जो बंगाल में क्या होगा? जैसे आपने कहा कि ममता बनर्जी के पास दो एम है मुस्लिम और महिला। लेकिन एक ज्योग्राफिकली भी बात हो रही है कि नॉर्थ बंगाल जो है वह बीजेपी या पहले कांग्रेस के पास होता था। अब बीजेपी के पास वहां दबदबा है। साउथ बंगाल मतलब जो कोलकाता के आसपास वाला इलाका है वो ममता बनर्जी का इलाका है। तो अगर बीजेपी ने साउथ में सेन लगा दी तो वो सरकार बना सकती है। लेकिन ओवरऑल आपका क्या आकलन है? बंगाल में क्या हो सकता है? देखिए आपने बिल्कुल सही कहा। नॉर्थ बंगाल बीजेपी का गढ़ बन गया है। दक्षिण बंगाल ममता का गढ़ रहा है। अगर बीजेपी खास करके शहरी इलाके जो है कोलकाता और कोलकाता के इर्द-गिर्द और 24 साउथ परगना में यहां अगर बीजेपी ममता के इस किले में सेंध मार पाती है तो जरूर बीजेपी 100 तो पार कर सकती है।
देखिए मुझे लगता है इस चुनाव में बीजेपी का पहला टारगेट है 100 पार करना। उसके बाद कौन जाने कहां आपकी गाड़ी रुकती है। ममता बनर्जी का लुक मुझे लगता है पहला टारगेट है कि कम से कम मुझे एक क्लियर मेजरिटी मिलनी चाहिए 160 तो उनके 160 उसके बाद कितना ऊपर जाता है वो बाद की बात है ये जो दक्षिण बंगाल है जो दूसरे चरण में ज्यादातर जा रहा है अगर दक्षिण बंगाल में ममता कमजोर पड़ जाती है तो कुछ भी हो सकता है लेकिन दक्षिण बंगाल जहां ममता को बड़ी जीत पिछले बार मिली थी और ना केवल 2021 में लेकिन 204 में भी जब मोदी जी लोकसभा चुनाव भी लड़े थे। ममता बनर्जी ने दक्षिण बंगाल में हमेशा अच्छा प्रदर्शन किया है। और अगर वो बरकरार रहा तो एडवांटेज ममता। लेकिन ये चुनाव जिस तरह से एसआर एक्सरसाइज की वजह से कितने वोट काटे गए हैं। 90 लाख वोटर काटे गए हैं। जिसमें से कई की मृत्यु हुई है। किसने एड्रेस बदले हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो जिन्होंने पिछले इलेक्शन में वोट दिए दिए। लेकिन इस बार उनको वोट देने का अधिकार नहीं मिल रहा है।
अब वह किसको डैमेज करते हैं और यह कहना आज की तारीख में बहुत ही मुश्किल है कि एसआईआर किसको कितना नुकसान पहुंचाएगा क्योंकि कुछ इलाकों में जो मटवा राजवंशी समाज है वो बीजेपी के वोटर है। वहां भी कई वोट काटे गए हैं। फिर मुस्लिम है जो ममता को सपोर्ट करते हैं। उनके भी वोट काटे गए हैं। तो जैसे तमिलनाडु में विजय फैक्टर है। उस तरह से बंगाल में एसआईआर फैक्टर है और एसआईआर तय एक तरह से तय कर सकता है कि जो कांटे की टक्कर के जो 30 40 सीटें थी जो 5000 या कम वोटों से ममता बनर्जी ने जीती थी उन वो उन सीटों पर क्या होगा? वह बहुत ही मुझे लगता है महत्वपूर्ण है और वह निर्णायक रहेगा कि ममता को कितनी को जीत मिलती है या अच्छी जीत मिलती है या बीजेपी कांटे की टक्कर लेके 100 ही नहीं 100 के बहुत ऊपर जाती है। कहना बहुत मुश्किल है क्योंकि एसआर किसको कितना नुकसान पहुंचाएगा यह आज की तारीख में कहना जैसे विजय किसको कितना नुकसान पहुंचाएगा तमिलनाडु में कहना बहुत मुश्किल है मिलन नहीं तो राजीव जैसे कहा कि एक्स फैक्टर जो बंगाल में है वो एसआईआर है और मैंने एक आंकड़ा पढ़ा था अखबार में इंडियन एक्सप्रेस में कि 44 सीटें ऐसी है
जहां पर डिलीशन ज्यादा है पिछली बार की मार्जिन के लेकिन जब उसका बंटवारा हुआ तो 24 सीटें टीएमसी को नुकसान हुआ है और 20 सीटों पर नुकसान मतलब जो जीती थी उस समय वह 24 सीटें ममता ने जीती थी और 20 सीटें बीजेपी ने जीती थी। यह हम पहले भी एक आंकड़े की बात कर चुके हैं जो बार-बार चलता है सोशल मीडिया की 90 लाख वोट चले गए और ममता का मार्जिन पिछली बार 60 लाख था। हालांकि ये ऐसी कोई गणित में चुनाव नहीं होता है। लेकिन आपको क्या लगता है कि ये एसआईआर सचमुच में इतना बड़ा गेम चेंजर होगा या हम उसको ओवरएस्टीमेट कर रहे हैं? नहीं देखिए हमने देखा है बिहार में भी कि जब किसी एक पक्ष को जीत मिलती है तो बड़ी भारी जीत मिलती है। अब हम यह नहीं कह सकते कि आरजेडी और कांग्रेस हार गई क्योंकि एसआर में वोट काटे गए। आरजेडी और कांग्रेस हार गई क्योंकि लोगों ने जेडीयू और बीजेपी में भरोसा रखा। अंत में मुझे नहीं एसआईआर क्योंकि एसआर एक नया फैक्टर है बंगाल की राजनीति में क्योंकि इतने जब इतने वोट काटे जाते हैं जैसे आपने कहा जो कांटे की टक्कर की सीटें हैं वहां जरूर उसका प्रभाव पड़ सकता है। कुछ ऐसी सीटें हैं जहां बड़े मार्जिन से टीएमसी जीती हो या भाजपा जीती हो वहां एसआईआर का कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला।
तो और एसआर का और एक है। अगर आप सोचिए आप परिवार में पांच है लेकिन छठा व्यक्ति जो आप ही के परिवार के है आपकी भाई या भाई है या आपकी बहन है उनका वोट कट जाता है तो बाकी पांच गुस्से में आते हैं। यह भी ये भी हो सकता है। और तो एसआईआर का किस स्वरूप लेगा? क्या लोग एसआईआर से जो इतनी धूप में जाकर ट्राइबनल के सामने या अपने जो दिहाड़ी वर्कर है उनकी दिहाड़ी चली गई। वह किस तरह से देखेंगे एसआर को? या कोई एक बंगाली हिंदू जो है उसे लगता है कि यह ज्यादातर जो नैरेटिव चलाया गया है कि बांग्लादेश से इतने लोग आए हैं। इनका वोट काटा गया है। बंगाली हिंदू को एकजुट होना चाहिए। जो बीजेपी का नैरेटिव है। क्या वो चलेगा? देखिए बंगाल में आज की तारीख में कहना बहुत मुश्किल है कि एसआर किसको कितना नुकसान किस एरिया में पहुंचाएगा। इसलिए मैंने कहा वो एक्स फैक्टर है। मैं नहीं मानता कि वो निर्णायक होगा। ओवरऑल रिजल्ट में मार्जिन में तय करेगा कि कितने सीटों से कौन कहां जीतता है।
यह हो सकता है। आई थिंक इवेंचुअली जो वोटर है मैं बार-बार वो शब्द आज यूज़ कर रहा हूं आपके लिए स्विगी पॉलिटिक्स। वोटर वोट करेगा जो मुझे जो पार्टी या जो सरकार मुझे कुछ दे रही है जिससे मुझे लगता है मेरी जिंदगी इंप्रूव हो रही है। अगर वोटर को लगे कि कन्याश्री और लोखीर भंडार और रूपश्री के जरिए मेरी जिंदगी बेहतर हुई है तो वो अभी भी ममता को वोट करेगा। अगर उनको लगता है कि भाजपा की जो ₹3000 प्रॉमिस कर रही है और अन्य जो बाकी प्रॉमिस कर रहे हैं युवाओं के लिए और अन्य वर्गों के लिए क्या वो मुझे लुभा पाएंगी और मेरी जिंदगी बेहतर होगी वो भाजपा के लिए देगा। उसे ना कोई विचारधारा से अब कोई लेना देना है। हमारे नेता और हमारे पत्रकार ये विचारधारा की लड़ाई करके डिबेट करते हैं। स्विगी पॉलिटिक्स का प्रभाव अब देश भर में है और बंगाल और तमिलनाडु में भी मुझे लगता है जो स्विगी पॉलिटिक्स की लड़ाई जीत पाएगा वही चुनाव जीतेगा। बहुत-बहुत धन्यवाद राजदीप इस बातचीत के लिए।
राजदीप ने एक नया शब्द हमें बताया राजनीति में जो आजकल चल रहा है स्विगी पॉलिटिक्स मतलब ये शब्द मुझे रेवंत रेड्डी ने दिया है उनको आप पेटेंट दीजिए मैंने उसे कॉपी किया है नहीं नहीं तो आप ही से बातचीत में उन्होंनेकि कहा था तो मैं आपका हवाला दे रहा हूं लेकिन तो कहने का मतलब यह है कि जो घर पे जाके डिलीवरी करेगा जो मुझे फायदा पहुंचाएगा लोग उसको वोट डालते हैं और अगर स्विगी पॉलिटिक्स चलती है तो ममता बनर्जी को फायदा हो सकता है क्योंकि ऑलरेडी उनकी डिलीवरी चल रही है वही बात डीएमके पर भी लागू होती क्योंकि वह भी पैसे दे रहे हैं। लेकिन क्या यह दो फैक्टर और है इस दोनों राज्यों के चुनाव में। तमिलनाडु में जो फैक्टर है वो है विजय का फैक्टर कि वह कितना वोट काटते हैं और कितना किसका वोट काटते हैं और बंगाल में जो एसआईआर का फैक्टर है वह तय करेगा कि चुनाव का परिणाम क्या होगा। [संगीत] [संगीत] [संगीत] तो