96,000 करोड़ यानी करीब 10 बिलियन डॉलर। दावा है कि बिजनेसमैन गौतम अडानी ने फ्रॉड के केस में सजा माफी के लिए अमेरिका में इतने बड़े निवेश का ऑफर दिया है। कहा है कि इससे अमेरिका में 15,000 नौकरियां पैदा होंगी।
पूरी कहानी शुरू होती है गौतम अडानी पर लगे एक बड़े आरोप से। क्या है आरोप? अमेरिकी जस्टिस डिपार्टमेंट यानी डीओजे ने अडानी ग्रुप पर आरोप लगाया था कि भारत में सोलर प्रोजेक्ट हासिल करने के लिए सरकारी अधिकारियों को रिश्वत खिलाई गई और यह बात अमेरिकी इन्वेस्टर्स से छिपाई भी गई। आरोप यह भी था कि अडानी ग्रुप ने करीब 265 मिलियन डॉलर यानी लगभग $2500 करोड़ की रिश्वत और धोखाधड़ी की है। लेकिन यहां सवाल यह है कि मामला भारत का था तो अमेरिका इसमें कहां से आया?
तो वजह यह है कि अडानी ग्रुप ने विदेशी इन्वेस्टर्स से पैसा जुटाया था और अगर किसी अमेरिकी इन्वेस्टर को गलत जानकारी देकर निवेश कराया गया हो तो अमेरिका अपने कानून के तहत कारवाई कर सकता है। लेकिन अब कहानी में एक और ट्विस्ट आ गया।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट कहती है कि अमेरिकी सरकार इस केस को वापस लेने पर विचार कर रही है और यहीं से मामले में एंट्री होती है राजनीति लॉबिंग और बड़ी कानूनी चालों की। अडानी ग्रुप ने हाल ही में अपनी नई कानूनी टीम बनाई है। इस टीम को लीड कर रहे हैं रॉबर्ट ग्रिफा जूनियर। अब यह कोई मामूली वकील नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के केस संभालते हैं।
अमेरिका के बड़े कॉर्पोरेट वकीलों में गिने जाते हैं। न्यूयॉर्क की मशहूर लॉ फर्म सुलवन एंड क्रोमवेल के कोचेयर हैं। उन्होंने प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी और ये लॉ स्कूल से पढ़ाई की है। रॉबर्ट वाइट कॉलर क्राइम बैंकिंग फ्रॉड, सिक्योरिटी फ्रॉड और हाई प्रोफाइल मुकदमों के एक्सपर्ट माने जाते हैं। मतलब अगर कॉर्पोरेट दुनिया में बड़ा संकट आए तो उन्हें ही याद किया जाता है। अब आते हैं कि उस मीटिंग पर जिसने पूरा मामला गमा दिया है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले महीने वाशिंगटन में अडानी के वकीलों और अमेरिकी अधिकारियों के बीच बड़ी बैठक हुई। बताया गया कि अडानी की टीम करीब 100 स्लाइड्स का प्रेजेंटेशन लेकर पहुंची थी। उसमें कई बातें कही गई थी। पहली सरकार के पास पक्के सबूत नहीं है। दूसरी अमेरिका को यह केस चलाने का अधिकार भी नहीं है। तीसरी पूरा मामला भारत से जुड़ा है अमेरिका से नहीं। यानी वकीलों का साफ शब्दों में यह कहना था कि यह केस कमजोर है। लेकिन असली चर्चा एक और बात पर हुई।
रिपोर्ट्स के मुताबिक अडानी ग्रुप की तरफ से कहा गया कि अगर केस खत्म हो जाता है तो ग्रुप अमेरिका में करीब $ बिलियन डॉलर यानी लगभग 96000 करोड़ इन्वेस्ट करेगा साथ में 15000 नौकरियां भी देगा। बस फिर क्या था? सोशल मीडिया पर लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि यह निवेश है या समझौते का ऑफर। हालांकि अमेरिकी अधिकारियों ने बाद में साफ कहा कि निवेश का प्रस्ताव केस खत्म होने या केस खत्म करने का आधार नहीं होगा।
अब यहां एक और बड़ा एंगल आता है वो है ट्रंप प्रशासन की नीति। रिपोर्ट्स कहती है कि डोनाल्ड ट्रंप की सरकार विदेशी रिश्वतखोरी वाले मामलों में पहले जैसी सख्ती नहीं दिखाना चाहती है। यानी पहले अमेरिका दुनिया भर में जाकर कंपनियों पर कारवाई करता था। लेकिन अब ट्रंप का मानना है कि इससे अमेरिकी बिजनेस को नुकसान होता है। ट्रंप पर आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने अपने करीबियों को चंदा देने वालों को फायदा पहुंचाया। कुछ लोगों को माफी भी मिली। इसलिए अब विपक्ष सवाल उठा रहा है कि क्या अडानी केस में भी राजनीतिक असर है? मामले पर कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा कॉम्प्रोमाइज्ड पीएम ने ट्रेड डील नहीं अडानी की रिहाई का सौदा किया है। हालांकि अभी तक ऐसा कोई सबूत सामने नहीं आया है जिससे साबित हो कि भारत सरकार ने सीधे तौर पर इस मामले में कोई डील की हो। उधर अडानी ग्रुप शुरू से आरोपों को खारिज करता आया है।
ग्रुप का कहना है कि उसने सभी अंतरराष्ट्रीय नियमों और पारदर्शिता के कानूनों का पालन किया है। यह आरोप बेबुनियाद है। अब आगे क्या होगा? अगर अमेरिका अपराधिक केस वापस भी ले लेता है तब भी अडानी ग्रुप पर आर्थिक जुर्माना लग सकता है। लेकिन अगर मामला शांत हो गया तो ग्रुप को बड़ा फायदा भी मिल सकता है। विदेशी इन्वेस्टर्स का भरोसा बढ़ेगा। अंतरराष्ट्रीय कारोबार आसान होगा और विदेश से फंड जुटाने में भी राहत मिलेगी।
फिलहाल पूरी कहानी में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सिर्फ कानूनी लड़ाई है या फिर दुनिया की सबसे ताकतवर राजनीति और बड़े कारोबारियों के बीच चल रही हाई लेवल नेगोशिएशन है।