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अब भगवान के नाम पर होंगे कॉपीराइट?क्या है सालंगपुर मंदिर विवाद मामला?

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अब बात करते हैं भगवान पर कॉपीराइट की। अब भगवान पर भी कॉपीराइट है, आपको हैरानी होगी।* प्रसिद्ध सारंगपुर कष्टभंजन देव हनुमानजी मंदिर के अधिकारियों ने मंदिर के कॉपीराइट ले लिए हैं। इसलिए अब कोई भी दादा के दिव्य स्वरूप और आस्था के प्रतीकों का व्यावसायिक उपयोग नहीं कर सकेगा। गुजरात में किसी मंदिर ने भगवान के कॉपीराइट लिए हों, ये पहली घटना है, जिसको लेकर अब विवाद भी शुरू हो गया है। अब भगवान पर कॉपीराइट – सारंगपुर मंदिर ने कॉपीराइट ले लिए।कॉपीराइट और ट्रेडमार्क का कानूनी सुरक्षा कवच आखिर हनुमानजी के लिए क्यों पड़ा?

कॉपीराइट की जरूरत: सारंगपुर के कष्टभंजन देव हनुमानजी मंदिर में हर साल लाखों श्रद्धालु आते हैं। कष्टभंजन देव हनुमानजी भक्तों के कष्ट दूर करते हैं। लेकिन अब मंदिर के संचालकों ने एक ऐसा फैसला लिया है जिसकी चर्चा पूरे गुजरात में हो रही है। एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला जो पहले कभी नहीं लिया गया था। हालांकि इस पहल पर विवाद भी शुरू हो गया है।

अब तक किसी कंपनी, किसी व्यक्ति या किसी फर्म के कॉपीराइट लिए जाते थे। लेकिन अब तो भगवान के ही कॉपीराइट लिए जा रहे हैं। अभी ये फैसला चर्चा के केंद्र में है।अब कष्टभंजन देव हनुमानजी के नाम, स्वरूप, चित्रों और मंदिर से जुड़ी कुछ विशिष्ट कृतियों को कॉपीराइट और ट्रेडमार्क का कानूनी सुरक्षा कवच दिया गया है। ट्रस्ट का दावा है कि ये फैसला दादा के दिव्य स्वरूप और आस्था के प्रतीकों के व्यावसायिक दुरुपयोग को रोकने के लिए लिया गया है।

भारत सहित दुनिया के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र माने जाने वाले सारंगपुर कष्टभंजन देव हनुमानजी मंदिर ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। ट्रस्ट ने हनुमानजी के विभिन्न दिव्य स्वरूपों, चित्रों, रचनात्मक कृतियों और ‘किंग ऑफ सारंगपुर’ जैसी पहचान को कॉपीराइट-ट्रेडमार्क के तहत रजिस्टर कराया है।मंदिर संचालकों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में दादा के नाम और स्वरूप का व्यापारिक उपयोग बढ़ता देखा जा रहा है, जिस वजह से इस आध्यात्मिक विरासत को कानूनी तौर पर सुरक्षित करने की जरूरत पैदा हो गई थी।l

“हनुमानजी महाराज के अलग-अलग विविध स्वरूपों और ‘किंग ऑफ सारंगपुर’ की जो दिव्य मूर्ति है, उस मूर्ति और आस्था-श्रद्धा के केंद्र को ध्यान में रखकर आज उनके ट्रेडमार्क-कॉपीराइट कराए हैं। इसका कोई भी दुरुपयोग या मिसयूज न कर सके, हमारी सारंगपुर की अनोखी भक्ति परंपरा, सेवा परंपराएं बनी रहें, इस उद्देश्य से ये काम पूरा हुआ है।

“हालांकि इस फैसले के बाद विवाद भी शुरू हो गया है। कुछ संतों और धार्मिक अगुवाओं का मानना है कि देवी-देवताओं को कॉपीराइट के दायरे में लाना सही बात नहीं है। इस मुद्दे पर सनातन संत समिति ने खुलकर विरोध जताया है। “मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा कि धर्म कहां जा रहा है। क्या हनुमानजी कॉपीराइट होंगे? देवता कॉपीराइट होंगे? कल कोई शिव को कॉपीराइट करेगा, कोई अंबाजी को कॉपीराइट करेगा, कोई माताजी को कॉपीराइट करेगा। क्या चल रहा है, हम धर्म को कहां ले जा रहे हैं? देवों के देव होते हैं और देवों के सब हैं। तब सनातन धर्म की प्रणाली में कॉपीराइट जैसी सिस्टम न लाएं और धर्म को हानि न पहुंचे, ऐसी विनती है।

“लेकिन सवाल ये है कि क्या देवी-देवताओं के स्वरूप पर कॉपीराइट हो सकता है? आस्था और कानून के बीच संतुलन कैसे बना रहेगा? दादा के नाम के दुरुपयोग को रोकने के लिए क्या यही एकमात्र रास्ता था? कॉपीराइट सिर्फ व्यावसायिक उपयोग के लिए ही लागू होगा। क्या दूसरी धार्मिक संस्थाएं भी ये मॉडल अपनाएंगी? इस फैसले से नए विवाद खड़े होंगे। धार्मिक विरासत के संरक्षण के लिए नए नियमों की जरूरत है।

सारंगपुर कष्टभंजन देव हनुमानजी मंदिर का ये फैसला एक तरफ आध्यात्मिक विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, तो दूसरी तरफ कॉपीराइट और धार्मिक आस्था के बीच की चर्चा को भी नई दिशा दे रहा है।

देखना होगा कि ये फैसला भविष्य में दूसरी धार्मिक संस्थाओं के लिए नया मार्गदर्शक बनेगा या फिर विवाद का नया कारण।’सारंगपुर’, ‘कष्टभंजन देव’, ‘किंग ऑफ सारंगपुर’ जैसे नाम वैसे ही रखे हैं क्योंकि वो उचित नाम हैं।

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