पर बैठकर फूट-फूटकर रोने लगे और बोले, “मुझे लगा कि आज मैं मर जाऊंगा।” यह सुनकर मनमोहन जोर-जोर से हंसने लगे। फिर शशि, किसी व्यक्ति की पूरी जीवन गाथा को सिर्फ एक वीडियो में समेटना मुश्किल है। मुश्किल है, नामुमकिन नहीं। आज मैं आपके लिए बॉलीवुड के सबसे महान कपूर कहे जाने वाले अभिनेता, शशि कपूर की पूरी जीवन गाथा लेकर आया हूं।आखिर क्यों शशि कपूर की सगी मां ने उन्हें चार बार मारने की कोशिश की थी? शशि कपूर की पत्नी ने उन पर समलैंगिक होने का आरोप क्यों लगाया था? पत्नी के प्यार ने कैसे शशि कपूर की जिंदगी बर्बाद कर दी? क्यों शशि कपूर ने एक बंद कमरे में लेटे-लेटे 28 साल तक तड़प-तड़प कर बिताए? इन सवालों के जवाब के साथ-साथ मैं आपको इस एक वीडियो में और भी बहुत कुछ बताऊंगा। तो चलिए, शुरू करते हैं।शुरुआती जीवन और परिवारशशि कपूर का जन्म 18 मार्च 1938 को कोलकाता में हुआ था। उनके पिता, पृथ्वीराज कपूर, भारतीय सिनेमा के एक दिग्गज अभिनेता थे और उस समय अपनी खुद की थिएटर कंपनी ‘पृथ्वी थिएटर्स’ चलाते थे। उनकी मां, रामसरनी देवी, एक साधारण गृहिणी थीं
।शशि के दो बड़े भाई, राज कपूर और शम्मी कपूर, हिंदी सिनेमा की दो महान हस्तियां हैं। शशि से पहले उनके दो बड़े भाई और हुए थे – देवी और बिंदी। लेकिन देवी की छोटी माता (चेचक) से और बिंदी की गलती से चूहे की दवा खाने से मौत हो गई थी। यही वजह है कि राज कपूर और शशि कपूर के बीच कई सालों का अंतर था। इसीलिए राज कपूर शशि कपूर को अपने बेटे की तरह प्यार करते थे।1995 के एक इंटरव्यू में शशि कपूर ने खुलासा किया था कि उनकी मां उन्हें पैदा नहीं करना चाहती थीं। जब उन्हें पता चला कि वह गर्भवती हैं, तो वह उदास और परेशान हो गईं। वह इस बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती थीं। इसीलिए उन्होंने गर्भ में ही बच्चे को मारने का फैसला किया था। उनकी मां गर्भवती होने के बावजूद साइकिल चलाती थीं। वह सबसे कठिन काम करती थीं। वह रस्सी कूदती थीं। वह सीढ़ियों से खुद को गिरा लेती थीं। वह जानबूझकर ऐसे कई प्रयास करती थीं ताकि उनका बच्चा गर्भ में ही मर जाए। लेकिन जो होना था, वह होकर रहता। शशि को आना था, इसलिए वह आ गए।वैसे, बहुत कम लोग जानते हैं कि शशि कपूर का असली नाम शशि कपूर नहीं था। उनका असली नाम बलबीर था, लेकिन उनकी मां को उनकी दादी द्वारा दिया गया नाम पसंद नहीं आया था। चूंकि शशि खिड़की से घंटों चांद को निहारते रहते थे, इसलिए उन्होंने उनका नाम शशि रख दिया।शशि ने डॉन बॉस्को स्कूल में पढ़ाई की लेकिन पढ़ाई में वह पूरी तरह फेल हो गए। जब वह नौवीं कक्षा में फेल होकर घर लौटे, तो उनके पिता ने उन्हें बिल्कुल भी नहीं डांटा। बल्कि उन्होंने उनसे पूछा, “क्या तुम्हारा पढ़ाई में बिल्कुल भी मन नहीं है?” शशि ने कहा हां। उसी दिन से उनके पिता ने उन्हें अपने थिएटर का हिस्सा बना लिया। यही वजह है कि शशि ने बचपन से ही मंच पर नाटक करना शुरू कर दिया था।फिल्मी सफर की शुरुआत1948 में शशि कपूर ने बाल कलाकार के रूप में अपनी पहली फिल्म में काम किया। यह उनके बड़े भाई राज कपूर की फिल्म ‘बरसात’ थी। राज कपूर और नरगिस की प्रतिष्ठित फिल्म ‘आवारा’ में शशि कपूर ने युवा राज कपूर की भूमिका निभाई थी। 1948 से 1954 तक शशि कपूर ने बाल कलाकार के रूप में कई फिल्मों में काम किया। इनमें दो प्रमुख फिल्में थीं – ‘संग्राम’, जिसमें उन्होंने युवा अशोक कुमार की भूमिका निभाई थी, और ‘दाना पानी’, जहां वह भारत भूषण के साथ थे।जेनिफर केंडल से पहली मुलाकात और प्रेम कहानीसाल 1956 था और पृथ्वी थिएटर्स का कोलकाता के ओपेरा हाउस में एक शो था। हालांकि मंच का पर्दा गिरा हुआ था, लेकिन लोग पहले ही इकट्ठा होने लगे थे। अचानक शशि ने पर्दे की झीनी से झांककर देखा। उन्होंने भीड़ के बीच बैठी एक लड़की को देखा। वह लड़की पोका-डॉट (बिंदीदार) ड्रेस पहने हुए थी और बेहद खूबसूरत लग रही थी। शशि उन पर मुग्ध हो गए। यह पहली बार था जब किसी लड़की ने उनके दिल में जगह बनाई थी।उन्हें पता चला कि वह कोई साधारण लड़की नहीं है, बल्कि एक अभिनेत्री है। उनका नाम जेनिफर केंडल था। उनके पिता, जियोफ्री केंडल, इंग्लैंड के एक प्रसिद्ध थिएटर अभिनेता हैं जो इस समय अपनी थिएटर कंपनी ‘शेक्सपियरना’ के साथ भारत दौरे पर हैं और आज शाम को इसी ओपेरा हाउस में उनका शो है।शशि जेनिफर से मिलना चाहते थे, इसलिए उन्होंने अपने एक चचेरे भाई से मुलाकात कराने को कहा। जेनिफर मिलने के लिए मान गईं। जब शशि जेनिफर के साथ बैठे, तो यह पहली बार था जब वह अपनी बहन उर्मिला के अलावा किसी अन्य लड़की के साथ बैठे थे। वह उनसे बात कर रहे थे। इसलिए उन्हें बहुत घबराहट हो रही थी। वह इतने घबराए हुए थे कि जेनिफर को लगा कि शशि गे (समलैंगिक) हैं। यही वजह है कि वह बहुत शर्मिंदा महसूस कर रहे थे।उस समय शशि 18 वर्ष के थे और जेनिफर 23 वर्ष की—यानी उनसे पांच साल बड़ी। लेकिन फिर भी दोनों ने पहली ही मुलाकात में एक-दूसरे को अपना दिल दे दिया।शशि के बड़े भाई शम्मी कपूर और भाभी गीता बाली ने इस प्रेम कहानी में बहुत बड़ा योगदान दिया। उन्होंने उनकी बहुत मदद की। लेकिन वह दिन भी आ गया जब जेनिफर को भारत छोड़ना पड़ा। जेनिफर का दिल टुकड़ों में बंट रहा था और शशि को ऐसा लगा मानो उनकी जान ही निकल जाएगी। ऐसा लगा जैसे उनकी आत्मा उनके शरीर को छोड़कर जा रही है।कोई भी अलग नहीं होना चाहता था। लेकिन यह शशि थे। उन्होंने पृथ्वी थिएटर छोड़ दिया और जेनिफर के थिएटर समूह ‘शेक्सपियरना थिएटर ग्रुप’ में शामिल हो गए। सिर्फ जेनिफर के साथ रहने के लिए, वह उनके साथ यात्रा करने लगे और अलग-अलग जगहों पर नाटक करने लगे।शादी और शुरुआती मुश्किलेंदो साल बीत गए। 1958 में उनका सिंगापुर में एक शो था, और उसी दिन शशि ने जेनिफर के पिता से अपने प्यार का इजहार किया और उनका हाथ मांगा, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। * सबसे पहले, वह अपने परिवार में कोई भारतीय दामाद नहीं चाहते थे। * दूसरे, अगर जेनिफर की शादी हो जाती, तो वह अपने नाटकों की मुख्य अभिनेत्री को खो देते।ऐसी स्थिति में, जेनिफर ने शशि का हाथ पकड़ा और कहा, “आई लव यू।” “तुम मुझसे प्यार करती हो।” “बस, इतना ही काफी है।” और इसके बाद जेनिफर शशि के साथ अपने पिता के घर से भाग गईं।लेकिन वे कहां भागते? शशि की जेब में एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी। इसलिए शशि ने बॉम्बे में राज कपूर को ट्रंक कॉल किया और उन्हें पूरी कहानी बताई। तब राज कपूर ने उनके हवाई जहाज के टिकटों की व्यवस्था की और वे दोनों सिंगापुर से बॉम्बे आ गए। यहां बिना किसी देर के उनकी शादी तय कर दी गई और धूमधाम से संपन्न हुई।हालांकि शशि के माता-पिता परिवार में विदेशी बहू के आने से खुश नहीं थे। वे इस शादी का विरोध कर रहे थे। लेकिन उनके बड़े भाई शम्मी कपूर ने सिर्फ दो घंटे में उन्हें मना लिया और समझा-बुझाकर राजी कर लिया
।पृथ्वीराज कपूर उस समय अजमेर में ‘मुगल-ए-आज़म’ की शूटिंग कर रहे थे। जब उन्हें पता चला, तो निर्देशक के. आसिफ ने उन्हें अपना निजी हेलीकॉप्टर दिया, जिससे पृथ्वीराज कपूर उड़कर बॉम्बे आए। उन्होंने शादी में शिरकत की और छह घंटे बिताने के बाद शूटिंग के लिए वापस अजमेर चले गए।हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार शादी के बाद, शशि और जेनिफर अब पति-पत्नी थे। वे दोनों अपनी शादी की रात को लेकर बहुत उत्साहित थे। लेकिन जैसे ही वे कमरे में दाखिल हुए, वे दंग रह गए। उनके फूलों से सजे बिस्तर पर दो शराबी लेटे हुए थे। जैसे ही उन्होंने शशि और जेनिफर को देखा, वे उठकर बैठ गए और पल भर में हंगामा करने लगे और कमरे में तोड़फोड़ शुरू कर दी।स्थिति ऐसी हो गई कि जेनिफर चीखने और चिल्लाने लगीं, और शशि एक डंडा उठाकर उन दोनों को मारने दौड़े। तब वे दोनों कमरे से बाहर भाग गए। जेनिफर समझ नहीं पा रही थीं कि ये दोनों कौन थे।दरसअल, जब भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ था, तो कपूर परिवार मूल रूप से दूसरी तरफ पेशावर से था। विश्वेश्वरनाथ कपूर समंदरी तहसील में तहसीलदार थे। ये लोग तो बॉम्बे में रुक गए थे। लेकिन दूसरी तरफ से उनके दूर-दूर के रिश्तेदार सीमा पार करके भारत आ रहे थे, और जो भी आता, बॉम्बे में कपूर परिवार का यह घर उनके लिए सबसे बड़ा ठिकाना था। ये दोनों शराबी भी विभाजन के दर्द से जूझ रहे दो लोग थे। यह सब जानकर जेनिफर सन्न रह गईं।संघर्ष और फिल्मों में वापसीशादी के बाद शशि और जेनिफर के तीन बच्चे हुए – दो बेटे, करण और कुणाल, और एक बेटी, संजना।आपको यह जानकर हैरानी होगी कि जिसे बॉलीवुड के सबसे महान सुपरस्टार्स में से एक कहा जाता है, वह शशि कपूर कभी फिल्मों में आना ही नहीं चाहते थे। 1959 में वह पृथ्वी थिएटर में एक बहुत अनुभवी और मंजे हुए अभिनेता थे। एक दिन मुमताज जी ने शशि को डांटा और कहा, “अब तुम्हारी शादी हो चुकी है और तुम तीन बच्चों के पिता हो, क्या अब भी तुम अपने परिवार की जिम्मेदारी नहीं लोगे?”उस दिन शशि की आंखें खुल गईं; उन्हें एहसास हुआ कि उनकी शादी हो चुकी है। उनके अपने बच्चे हैं। लेकिन वह अभी भी अपने माता-पिता के घर में रह रहे थे। उनके खर्चों पर पल रहे थे। शशि को याद आया कि उन्होंने बहुत समय से जेनिफर को किसी होटल में घुमाने नहीं ले जाया था। उन्होंने गौर किया कि काफी समय से जेनिफर वही पुराने कपड़े पहन रही थीं। उन्होंने लंबे समय से जेनिफर के लिए कुछ नहीं खरीदा था।उसी पल शशि ने मन बना लिया और फिल्मों की दुनिया में अपना नाम कमाने निकल पड़े। लेकिन यह आसान नहीं था। शशि स्टूडियो-स्टूडियो के चक्कर काटने लगे। उन्होंने बहुत संघर्ष किया। एक दिन ऐसी स्थिति आई कि एक बेंच थी। शशि बाईं तरफ बैठे थे और मनोज कुमार दाईं तरफ बैठे थे। मनोज कुमार फिल्म लेकर निकल गए और शशि हाथ मलते रह गए।अंततः 1961 में शशि कपूर को एक हीरो के रूप में उनकी पहली फिल्म मिली। फिल्म का नाम ‘धर्मपुत्र’ था और इसके निर्देशक बी.आर. चोपड़ा थे। लेकिन यह फिल्म फ्लॉप हो गई। शशि की दूसरी फिल्म ‘चार दिवारी’ भी फ्लॉप रही। इसके बाद शशि ने कुछ और फिल्मों में काम किया, लेकिन वे सभी बुरी तरह असफल रहीं।इस वजह से शशि इंडस्ट्री में बदनाम हो गए। निर्माताओं ने उन्हें फिल्मों में लेना बंद कर दिया और उन्हें “मनहूस कपूर” कहा जाने लगा। अभिनेत्रियों ने शशि के साथ काम करने से डरना शुरू कर दिया। कई अभिनेत्रियां तो उनका नाम सुनते ही फिल्म करने से मना कर देती थीं।ऐसे में शशि बहुत डिप्रेशन में आ गए। अब उन्हें कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी। लेकिन ऐसे मुश्किल समय में सिर्फ एक लड़की ने उनका साथ निभाया – साठ के दशक की मशहूर अभिनेत्री नंदा। उस दौर में नंदा ने शशि के साथ सात फिल्मों पर साइन किए। यही वजह है कि शशि कपूर ने अपने स्टारडम का जो भी मुकाम हासिल किया, उसके लिए वह नंदा के बहुत आभारी महसूस करते थे।सफलता और स्टारडमनंदा के साथ दो-तीन फिल्में फ्लॉप होने के बाद, आखिरकार 1965 शशि की जिंदगी में खुशियां लेकर आया। उनकी पहली फिल्म हिट हो गई। फिल्म का नाम था ‘जब जब फूल खिले’। इसमें उनकी नायिका नंदा थीं। और इस फिल्म के गाने – “एक था गुल और एक थी बुलबुले” और “ये समां, समां है ये प्यार का” – आज भी लोग इन धुनों में खो जाते हैं।और इसके बाद शशि की अगली फिल्म ‘वक्त’ साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन गई। शशि बहुत खुश थे। पूरी इंडस्ट्री के लोगों को लगा कि अब शशि कपूर का करियर उड़ान भरेगा।लेकिन यह शशि थे। उन्हें अपनों ने ही धोखा दिया। बाहरी लोगों में उन्हें गिराने की ताकत नहीं थी। उनकी नाव वहीं डूबी जहां पानी बहुत उथला था। इतने बड़े दो बैक-टू-बैक हिट देने के बाद भी स्टारडम मिलने के बजाय उन्हें पतन का सामना करना पड़ा। स्थिति यह थी कि 1960 के दशक के उत्तरार्ध में शशि कपूर की कोई भी फिल्म नहीं चली। इसका कारण राजेश कुमार का वह तूफान भी माना जाता है जिसने इंडस्ट्री के दिग्गजों को भी हिलाकर रख दिया था।हालात इतने खराब हो गए कि शशि कपूर को घर चलाने के लिए अपनी कार बेचनी पड़ी। उनकी पत्नी जेनिफर को अपनी सास से मिले खानदानी गहने गिरवी रखने पड़े। यह शशि कपूर की जिंदगी का सबसे बुरा दौर था।लेकिन जैसा कि कहा जाता है, सूरज तभी उगता है जब अंधेरा सबसे गहरा होता है। ठीक उसी समय जब शशि की जिंदगी का सबसे अंधेरा दौर चल रहा था, 1971 में ‘शर्मीली’ रिलीज हुई। इस फिल्म में उनकी नायिका राखी थीं और फिल्म सुपर-डूपर हिट रही। इस फिल्म के गाने “ओ मेरी ओ मेरी ओ मेरी शर्मीली” के जादू में लोग आज भी खो जाते हैं।और उसके बाद 1974 में रिलीज हुई ‘चोर मचाये शोर’ ने शशि कपूर की जिंदगी पूरी तरह बदल दी। इस ब्लॉकबस्टर फिल्म में उनकी नायिका मुमताज थीं और फिल्म का मशहूर गाना “ले जाएंगे ले जाएंगे, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे” ने 20 साल बाद बनने वाली शाहरुख-काजोल की DDLJ को प्रेरित किया।इस फिल्म ने शशि कपूर को रातों-रात स्टार बना दिया। उनके घर के बाहर उन्हें अपनी फिल्मों में साइन करने के लिए निर्माताओं की लंबी लाइन लग गई।प्रसिद्ध जोड़ियां और यादगार फिल्मेंशशि कपूर और राखी की जोड़ी पर्दे पर बहुत अच्छी लगती थी। साथ में उन्होंने कई फिल्में कीं जैसे – * ‘जमीन आसमान’ * ‘पिघलता आसमान’ * ‘जानवर और इंसान’ * ‘बंधन’ * ‘दूसरा आदमी’ * ‘तृष्णा’ * ‘बंद होंठ’ * ‘बंधन कच्चे धागों के’इनमें ‘कभी कभी’ सबसे प्रमुख थी। अमिताभ बच्चन, वहीदा रहमान, ऋषि कपूर और नीतू सिंह जैसी बड़ी स्टार कास्ट से सजी इस फिल्म का निर्देशन यश चोपड़ा ने किया था, जिसमें शशि कपूर ने एक ऐसे पति की भूमिका निभाई थी जो जानता है कि उसकी पत्नी उससे प्यार नहीं करती। वह किसी और से प्यार करती है, और इस कड़वी सच्चाई को जानने के बाद भी वह उसके साथ घर बसाता है। शशि द्वारा निभाए गए इस किरदार को लोगों ने बहुत पसंद किया।शशि कपूर और
शर्मिंदा टैगोर (शर्मिला टैगोर) की जोड़ी को लोग बहुत पसंद करते थे। इसीलिए दोनों ने साथ में कई फिल्में कीं जैसे ‘आमने सामने’, ‘पाप और पुण्य’, और ‘स्वाति’, जिनमें ‘आ गले लग जा’ सबसे प्रमुख है। इस फिल्म के निर्देशक मनमोहन देसाई थे और यह अपने समय से काफी आगे की फिल्म थी। इसका विषय काफी बोल्ड था। एक युवा मेडिकल छात्र को एक अजनबी से प्यार हो जाता है, और वह आदमी, जिसका किरदार शशि कपूर ने निभाया था, उसे गर्भवती करके छोड़ देता है।उस समय आलोचकों ने इसकी कड़ी आलोचना की थी, लेकिन दर्शकों को यह बहुत पसंद आई और शशि कपूर ने अपने किरदार को इतनी संजीदगी और शालीनता से निभाया कि वह कभी भद्दा नहीं लगा, जिसके लिए उनकी बहुत तारीफ हुई।अमिताभ बच्चन के साथ ब्रोमांस और वह खौफनाक हादसाशशि कपूर 1970 के दशक के सबसे व्यस्त स्टार थे। उन्हें बॉलीवुड का सबसे हैंडसम हीरो माना जाता है। शर्मिला टैगोर ने अपने इंटरव्यू में जिक्र किया है कि जब शशि कभी-कभी ‘कश्मीर की कली’ के सेट पर शम्मी कपूर के साथ जाते थे, तो वह निर्देशक से हाथ जोड़कर विनती करती थीं कि कृपया शशि को वहां से हटा दें। वरना वह शूटिंग नहीं कर पाएंगे। वह सिर्फ किसी आशिक फैन की तरह उनके चेहरे को घूरती रहती थीं। उन्हें उनसे प्यार होने लगता था। जब शबाना आजम को पता चला कि इस फिल्म में शशि कपूर उनके हीरो हैं, तो वह बेहोश हो गईं और उनकी तबीयत बिगड़ गई।शशि कपूर ने खूब रोमांस किया। लेकिन वह इकलौते ऐसे अभिनेता थे जो उस अंदाज में रोमांस कर सकते थे। बॉलीवुड आज तक शशि कपूर और अमिताभ बच्चन जैसी दोस्ती (ब्रोमांस) दोबारा पैदा नहीं कर पाया है। यह जोड़ी ‘दीवार’ फिल्म से जन्मी, जो बॉलीवुड की सबसे महान फिल्मों में से एक है, जिसका निर्देशन यश चोपड़ा ने किया था और जिसे सलीम-जावेद ने लिखा था।इस फिल्म में शशि द्वारा बोला गया संवाद—”मेरे पास मां है”—आज तक अनगिनत पैरोडी और मीम्स में इस्तेमाल किया जाता है। एक ईमानदार पुलिसवाला जो अपने कर्तव्य और अपने भाई के प्यार के बीच फंस जाता है। इस शानदार किरदार को निभाने के लिए शशि कपूर को फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया।आपको बता दें कि इस फिल्म की शूटिंग के दौरान शशि कपूर ने अमिताभ बच्चन को एक उपनाम दिया था जिससे सिर्फ वही अमिताभ को पुकारते थे। वह अमिताभ को “बाबा” कहकर बुलाते थे।और यहीं से शशि कपूर और अमिताभ बच्चन की वह साझेदारी शुरू हुई जिसके तहत उन्होंने कई फिल्मों में साथ काम किया। लेकिन उम्र में बड़े होने के बावजूद, शशि ने हमेशा अमिताभ के छोटे भाई की भूमिका निभाई।ऐसी ही एक फिल्म थी ‘सुहाग’। ‘सुहाग’ के निर्देशक मनमोहन देसाई थे। इस फिल्म में एक सीन था—क्लाइमैक्स का हेलीकॉप्टर सीन। इसमें मनमोहन देसाई ने किसी स्टंटमैन की मदद नहीं ली, बल्कि शशि से यह सीन खुद करवाया।अब शूटिंग के दौरान हेलीकॉप्टर हवा में 100 मीटर से ऊपर उड़ रहा था और शशि रेलिंग पकड़कर लटके हुए थे। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान शशि का दिल मानो धड़कना बंद हो गया था। स्थिति यह थी कि नीचे उतरते ही वह डर के मारे सुन्न पड़ गए थे। वह टूट चुके थे।शशि जमीन पर बैठकर फूट-फूटकर रोने लगे और बोले, आज सच में लगा कि मैं मर जाऊंगा। यह सुनकर मनमोहन जोर-जोर से हंसने लगे। तभी शशि ने कसम खाई कि वह मनमोहन देसाई के साथ कभी काम नहीं करेंगे।”टैक्सी” उपनाम और जीवनशैलीशशि कपूर 70 के दशक के सबसे व्यस्त अभिनेता थे। वह एक साथ 60 से 70 फिल्मों में काम करते थे। उनके बारे में लोग कहते थे कि शशि कपूर पैंट पहनकर एक फिल्म के सेट पर जाते हैं और शर्ट पहनकर दूसरी फिल्म के सेट से निकलते हैं।यहां तक कि उनके बड़े भाई राज कपूर के लिए भी अपनी फिल्म ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ के लिए शशि की तारीखें (डेट्स) पाना किसी नर्क से कम नहीं था। इसीलिए राज कपूर ने शशि कपूर को एक उपनाम दिया था। वह शशि को “टैक्सी” कहकर बुलाते थे। क्योंकि उन दिनों शशि इतने व्यस्त हुआ करते थे कि अक्सर टैक्सी में ही सो जाते थे।लेकिन इतने व्यस्त शेड्यूल के बाद भी उन्होंने कभी अपनी पत्नी और बच्चों को नजरअंदाज नहीं किया। वह हफ्ते में एक दिन, यानी रविवार, उनके साथ बिताते थे। वह कोई काम नहीं करते थे। वह बस उन्हें बाहर घुमाने ले जाते थे।लोग हैरान रह जाते थे। यह देखकर वे सोचते थे कि शशि बाकी कपूर खानदान से इतने अलग क्यों हैं? कपूर परिवार की परंपरा के अनुसार, जैसे-जैसे हर आदमी की उम्र बढ़ती थी, उसका पेट निकल आता था। लेकिन शशि इतने स्लिम, ट्रिम और फिट कैसे थे?इसकी वजह जेनिफर थीं। जेनिफर शशि का बहुत ख्याल रखती थीं। खासकर उनके खान-पान और एक्सरसाइज का। जेनिफर ही शशि की जिंदगी थीं। वह उनका सब कुछ थीं।जेनिफर की बीमारी और सबसे बड़ा सदमालेकिन 1982 शशि कपूर की जिंदगी का सबसे दुखद साल बन गया। क्योंकि उन्हें उस राज का पता चला जिसे उनकी पत्नी जेनिफर पिछले चार सालों से छिपा रही थीं, और यह बात पता चलते ही शशि जमीन पर मुंह के बल गिर पड़े।जेनिफर को कैंसर था। शशि कपूर ने गुस्से में अपनी पत्नी जेनिफर पर चिल्लाते हुए कहा, “तुम्हें इतनी खतरनाक बीमारी है और तुमने मुझसे चार साल तक यह बात छिपाई? क्यों?”जेनिफर ने कहा, “ताकि तुम परेशान न हो।”शशि क्या कहते? कैंसर चौथी स्टेज तक पहुंच चुका था। शशि कपूर ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की। उन्होंने हरसंभव इलाज कराया, अपनी पूरी ताकत झोंक दी,
लेकिन अंत में जो होना था, वही हुआ। शशि को छोड़कर जेनिफर हमेशा के लिए इस दुनिया से चली गईं।शशि पूरी तरह से टूट चुके थे। उनके जन्म से लेकर उनकी पत्नी के अंतिम संस्कार तक, किसी ने भी शशि की आंखों में एक आंसू नहीं देखा था, लेकिन उनके बेटे करण कपूर बताते हैं कि 13 दिन बाद शशि गोवा के एक बीच पर खड़े थे। वहां से उन्होंने एक वाटर बोट ली, उसे समुद्र के बीच में ले गए, और फिर आसमान की तरफ देखकर जोर-जोर से चीखने और रोने लगे, अपनी छाती पीटने लगे।दर्द से भरा ऐसा रुदन देखकर आसमान भी मानो रो पड़ा और तट पर खड़े शशि के करीबियों के दिल उनके साथ रो पड़े। जेनिफर ही शशि की जिंदगी थीं। यही वजह है कि उनके जाने के बाद शशि की जिंदगी वैसी कभी नहीं हो सकती थी जैसी हुआ करती थी। शशि कपूर कभी वह इंसान नहीं बन पाए जो वह कभी हुआ करते थे।आखिरी दौर और अकेलापन1982 में रिलीज हुई फिल्म ‘नमक हलाल’ बॉलीवुड में मुख्य अभिनेता के रूप में शशि कपूर की आखिरी हिट फिल्म थी। इसके बाद उनका करियर ढलान पर जाने लगा और शशि का करियर बर्बाद हो गया।लोग यह देखकर दंग रह गए कि जिंदगी के इतने सालों तक जो शशि कपूर इतने स्लिम, ट्रिम और फिट रहे थे, वह अचानक फूलने लगे और कद्दू जैसे गोल हो गए। इसकी वजह जेनिफर थीं। अब उनका ध्यान रखने या देखभाल करने के लिए जेनिफर उनके पास नहीं थीं।1990 में शशि कपूर ने एक निर्देशक के रूप में अपने करियर की नई शुरुआत की। उन्होंने अमिताभ बच्चन से अपनी फिल्म में हीरो बनने का अनुरोध किया। उन दिनों अमिताभ कोई फिल्म साइन नहीं कर रहे थे। उन्होंने फिल्मों में काम करना बंद कर दिया था। लेकिन शशि के कहने पर वह मान गए।हालांकि 1991 में अमिताभ बच्चन अभिनीत ‘अजूबा’ इतनी बुरी तरह फ्लॉप हुई कि शशि ने हमेशा के लिए निर्देशन से तौबा कर ली।इसके बाद शशि कपूर सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह कट गए। उन्होंने खुद को अपने कमरे की चार दीवारों में बंद कर लिया और एक ऐसी जिंदगी जीने लगे जैसे मानो उनकी आंखें हैं पर नजर नहीं, शरीर है पर जान नहीं, दिल है पर धड़कन नहीं, और सांसें हैं पर वजह नहीं। जेनिफर ही शशि की जिंदगी थीं; अब जब वह नहीं थीं, तो उनके जीवन का क्या वजूद था? उनके जीवन का क्या उद्देश्य था?शशि न तो किसी से बात करते थे और न ही कोई उनसे बात कर सकता था। बस हर शाम 6:00 बजे वह अपनी व्हीलचेयर को पृथ्वी थिएटर के बगीचे में ले जाते थे और आंखें बंद करके डेढ़, दो, तीन, कभी-कभी चार घंटे तक वहां बैठे रहते थे। बस खयालों में खोए रहते।इसकी वजह भी जेनिफर थीं। दरअसल, 1978 में शशि कपूर के बार-बार विरोध करने के बावजूद, जेनिफर ने पृथ्वी थिएटर्स को फिर से खुलवाया था। क्योंकि पृथ्वीराज कपूर के निधन के बाद इसे बंद कर दिया गया था। यही वजह है कि शशि को इस थिएटर की हर दीवार में जेनिफर नजर आती थीं। यहां की हवा और आबोहवा में उन्हें जेनिफर की खुशबू महसूस होती थी।आखिरी विदाईसालों बाद, 2010 में जब शशि कपूर को फिल्मफेयर द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया, तो उन्हें कैमरे पर देखा गया। लोग हैरान रह गए क्योंकि साल पहले जब उन्होंने फिल्मों में शशि को देखा था, तो वह कितने हैंडसम हुआ करते थे। आज वह इतने बदल चुके थे। उन्हें पहचानना मुश्किल था।2014-15 तक शशि कपूर की मानसिक स्थिति थोड़ी बिगड़ने लगी थी। जब उनका किडनी का ऑपरेशन हुआ, तो वह आने-जाने वाले हर व्यक्ति को देखते और बार-बार बुदबुदाते थे— “चाइनीज रेस्तरां में चलते हैं और कुछ खाते हैं।” “चाइनीज रेस्तरां में चलते हैं और कुछ खाते हैं।”उनकी ऐसी हालत देखकर उनके तीनों बच्चे…संक्षिप्त सारांश (Quick Summary at a Glance)| विषय | विवरण ||—|—|| पूरा नाम | बलबीर राज कपूर (शशि कपूर) || जन्म | 18 मार्च 1938, कोलकाता || माता-पिता | रामसरनी देवी और पृथ्वीराज कपूर || जीवनसाथी | जेनिफर केंडल (विवाह: 1958) || संतान | करण, कुणाल और संजना कपूर || प्रमुख फिल्में | जब जब फूल खिले, वक्त, शर्मीली, दीवार, कभी कभी, सुहाग, नमक हलाल || निधन | 4 दिसंबर 2017 |क्या आप शशि कपूर की किसी खास फिल्म या उनके थिएटर के सफर के बारे में कुछ और विस्तार से जानना चाहते हैं?
Shashi Kapoor Ki Jeevani (शशि कपूर की जीवन गाथा)शशि कपूर जमीन पर बैठकर फूट-फूटकर रोने लगे और बोले, “मुझे लगा कि आज मैं मर जाऊंगा।” यह सुनकर मनमोहन जोर-जोर से हंसने लगे। फिर शशि, किसी व्यक्ति की पूरी जीवन गाथा को सिर्फ एक वीडियो में समेटना मुश्किल है। मुश्किल है, नामुमकिन नहीं। आज मैं आपके लिए बॉलीवुड के सबसे महान कपूर कहे जाने वाले अभिनेता, शशि कपूर की पूरी जीवन गाथा लेकर आया हूं।आखिर क्यों शशि कपूर की सगी मां ने उन्हें चार बार मारने की कोशिश की थी? शशि कपूर की पत्नी ने उन पर समलैंगिक होने का आरोप क्यों लगाया था? पत्नी के प्यार ने कैसे शशि कपूर की जिंदगी बर्बाद कर दी? क्यों शशि कपूर ने एक बंद कमरे में लेटे-लेटे 28 साल तक तड़प-तड़प कर बिताए? इन सवालों के जवाब के साथ-साथ मैं आपको इस एक वीडियो में और भी बहुत कुछ बताऊंगा। तो चलिए, शुरू करते हैं।शुरुआती जीवन और परिवारशशि कपूर का जन्म 18 मार्च 1938 को कोलकाता में हुआ था। उनके पिता, पृथ्वीराज कपूर, भारतीय सिनेमा के एक दिग्गज अभिनेता थे और उस समय अपनी खुद की थिएटर कंपनी ‘पृथ्वी थिएटर्स’ चलाते थे। उनकी मां, रामसरनी देवी, एक साधारण गृहिणी थीं।शशि के दो बड़े भाई, राज कपूर और शम्मी कपूर, हिंदी सिनेमा की दो महान हस्तियां हैं। शशि से पहले उनके दो बड़े भाई और हुए थे – देवी और बिंदी। लेकिन देवी की छोटी माता (चेचक) से और बिंदी की गलती से चूहे की दवा खाने से मौत हो गई थी। यही वजह है कि राज कपूर और शशि कपूर के बीच कई सालों का अंतर था। इसीलिए राज कपूर शशि कपूर को अपने बेटे की तरह प्यार करते थे।1995 के एक इंटरव्यू में शशि कपूर ने खुलासा किया था कि उनकी मां उन्हें पैदा नहीं करना चाहती थीं। जब उन्हें पता चला कि वह गर्भवती हैं, तो वह उदास और परेशान हो गईं। वह इस बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती थीं। इसीलिए उन्होंने गर्भ में ही बच्चे को मारने का फैसला किया था। उनकी मां गर्भवती होने के बावजूद साइकिल चलाती थीं। वह सबसे कठिन काम करती थीं। वह रस्सी कूदती थीं। वह सीढ़ियों से खुद को गिरा लेती थीं। वह जानबूझकर ऐसे कई प्रयास करती थीं ताकि उनका बच्चा गर्भ में ही मर जाए। लेकिन जो होना था, वह होकर रहता। शशि को आना था, इसलिए वह आ गए।वैसे, बहुत कम लोग जानते हैं कि शशि कपूर का असली नाम शशि कपूर नहीं था। उनका असली नाम बलबीर था, लेकिन उनकी मां को उनकी दादी द्वारा दिया गया नाम पसंद नहीं आया था। चूंकि शशि खिड़की से घंटों चांद को निहारते रहते थे, इसलिए उन्होंने उनका नाम शशि रख दिया।शशि ने डॉन बॉस्को स्कूल में पढ़ाई की लेकिन पढ़ाई में वह पूरी तरह फेल हो गए। जब वह नौवीं कक्षा में फेल होकर घर लौटे, तो उनके पिता ने उन्हें बिल्कुल भी नहीं डांटा। बल्कि उन्होंने उनसे पूछा, “क्या तुम्हारा पढ़ाई में बिल्कुल भी मन नहीं है?” शशि ने कहा हां। उसी दिन से उनके पिता ने उन्हें अपने थिएटर का हिस्सा बना लिया। यही वजह है कि शशि ने बचपन से ही मंच पर नाटक करना शुरू कर दिया था।फिल्मी सफर की शुरुआत1948 में शशि कपूर ने बाल कलाकार के रूप में अपनी पहली फिल्म में काम किया। यह उनके बड़े भाई राज कपूर की फिल्म ‘बरसात’ थी। राज कपूर और नरगिस की प्रतिष्ठित फिल्म ‘आवारा’ में शशि कपूर ने युवा राज कपूर की भूमिका निभाई थी। 1948 से 1954 तक शशि कपूर ने बाल कलाकार के रूप में कई फिल्मों में काम किया। इनमें दो प्रमुख फिल्में थीं – ‘संग्राम’, जिसमें उन्होंने युवा अशोक कुमार की भूमिका निभाई थी, और ‘दाना पानी’, जहां वह भारत भूषण के साथ थे।जेनिफर केंडल से पहली मुलाकात और प्रेम कहानीसाल 1956 था और पृथ्वी थिएटर्स का कोलकाता के ओपेरा हाउस में एक शो था। हालांकि मंच का पर्दा गिरा हुआ था, लेकिन लोग पहले ही इकट्ठा होने लगे थे। अचानक शशि ने पर्दे की झीनी से झांककर देखा। उन्होंने भीड़ के बीच बैठी एक लड़की को देखा। वह लड़की पोका-डॉट (बिंदीदार) ड्रेस पहने हुए थी और बेहद खूबसूरत लग रही थी। शशि उन पर मुग्ध हो गए। यह पहली बार था जब किसी लड़की ने उनके दिल में जगह बनाई थी।उन्हें पता चला कि वह कोई साधारण लड़की नहीं है, बल्कि एक अभिनेत्री है। उनका नाम जेनिफर केंडल था। उनके पिता, जियोफ्री केंडल, इंग्लैंड के एक प्रसिद्ध थिएटर अभिनेता हैं जो इस समय अपनी थिएटर कंपनी ‘शेक्सपियरना’ के साथ भारत दौरे पर हैं और आज शाम को इसी ओपेरा हाउस में उनका शो है।शशि जेनिफर से मिलना चाहते थे, इसलिए उन्होंने अपने एक चचेरे भाई से मुलाकात कराने को कहा। जेनिफर मिलने के लिए मान गईं। जब शशि जेनिफर के साथ बैठे, तो यह पहली बार था जब वह अपनी बहन उर्मिला के अलावा किसी अन्य लड़की के साथ बैठे थे। वह उनसे बात कर रहे थे। इसलिए उन्हें बहुत घबराहट हो रही थी। वह इतने घबराए हुए थे कि जेनिफर को लगा कि शशि गे (समलैंगिक) हैं। यही वजह है कि वह बहुत शर्मिंदा महसूस कर रहे थे।उस समय शशि 18 वर्ष के थे और जेनिफर 23 वर्ष की—यानी उनसे पांच साल बड़ी। लेकिन फिर भी दोनों ने पहली ही मुलाकात में एक-दूसरे को अपना दिल दे दिया।शशि के बड़े भाई शम्मी कपूर और भाभी गीता बाली ने इस प्रेम कहानी में बहुत बड़ा योगदान दिया। उन्होंने उनकी बहुत मदद की। लेकिन वह दिन भी आ गया जब जेनिफर को भारत छोड़ना पड़ा। जेनिफर का दिल टुकड़ों में बंट रहा था और शशि को ऐसा लगा मानो उनकी जान ही निकल जाएगी। ऐसा लगा जैसे उनकी आत्मा उनके शरीर को छोड़कर जा रही है।कोई भी अलग नहीं होना चाहता था। लेकिन यह शशि थे। उन्होंने पृथ्वी थिएटर छोड़ दिया और जेनिफर के थिएटर समूह ‘शेक्सपियरना थिएटर ग्रुप’ में शामिल हो गए। सिर्फ जेनिफर के साथ रहने के लिए, वह उनके साथ यात्रा करने लगे और अलग-अलग जगहों पर नाटक करने लगे।शादी और शुरुआती मुश्किलेंदो साल बीत गए। 1958 में उनका सिंगापुर में एक शो था, और उसी दिन शशि ने जेनिफर के पिता से अपने प्यार का इजहार किया और उनका हाथ मांगा, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। * सबसे पहले, वह अपने परिवार में कोई भारतीय दामाद नहीं चाहते थे। * दूसरे, अगर जेनिफर की शादी हो जाती, तो वह अपने नाटकों की मुख्य अभिनेत्री को खो देते।ऐसी स्थिति में, जेनिफर ने शशि का हाथ पकड़ा और कहा, “आई लव यू।” “तुम मुझसे प्यार करती हो।” “बस, इतना ही काफी है।” और इसके बाद जेनिफर शशि के साथ अपने पिता के घर से भाग गईं।लेकिन वे कहां भागते? शशि की जेब में एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी। इसलिए शशि ने बॉम्बे में राज कपूर को ट्रंक कॉल किया और उन्हें पूरी कहानी बताई। तब राज कपूर ने उनके हवाई जहाज के टिकटों की व्यवस्था की और वे दोनों सिंगापुर से बॉम्बे आ गए। यहां बिना किसी देर के उनकी शादी तय कर दी गई और धूमधाम से संपन्न हुई।हालांकि शशि के माता-पिता परिवार में विदेशी बहू के आने से खुश नहीं थे। वे इस शादी का विरोध कर रहे थे। लेकिन उनके बड़े भाई शम्मी कपूर ने सिर्फ दो घंटे में उन्हें मना लिया और समझा-बुझाकर राजी कर लिया।पृथ्वीराज कपूर उस समय अजमेर में ‘मुगल-ए-आज़म’ की शूटिंग कर रहे थे। जब उन्हें पता चला, तो निर्देशक के. आसिफ ने उन्हें अपना निजी हेलीकॉप्टर दिया, जिससे पृथ्वीराज कपूर उड़कर बॉम्बे आए। उन्होंने शादी में शिरकत की और छह घंटे बिताने के बाद शूटिंग के लिए वापस अजमेर चले गए।हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार शादी के बाद, शशि और जेनिफर अब पति-पत्नी थे। वे दोनों अपनी शादी की रात को लेकर बहुत उत्साहित थे। लेकिन जैसे ही वे कमरे में दाखिल हुए, वे दंग रह गए। उनके फूलों से सजे बिस्तर पर दो शराबी लेटे हुए थे। जैसे ही उन्होंने शशि और जेनिफर को देखा, वे उठकर बैठ गए और पल भर में हंगामा करने लगे और कमरे में तोड़फोड़ शुरू कर दी।स्थिति ऐसी हो गई कि जेनिफर चीखने और चिल्लाने लगीं, और शशि एक डंडा उठाकर उन दोनों को मारने दौड़े। तब वे दोनों कमरे से बाहर भाग गए। जेनिफर समझ नहीं पा रही थीं कि ये दोनों कौन थे।दरसअल, जब भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ था, तो कपूर परिवार मूल रूप से दूसरी तरफ पेशावर से था। विश्वेश्वरनाथ कपूर समंदरी तहसील में तहसीलदार थे। ये लोग तो बॉम्बे में रुक गए थे। लेकिन दूसरी तरफ से उनके दूर-दूर के रिश्तेदार सीमा पार करके भारत आ रहे थे, और जो भी आता, बॉम्बे में कपूर परिवार का यह घर उनके लिए सबसे बड़ा ठिकाना था। ये दोनों शराबी भी विभाजन के दर्द से जूझ रहे दो लोग थे। यह सब जानकर जेनिफर सन्न रह गईं।संघर्ष और फिल्मों में वापसीशादी के बाद शशि और जेनिफर के तीन बच्चे हुए – दो बेटे, करण और कुणाल, और एक बेटी, संजना।आपको यह जानकर हैरानी होगी कि जिसे बॉलीवुड के सबसे महान सुपरस्टार्स में से एक कहा जाता है, वह शशि कपूर कभी फिल्मों में आना ही नहीं चाहते थे। 1959 में वह पृथ्वी थिएटर में एक बहुत अनुभवी और मंजे हुए अभिनेता थे। एक दिन मुमताज जी ने शशि को डांटा और कहा, “अब तुम्हारी शादी हो चुकी है और तुम तीन बच्चों के पिता हो, क्या अब भी तुम अपने परिवार की जिम्मेदारी नहीं लोगे?”उस दिन शशि की आंखें खुल गईं; उन्हें एहसास हुआ कि उनकी शादी हो चुकी है। उनके अपने बच्चे हैं। लेकिन वह अभी भी अपने माता-पिता के घर में रह रहे थे। उनके खर्चों पर पल रहे थे। शशि को याद आया कि उन्होंने बहुत समय से जेनिफर को किसी होटल में घुमाने नहीं ले जाया था। उन्होंने गौर किया कि काफी समय से जेनिफर वही पुराने कपड़े पहन रही थीं। उन्होंने लंबे समय से जेनिफर के लिए कुछ नहीं खरीदा था।उसी पल शशि ने मन बना लिया और फिल्मों की दुनिया में अपना नाम कमाने निकल पड़े। लेकिन यह आसान नहीं था। शशि स्टूडियो-स्टूडियो के चक्कर काटने लगे। उन्होंने बहुत संघर्ष किया। एक दिन ऐसी स्थिति आई कि एक बेंच थी। शशि बाईं तरफ बैठे थे और मनोज कुमार दाईं तरफ बैठे थे। मनोज कुमार फिल्म लेकर निकल गए और शशि हाथ मलते रह गए।अंततः 1961 में शशि कपूर को एक हीरो के रूप में उनकी पहली फिल्म मिली। फिल्म का नाम ‘धर्मपुत्र’ था और इसके निर्देशक बी.आर. चोपड़ा थे। लेकिन यह फिल्म फ्लॉप हो गई। शशि की दूसरी फिल्म ‘चार दिवारी’ भी फ्लॉप रही। इसके बाद शशि ने कुछ और फिल्मों में काम किया, लेकिन वे सभी बुरी तरह असफल रहीं।इस वजह से शशि इंडस्ट्री में बदनाम हो गए। निर्माताओं ने उन्हें फिल्मों में लेना बंद कर दिया और उन्हें “मनहूस कपूर” कहा जाने लगा। अभिनेत्रियों ने शशि के साथ काम करने से डरना शुरू कर दिया। कई अभिनेत्रियां तो उनका नाम सुनते ही फिल्म करने से मना कर देती थीं।ऐसे में शशि बहुत डिप्रेशन में आ गए। अब उन्हें कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी। लेकिन ऐसे मुश्किल समय में सिर्फ एक लड़की ने उनका साथ निभाया – साठ के दशक की मशहूर अभिनेत्री नंदा। उस दौर में नंदा ने शशि के साथ सात फिल्मों पर साइन किए। यही वजह है कि शशि कपूर ने अपने स्टारडम का जो भी मुकाम हासिल किया, उसके लिए वह नंदा के बहुत आभारी महसूस करते थे।सफलता और स्टारडमनंदा के साथ दो-तीन फिल्में फ्लॉप होने के बाद, आखिरकार 1965 शशि की जिंदगी में खुशियां लेकर आया। उनकी पहली फिल्म हिट हो गई। फिल्म का नाम था ‘जब जब फूल खिले’। इसमें उनकी नायिका नंदा थीं। और इस फिल्म के गाने – “एक था गुल और एक थी बुलबुले” और “ये समां, समां है ये प्यार का” – आज भी लोग इन धुनों में खो जाते हैं।और इसके बाद शशि की अगली फिल्म ‘वक्त’ साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन गई। शशि बहुत खुश थे। पूरी इंडस्ट्री के लोगों को लगा कि अब शशि कपूर का करियर उड़ान भरेगा।लेकिन यह शशि थे। उन्हें अपनों ने ही धोखा दिया। बाहरी लोगों में उन्हें गिराने की ताकत नहीं थी। उनकी नाव वहीं डूबी जहां पानी बहुत उथला था। इतने बड़े दो बैक-टू-बैक हिट देने के बाद भी स्टारडम मिलने के बजाय उन्हें पतन का सामना करना पड़ा। स्थिति यह थी कि 1960 के दशक के उत्तरार्ध में शशि कपूर की कोई भी फिल्म नहीं चली। इसका कारण राजेश कुमार का वह तूफान भी माना जाता है जिसने इंडस्ट्री के दिग्गजों को भी हिलाकर रख दिया था।हालात इतने खराब हो गए कि शशि कपूर को घर चलाने के लिए अपनी कार बेचनी पड़ी। उनकी पत्नी जेनिफर को अपनी सास से मिले खानदानी गहने गिरवी रखने पड़े। यह शशि कपूर की जिंदगी का सबसे बुरा दौर था।लेकिन जैसा कि कहा जाता है, सूरज तभी उगता है जब अंधेरा सबसे गहरा होता है। ठीक उसी समय जब शशि की जिंदगी का सबसे अंधेरा दौर चल रहा था, 1971 में ‘शर्मीली’ रिलीज हुई। इस फिल्म में उनकी नायिका राखी थीं और फिल्म सुपर-डूपर हिट रही। इस फिल्म के गाने “ओ मेरी ओ मेरी ओ मेरी शर्मीली” के जादू में लोग आज भी खो जाते हैं।और उसके बाद 1974 में रिलीज हुई ‘चोर मचाये शोर’ ने शशि कपूर की जिंदगी पूरी तरह बदल दी। इस ब्लॉकबस्टर फिल्म में उनकी नायिका मुमताज थीं और फिल्म का मशहूर गाना “ले जाएंगे ले जाएंगे, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे” ने 20 साल बाद बनने वाली शाहरुख-काजोल की DDLJ को प्रेरित किया।इस फिल्म ने शशि कपूर को रातों-रात स्टार बना दिया। उनके घर के बाहर उन्हें अपनी फिल्मों में साइन करने के लिए निर्माताओं की लंबी लाइन लग गई।प्रसिद्ध जोड़ियां और यादगार फिल्मेंशशि कपूर और राखी की जोड़ी पर्दे पर बहुत अच्छी लगती थी। साथ में उन्होंने कई फिल्में कीं जैसे – * ‘जमीन आसमान’ * ‘पिघलता आसमान’ * ‘जानवर और इंसान’ * ‘बंधन’ * ‘दूसरा आदमी’ * ‘तृष्णा’ * ‘बंद होंठ’ * ‘बंधन कच्चे धागों के’इनमें ‘कभी कभी’ सबसे प्रमुख थी। अमिताभ बच्चन, वहीदा रहमान, ऋषि कपूर और नीतू सिंह जैसी बड़ी स्टार कास्ट से सजी इस फिल्म का निर्देशन यश चोपड़ा ने किया था, जिसमें शशि कपूर ने एक ऐसे पति की भूमिका निभाई थी जो जानता है कि उसकी पत्नी उससे प्यार नहीं करती। वह किसी और से प्यार करती है, और इस कड़वी सच्चाई को जानने के बाद भी वह उसके साथ घर बसाता है। शशि द्वारा निभाए गए इस किरदार को लोगों ने बहुत पसंद किया।शशि कपूर और शर्मिंदा टैगोर (शर्मिला टैगोर) की जोड़ी को लोग बहुत पसंद करते थे। इसीलिए दोनों ने साथ में कई फिल्में कीं जैसे ‘आमने सामने’, ‘पाप और पुण्य’, और ‘स्वाति’, जिनमें ‘आ गले लग जा’ सबसे प्रमुख है। इस फिल्म के निर्देशक मनमोहन देसाई थे और यह अपने समय से काफी आगे की फिल्म थी। इसका विषय काफी बोल्ड था। एक युवा मेडिकल छात्र को एक अजनबी से प्यार हो जाता है, और वह आदमी, जिसका किरदार शशि कपूर ने निभाया था, उसे गर्भवती करके छोड़ देता है।उस समय आलोचकों ने इसकी कड़ी आलोचना की थी, लेकिन दर्शकों को यह बहुत पसंद आई और शशि कपूर ने अपने किरदार को इतनी संजीदगी और शालीनता से निभाया कि वह कभी भद्दा नहीं लगा, जिसके लिए उनकी बहुत तारीफ हुई।अमिताभ बच्चन के साथ ब्रोमांस और वह खौफनाक हादसाशशि कपूर 1970 के दशक के सबसे व्यस्त स्टार थे। उन्हें बॉलीवुड का सबसे हैंडसम हीरो माना जाता है। शर्मिला टैगोर ने अपने इंटरव्यू में जिक्र किया है कि जब शशि कभी-कभी ‘कश्मीर की कली’ के सेट पर शम्मी कपूर के साथ जाते थे, तो वह निर्देशक से हाथ जोड़कर विनती करती थीं कि कृपया शशि को वहां से हटा दें। वरना वह शूटिंग नहीं कर पाएंगे। वह सिर्फ किसी आशिक फैन की तरह उनके चेहरे को घूरती रहती थीं। उन्हें उनसे प्यार होने लगता था। जब शबाना आजम को पता चला कि इस फिल्म में शशि कपूर उनके हीरो हैं, तो वह बेहोश हो गईं और उनकी तबीयत बिगड़ गई।शशि कपूर ने खूब रोमांस किया। लेकिन वह इकलौते ऐसे अभिनेता थे जो उस अंदाज में रोमांस कर सकते थे। बॉलीवुड आज तक शशि कपूर और अमिताभ बच्चन जैसी दोस्ती (ब्रोमांस) दोबारा पैदा नहीं कर पाया है। यह जोड़ी ‘दीवार’ फिल्म से जन्मी, जो बॉलीवुड की सबसे महान फिल्मों में से एक है, जिसका निर्देशन यश चोपड़ा ने किया था और जिसे सलीम-जावेद ने लिखा था।इस फिल्म में शशि द्वारा बोला गया संवाद—”मेरे पास मां है”—आज तक अनगिनत पैरोडी और मीम्स में इस्तेमाल किया जाता है। एक ईमानदार पुलिसवाला जो अपने कर्तव्य और अपने भाई के प्यार के बीच फंस जाता है। इस शानदार किरदार को निभाने के लिए शशि कपूर को फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया।आपको बता दें कि इस फिल्म की शूटिंग के दौरान शशि कपूर ने अमिताभ बच्चन को एक उपनाम दिया था जिससे सिर्फ वही अमिताभ को पुकारते थे। वह अमिताभ को “बाबा” कहकर बुलाते थे।और यहीं से शशि कपूर और अमिताभ बच्चन की वह साझेदारी शुरू हुई जिसके तहत उन्होंने कई फिल्मों में साथ काम किया। लेकिन उम्र में बड़े होने के बावजूद, शशि ने हमेशा अमिताभ के छोटे भाई की भूमिका निभाई।ऐसी ही एक फिल्म थी ‘सुहाग’। ‘सुहाग’ के निर्देशक मनमोहन देसाई थे। इस फिल्म में एक सीन था—क्लाइमैक्स का हेलीकॉप्टर सीन। इसमें मनमोहन देसाई ने किसी स्टंटमैन की मदद नहीं ली, बल्कि शशि से यह सीन खुद करवाया।अब शूटिंग के दौरान हेलीकॉप्टर हवा में 100 मीटर से ऊपर उड़ रहा था और शशि रेलिंग पकड़कर लटके हुए थे। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान शशि का दिल मानो धड़कना बंद हो गया था। स्थिति यह थी कि नीचे उतरते ही वह डर के मारे सुन्न पड़ गए थे। वह टूट चुके थे।शशि जमीन पर बैठकर फूट-फूटकर रोने लगे और बोले, आज सच में लगा कि मैं मर जाऊंगा। यह सुनकर मनमोहन जोर-जोर से हंसने लगे। तभी शशि ने कसम खाई कि वह मनमोहन देसाई के साथ कभी काम नहीं करेंगे।”टैक्सी” उपनाम और जीवनशैलीशशि कपूर 70 के दशक के सबसे व्यस्त अभिनेता थे। वह एक साथ 60 से 70 फिल्मों में काम करते थे। उनके बारे में लोग कहते थे कि शशि कपूर पैंट पहनकर एक फिल्म के सेट पर जाते हैं और शर्ट पहनकर दूसरी फिल्म के सेट से निकलते हैं।यहां तक कि उनके बड़े भाई राज कपूर के लिए भी अपनी फिल्म ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ के लिए शशि की तारीखें (डेट्स) पाना किसी नर्क से कम नहीं था। इसीलिए राज कपूर ने शशि कपूर को एक उपनाम दिया था। वह शशि को “टैक्सी” कहकर बुलाते थे। क्योंकि उन दिनों शशि इतने व्यस्त हुआ करते थे कि अक्सर टैक्सी में ही सो जाते थे।लेकिन इतने व्यस्त शेड्यूल के बाद भी उन्होंने कभी अपनी पत्नी और बच्चों को नजरअंदाज नहीं किया। वह हफ्ते में एक दिन, यानी रविवार, उनके साथ बिताते थे। वह कोई काम नहीं करते थे। वह बस उन्हें बाहर घुमाने ले जाते थे।लोग हैरान रह जाते थे। यह देखकर वे सोचते थे कि शशि बाकी कपूर खानदान से इतने अलग क्यों हैं? कपूर परिवार की परंपरा के अनुसार, जैसे-जैसे हर आदमी की उम्र बढ़ती थी, उसका पेट निकल आता था। लेकिन शशि इतने स्लिम, ट्रिम और फिट कैसे थे?इसकी वजह जेनिफर थीं। जेनिफर शशि का बहुत ख्याल रखती थीं। खासकर उनके खान-पान और एक्सरसाइज का। जेनिफर ही शशि की जिंदगी थीं। वह उनका सब कुछ थीं।जेनिफर की बीमारी और सबसे बड़ा सदमालेकिन 1982 शशि कपूर की जिंदगी का सबसे दुखद साल बन गया। क्योंकि उन्हें उस राज का पता चला जिसे उनकी पत्नी जेनिफर पिछले चार सालों से छिपा रही थीं, और यह बात पता चलते ही शशि जमीन पर मुंह के बल गिर पड़े।जेनिफर को कैंसर था। शशि कपूर ने गुस्से में अपनी पत्नी जेनिफर पर चिल्लाते हुए कहा, “तुम्हें इतनी खतरनाक बीमारी है और तुमने मुझसे चार साल तक यह बात छिपाई? क्यों?”जेनिफर ने कहा, “ताकि तुम परेशान न हो।”शशि क्या कहते? कैंसर चौथी स्टेज तक पहुंच चुका था। शशि कपूर ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की। उन्होंने हरसंभव इलाज कराया, अपनी पूरी ताकत झोंक दी, लेकिन अंत में जो होना था, वही हुआ। शशि को छोड़कर जेनिफर हमेशा के लिए इस दुनिया से चली गईं।शशि पूरी तरह से टूट चुके थे। उनके जन्म से लेकर उनकी पत्नी के अंतिम संस्कार तक, किसी ने भी शशि की आंखों में एक आंसू नहीं देखा था, लेकिन उनके बेटे करण कपूर बताते हैं कि 13 दिन बाद शशि गोवा के एक बीच पर खड़े थे। वहां से उन्होंने एक वाटर बोट ली, उसे समुद्र के बीच में ले गए, और फिर आसमान की तरफ देखकर जोर-जोर से चीखने और रोने लगे, अपनी छाती पीटने लगे।दर्द से भरा ऐसा रुदन देखकर आसमान भी मानो रो पड़ा और तट पर खड़े शशि के करीबियों के दिल उनके साथ रो पड़े। जेनिफर ही शशि की जिंदगी थीं। यही वजह है कि उनके जाने के बाद शशि की जिंदगी वैसी कभी नहीं हो सकती थी जैसी हुआ करती थी। शशि कपूर कभी वह इंसान नहीं बन पाए जो वह कभी हुआ करते थे।आखिरी दौर और अकेलापन1982 में रिलीज हुई फिल्म ‘नमक हलाल’ बॉलीवुड में मुख्य अभिनेता के रूप में शशि कपूर की आखिरी हिट फिल्म थी। इसके बाद उनका करियर ढलान पर जाने लगा और शशि का करियर बर्बाद हो गया।लोग यह देखकर दंग रह गए कि जिंदगी के इतने सालों तक जो शशि कपूर इतने स्लिम, ट्रिम और फिट रहे थे, वह अचानक फूलने लगे और कद्दू जैसे गोल हो गए। इसकी वजह जेनिफर थीं। अब उनका ध्यान रखने या देखभाल करने के लिए जेनिफर उनके पास नहीं थीं।1990 में शशि कपूर ने एक निर्देशक के रूप में अपने करियर की नई शुरुआत की। उन्होंने अमिताभ बच्चन से अपनी फिल्म में हीरो बनने का अनुरोध किया। उन दिनों अमिताभ कोई फिल्म साइन नहीं कर रहे थे। उन्होंने फिल्मों में काम करना बंद कर दिया था। लेकिन शशि के कहने पर वह मान गए।हालांकि 1991 में अमिताभ बच्चन अभिनीत ‘अजूबा’ इतनी बुरी तरह फ्लॉप हुई कि शशि ने हमेशा के लिए निर्देशन से तौबा कर ली।इसके बाद शशि कपूर सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह कट गए। उन्होंने खुद को अपने कमरे की चार दीवारों में बंद कर लिया और एक ऐसी जिंदगी जीने लगे जैसे मानो उनकी आंखें हैं पर नजर नहीं, शरीर है पर जान नहीं, दिल है पर धड़कन नहीं, और सांसें हैं पर वजह नहीं। जेनिफर ही शशि की जिंदगी थीं; अब जब वह नहीं थीं, तो उनके जीवन का क्या वजूद था? उनके जीवन का क्या उद्देश्य था?शशि न तो किसी से बात करते थे और न ही कोई उनसे बात कर सकता था। बस हर शाम 6:00 बजे वह अपनी व्हीलचेयर को पृथ्वी थिएटर के बगीचे में ले जाते थे और आंखें बंद करके डेढ़, दो, तीन, कभी-कभी चार घंटे तक वहां बैठे रहते थे। बस खयालों में खोए रहते।इसकी वजह भी जेनिफर थीं। दरअसल, 1978 में शशि कपूर के बार-बार विरोध करने के बावजूद, जेनिफर ने पृथ्वी थिएटर्स को फिर से खुलवाया था। क्योंकि पृथ्वीराज कपूर के निधन के बाद इसे बंद कर दिया गया था। यही वजह है कि शशि को इस थिएटर की हर दीवार में जेनिफर नजर आती थीं। यहां की हवा और आबोहवा में उन्हें जेनिफर की खुशबू महसूस होती थी।आखिरी विदाईसालों बाद, 2010 में जब शशि कपूर को फिल्मफेयर द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया, तो उन्हें कैमरे पर देखा गया। लोग हैरान रह गए क्योंकि साल पहले जब उन्होंने फिल्मों में शशि को देखा था, तो वह कितने हैंडसम हुआ करते थे। आज वह इतने बदल चुके थे। उन्हें पहचानना मुश्किल था।2014-15 तक शशि कपूर की मानसिक स्थिति थोड़ी बिगड़ने लगी थी। जब उनका किडनी का ऑपरेशन हुआ, तो वह आने-जाने वाले हर व्यक्ति को देखते और बार-बार बुदबुदाते थे— “चाइनीज रेस्तरां में चलते हैं और कुछ खाते हैं।” “चाइनीज रेस्तरां में चलते हैं और कुछ खाते हैं।”उनकी ऐसी हालत देखकर उनके तीनों बच्चे…संक्षिप्त सारांश (Quick Summary at a Glance)| विषय | विवरण ||—|—|| पूरा नाम | बलबीर राज कपूर (शशि कपूर) || जन्म | 18 मार्च 1938, कोलकाता || माता-पिता | रामसरनी देवी और पृथ्वीराज कपूर || जीवनसाथी | जेनिफर केंडल (विवाह: 1958) || संतान | करण, कुणाल और संजना कपूर || प्रमुख फिल्में | जब जब फूल खिले, वक्त, शर्मीली, दीवार, कभी कभी, सुहाग, नमक हलाल || निधन | 4 दिसंबर 2017 |क्या आप शशि कपूर की किसी खास फिल्म या उनके थिएटर के सफर के बारे में कुछ और विस्तार से जानना चाहते हैं?