नमस्कार आप सुन रहे हैं द बॉलीवुड रेडियो और मैं हूं आपके साथ आकाश। दोस्तों आज के इस पॉडकास्ट में किस्सा है राज कपूर के आखिरी दिनों का। जैसे ही फ्लाइट का दरवाजा खुला राज कपूर के साथ दिल्ली पहुंची पत्नी कृष्णा राज कपूर ने कहा, बाप रे बाप! यह आंधी तो आपकी जान ले लेगी। उस दिन दिल्ली में बहुत तेज आंधी आई थी। तारीख 30 अप्रैल साल 1988 जैसे ही राज कपूर फ्लाइट से उतरे धूल भरी आंधी का असर ऐसा हुआ कि मानो फेफड़े झुलस गए।
यह राज कपूर की जिंदगी का आखिरी अप्रैल था। हिंदी सिनेमा के इतिहास का एक बेहद भावुक अध्याय राज कपूर उस समय 63 साल के थे। उम्र बढ़ने के साथ-साथ उन्हें लंबे समय से अस्थमा और सांस की गंभीर तकलीफ थी। इसके बावजूद उनके भीतर फिल्मों को लेकर वही जुनून था। वह अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म हिना की तैयारियों में जुटे हुए थे। इसी बीच भारत सरकार ने उन्हें भारतीय सिनेमा में उनके अतुलनीय योगदान के लिए दादा साहेब फाल्के पुरस्कार देने की घोषणा की। यह भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान था और राज कपूर ने तय किया कि चाहे तबीयत कैसी भी हो वह खुद दिल्ली आकर यह सम्मान ग्रहण करेंगे। 30 अप्रैल 1988 को राज कपूर अपने परिवार के साथ मुंबई से दिल्ली पहुंचे
उनकी बेटी रीमा जैन ने सालों बाद बताया कि दिल्ली पहुंचते ही तेज धूल भरी आंधी चली। विमान का दरवाजा खुलते ही धूल और तेज हवा का झोंका सीधे राज कपूर के चेहरे पर लगा। अस्थमा के पुराने मरीज होने के कारण उनकी सांसे वहीं से उखड़ने लगी। परिवार ने उन्हें आराम करने की सलाह दी। लेकिन राज कपूर बार-बार यही कहते रहे कि वह किसी भी कीमत पर पुरस्कार समारोह में शामिल होंगे। 1 मई 1988 को विज्ञान भवन में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह आयोजित हुआ। राज कपूर की तबीयत पहले से ही नाजुक थी। वह ऑक्सीजन सिलेंडर की मदद से समारोह में पहुंचे। पूरे कार्यक्रम के दौरान उनकी बेचैनी बढ़ती रही। परिवार के अनुसार वह अपनी पत्नी कृष्णा कपूर का हाथ कसकर पकड़े रहे। मानो सांस लेने में हो रही तकलीफ का इशारा दे रहे हो। लेकिन उनके चेहरे पर वही मुस्कान थी जो दशकों तक करोड़ों दर्शकों ने पर्दे पर देखी थी। फिर वह ऐतिहासिक क्षण आया मंच से घोषणा हुई दादासाब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किए जाते हैं श्री राज कपूर। बोरा सभागार तालियों से गूंज उठा।
लेकिन राज कपूर अपनी सीट से उठ ही नहीं पाए। उनकी सांसे इतनी तेज चल रही थी कि खड़े होना भी मुश्किल हो गया। कुछ क्षणों के लिए पूरा हॉल शांत हो गया और तब तत्कालीन राष्ट्रपति प्रोटोकॉल को तोड़ते हुए खुद मंच से नीचे आकर राज कपूर की सीट तक उन्हें जाकर उन्हें सम्मान प्रदान किया। यह भारतीय पुरस्कार इतिहास के सबसे भावुक दृश्यों में से एक था। उस दिन तो यह सम्मान समारोह किसी तरह से संपन्न हुआ लेकिन राज कपूर की सेहत दिन-ब दिन बिगड़ती गई। उन्हें एम्स में भर्ती करवाया गया और फिर जिंदगी के आखिरी दिनों तक राज कपूर जिंदगी और मौत की जंग लड़ते रहे।
हर दिन उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती जा रही थी। तमाम फिल्म इंडस्ट्री के सियासत के लोग उनसे मिलने आते लेकिन राज कपूर की सेहत में कोई सुधार नहीं हो रहा था। लगातार उन्हें सांस लेने में तकलीफ होती जा रही थी। और फिर 2 जून साल 1988 वो तारीख जिस रोज राज कपूर ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। राज कपूर सिर्फ एक बेहतरीन एक्टर नहीं थे बल्कि वह शोमैन थे। राज कपूर ने जो फिल्में बनाई उसने एक सामाजिक संदेश भी दिया। लेकिन राज कपूर ने बहुत कम उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया। सुनते रहिए द बॉलीवुड रेडियो सुनता है सारा इंडिया