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ईरान को रोकने का बस यही तरीका, लौट के अमेरिकी किसके पास आए?

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मिडिल ईस्ट में जारी में ईरान और अमेरिका के बीच किसी तरह के समझौते की कड़ी को मजबूत करने के लिए कई देश अपनी भूमिका अदा कर रहे हैं। तुर्की, पाकिस्तान और मिस्र जैसे देशों ने इस के समाप्ति प्रयास के लिए पूरी ताकत झोंक रखी है। इनमें पाकिस्तान अमेरिका के संदेशों को ईरान पर पहुंचा रहा है। जबकि तुर्की खाली देशों को मनाने की कोशिश कर रहा है। इन सभी प्रयासों के बीच अमेरिका ने मध्यस्था के नेतृत्व के लिए सबसे पुराने खिलाड़ी क़तर को सक्रिय किया है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे डी वेंस ने क़तर के प्रधानमंत्री से बात की है।

अमेरिकी मीडिया आउटलेट एक्सओस की रिपोर्ट के मुताबिक वेंस को ईरान अमेरिका के बीच मध्यस्ता और सीजफायर प्रक्रिया की कमान दी गई है। जिसके बाद उन्होंने क़तर से संपर्क साधा। इस मुलाकात में दोनों नेताओं ने चर्चा की कि मिडिल ईस्ट में को कैसे खत्म किया जाए और स्थाई शांति कैसे स्थापित की जा सकती है। दिलचस्प बात तो यह है कि मात्र 2 दिन पहले क़तर ने खुद घोषणा की थी कि वह ईरान और अमेरिका के बीच हो रहे समझौते से अपने आप को अलग कर रहा है।

क़तर ने कहा था कि वह इस समझौते का हिस्सा नहीं है और खुद को तीसरे दल के रूप में अलग रखता है। उसके बावजूद अमेरिका ने अपनी मध्यस्था प्रक्रिया में कतर की भूमिका को अहम माना और वेंस ने कतर के प्रधानमंत्री को अमेरिका बुलाकर उनसे विस्तृत बातचीत की। एक्सियोस के अनुसार केवेंस के लिए यह मध्यस्था काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि वेंस शुरू से ईरान के खिलाफ सीधे के पक्ष में नहीं रहे। वेंस यह नहीं चाहते थे कि अमेरिका इजराइल के लिए युद्ध लड़े। इसी कारण डोनाल्ड ट्रंप ने विराम की कमान वेंस को सौंपी है।

जब अमेरिका अफगानिस्तान में में फंसा हुआ था। इसी तरह क़तर ने हमास और इजराइल के बीच भी शांति समझौते में निरंतर मध्यस्था की थी। अब तक क़तर कुल 10 बड़े शांति समझौते कराने में सफल भी रहा है। इसी बीच खाली क्षेत्र में ईरान और क़तर के बीच साइलेंट डील की चर्चा तेज हो रही है।इस समझौते के तहत कहा जा रहा है कि यदि ईरान खाड़ी में स्थित क़तर के तेल और गैस संसाधनों पर हमला नहीं करता है तो उसे $6 बिलियन दिए जाएंगे। यह वही राशि है जो 2023 में अमेरिका ने क़तर को दी थी। जब ईरान ने कुछ अमेरिकी कैदियों को छोड़ दिया था। उस मुआवजे को ईरान को देने से बाद में क़तर ने हटने का निर्णय लिया था। अब पुनः उसी राशि को ईरान के इस्लामिक रिवोशनरी गार्ड कॉब्स को देने की बात हो रही है जो फिलहाल पूरे युद्ध को लीड कर रहा है।इस डील का सीधा-सीधा असर यह हुआ है कि पहली बार क़तर ने औपचारिक रूप से खुद को ईरान अमेरिकी विवाद से अलग कर लिया था और ईरान ने 20 मार्च के बाद क़तर पर किसी हमले की पुष्टि नहीं की है। मिडिल ईस्ट में जारी को आपको बता दें 28 दिन पूरे हो चुके हैं और इस बीच यह खबर विश्व स्तर पर विवाद का विषय अब बनी हुई है।

मिडिल ईस्ट में बिगड़ते हालात के बीच इजराइल को लेकर एक बड़ी और चिंताजनक खबर सामने आ रही है।ईरान के साथ जारी तनावपूर्ण हालात के बीच इजराइल डिफेंस फोर्स यानी कि आईडीएफ के प्रमुख इयाल अजमी ने कैबिनेट मीटिंग में ऐसा बयान दिया है।जिसने सरकार के साथ-साथ सुरक्षा एजेंसियों की भी चिंता बढ़ा दी है। उन्होंने साफ चेतावनी दी है कि अगर मौजूदा हालात नहीं सुधरे तो आने वाले समय में सेना के कोलैप्स होने का खतरा पैदा हो सकता है। यह बयान उस वक्त आया जब कैबिनेट की अहम बैठक में प्रधानमंत्री बेजमीन नितिन याहू और रक्षा मंत्री इसराइल कैंट भी मौजूद थे। बैठक के दौरान जमीन ने कहा कि एक तरफ सेना पर ऑपरेशनल दबाव तेजी से बढ़ रहा है। वहीं दूसरी ओर जनशक्ति की भारी कमी स्थिति को गंभीर बना रही है।जमीन ने अपने संबोधन में 10 बड़े खतरों का जिक्र करते हुए कहा कि अब तुरंत ठोस कदम उठाने की जरूरत है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि अगर इन चुनौतियों को जल्द [संगीत] नहीं सुलझाया गया तो सेना की क्षमता बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। खासतौर पर उन्होंने यह बात उठाई कि लंबे समय तक रिजर्व सैनिकों के भरोसे युद्ध नहीं लड़ा जा सकता। उन्होंने जरूरी से अन्य सेवा कानून में बदलाव की मांग करते हुए कहा कि सेवा अवधि बढ़ाने और रिजर्व सिस्टम को मजबूत करने की जरूरत है।उनका मानना है कि मौजूदा ढांचा इस तरह के लंबे और बहुस्तरीय युद्ध के लिए पर्याप्त नहीं है। रक्षा मंत्री ने इस मुद्दे पर सत रुख अपनाते हुए संकेत दिए हैं कि जो लोग सेना में शामिल नहीं हो रहे हैं उनके खिलाफ कानून लाया जा सकता है। इजराइल में खरीदी समुदाय लंबे समय से अनिवार्य सेना सेवा का विरोध करता रहा है। जिससे यह मुद्दा और ज्यादा जटिल बन गया है। प्रधानमंत्री नितिन याू ने बैठक में इन समस्याओं को लेकर गहरी चिंता जताई है और भरोसा दिलाया है कि सरकार जल्द ही इसका समाधान निकालेगी।प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान में भी स्थिति की गंभीरता को माना गया है। इस समय इजराइल की सेना एक साथ कई मोर्चों पर दरअसल सक्रिय है। गाजा, सीरिया, लेबनान, ईरान और इराक में चल रहे सैन्य अभियानों ने सेना के संसाधनों पर भारी दबाव डाला है। अक्टूबर 2023 से जारी इस लंबे संघर्ष हालातों को और ज्यादा चुनौतीपूर्ण बना दिया है। मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक इजराइल के पास करीब 1 लाख 70,000 सक्रिय सैनिक और लगभग 4 लाख रिजर्व सैनिक हैं। इसके बावजूद सेना को करीब 15,000 सैनिकों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। जिनमें 8000 लड़ाकू सैनिक भी शामिल हैं।मिडिल ईस्ट में

जंग का यह 28वां दिन है और हालात लगातार आपको बता दें बिगड़ते जा रहे हैं। ऐसे में अंदर से आई यह चेतावनी साफ संकेत देती है कि इजराइल की सैन्य स्थिति पर गंभीर दबाव है और आने वाले दिनों में संकट और ज्यादा गहरा सकता है। अमेरिका, इजराइल और ईरान युद्ध के बीच पाकिस्तान ने इजराइल को चेतावनी दे दी है। पाकिस्तान सरकार से जुड़े एक फोरम का कहना है कि उसे कतर ना समझा जाए। साथ ही कहा है कि अधिकारियों को कुछ हुआ तो अंजाम बुरा होगा। दरअसल खबरें थी कि अमेरिका और इजराइल ने तेहरान में पाकिस्तानी दूतावास के पास हमले किए हैं। इजराइल रक्षा बलों ने शुक्रवार को कहा कि उसने मध्य तेहरान पर बड़े पैमाने पर सिलसिलेवार हमले किए।न्यूज़ 18 की रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान सरकार से जुड़े पाकिस्तान स्ट्रेटेजिक फोरम ने कहा इजराइल को यह याद रखना चाहिए कि पाकिस्तान कतर नहीं है। अगर हमारे डिप्लोमेट्स को दुनिया में कहीं भी किसी भी तरह का नुकसान पहुंचाया गया तो हम उन्हें बुरी तरह से मारेंगे। रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया कि पाकिस्तानी दूतावास के परिसर और स्टाफ को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है।हालांकि इस दौरान आसपास की कई इमारतें प्रभावित हुई हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार आईडीएफ ने टेलीग्राम पर कहा कुछ देर पहले आईडीएफ ने तेहरान के केंद्र में ईरानी शासन इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाते हुए बड़े पैमाने पर हमले किए। इसी बीच प्रेस टीवी ने खबर दिया कि ईरान ने ऑपरेशन टू प्रॉमिस चार की 83वीं लहर शुरू कर दी है।

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