ईरान से जारी अमेरिका और इजराइल का युद्ध अब 14वें दिन में प्रवेश कर चुका है। आज युद्ध का 14वां दिन है। इस बीच कई सारे ताजा घटनाक्रम सामने आए हैं जो मैं आपको बता देता हूं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रक्षा मंत्री की ओर से बड़ा बयान दिया गया है। राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि ईरान की सत्ता में बैठे लोगों को मारना एक सम्मानजनक काम है क्योंकि वो लोग अपने ही देश के लोगों को मार रहे थे। तो ऐसा ट्रंप का कहना है। इसके साथ ही अमेरिका के रक्षा मंत्री जो युद्ध मंत्री भी हैं उनका क्या कहना है वो भी आपको बता देते हैं। उनका कहना है कि अब तक हमने ईरान में करीब-करीब 15,000 सन ठिकानों को निशाना बनाया है। हमारा ऑपरेशन अभी भी जारी है।
अभी भी हमारे कई सारे लक्ष्य हैं जिन्हें हमें पूरा करना है। इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि हम ईरान की सभी वो उन कंपनियों को तबाह कर देंगे जो मिसाइलें बनाती हैं, जो ड्रोंस बनाते हैं, जो हथियार बनाते हैं। इसके साथ ही ईरान के सभी सैन्य उपकरणों को सैन्य ताकत को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया जाएगा। तो ऐसा अमेरिका के रक्षा मंत्री का कहना है। दूसरी तरफ की बातें बताएं तो ईरान की ओर से सर्वोच्च नेता का बयान तो सामने आ ही चुका है। जो नए सर्वोच्च नेता है मुस्तफा खान खामई उन्होंने अपने पहले लिखित बयान में कहा है कि ईरान झुकेगा नहीं। ईरान इस युद्ध के नुकसान की भरपाई भी लेगा। इसके साथ ही ईरान मध्य पूर्व में अमेरिका के सैन ठिकानों को बर्बाद करता रहेगा और वो आया अली खामनी के बलिदान का और ईरानी बच्चों की शहादत का बदला भी लेगा। ऐसा ईरान का कहना है।
और ईरान के राष्ट्रपति समेत विदेश मंत्री के बयान को देख लें या और नेताओं के बयान को देखें, आईआरजीसी के कमांडरों के बयान को देखें। सब यही कह रहे हैं कि हम इस युद्ध में बहुत अच्छी स्थिति में हैं। हम इस जंग को जीतने जा रहे हैं और हमने अमेरिका और इजराइल के घमंड को तोड़ दिया है। तो युद्ध के इन्हीं सभी ताजा घटनाक्रमों पर बयानों पर आज हम बात करने वाले हैं। युद्ध 14वें दिन में किस तरफ जा रहा है? कब तक युद्ध जा चलेगा ये? कब रुकेगा और क्या ट्रंप प्रशासन के बीच में कोई हड़कंप मचा हुआ है? आपस में ही कोई तालमेल में कमी नजर आ रही है? इस पर भी बात करेंगे और हमारे साथ तरकश में आज कई सारे खास मेहमान जुड़ने वाले हैं।
अभी फिलहाल हमारे साथ जुड़े हैं ग्रुप कैप्टन यूके देवनाथ सर जो रक्षा विशेषज्ञ हैं। देवनाथ सर बार-बार यह बात उठ रही है विदेशी मीडिया दावा भी कर रही है कि ट्रंप अब चाह रहे हैं कि वो इस युद्ध के को रोकने का रास्ता ढूंढे और वह शांतिपूर्वक खुद को जीता बताकर इस युद्ध को खत्म करना चाहते हैं। लेकिन उनको यह रास्ता अभी दिख नहीं रहा है। आपके हिसाब से ट्रंप प्रशासन के मन मस्तिष्क में अभी क्या चल रहा होगा?
वैभव जी डोनाल्ड ट्रंप ने यह युद्ध जिस मकसद से चालू किया था 28 फरवरी को वो मकसद पूरा नहीं हुआ। 28 फरवरी को जो हमला करके उन्होंने आयतला अली खमानी को मार डाला, शहीद कर डाला और ईरान के दूसरे टॉप पॉलिटिकल लीडर्स और जनरल्स को मार डाला। उसके बाद उन्होंने बहुत आशा की थी कि 1 मार्च की सुबह को और 2 मार्च की सुबह को लाखों की तादाद में ईरान की जो जजी है या ईरान में वह लोग जो कि पश्चिमी सभ्यता में पले बड़े हुए हैं। यूरोप में अमेरिका में पढ़ाई लिखाई की है। वह सड़कों पर आ जाएंगे और सरकारी प्रशिक्षणों में आग लगा देंगे। बसों पर पत्थर फेंकेंगे। आईआरजी की यूनिट्स पर हमला करेंगे।
जैसा कि जनवरी के पहले दो हफ्ते में हुआ था। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप को बहुत दुख हुआ जब ऐसा पहली मार्च की सुबह को या दूसरी मार्च की सुबह को नहीं हुआ। अब डोनाल्ड ट्रंप लगातार इजराइल की मदद से ईरान पर बमबारी कर रहे हैं। दावा कर रहे हैं कि उन्होंने अभी तक 6000 से ज्यादा टारगेट पर हमला किया है। जी तो रक्षा मंत्री ने तो आज 15,000 बता दिया सर। जी हां रक्षा मंत्री ने आज 15,000 बता दिए। तो होता क्या है कि ऐसी बमबारी आसमान से होने से सिर्फ ईरान को नुकसान हो रहा है। लेकिन अमेरिका जो चाहता था कि दिलो दिल में वो बोल नहीं पाते। ये एटम बम ईरानी एटम बम बहाना है। असल में अमेरिका और डोनाल्ड ट्रंप चाहते हैं कि ईरान में जो कच्चा तेल है जमीन के नीचे।
दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा भंडार 209 बिलियन बैरल्स वो अमेरिका के कंट्रोल में आ जाए जैसा उन्होंने वेनेजुएला में किया लेकिन वह इसको करने में भी कामयाब नहीं हो रही क्योंकि ईरान में आईआरजीसी जो है अभी तक मजबूती से खड़ी है। विद्रोह की भावना नहीं आई है। ईरान की आर्मी भी अभी तक मजबूती से बॉर्डर पर डटी हुई है। मोसाद ने और सीआईए ने बहुत कोशिश की कि ईरान की आर्मी के टॉप जनरल्स को तोड़ लें। ईरान में आईआरजीसी के टॉप ब्रिगेडियर्स और जनरल्स को तोड़ ले। कहते हैं ना कुछ जयचंद ढूंढ लेना,
विभीषण ढूंढ लेना। लेकिन अभी तक वो उसमें सफल नहीं हुए हैं। डोनाल्ड ट्रंप वाकई बहुत दुखी हैं। उनको समझ नहीं आ रहा कि इस दलदल से अब अपने को बाहर कैसे खींचे। बिल्कुल देवनाथ सर अभी खबर आई थी कुछ देर पहले कि पश्चिमी इराक में इरा अमेरिका का एक विमान था। रिफ्यूलिंग विमान था। सी KC135 नाम बताया जा रहा है उसका। अब वो क्रैश हो गया। दुर्घटनाग्रस्त कैसे हुआ?
इसके पीछे के असल कारण अभी पता नहीं चल पाए हैं। अमेरिका का कहना है कि उसकी वजह ईरानी हमला तो बिल्कुल नहीं थी। तो विमान क्रैश होने से चार अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई है। दो लापता हैं। कुल छह लोग उस पर बैठे हुए थे, सवार थी। आपके हिसाब से अमेरिका में सैनिकों की जो लगातार मौत हो रही है। जैसे चार सैनिक मारे गए। इनके शो अब अमेरिका पहुंचेंगे तो वहां का माहौल जिस तरह से बदलेगा सरकार ट्रंप की जो घिरती हुई नजर आएगी क्या आपको लगता है कि अभी अमेरिका बैकफुट पर नजर आ रहा है पूरी तरह से जी हां अमेरिका में होता ये है कि वहां के लोगों को पसंद नहीं है कि दूसरे देशों में युद्ध करते हुए अमेरिका के सोल्जर्स जो है वो बॉडी बैग में वापस अमेरिका में आए।
अमेरिका की माताएं अपने लड़कों को युद्ध में शहीद होना नहीं देना देखना चाहती। उनके यहां पत्नियां अपने पति को युद्ध में शहीद नहीं देखना चाहती हैं। बहनें अपने भाइयों को युद्ध में जान देना नहीं चाहती हैं। तो हो क्या रहा है कि अमेरिका में अभी इस साल अक्टूबर में मिड टर्म इलेक्शन ड्यू है। और ऐसे भी मुश्किल से डोनाल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी को मात्र एक या दो पॉइंट की बढ़त मिली थी। लेकिन जब से खाड़ी का युद्ध चालू हुआ है वह एक दो% की जो बढ़त थी वह भी अब खत्म हो गई है। ताजा जो वहां सर्वे कराए गए हैं
उसके अनुसार अभी डेमोक्रेट्स जो हैं वो 100 में से 53 लोग डेमोक्रेट्स के प्रति वफादार दिख रहे हैं। और 100 में से मात्र 47 लोग जो है रिपब्लिकनंस या डोन्ड ट्रंप को वोट देना चाहते हैं। यानी हुआ क्या है कि जो फेंस सिटर्स होते हैं, अनडिसाइडेड वोटर जो होते हैं, वह भी अब रिपब्लिकन पार्टी को वोट ना देकर डेमोक्रेट्स को वोट दे सकते हैं अक्टूबर के महीने। इससे डोनाल्ड ट्रंप थोड़ा सा सकपकाए हुए हैं क्योंकि उनका पूरा प्लान था कि इस मिड टर्म इलेक्शन में अगर ज्यादा रिपब्लिकनंस सेनेटर्स जीत के आते हैं
तो जब अगले 2000 29 में जब प्रेसिडेंशियल इलेक्शन होगा राष्ट्रपति का इलेक्शन होगा उसमें जेडी वंस को आगे करने का प्लान था कि क्योंकि अमेरिका में ऐसे कहा जाता है कि दो बार से ज्यादा प्रेसिडेंट नहीं बन सकते डोन्ड ट्रंप का ये सेकंड टेन्योर है। तो अगली बार डोनाल्ड ट्रंप ही अपने हाथ से जेडी वंस को अमेरिका का जो कि अभी वाइस प्रेसिडेंट हैं। अमेरिका का अगला प्रेसिडेंट बनाते। रिपब्लिकन पार्टी का दराज चलता रहता। लेकिन अगर बड़ी तादाद में रिपब्लिकन पार्टी के सेनेटर्स नहीं जीते तो फिर जेडी वंश का राष्ट्रपति पद पर चुना जाना भी खटाई में पड़ जाएगा।
जी बिल्कुल सर ईरान की ओर से देवनाथ सर दावा किया जा रहा है कि हमने करीब-करीब 100 तो अमेरिकी सैनिक मार दिए हैं। संख्या ज्यादा भी हो सकती है। लेकिन अमेरिका जो है वो आधिकारिक तौर पर संख्या 11 बता रहा है। सात पहले मरे थे कुवैत वाले हमले में। उसके बाद चार अभी मरे हैं। इराक में जो विमान क्रैश हुआ है। टोटल 11। आपके हिसाब से क्या अमेरिका असल संख्या छिपा रहा है या असल आंकड़े 11 ही हैं?
देखिए अमेरिका क्योंकि अमेरिका ऐसा देश है जहां पर अगर देश का कोई नागरिक कहीं पर भी मृत्यु होता है तो उसको छुपाना जरा मुश्किल है। उनके यहां जो प्रेस फ्रीडम नाम की ये जो संस्था है ये एक धारणा है और उनके यहां राइट टू इंफॉर्मेशन की जो धारणा है उसको शायद दुनिया के दूसरे देश में कोई समझ नहीं सकता। भारत में भी हम नहीं समझ सकते। उनके यहां पर अगर एक अमेरिकन सैनिक तो छोड़ दीजिए अगर एक अमेरिकन नागरिक को भी दुनिया में कहीं हो जाता है तो तुरंत वो अगले दिन सुर्खियों में आ जाता है।
तो हां जब ईरान कहता है कि 100 नागरिक हताहत हुए हैं। उसका मतलब यह है कि 11 मारे गए हैं। लेकिन और 70 70 80 जो हैं वो गंभीर रूप से घायल हो गए हैं। हाथ उड़ गए हैं। पैर उड़ गए हैं। एक आंख उड़ गया है। जी बिल्कुल देवनाथ सर एक सवाल और है। तुर्की पर भी हमले की खबर आई है। पहले भी आई थी और इसके बाद कहा जा रहा है कि तुर्की नेटो का सदस्य है। हो सकता है नेटो के और भी देश इस युद्ध में शामिल हो जाए। लगातार आज 14वां दिन है। डे वन से ही ये बातें हो रही थी कि कई और देश शामिल होंगे।
लेकिन अभी तक तो ऐसा कुछ नहीं हुआ। इस बीच जर्मनी की ओर से कह दिया गया है कि हम इस युद्ध में हिस्सा नहीं लेंगे। ब्रिटेन भी पहले कह चुका है। आपको क्या लगता है? नाटो जो संयुक्त रूप से इराक हमले के दौरान हमने देखा था किस तरह से सब एकजुट होकर हमला कर रहे थे। अब बिखरा बिखरा सा नजर आ रहा है। क्या अमेरिका को अब नाटो देशों की जरूरत नहीं है? और इस युद्ध में क्या उसको जरूरत नहीं थी?
वैभव जी नाटो का मूल भाव जो था वो रूस विरोधी धारणा थी। पहले द्वितीय युद्ध अभी जब सेकंड वर्ल्ड वार खत्म हुआ 194546 में तो रूस ने बनाया वारसा पैक्ट जिसमें कि पूर्वी यूरोप के देशों ने ज्वाइन किया कम्युनिस्ट देश थे और इसके काउंटर करने के लिए अमेरिका ने बनाया नाटो जिसमें कि पश्चिमी यूरोप के देश थे। तो जो नेटो का चार्टर फाइव है वह कहता है कि अगर नेटो के किसी देश पर हमला हुआ तो वह बाकी सारे देशों पर हमला माना जाएगा और बाकी नेटो के देश भी दुश्मन पर हमला करने के लिए बाध्य हैं। तो ये रूस विरोधी धारणा है। नेटो को कभी भी एंटी ईरान या एंटी दूसरा कोई देश ऑर्गेनाइजेशन नहीं समझा गया। दूसरी चीज ये भी समझना पड़ेगा कि जब कोई बोल रहा है कि तुर्की के ऊपर हमला हो गया है। जी तो देखिए टेक्निकल रीज़ काफी होती है।
जब आप एक मिसाइल को ल्च करते हैं। दिवाली के रॉकेट मैंने और आपने फायर किए हैं। बोतल में रख के हम फायर करते हैं। वो बीच-बीच में एक जो है वो पता नहीं कहां आम के पेड़ की तरफ चल पड़ता है। तो तुर्की के साथ ईरान के डिप्लोमेटिक चैनल पर ईरान ने उनको समझा दिया है। कि यह जो मिसाइलें जो कि तुर्कियों की तरफ चल पड़ी थी शायद दो ऐसे कांड हुए हैं, इंसिडेंट हुए हैं अभी तक कि यह तुर्कियों को नुकसान पहुंचना पहुंचाने की वजह से नहीं ल्च की गई थी। ये टेक्निकल खराबी से उस तरफ चल पड़ी थी।
जाहिर बात है जब आप हर रोज 100 200 मिसाइलें ल्च कर रहे हो तो कुछ मिसाइलें होंगी जो 5 डिग्री या 10 डिग्री अपने रास्ते से भटक जाएंगी। ऐसा होता है तो तुर्की भी इसको समझ गया है और यह मिसाइल फाइनली जाकर गिरी कहां पर किसी निदृष्ट टारगेट पर तो गिरी नहीं वो खेतों में खलियानों में रेगिस्तान के मध्य में तुर्की के पहाड़ों में जाके एनथोलिया में जाके फट गई किसी का नुकसान नहीं हुआ और तुर्की ने ईरान द्वारा डिप्लोमेटिक चैनल पे जो कारण दिया कि भाई युद्ध की भावना नहीं थी ये गलती से उस तरफ चली गई जी उसको लिया बिल्कुल देवनाथ सर सर ट्रंप ने आज जी7 देशों की वर्चुअली जो बैठक हो रही थी उसमें हिस्सा लिया और उन्होंने बाकी देशों से यह कहा कि इस जंग को हम जल्दी ही खत्म करने जा रहे हैं। हमने एक ऐसे देश को बर्बाद कर दिया या उसकी सैन्य शक्ति को पूरी तरह खत्म कर दिया जो देश सबके लिए खतरा था।
और ट्रंप का ऐसा कहना है। आपको क्या लगता है कि ट्रंप अपने बड़बोलेपन के चक्कर में असल सच्चाई को वो हजम नहीं कर पा रहे क्योंकि अभी अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं जॉन वाल्टन उनका बयान आया है कि ट्रंप जो है बड़े फैसले बिना प्लानिंग के लेते हैं और वो इस चक्कर में ईरान को वेनेजुला समझ बैठे थे। उनके आकलन में गलती हुई थी। आपके हिसाब से क्या सच है?
इसमें कोई शक नहीं है कि वेनेजुला में जो सक्सेस मिली कि उनका एयरक्राफ्ट करियर वहां था। हेलीकॉप्टर और डेटा फोर्स के कमांडो गए। 11 मिनट में कराकस पहुंच गए। निकोलाई मधुरा को उठा के हाईजैक करके ले गए अमेरिका। हेलीकॉप्टर और डेटा फ़ोर्स 11 मिनट में वापस आ गए। ईरान बहुत बड़ा देश है। ये गलती वो समझने में देखिए मोटा-मोटी अंदाज देता हूं। जी ईरान उतना ही बड़ा है जितना बड़ा उत्तर भारत है। भारत का क्षेत्रफल 15 लाख किलोमीटर है। वर्ग किलोमीटर ईरान का क्षेत्रफल 8 लाख वर्ग किलोमीटर है। तो इतना आसान नहीं है कि बस गए और तेहान पहुंच गए और आयतलाक हमानी और राष्ट्रपति पेजिशकिन को हाईजैक करके ले गए। दूसरी बात है कि अमेरिका ने बहुत तरह की भ्रांतियां फैलाने की कोशिश की। गल्फ देशों में पिछले 30 साल, 20 साल, 10 साल में कि ईरान तुम लोगों को खा जाएगा। ईरान तुम्हारे ऊपर हमला कर देगा। ईरान तुम लोगों को गपचिया जाएगा।
जबकि ईरान ने हमेशा कहा कि ठीक है शिया सुन्नी का विवाद है। लेकिन ईरान का कोई इरादा नहीं है कुवैत, अबू धाबी, यूएई, ओमान या सऊदी या इराक पर हमला करने का। होता क्या है वहां पर? होता यह है इन सब देशों में कि एक सियासनी का डिवाइड बनाया हुआ है पश्चिमी देशों ने। लेकिन अगर हम याद रखें आज से तीन साल पहले चीन ने एक बहुत शानदार डिप्लोमेटिक कामयाबी दिखाते हुए ईरान की सरकार और सऊदी की राजशाही के बीच में रिश्तों को नॉर्मलाइज कर दिया था। ये तीन साल पहले की बात है। अब इससे अमेरिका को बहुत चिंता हो गई कि भाई अगर सऊदी अरेबिया और ईरान आपस में अगर मिल जाते हैं या दोस्त दोस्त रहते हैं दुश्मन दुश्मन नहीं रहते हैं। फिर अमेरिका वहां पर खेल कैसे खेलेगा? तो अमेरिका ने अलग-अलग तरह से चाल चली है
ताकि वो ईरान को भड़का सके। अभी भी ईरान के राष्ट्र विदेश मंत्री एक महीने में तीन बार बयान दे चुके हैं कि यह छोटे-छोटे जो हमले हो रहे हैं अरब मुल्कों पर सऊदी पर हुए हैं, इराक पर हुए हैं, कुवैत पर हुए हैं। उन्होंने बार-बार कहा है पेजिशकीन ने तो फाइनली माफी मांग ली कि भाई हमारे जो हमले थे वो अमेरिकन आर्मी, नेवी एयरफोर्स ठिकाने पर थे। ईरान ने कहा है भाई आपके यहां पर जो अमेरिकन दूतावास है इंटरनेशनल रूल है कि किसी देश में अगर किसी देश का दूतावास है तो उसको उस देश का हिस्सा माना जाता है। तो अमेरिकन दूतावास या काउंसिलेट अगर पश्चिम एशिया के देशों में है तो
वो वाजिब लेजिटमेट टारगेट बनते हैं ईरान के लिए। अच्छा एक और चीज मैं बताना चाहता हूं। लोग कहते हैं कि सिविलियन टारगेट पे ईरान ने हमला कर दिया। ऐसा नहीं है। हो ये रहा है कि इस युद्ध के पहले मोसाद और सीआईए के एजेंट इन सब देशों में थे 10 10 1515 लेकिन इस युद्ध के चालू होते ही अब मोसाद और सीआईए के एजेंट इन देशों में आ गए हैं 400 400 600 600 तो रहेंगे कहां रेगिस्तान में तंबू लगा के तो रहेंगे नहीं वो रह रहे हैं फाइव स्टार होटल में और इस तरह से ही जब ईरान ने हमला किया डिप्लोमेटिक एनक्लेव पर अमेरिकन एंबेसी या काउंसिलेट पे तो वहां जो डिप्लोमेट्स अपने परिवार के साथ रहते थे। वो सब भागे वहां से परिवार को लेकर। तो कहां रहेंगे?
फाइव स्टार होटल में रहेंगे। तो ये फाइव स्टार होटल की अब ईरान की इंटेलिजेंस सर्विस को पता लग जाता है। बहुत ही आसान है। क्योंकि इन फाइव स्टार होटल में जो भी प्लंबर है, इलेक्ट्रिशियन है, मेंटेनेंस स्टाफ है, हाउस कीपिंग स्टाफ है, उन सबकी सहानुभूति किसके साथ है? ईरान के लोगों के साथ है। महजे भी है। दोनों ही मुस्लिम मुस्लिम भावना रखते हैं। तो ये होटल स्टार भी बता देता है ईरानियन इंटेलिजेंस को कि हमारे होटल में 22वें मंजिल में पूरब की तरफ जो रूम नंबर 212 है उसमें अमेरिकन डिप्लोमेट ठहरे हुए हैं। ईरान एक ड्रोन ल्च कर देता है उसके ऊपर। या अमेरिकन डिप्लोमेट बड़ी तादाद में वहां किराए के घरों में रह रहे हैं। ऐसा सभी देशों में होता है। अगर आप दिल्ली में देखें चाणक्यपुरी है।
लेकिन ये चाणक्यपुरी में जो विदेशी एंबेसी खुली इनका स्टाफ कहां रहता है? वसंत विहार, वसंत को या मेहरौली वो ग्रेटर कैलाश वहां घर किराए पर लेके रखता है। तो ईरान इन डिप्लोमेट्स के घरों को ऊपर हमला कर रहा है। सिविलियन टारगेट पर हमला नहीं कर रहा। जी बिल्कुल। बिलकुल ईरान के हमलों की बात कर रहे हैं देवनाथ सर लगातार ईरान की ओर से दावा किया जा रहा है कि अमेरिका का दो सबसे बड़ा जो जंगी बेड़ा है यूएसएस अब्राहम लिंकन और जेरार्ड फोर्ड उसे भी ईरान कह रहा है कि हमने निशाना बनाया है। अभी हालिया दावा तो अब्राहम लिंकन को लेकर है। लेकिन इससे पहले जेरार्ड फोर्ड को लेकर भी दावा किया था कि वहां पर हमने हमला किया उसे नुकसान पहुंचाया है। ठीक-ठाक। आपके हिसाब से अभी क्या अमेरिका के यह दोनों जंगी बेड़े जो मध्य पूर्व में मौजूद हैं यह सुरक्षित हैं?