आज पूरे यूनाइटेड स्टेट्स में आपको हर जगह ऐसे भारत में बने सीवर के कवर्स देखने को मिलते हैं। इन्हें मैनुअल कवर्स कहा जाता है जिसका इस्तेमाल सीवर और गटर को ढकने में किया जाता है।न्यूयॉर्क से लेके मैनहटन और एलेबामा से कैलिफोर्निया आप यूनाइटेड स्टेट्स में कहीं भी चले जाइए। आपको मेड इन इंडिया की एनग्रेविंग के साथ ऐसे गटर के ढक्कन हर जगह देखने को मिल जाएंगे। क्योंकि यूएसए की मैनुअल कवर की डिमांड का आज 60 से 70% हिस्सा भारत से इंपोर्ट किया जाता है। बहुत कम लोग इसके बारे में जानते हैं। लेकिन भारत के एक छोटे से शहर की वजह से आज यूनाइटेड स्टेट्स का सीवर इंफ्रास्ट्रक्चर चल पा रहा है। और भारत आज यूएसए जैसे डेवलप्ड देश को हर साल 10 लाख से ज्यादा मैनुअल कवर्स एक्सपोर्ट करता है। आज इसी टॉपिक के बारे में बात करेंगे।
लेकिन आगे बढ़ने से पहले मैं आपसे आज रिक्वेस्ट करूंगा कि हमें अपना सपोर्ट दें और वीडियो को लाइक करके ज्यादा से ज्यादा ऐसी वीडियोस को शेयर करें जिससे लोग मेक इन इंडिया की ताकत को समझे और भारत में बने सामान के प्रति उनका कॉन्फिडेंस बढ़े। यूनाइटेड स्टेट्स के मैन्युफैक्चरर्स आज भारत में बने मैनुअल कवर्स की वजह से परेशान हैं। क्योंकि अपने ही सीवर्स को कवर करने के लिए यूनाइटेड स्टेट्स की सरकार ऐसे मैनुअल कवर्स मेजरली भारत से इंपोर्ट करती है और यूएसए के मैनुअल कवर मैन्युफैक्चरर्स का बिजनेस हावड़ा बेस्ड फैक्ट्रीज की वजह से ठप पड़ चुका है। पहले इतिहास समझ लेते हैं। कोलकाता के हावड़ा में पहली बार 1781 में एक स्टील फाउंड्री सेटअप की गई।
इस टाइम पे भारत पे ब्रिटिशर्स का कंट्रोल था। लेकिन किसी वजह से ये फाउंड्री नहीं चल पाई और कुछ सालों के ऑपरेशंस के बाद बंद कर दी गई। 1846 में फिर दोबारा एक और फाउंड्री का गठन बर्न एंड कॉरपोरेशन ने भारत में किया। इस बार अच्छी बात यह थी कि भारत में इंडस्ट्रलाइजेशन बढ़ने की वजह से ना केवल स्किल्ड लेबर आसानी से मिल सकती थी बल्कि भारत में कोयले जैसे रॉ मटेरियल का प्रोडक्शन भी बढ़ चुका था। शिपिंग, कंस्ट्रक्शन और रेलवेेज का एक्सपेंशन इस दौरान एक काफी बड़े लेवल पर शुरू हो चुका था और भारत में स्टील की डिमांड अब एक्सपोनेंशियली बढ़ने लगी थी। शुरुआत में इसी स्टील फाउंड्रीज को ब्रिटिशर्स कंट्रोल करते थे। लेकिन स्टील की बढ़ती हुई डिमांड की वजह से अब दूसरे बिजनेसमैन भी इस सेक्टर में उतरने लगे। साल 1900 तक आते-आते भारत में और सेक्टर्स के लिए भी स्टील का प्रोडक्शन शुरू हो गया। और 1912 से 1940 के बीच ब्रिटिशर्स ने भारत से बहुत ही छोटे लेवल पे स्टील का एक्सपोर्ट भी शुरू कर दिया।
आजादी के बाद जब भारत को फॉरेक्स रिजर्व बढ़ाने की जरूरत पड़ी तब हमने एक बड़े लेवल पे और स्टील के प्रोडक्ट्स वेस्टर्न देशों को एक्सपोर्ट करने शुरू किए। 1980 से 1990 के बीच भारत ने यूएसए को मैनुअल कवर्ड्स एक्सपोर्ट करना शुरू किया जो यूएसए में बने मैनुअल कवर से 60 से 70% ज्यादा सस्ते पड़ते थे। 1990 से साल 2000 तक भारत यूएसए के मैनुअल कवर का 60% से ज्यादा मार्केट डोमिनेट कर चुका था और यह आज तक कायम है। इंडियन एक्सप्रेस के एक आर्टिकल में बताया गया है कि 1970 तक यूएसए में मैनुअल कवर का इंपोर्ट ना के बराबर था। पर आज यूएसए की खुद की इंडस्ट्रीज अपने ही मार्केट में भारतीय एक्सपोर्ट की वजह से दम तोड़ने लगी हैं। और यूएसए की सरकार आज चाह के भी कुछ नहीं कर पा रही। भारत की आज 30% फाउंड्रीज वेस्ट बंगाल में बेस्ड हैं और ये 250 फाउंड्रीज ना केवल यूएसए बल्कि यूरोप और सेंट्रल एशिया की स्टील डिमांड को एक बड़े लेवल पर पूरा करती हैं।एक अनुमान के मुताबिक पूरे यूनाइटेड स्टेट्स में 25 से 30 मिलियन यानी कि अराउंड 3 करोड़ मैन होल्स हैं।
स्टील से बने एक मैन होल कवर की उम्र 20 से 25 साल तक की होती है और हर साल यूएसए की म्युनिसिपल अथॉरिटीज करीबन 20 लाख से ज्यादा मैन होल्स रिप्लेस करती है। इसके अलावा नई कंस्ट्रक्शन साइट्स के लिए भी यूएसए को ऐसे मैनुअल कवर्स की जरूरत पड़ती है। लेकिन पूरी डिमांड का एक काफी छोटा परसेंटेज ही यूएसए में मैन्युफैक्चर किया जाता है। क्योंकि अमेरिका में बने मैनुअल कवर की कीमत $0 से $400 की होती है। वहीं भारत से इस तरह के ढक्कनों को 80 से $200 पर पीस के हिसाब से इंपोर्ट किया जाता है। वो भी शिपिंग कॉस्ट मिलाके। भारत आज भले ही स्टील प्रोडक्शन में पूरी दुनिया में दूसरी रैंकिंग पे आता है। लेकिन अगर यूएसए मार्केट के अलावा ओवरऑल ग्लोबल मार्केट को देखा जाए तो मैनुअल कवर के एक्सपोर्ट में वियतनाम और चाइना भारत से भी काफी आगे हैं और यूरोपियन मार्केट को भारत से बड़े लेवल पर डोमिनेट करते हैं।सोचिए अकेले मैनुअल कवर के मार्केट की वैल्यू आज करीबन 6.5 बिलियन से भी ज्यादा है और दुनिया के तीन देश इस इंडस्ट्री को डोमिनेट करते हैं। लेकिन यह ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकता क्योंकि हाल ही के दिनों में इस इंडस्ट्री के अंदर मटेरियल शिफ्ट देखने को मिला है। दूसरे लाइट वेट और जंग ना लगने वाले मटेरियल जैसे कि फाइबर रिइंफोर्स प्लास्टिक और पॉलीमर कंपोजिट्स अब मैनुअल कवर को रिप्लेस करने लगे हैं। यह ना केवल हल्के बल्कि ऐसे कवर्स को 50 से 60 सालों तक भी रिप्लेस करने की जरूरत नहीं पड़ती। इसके अलावा कास्ट आयरन से बने मैनुअल से इनकी कीमतें लगभग 30% तक कम होती है।
भारत में भी इस तरह के मैनुअल्स का प्रोडक्शन शुरू हो चुका है और धीरे-धीरे दुनिया भर में इनकी डिमांड बढ़ने लगी है। इसका असर अब वेस्ट बंगाल की फाउंड्रीज पे भी दिखना शुरू हो चुका है। पिछले कुछ महीनों में कास्ट आयरन से बने मैनुअल कवर की डिमांड 5 से 6% गिरी है। पर इसके मल्टीपल रीज़ंस हो सकते हैं। यूएसए ने कुछ महीनों से अपने मैन्युफैक्चरर्स को सपोर्ट करना शुरू कर दिया है। इसके अलावा दुनिया में चल रहे युद्ध की वजह से भी इस डिमांड पे असर पड़ सकता है।यूएसए में भारतीय मैनुअल कवर्स की डिमांड अभी कुछ सालों तक और रहने वाली है। लेकिन टेक्नोलॉजी शिफ्ट को रोका नहीं जा सकता। आज नहीं तो कल कास्ट आयरन को दूसरे पॉलीमर बेस मटेरियल यूएसए और बाकी देश रिपे जरूर करेंगे।इसलिए हमें इस सेक्टर में बड़े बदलाव और अपग्रेड की जरूरत है। जो ना केवल नई टेक्नोलॉजीस को टक्कर दें बल्कि भारत को सिर्फ कॉस्ट एडवांटेज से उठाकर इनोवेशन और हाई वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग का ग्लोबल लीडर बना दे। हम