पाकिस्तान की ओर से पूर्वी अफगानिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में एकतरफा हवाई हमला किया गया है। इन हमलों में अफगानिस्तान के 29 बेकसूर नागरिकों की मौत हो गई है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सरहद पर दशकों से चला आ रहा तनाव अब अपने चरम पर जा पहुंचा है। जिस सरहद पर दोनों देश युद्धरत हैं, उसका नाम है डूरंड लाइन। यह वही लाइन है जिसकी शुरुआत 12 नवंबर 1893 की तारीख को हुई थी। इस तारीख को काबुल के एक अलीशान दरबार में दो शख्सियतों के बीच एक समझौते पर दस्तखत हो रहे थे। एक तरफ थे ब्रिटिश इंडिया के विदेश सचिव सर ममर डूरंड और दूसरी तरफ थे
अफगानिस्तान के अमीर अब्दुल रहमान खान। दोनों के बीच करीब 2670 कि.मी. लंबी एक ऐसी सरहद तय हो रही थी जिसने ना सिर्फ जमीन को बांटा बल्कि एक ही नस्ल एक ही संस्कृति के लाखों लोगों को हमेशा के लिए जुदा कर दिया। इस सरहद को आज हम दुरंड रेखा के नाम से जानते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अंग्रेजों ने यह लाइन क्यों खींची थी? इसका भारत से क्या कनेक्शन है और यहां पर तालीबान और पाकिस्तान के बीच मौजूदा तनाव क्यों बना हुआ है? चलिए वक्त के पन्नों को पलटते हैं। नमस्कार, मैं हूं आदित्य। भारत फैक्ट्स के आज के एपिसोड में आपका स्वागत है। पहले आते हैं मौजूदा घटनाक्रम पर। पाकिस्तानी फौज ने रविवार देर रात अफगानिस्तान से लगी सीमा पर कुनारकोस और पाकिका प्रांतों पर जबरदस्त हमले किए। इन हमलों में 29 लोगों की जाने चली गई। पाकिस्तान की ओर से कहा गया कि यह कार्रवाही हाल ही में खैबर पख्तून ख्वा बलूचिस्तान और कराची के रेंजर्स कैंप में हुई घटनाओं के मद्देनजर की गई है।
साथ ही आगे कहा गया कि इस हमले में अफगानिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में जमीनी कार्रवाही भी शामिल थी। पाक का निशाना जमात उल अहरार पर था जो वहां की सरकार के अनुसार चरमपंथी गुट है और वहां अक्सर तहरीक तालिबान पाकिस्तान से जुड़ा माना जाता है। पाकिस्तान ने हाल के महीनों में अफगानिस्तान पर कई हवाई हमले किए हैं। इनमें से आखिरी हमला इसी महीने की शुरुआत में हुआ था। इस्लामाबाद में बैठी सरकार का आरोप है कि तालीबान सरकार उन चरमपंथियों को पनाह दे रही है जो हमलों में तेजी के लिए जिम्मेदार हैं। खासकर टीटीपी जिसने सालों से पाकिस्तान के खिलाफ हिंसक अभियान चला रखा है। इन संगठनों में कई ऐसे हैं जो पाकिस्तान से आजादी चाहते हैं। वहीं अफगानिस्तान की तालीबान सरकार की ओर से दावा किया जा रहा है कि इन हमलों का फिर से मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। और ऐसा जवाब दिया जाएगा कि पाकिस्तान की आने वाली पीढ़ियां इसे याद रखेंगी। कुल मिलाकर डोनट लाइन पर इस समय एक भयानक युद्ध की स्थिति बनी हुई है। अब आते हैं डोनट लाइन के इतिहास पर। कहानी की शुरुआत होती है 19वीं सदी के द ग्रेट गेम से। यह दो महाशक्तियां ब्रिटिश साम्राज्य और रूसी साम्राज्य के बीच एशिया पर कब्जे की एक छिपी हुई जंग थी।
अंग्रेजों को डर था कि रूस मध्य एशिया से होते हुए अफगानिस्तान के रास्ते ब्रिटिश भारत यानी आज के पाकिस्तान पर हमला कर सकता है। अंग्रेजों ने अफगानिस्तान को अपने कब्जे में लेने के लिए दो बार जंग लड़ी। इन्हें इतिहास में एंग्लो अफगान वॉर कहा जाता है। लेकिन उन्हें वहां करारी शिकस्त मिली। तब अंग्रेजों ने अपनी रणनीति बदली। उन्होंने तय किया कि अफगानिस्तान को पूरी तरह जीतने के बजाय उसे रूस और ब्रिटिश भारत के बीच एक बफर स्टेट बना दिया जाए। इस बफर स्टेट की बाहरी सीमा तय करने के लिए सर मर्टीमर डूरंड को काबुल भेजा गया। एक लंबी बातचीत के बाद डूरंड रेखा वजूद में आई। अंग्रेजों ने इस लाइन को खींचते वक्त भौगोलिक और रणनीतिक फायदों को तो देखा लेकिन वहां रहने वाले इंसानों को भूल गए। इस लाइन ने अफगानी मूल के पश्तून समुदाय को दो हिस्सों में बांट दिया। सदियों से एक साथ रहने वाले पश्तून कबीले रातोंरात दो अलग-अलग देशों के नागरिक बन गए। आधे अफगानिस्तान में रह गए और आधे ब्रिटिश भारत यानी आज के पाकिस्तान के हिस्से में आ गए। अब सवाल आता है कि आज के भारत और अफगानिस्तान के बीच ये लाइन कैसे आई? साल 1947 से पहले पाकिस्तान नाम का कोई देश था ही नहीं। आज जो पाकिस्तान का खैबर पख्तून और बलूचिस्तान प्रांत है, वह ब्रिटिश भारत का हिस्सा था। इसलिए साल 1893 में यह रेखा सीधे तौर पर अविभाजित भारत और अफगानिस्तान के बीच खींची गई थी। जब 1947 में भारत का बंटवारा हुआ तो इस डूरंड रेखा का एक बहुत बड़ा हिस्सा पाकिस्तान को विरासत में मिल गया।
लेकिन आज भी भारत और अफगानिस्तान के बीच 106 कि.मी. लंबी एक सीमा मौजूद है जो जम्मू कश्मीर के पीओके यानी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर वाले हिस्से में आती है। भारत आधिकारिक तौर पर आज भी इस 106 कि.मी. की सीमा को अफगानिस्तान के साथ अपनी अंतरराष्ट्रीय सरहद मानता है। साथियों इतिहास गवाह है कि अफगानिस्तान ने कभी भी डूरंड रेखा को दिल से स्वीकार नहीं किया। जब 1947 में पाकिस्तान बना तो अफगानिस्तान यूनाइटेड नेशन में पाकिस्तान को मान्यता देने के खिलाफ वोट करने वाला एकमात्र देश था।
अफगानिस्तान का मानना है कि यह समझौता अंग्रेजों ने उन पर दबाव बनाकर थोपा था और इसकी मियाद सिर्फ 100 साल की थी। चाहे अफगानिस्तान में राजा का शासन रहा हो या लोकतांत्रिक सरकार रही हो या आज का तालीबान शासन। काबुल की हर हुकूमत ने इस लाइन को अंतरराष्ट्रीय सीमा मानने से साफ इंकार कर दिया है। साथियों तो यह था डूरन रेखा का वो इतिहास जिसे आज से 130 साल से भी पहले औपनिवेशिक स्वार्थ के लिए खींचा गया था। एक ऐसी लकीर जिसने भूगोल तो तय कर दिया लेकिन इतिहास में एक ऐसा विवाद छोड़ गई जो आज भी सुलग रहा है और साथ ही वहां पर एक भयानक युद्ध की स्थिति बनी हुई है। साथियों इस मुद्दे पर आप क्या सोचते हैं? कमेंट करके हमें जरूर बताएं। बने रहिए india.com के साथ। शुक्रिया।