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बॉलीवुड का वो हीरा जिसे तराशने के बजाय कई बार किया गया किनारा: रघुवीर यादव का दर्दनाक सच

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ओ पवन परदे जो जइयो मोर पिया आज ये दास्तान है भारतीय हिंदी सिनेमा के उस मझे हुए कलाकार और अभिन्न की दुनिया के उस जादूगर की जिसने अपनी सादगी और बेमिसाल अदाकारी से पूरी दुनिया को अपना कायल बना लिया मर जाइए ना चुप रह बॉलीवुड का एक ऐसा चरित्र अभिनेता जो अपनी अदा अदाकारी के दम पर हर किरदार में फूंक देता है ऐसी जान जो हमेशा हमेशा के लिए हो जाता है अमर। कल का बना है मटन। परसों क्या बना था? मटन। अब क्या बना था? मटन मटन मटन। यहां तो उस मटर ने हमारी जिंदगी खराब कर दी। ससुराल मटर मटन मटन। कलाकारी की दुनिया का एक ऐसा चेहरा जिसे पर्दे पर देखते ही लोग अपनी परेशानियां भुला देते। 80 और 90 के दशक से लेकर आज तक इस कलाकार ने थिएटर की गलियों से लेकर हॉलीवुड तक अपनी कला का वो परचम लहराया जिसकी गूंज सुनाई देती है आज भी बादल घुमड़ बढ़ बादल घुमड़ बढ़ एक ऐसा सदाबहार अभिनेता जो अभिन्य को अपना धर्म मानकर मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव से निकल पड़ा था पारसी थिएटर और नसरुद्दीन शाह जैसे दिग्गजों के बीच अपनी जगह बनाने जिसने अपनी आवाज और अदाकारी को ही बना लिया अपना हथियार। जोगनिया बना दे बन जोगी हो गए। लेकिन दोस्तों क्या आप जानते हैं कि एक ही फिल्म के लिए बेस्ट एक्टर के दो-दो इंटरनेशनल अवार्ड जीतने वाले और भारत की तरफ से आठ बार ऑस्कर की दहलीज तक पहुंचने वाली फिल्मों का हिस्सा रहने के बावजूद क्यों इस शानदार कलाकार को मुंबई की सड़कों पर भूखे पेट सोना पड़ा। क्यों वक्त ने ऐसी मार मारी कि महीनों तक उन्हें सिर्फ Parleg बिस्किट खाकर दिन गुजारने पड़े। भूख लगी है। तीन दिन से कुछ खाया ही नहीं। क्या आप जानते हैं कि आखिर किस जुर्म की वजह से इन्हें खानी पड़ गई थी जेल की हवा और कैसे एक पापड़ वाले ने कर दिया था कुछ ऐसा कि हमेशा हमेशा के लिए बदल गई थी

इनकी तकदीर। बाप दादा की जमीन बचा के रखी और ससुरी हाथ सजा रही। अरे हमरा उसने तो अपनी जान लेके जमीन बचा दी। दोस्तों कोई और नहीं बल्कि हम बात कर रहे हैं बेहद सरल, बेहद टैलेंटेड और देसी अंदाज के लिए पहचाने जाने वाले एक्टर अगुबीर यादव की। और महंगाई डायन खा सखी सया। दोस्तों एक ऐसा लेजेंड्री एक्टर जिसने अपनी दमदार शख्सियत के दम पर मुंगेरी लाल बनकर हर घर में अपनी पहचान बनाई। आज वही कलाकार चकाचौंध वाली इस इंडस्ट्री में कहीं खोया हुआ सा क्यों लगता है? आखिर क्यों अभिनय की दुनिया का यह अनमोल रत्न आज भी उस मुकाम और शोहरत के लिए संघर्ष कर रहा है जिसका वह हकदार है। क्यों बॉलीवुड ने कई बार इस हीरे को तराशने के बजाय किनारा कर दिया? जानेंगे सब कुछ। आप बने रहे हमारे साथ वीडियो के अंत तक। वो विधायक वो साला अपने आप को समझता क्या है? हमारे सचिव जी को ये प्रहलाद को ये विकास को गाली देगा। हमारे सामने हमारा इज्जत नहीं इनका इज्जत नहीं हमारा भी इज्जत नहीं कर रहा साला। नमस्कार आप सभी का स्वागत है बॉलीवुड नवेल के इस एपिसोड में। लकी सया तो खूब ही कमात है महंगाई टाइम खाए जाते हैं। रघुवीर यादव का जन्म 25 जून 1957 को मध्य प्रदेश के जबलपुर में एक किसान परिवार में हुआ था। वह पांच भाई बहनों में दूसरे नंबर पर हैं। किसी आम परिवार की तरह रघुवीर के घर वाले भी चाहते थे कि उनका बेटा पढ़ लिखकर अच्छी नौकरी करें। अच्छी नौकरी रहेगी तो जिंदगी सुधर जाएगी और कोई अच्छे परिवार की लड़की भी मिल जाएगी। यही सोचकर रघुवीर के पिता ने उनका दाखिला साइंस साइड से करा दिया। हालांकि उन्हें इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि उनके सीधे-सीधे बेटे का मन पढ़ाई में नहीं बल्कि खेती-किसानी में लगता है।

रघुवीर का एडमिशन तो हो गया लेकिन साइंस की पढ़ाई उन्हें कभी समझ ही नहीं आई। उनका मन पिता के साथ खेती, किसानी और बैलगाड़ी चलाने में लगता था। खेती किसानी के अलावा कुछ और भी था जो रघुवीर को अपनी ओर खींचता था और वह था संगीत और संगीत से रघुवीर यादव का परिचय भी किसी रोचक कहानी से कम नहीं है। दरअसल रघुवीर यादव जब छोटे थे तो उनके गांव में एक पापड़ बेचने वाला आता था जो अपने अंदाज में गाकर पापड़ बेचता था। बस फिर क्या था? रघुवीर के दिमाग पर उस पापड़ वाले की वह धुन ऐसी चढ़ी कि अब वह भी पूरा दिन घर में पूरी धुन के साथ पापड़ बेचने लगे और उन्हें अब इसमें मजा भी आने लगा था। हालांकि पिता पढ़ाई को लेकर सख्त थे। इसलिए अब वह छुप-छुप कर संगीत भी गुनगुनाने लगे थे। एक इंटरव्यू में रघुवीर बताते हैं कि कभी-कभी जरूरी नहीं कि सफलता पाने के लिए हाथ पैर चलाने पड़े। कभी-कभी आपके कान भी बहुत कुछ कर जाते हैं। वह आगे बताते हैं कि वह पापड़ वाला ही था जिसे वह अपनी जिंदगी का पहला गुरु मानते हैं। खैर, संगीत की ओर रुझान तो था ही लेकिन इसके साथ पढ़ाई का बोझ और पिता की उम्मीदें भी थी जो रघुवीर को दिन रात परेशान करती थी। वह जितना साइंस के करीब जाने की कोशिश करते ऐसा लगता साइंस उनसे उतना ही दूर भाग रही है। उन्हें कुछ पल्ले नहीं पड़ रहा था। जिसका नतीजा यह हुआ कि वह एग्जाम में फेल हो गए। अब रघुवीर की आंख के सामने उनके पिता का चेहरा घूम रहा था। एक ओर उन्हें शर्म आ रही थी कि वह फेल होने के बाद वो घर वालों से नजरें कैसे मिला पाएंगे तो दूसरी ओर उन्हें अपने पिता की नाराजगी का भी डर सता रहा था। इसी डर और शर्म की कशमकश में उन्होंने घर से भागने का फैसला कर लिया। उन्होंने यह सोच लिया कि वह अब घर वालों के सामने नहीं जाएंगे। महज 15 साल की उम्र में रघुवीर घर से तो भाग गए थे लेकिन उन्हें कुछ भी अंदाजा नहीं था कि वह कहां जाएंगे, क्या करेंगे और किसके पास रहेंगे। इत्तेफाक से रघुवीर के साथ उनका दोस्त भी साथ गया था जो उन्हें अपने एक रिश्तेदार के यहां लेकर ललितपुर गया। रघुवीर भी उसके साथ वहीं रहे। लेकिन उनके पांव तले जमीन तब खिसक गई जब उनका दोस्त अपने रिश्तेदार का घर भी छोड़कर चला गया। अब रघुवीर बिल्कुल अकेले पड़ गए थे। उन्हें भी उस घर से निकलना पड़ा। रघुवीर को अब घर की अहमियत पता चल रही थी। एक समय उनके पास सब कुछ था लेकिन अब वह सड़क पर फिरने वाले एक अजनबी की तरह दर-दर भटक रहे थे। वह चाहते तो घर लौट सकते थे। लेकिन उनमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि अपने घर वालों का निराश चेहरा देख पाएं। वह नहीं चाहते थे कि उनकी वजह से कोई दुखी हो। उनकी राह की ठोकर खाना तो पसंद था, लेकिन पिता का शर्मिंदा होना उन्हें हरगिज़ कबूल नहीं था। रघुवीर के लिए यह बहुत सख्त दिन थे।

उनके पास जो थोड़े बहुत पैसे थे, उससे वह बिस्किट खाकर गुजारा करते थे। इसी बीच उन्हें एक थिएटर कंपनी की याद आई। दरअसल, जब वह अपने दोस्त के साथ भाग कर आए थे, तभी उस गांव में एक पारसी थिएटर कंपनी भी आई हुई थी। रघुवीर को संगीत का शौक था, तो वह अपने दोस्त के साथ उसमें नाटक देखने गए थे। आखिरकार वह अपना बैग उठाकर उसी पारसी थिएटर कंपनी में पहुंच गए। वहां जाकर रघुवीर उसके मालिक से मिले और काम मांगा। उन्होंने रघुवीर से पूछा कि तुम क्या कर सकते हो? अब चूंकि बचपन से ही रघुवीर यादव को गाना बहुत अच्छा लगता था और उनके मन के किसी कोने में गायक बनने की ख्वाहिश भी थी तो रघुवीर यादव ने उनसे कहा कि मैं गाना गा लेता हूं। उन्होंने रघुवीर से कोई गाना सुनाने को कहा। रघुवीर ने गाना सुनाया भी। वह गाना सुनने के बाद थिएटर कंपनी के मालिक इनसे बोले कि भाई तुम गाते तो अच्छा हो लेकिन तुम्हारा तलफुस तो बहुत ज्यादा खराब है। अब रघुवीर तो ठहरे सीधे-साधे इंसान। उन्होंने सिर्फ पापड़ वाले को गाते सुना था। उन्हें तलफुस का मतलब ही नहीं पता था। उन्हें लगा कि उनके गाने की स्टाइल में कोई कमी है तो फटाक से बोल दिए कि अगर ऐसी दिक्कत है तो मैं इसे तबले पर गाऊंगा तो सही गा लूंगा। रघुवीर का इतना कहना था कि वहां मौजूद सभी लोग उनकी बात सुनकर हंस पड़े। लोगों को हंसता देख रघुवीर को समझ आ गया था कि उन्होंने कोई बेवकूफी भरा जवाब दिया है। इसके बाद थिएटर के मालिक ने समझाया कि तलफुस का मतलब होता है उच्चारण जिसमें काफी कमी है। रघुवीर ने थिएटर कंपनी के मालिक से गुजारिश की कि मुझे काम पर रख लीजिए। मैं पूरी मेहनत से काम करूंगा और सारे उच्चारण भी सही कर लूंगा। मालिक ने रघुवीर पर तरस खाकर ₹2.5 रोज के हिसाब से इन्हें काम पर रख लिया। रघुवीर वहां रहकर उनके शोज़ में गाना गाने लगे। थिएटर के लोगों ने ही रघुवीर को उर्दू भी सिखाई और इनका उच्चारण सही कराया। रघुवीर उस कंपनी के नाटकों में गाने का काम करते थे। नौकरी मिलने के बाद रघुवीर को एक ठोर तो मिल गया था लेकिन उनकी परेशानी अभी कम नहीं हुई थी क्योंकि कई दफा ऐसा होता था जब शो कैंसिल हो जाते या बारिश हो जाती तो ऐसे में रघुवीर का मेहनताना ₹5 से घटकर ₹1 तो कभी कभार मात्र 50 पैसा ही रह जाता था। रघुवीर कहते हैं कि वह बड़े मुश्किल दिन थे। खाने की भी कमी रहती थी। नाटक कंपनी में इनके साथ काम करने वाले स्टाफ के कई लोग कमजोर में पीले पड़ जाते थे। हालांकि भूख प्यास की शिद्दत के बावजूद भी रघुवीर हमेशा एनर्जेटिक रहे। ऐसा इसलिए क्योंकि वह खुश रहते थे। रघुवीर का मानना था कि हालात पर रोने से बेहतर है उससे निपटना, चैलेंज करना। वो खुश रहते थे यह सोचकर कि हर दिन उन्हें कुछ नया सीखने को मिल रहा है। वहीं रघुवीर का मानना था कि जिंदगी की दुश्वारियों और मुश्किलों से ही बहुत कुछ सीखने को मिलता है। सारी सुविधाएं पाकर कोई कुछ नहीं सीख सकता। जब पेट भरा रहता है उस वक्त बिस्तर और आराम ही दिखता है। लेकिन जब आप भूखे रहते हैं तो तब आप ना चाहते हुए भी सीखने के लिए मजबूर हो जाते हैं। तकरीबन दो-तीन महीनों तक रघुवीर यादव का उस नाटक कंपनी में गाने और सीखने का काम चलता रहा। एक दिन अचानक कंपनी के मालिक इनके सामने पहुंचे और कहा अब तुम्हें सिर्फ गाना ही नहीं गाना है बल्कि अब तुम्हें नाटक में अभिनय भी करना होगा। मालिक की यह बात रघुवीर को बिल्कुल भी पसंद नहीं आई क्योंकि रघुवीर को तो गाने का शौक था और वह भी पैसों की मजबूरी के लिए थिएटर में रुके थे। फिर भी गाने तक तो ठीक था लेकिन अब यह नाटक में काम करना उन्हें बिल्कुल भी पसंद नहीं था। हालांकि मरता क्या ना करता। सो इसी मजबूरी के चलते ना चाहते हुए भी रघुवीर यादव ने हां कर दी क्योंकि रहने के लिए छत और खाने के लिए रोटी उनकी इसी हामी पर टिकी हुई थी। बेचारे रघुवीर अब उन्हें गाने के साथ-साथ एक्टिंग भी करके दिखानी थी। जिंदगी की ओर से उनको कड़ा इम्तिहान चालू था। हालांकि भले ही रघुवीर ने यह सब मजबूरी के लिए किया हो लेकिन उन्हें इसका जरा भी अंदाजा नहीं था कि जिस इम्तिहान से वह दोचार हो रही हैं वही एक दिन उन्हें चमकता हुआ सितारा बना देगा। खैर वह दिन भी आ गया जब रघुवीर को नाटक में अभिनय करने को दिया गया।

पहले नाटक में उन्हें सिपाही का किरदार दिया गया। एक ऐसा सिपाही जो हाथ में भाला लिए बस एक कोने में खड़ा रहता है। लेकिन रघुवीर को सिपाही बनकर पूरे नाटक के दौरान एक कोने में खड़ा रहना जरा भी पसंद नहीं आया। उन्हें इस काम से बहुत उलझन सी हुई। फिर जब अगले शो में रघुवीर यादव को दोबारा सिपाही बनने के लिए कहा गया तो इन्होंने इंकार कर दिया। इन्होंने कहा कि मुझे वह काम अच्छा नहीं लगता। रघुवीर मेहनतकश आदमी थे और उसूल वाले इंसान थे। उन्हें बिना किसी मेहनत के एक कोने में खड़ा रहना जरा भी जच नहीं रहा था। लेकिन जब बात सिर पर छत और दो वक्त की रोटी की हो तो सारे उसूल एक किनारे धरे रह जाते हैं। रघुवीर ने जब उस किरदार को निभाने से इंकार कर दिया तो यह बात मालिक को बहुत बुरी लगी। थिएटर के मालिक ने इनसे कहा कि अगर तुम यह काम नहीं करना चाहते तो कोई बात नहीं। लेकिन इसके बदले तुम्हें कंपनी छोड़नी पड़ेगी। एक बार फिर मजबूरी में रघुवीर यादव को सिपाही बनना पड़ा। वो सिपाही तो बन रहे थे लेकिन अंदर ही अंदर दुखी थे। हालांकि कुछ दिन बाद उन्हें कुछ दूसरे किरदार भी ऑफर होने लगे जिसमें थोड़े बहुत डायलॉग भी थे और जैसे-जैसे उन्हें डायलॉग वाले किरदार मिलते गए उन्हें अब इसमें मजा आने लगा था। रघुवीर अगले 6 सालों तक उस पारसी थिएटर कंपनी के साथ काम करते रहे। इस दौरान रघुवीर यादव ने कई नाटकों में अभिनय किया और देश के विभिन्न शहरों में नाटक किए। रघुवीर ने मशहूर नाटक लैला मजनू में मजनू का किरदार भी निभाया जो उस वक्त बेहतरीन एक्टर को ही यह किरदार दिया जाता था। रघुवीर बताते हैं कि वह कभी भी किसी भी बड़े से बड़े एक्टर के सामने नर्वस नहीं होते हैं। इसकी वजह है कि उन्हें पारसी थिएटर में एक से बढ़कर एक गुरुओं से शिक्षा मिली है। वक्त बदला तो धीरे-धीरे पारसी थिएटर के बुरे दिन भी शुरू हो गए। अब रघुवीर ने लखनऊ का रुख कर लिया। जहां वह रंगोली कठपुतली थिएटर से जुड़ गए और साथ ही साथ गायन भी करने लगे। लेकिन इसी दौरान उन्हें किसी ने दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा यानी एनएसडी के बारे में बताया। एनएसडी के बारे में सुनकर रघुवीर बहुत प्रभावित हुए और दिल्ली आ गए। रघुवीर बताते हैं कि वह हमेशा छोटे-छोटे शहर ही घूमे थे। लेकिन जब वह राजधानी दिल्ली पहुंचे तो यहां की भीड़भाड़ और सरपट दौड़ती जिंदगी को देखकर घबरा गए। हालांकि बाद में उन्होंने मेहनत करते हुए एनएसडी में दाखिला ले लिया। फिर तो वह बकायदा इन्होंने प्रोफेशनल थिएटर की विधिवत ट्रेनिंग ली। एनएसडी से 3 साल का ग्रेजुएशन करने के बाद वो वहां के रेपेटरी ग्रुप से जुड़कर 10 साल तक थिएटर करते रहे। एनएसडी में रघुवीर यादव के गुरु थे। आधुनिक थिएटर के पितामह कहे जाने वाले इब्राहिम अलकाजी साहब ने रघुवीर यादव के मन में थिएटर को लेकर इतनी दीवानगी पैदा कर दी थी कि उन्होंने फैसला कर लिया था कि यह जीवन भर थिएटर ही करेंगे। रघुवीर यादव बताते हैं कि आज वह जो भी हैं या तो पारसी थिएटर की वजह से हैं और या फिर इब्राहिम अलकाजी की देन है क्योंकि वह एक ऐसे इंसान थे जो बहुत डिसिप्लिन के साथ काम सिखाते थे।

रघुवीर कहते हैं कि सिर्फ काम ही नहीं बल्कि वह जीने का तरीका सिखाते थे। अलकाजी साहब का एक किस्सा साझा करते हुए रघुवीर बताते हैं कि पढ़ाई के दौरान रघुवीर टाइम के बहुत पाबंद थे। वह हर क्लास में टाइम से पहुंच जाते थे और उनकी पूरी अटेंडेंस होती थी। वो इब्राहिम अलकाजी साहब के सबसे फेवरेट स्टूडेंटों में से एक थे। अलकाजी साहब में खास बात यह थी कि वह जिस स्टूडेंट को सबसे ज्यादा मानते थे उसे ही सबसे ज्यादा डांटते भी थे। ऐसा इसलिए ताकि वह कभी लापरवाही में ना पड़े और आगे बढ़ता रहे। रघुवीर कहते हैं कि एक रोज अलकाजी साहब ने दिवाली के दिन क्लास लगा दी। इत्तेफाक से उस दिन रघुवीर छुट्टी का सोचकर कपड़े धोने बैठ गए थे और वह क्लास नहीं गए। तभी क्लास में रघुवीर को गायब देख अलकाजी साहब ने एक लड़के को कहा कि जाओ रघुवीर के पास जाओ और उसे बुलाकर लाओ। लड़का जब रघुवीर के पास पहुंचा तो वह यह सुनकर घबरा गए। जल्दी-जल्दी में क्लास पहुंचे तो अलकाजी साहब ने पूछा, “आज तुम क्लास क्यों नहीं आए?” अचानक सवाल से रघुवीर घबरा गए और हड़बड़ी में बोल दिया कि कुछ तबीयत नासाज थी। बीमार था इसलिए नहीं आ पाया। रघुवीर का जवाब सुनकर अलकाजी साहब ने कहा, “तुम मर भी रहे हो, तब भी क्लास आना और मेरे सामने मरना।” इस घटना के बाद रघुवीर यादव ने फिर कभी उनकी कोई क्लास नहीं छोड़ी। रघुवीर बताते हैं कि आज के समय में इतनी शिद्दत से सिखाने वाला गुरु ढूंढकर भी नहीं मिलेगा। खैर, बढ़ते हैं आगे। जब रघुवीर यादव एनएसडी के स्टूडेंट ही थे तब उन्हें उनके कुछ बैचमेट्स को इब्राहिम अलकाजी साहब ने पुणे स्थित एफटीआईआई में एक स्पेशल ट्रेनिंग के लिए भेजा था। पुणे में भी रघुवीर यादव ने एक नाटक किया था जिसे इत्तेफाक से दिग्गज डायरेक्टर सैद मिर्जा ने भी देखा। सैद मिर्जा रघुवीर यादव से बड़ा प्रभावित हुए। उन्होंने रघुवीर यादव से कहा कि तुम बॉम्बे आ जाओ। मैं एक फिल्म बना रहा हूं। इसमें तुम्हें लूंगा। साथ ही साथ तुम्हारे रहने खाने का बंदोबस्त भी कर दूंगा। रघुवीर यादव ने उस समय तो उनसे कहा कि सोचकर जवाब देंगे। लेकिन मन ही मन तय कर चुके थे कि इन्हें फिल्मों में काम नहीं करना है। रघुवीर यादव बताते हैं कि वह हमेशा से सिंगर बनना चाहते थे। लेकिन हमेशा एक्टिंग ही उनके गले पड़ती रही। सोच के निकला बस संगीत से ताल्लुक था। संगीत सीख ले निकला और बस एक्टिंग गले पड़ गई तो उसमें फैल गया मैं। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि रघुवीर यादव को फिल्मों से कोई एलर्जी रही हो या इन्होंने अपने जीवन में फिल्मों को पूरी तरह से ब्लॉक कर दिया हो। यह भी फिल्मों में काम करना चाहते थे। लेकिन सिर्फ अपने पसंद के किरदार वाली फिल्मों में ही इन्हें काम करना था। जब उस वक्त इन्हें जो कुछ फिल्में ऑफर हुई थी, उनमें कॉमेडियन वाले रोल्स इन्हें ऑफर हो रहे थे।

रघुवीर यादव वह रोल नहीं करना चाहते थे। हालांकि जब डायरेक्टर प्रदीप कृष्ण ने रघुवीर यादव को मेसी साहब की स्क्रिप्ट पढ़ने को दी तो इन्हें वह कहानी बहुत पसंद आई। खासतौर पर मेसी साहब का मुख्य किरदार फ्रांसिस मेसी प्रदीप कृष्ण चाहते भी थे कि फ्रांसिस मेसी का किरदार रघुवीर से ही कराया जाए। रघुवीर यादव मेसी साहब में काम करने को तैयार हो गए। लेकिन इस शर्त पर कि वह एनएसटी की रेपिटरी नहीं छोड़ेंगे। प्रदीप कृष्ण तैयार हो गए और एनएसडी से ब्रेक लेकर रघुवीर यादव ने मेसी साहब की फिल्म की शूटिंग की। फिल्म जब रिलीज हुई तो रघुवीर यादव के काम की चारों तरफ प्रशंसा हुई। साल 1985 में आई इस फिल्म के लिए उन्हें दो-दो इंटरनेशनल अवार्ड्स भी मिले। पहला 1986 के वेनिस अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में फिल्म मेसी साहब में उनके दमदार अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का एफआईपी आरईएससीआई क्रिटिक्स अवार्ड मिला। दूसरा साल 1987 में उन्हें 11वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में मेसी साहब फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का प्रतिष्ठित सिल्वर पिकॉक अवार्ड मिला। फिल्म मेसी साहब ही हैं। जिसके रिलीज के बाद रघुवीर यादव लगभग 20 साल बाद अपने गांव गए। उनके गांव जाने को लेकर भी बेहद रोचक कहानी जुड़ी हुई है। दरअसल रघुवीर यादव जब घर से भागे थे तब 6 महीने बाद यह अपने घर की तरफ वापस लौट आए थे। घर पहुंचने से पहले यह अपने इलाके की एक मशहूर पान की दुकान पर रुक गए। वहां इनके एक चचेरे भाई ने इन्हें देख लिया। उन्हें देखकर वो तंज कसते हुए बोले, तुम तो वापस आ गए। मुझे तो लगा था कि अब तुम्हें किसी फिल्म में लक्ष्मी टॉकीज में दोबारा देखूंगा। लक्ष्मी टॉकीज इनके इलाके में मौजूद एक सिनेमाघर था। अपने चचेरे भाई द्वारा खुद का मजाक उड़ाना रघुवीर यादव को बहुत बुरा लगा जिसकी वजह से वह घर गए ही नहीं और उसी पान की दुकान से वापस ललितपुर आ गए। रघुवीर बहुत स्वाभिमानी इंसान हैं। उन्होंने फिर कभी घर का रुख नहीं किया और क्या आप जानते हैं फिर रघुवीर यादव वापस अपने घर कब लौटे? पूरे 20 साल बाद जब इनकी फिल्म मेसी साहब रिलीज हो चुकी थी और इन्हें दो इंटरनेशनल फिल्म अवार्ड मिल चुके थे। कहां तो वह एक वक्त वो था जब इनके रिश्तेदार इनके पिता से रघुवीर की बुराई करते नहीं थकते थे।

कहते थे कि देखना तुम्हारा बेटा अब कोई चोर बनकर घर लौटेगा। लेकिन अब वो वक्त आ चुका था जब रघुवीर ने अपनी मेहनत और टैलेंट के दम पर वो मुकाम हासिल कर लिया था कि अब वही लोग 20 साल बाद कहने लगे थे कि हम तो पहले ही कहते थे कि रघुवीर कुछ बनकर ही गांव वापस लौटेगा। खैर फिल्म मेसी साहब के हिट होने के बाद अब रघुवीर यादव के पास फिल्मों के ऑफर्स की छड़ी लग गई। हालांकि उन्हें अब भी फिल्मों से ज्यादा थिएटर और खासकर एनएसटी से मोहब्बत थी। जिसकी वजह से इन्होंने काफी वक्त तक खुद को मिले सभी ऑफर्स ठुकरा दिए। समय बीतता गया और जब इन्होंने नोटिस किया कि इब्राहिम अलगाजी के एनएसजी छोड़ने के बाद वहां थिएटर की हालत खराब हो गई है और राजनीति होने लगी है तो इन्होंने भी एनएसजी छोड़ दिया और यह मुंबई आ गए। रघुवीर के पास ऑफर्स की कमी नहीं थी। तो मुंबई आने के बाद उन्होंने फिल्म सलाम बॉम्बे में काम किया। इस फिल्म ने दो राष्ट्रीय पुरस्कार जीते। फिल्मों के अलावा रघुवीर ने टीवी में भी काम किया। जहां उन्हें सबसे ज्यादा पहचान मिली। साल 1989 से 90 में दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक मुंगेरी लाल के हसीन सपने में यह धारावाहिक इतना लोकप्रिय हुआ कि लोग इन्हें मुंगेरी लाल के नाम से ही जानने लगे। मुंगेरी लाल के हसीन सपने मुंगेरी लाल के हसीन सपने। चाहे फिल्म हो या धारावाहिक। रघुवीर यादव जी में एक बात कॉमन थी और वो यह कि वह अपने मुताबिक ही कैरेक्टर चुनते थे। अगर उन्हें दिया गया किरदार पसंद नहीं आता तो वह काम करने से मना कर देते थे। किरदार को इतनी बारीकी से चुनने के पीछे भी एक रोचक कहानी है। दरअसल जब वह मुंबई आए थे तो अपने गुजारे के लिए साल 1992 से 93 में उन्होंने ना चाहते हुए भी एक फिल्म में रोल निभा लिया। यह फिल्म थी उधार की जिंदगी जिसमें उन्होंने ऊटपटांग किरदार ले लिया जो उन्हें भी पसंद नहीं था। लेकिन फिल्म की रिलीज के पास कुछ ऐसा हुआ जिसने हमेशा हमेशा के लिए रघुवीर यादव की सोच बदल कर रख दी। दरअसल एक पार्टी के दौरान उनसे एक महिला मिली जो बहुत आग बबूला थी। उसने मिलते ही रघुवीर से कहा आपको शर्म आनी चाहिए। आपने हम सबको कितनी तकलीफ दी है।

महिला की बात सुनकर रघुवीर घबरा गए और बोले मैंने ऐसा क्या कर दिया है? तब उस महिला ने कहा कि हम सब आपके काम को बहुत पसंद करते हैं। आपके अभिन्न की कला बेजोड़ है लेकिन आपने इस फिल्म से हम सबको निराश किया है। इस पर रघुवीर ने जवाब दिया कि मुंबई में खर्चा निकालने के लिए ऐसा रोल करना पड़ा। जिस पर उस महिला ने जवाब दिया कि आगे से आप भले ही भूखे मर जाना लेकिन ऐसा रोल मत करना। उस दिन रघुवीर के दिलो दिमाग पर उस महिला की बात का ऐसा असर हुआ कि उसके बाद से रघुवीर हमेशा सोच समझ कर ही रोल चुनने लगे। हां गए थे पी नहीं पाए। इससे पहले दोनों में झगड़ा हो गया। अरे अब चुपचाप चाय बना दो और नहीं बनाना है तो बता दो। हम खुद जाके बना लेंगे और पी लेंगे। लगे। हाल ही में रघुवीर ने वेब सीरीज की तरफ भी रुख किया है। जिसमें पंचायत नाम की सीरीज में उनके द्वारा प्रधान जी का निभाया हुआ किरदार बहुत पसंद किया गया। उनके देसी अखड़पन ने सीरीज में जान फूंक दी। अरे बुढ़ापे में कहां बिजली गिराओगी? बूढ़े होंगे आप। चलिए। आय हाय देखो तो। पंचायत के अलावा रे कौन बनेगी? शिखरवती और द ग्रेट इंडियन मर्डर जैसे मशहूर वेब सीरीज में भी रघुवीर ने काम किया। दोस्तों, रघुवीर यादव एक आला दर्जे के एक्टर हैं। उनके शानदार अभिनय का अंदाज आप इसी बात से लगा सकते हैं कि उन्हें दो-दो अंतरराष्ट्रीय अवार्ड मिलने के साथ-साथ वो भारत के इकलौते ऐसे अभिनेता हैं जिनकी कुल आठ फिल्मों को ऑस्कर के लिए नामांकित किया जा चुका है। और यह फिल्में हैं 1985 में आई सलाम बॉम्बे। 1993 में आई रुदाली और बैंडेट क्वीन, 1999 में आई अर्थ, 2001 में आई लगान, 2005 में आई वाटर, 2010 में आई पीपली लाइफ और 2017 में आई न्यूटन।

इन सब फिल्मों में अभिनय करने के बाद भी एक शौक था, जिसे उन्होंने अपने दिल के किसी कोने में जिंदा रखा हुआ था, और वो था संगीत प्रेम। फिल्म पीपली लाइव में रघुवीर के द्वारा गाया हुआ गाना महंगाई डायन खाए जात है खूब पसंद किया गया था सखी सया तो खूब ही कमात है महंगाई खाए जात है पीपली लाइफ के अलावा राम जी लंदन वाले और क्लब 60 जैसी फिल्मों में भी इन्होंने गाने गाए फिल्म लगान के समय रघुवीर यादव के साथ कुछ ऐसा हुआ जिससे वह मौत के मुंह से बाहर आए। दरअसल आप सब ने गौर किया होगा कि इस फिल्म के गाने मधुबन में जो कन्हैया गाने में सारे कैरेक्टर इसमें नजर आते हैं सिवाय रघुवीर के। दरअसल इस गाने की शूटिंग से पहले रघुवीर के पेट में जोर का दर्द उठा जो फूड पोइजनिंग की वजह से हुआ था। लेकिन डॉक्टर ने लापरवाही करते हुए बिना जांच के ही कह दिया अपेंडिक्स का दर्द है जिसे ऑपरेट करना होगा। फिर क्या था? आनन-फानन में इसका इंतजाम किया गया क्योंकि उस समय मुंबई जाना संभव नहीं था इसलिए पास के ही अस्पताल में ऑपरेशन होना तय हुआ। रघुवीर को ऑपरेशन के लिए ले जाया गया और बेहोशी का इंजेक्शन दे दिया गया। लेकिन टीम को डॉक्टर ने

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