की तलाश में संतोषी मीनाक्षी की राइफल माधुरी दीक्षित तक पहुंच चुके थे जो तेजाब फिल्म के बाद सुपरस्टार बन चुकी थी। लेकिन माधुरी दीक्षित ने दामिनी करने से मना कर दिया। वजह जवाब मीनाक्षी शेषादरी के हवाले से ही सुनिए। उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में बताया सभी ने मेरा साथ दिया और कहा नहीं हमें लगता है कि कुछ बहुत गलत हो रहा है। हम राजकुमार संतोषी के प्रस्ताव को नहीं मान सकते। मीनाक्षी शेषादरी आगे कहती हैं, “मुझे लगा कि यही वह पल था जब मेरी सभी फीमेल कलीग्स के लिए मेरा सम्मान अचानक से बहुत बढ़ गया। मुझे पक्का पता है कि माधुरी दीक्षित उनमें से एक थी। बाकी नामों के बारे में मुझे 100% नहीं पता जिन्होंने इस फिल्म के लिए मना किया। साल 1993 में रिलीज़ हुई दामिनी सिर्फ एक फिल्म बनकर नहीं आई। उसने हिंदी सिनेमा में महिला किरदारों को देखने का तरीका बदल दिया। मीनाक्षी ने फिल्म में उस औरत का किरदार निभाया जो सच बोलने की कीमत चुकाती है, रिश्ते खोती है, अकेली पड़ती है लेकिन पीछे नहीं हटती है। फिल्म का हर दृश्य, हर बहस, हर चुप्पी दर्शकों के भीतर उतरती चली जाती है। उनका तांडव सीक्वेंस आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार दृश्यों में गिना जाता है। और दिलचस्प बात यह है कि पर्दे पर जिस महिला का किरदार को वो निभा रही थी, फिल्म के बाहर भी कहीं ना कहीं वह उसी संघर्ष से गुजर रही थी। दामिनी को आज 90ज की सबसे महत्वपूर्ण महिला केंद्रित फिल्मों में गिना जाता है। फिल्म सनी देओल के कोर्ट रूम डायलॉग तारीख पे तारीख और 2ाई किलो का हाथ पॉप कल्चर का हिस्सा बन गई।
सनी देओल को इस फिल्म के लिए नेशनल अवार्ड मिला और साथ ही फिल्मफेयर अवार्ड्स में फिल्म को कई सारे नॉमिनेशंस मिले। एक रिश्ता जिसे उनकी इंडस्ट्री से एग्जिट की वजह माना जाता है वो है कुमार सानू के साथ उनका रमर्ड अफेयर। ये दौर था फिल्म जुर्म का। इसी फिल्म का एक गाना था जब कोई बात बिगड़ जाए। बहुत बड़ा हिट गाना आपने सुना होगा। इसे कुमार सानू ने गाया था। अमर उजाला के एक आर्टिकल में जिक्र है कि फिल्म के प्रीमियर के दौरान मीनाक्षी और कुमार सानू की मुलाकात हुई। धीरे-धीरे दोनों के करीब होने की खबरें आने लगी। उस समय कुमार सानू अपने आवाज की वजह से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में तेजी से लोकप्रिय हो रहे थे और लगातार हिट गाने दे रहे थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक दोनों करीब 3 साल तक रिश्ते में रहे। लेकिन इस रिश्ते के बीच एक सच ऐसा था जो मीनाक्षी को बाद में पता चला। कुमार सानू पहले से शादीशुदा थे। जब मीनाक्षी को इस बारे में जानकारी हुई तो उन्होंने कुमार सानू से पूछा कि उन्होंने यह सब बात पहले क्यों नहीं बताई? जवाब मिला तुमने पूछा ही नहीं। यहीं से मामला निजी रिश्ते से निकलकर मीडिया की सुर्खियों में बदल गया। साल 1994 में जब कुमार सानू का अपनी पत्नी से तलाक हुआ तो कई रिपोर्ट्स में मीनाक्षी जशाद्री को इस रिश्ते के लिए जिम्मेदार ठहराया जाने लगा। उन्हें घर तोड़ने वाली औरत की तरह पेश किया जाने लगा। दिलचस्प बात यह है कि उस दौर की ज्यादातर रिपोर्टिंग में सवाल कुमार सानू से कम थे और मीनाक्षी से ज्यादा थी। मीनाक्षी ने इस पूरे मामले पर बहुत कम बोला। वो ना टीवी इंटरव्यूज में सफाई देती दिखी ना मीडिया के सामने बयानबाजी करती नजर आई।
90 के दशक के आखिर तक मीनाक्षी शेषादरी लगातार फिल्मों विवादों मीडिया की सुर्खियों और इंडस्ट्री की राजनीति के बीच रह चुकी थी। एक तरफ स्टार डन था। दूसरी तरफ वही दुनिया धीरे-धीरे थकाने भी लगी थी। मीनाक्षी ने अपने कई इंटरव्यूज में इशारों से कहा कि वह खुद को उस तरह की बोल्ड या ग्लैमरस छवि में ढालना नहीं चाहती थी जिसकी उम्मीद धीरे-धीरे इंडस्ट्री करने लगी थी। वो अपने हिस्से की सीमाएं तय रखना चाहती थी। आखिरकार उन्होंने फैसला किया कि अब वो फिल्मों से ज्यादा अपनी निजी जिंदगी पर ध्यान देगी। साल 1995 में मीनाक्षी शेषाद्री ने अमेरिका में रहने वाले इन्वेस्टमेंट बैंकर हरीश मैसूर से शादी कर ली। शादी के बाद उन्होंने बॉलीवुड और ग्लैमर की दुनिया से दूरी भी बना ली और अमेरिका शिफ्ट हो गई। बात के एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि वह एक पैर भारत में और एक पैर अमेरिका में रखकर जिंदगी नहीं जीना चाहती थी। उन्होंने परिवार को चुना, बच्चों की परवरिश को चुना और कैमरे से दूर एक सामान्य जीवन की तरफ चली गई। उनके दो बच्चे हुए जोश और केंद्र लंबे समय तक वह टेक्सस के प्लानो शहर में रही। बाद में वाशिंगटन डीसी के आसपास बस गई। दिलचस्प बात यह रही कि जिस अभिनेत्री के बारे में कभी हर हफ्ते फिल्मी मैगजीनों में खबरें छपती थी, वहीं मीनाक्षी अचानक पूरी तरह सार्वजनिक जीवन से गायब हो गई। फिल्मों से दूरी बनाने के बीच साल 1996 में उनकी आखिरी बड़ी फिल्म घातक रिलीज हुई। फिल्म के साथ निर्देशक फिर वही रहे।
राजकुमार संतोषी। दिलचस्प बात यह थी कि दामिनी के दौरान आए तनाव के बावजूद दोनों ने एक साथ काम पूरा किया। घातक को बनाने और रिलीज होने में कई साल लगे। फिल्म में सनी देओल और अमरीश पुरी भी थे। रिलीज़ के बाद फिल्म बड़ी हिट साबित हुई और उसी साल आई राजा हिंदुस्तानी के बाद सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में शामिल हुई। फिर धीरे-धीरे मीनाक्षी शेषाद भी पर्दे से गायब हो गई। बिना किसी बड़े फेयरवेल, बिना किसी आखिरी इंटरव्यू, बिना किसी ड्रामाटिक घोषणा की। हालांकि फिल्मों से दूरी बनाने का मतलब कला से दूरी बनाना बिल्कुल नहीं था। अमेरिका में रहकर भी मीनाक्षी अपने शास्त्रीय नृत्य से जुड़ी रही। उन्होंने अपना डांस इंस्टट्यूट शुरू किया डालेस में जहां वो भरत नाट्यम, कथक और ओडिसी सिखाने लगी। वो अपने छात्रों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम और चैरिटी इवेंट्स में भी हिस्सा लेती रही। एक तरह से कैमरा भले पीछे छूट गया लेकिन रियाज़ अभी तक उनकी जिंदगी का हिस्सा था। पिछले कुछ सालों में मीनाक्षी फिर से इंटरव्यूज में दिखाई