अफगानिस्तान के काबुल का एक ड्रग रिहैबिलिटेशन सेंटर यानी नशा छुड़ाने वाला अस्पताल और वहां हुआ एक बेहद खौफनाक हमला। 16 मार्च की रात हुई एयर स्ट्राइक में करीब 408 लोगों की मौत हो गई और मरने वालों में ज्यादातर मरीज थे। अफगानिस्तान का सीधा आरोप है कि यह हमला पाकिस्तान ने किया है। लेकिन पाकिस्तान ने इसे पूरी तरह नकार दिया। अफगान सरकार के मुताबिक रात करीब 9:00 बजे काबुल के उमर एडिक्शन ट्रीटमेंट हॉस्पिटल को निशाना बनाया गया।
यह 2000 बेड का बड़ा अस्पताल था जहां नशे की लत से जूझ रहे लोगों को इलाज दिया जाता था। हमले में अस्पताल का बड़ा हिस्सा तबाह हो गया। सैकड़ों लोग मारे गए और करीब 250 लोग घायल हैं। अफगान अधिकारियों ने कहा है कि जो जगह लोगों को नई जिंदगी देने के लिए बनी थी, वह कुछ ही मिनटों में मौत के मंजर में बदल गई। दूसरी तरफ पाकिस्तान कहता है कि उसने किसी अस्पताल को नहीं बल्कि एक आतंकी ठिकाने को निशाना बनाया।
पाकिस्तान का दावा है कि हमले बेहद सटीक थे और सिर्फ उन जगहों पर किए गए जहां से आतंकवाद को सपोर्ट मिल रहा था। यानी दोनों देशों की कहानी पूरी तरह अलग है। और सच क्या है? यह अभी तक साफ नहीं है। तनाव तब और बढ़ गया जब पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने कहा कि अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने रेड लाइन पार कर दी है। वहां से ड्रोन हमले हुए हैं जिनमें पाकिस्तान के अंदर आम लोग घायल हुए।
इसके बाद जवाबी हमलों का सिलसिला शुरू हो गया जो दिन-बदिन और घातक हो गया। हालात ऐसे हो गए कि फरवरी में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इसे खुली जंग बता दिया। लेकिन यह मामला सिर्फ एक हमले का नहीं है बल्कि उस रिश्ते के टूटने की कहानी है जो कभी बहुत मजबूत माना जाता था। पाकिस्तान दशकों से अफगान तालिबान का सबसे करीबी साथी रहा है।
1990 के दशक में तालिबान को खड़ा करने में भी पाकिस्तान की बड़ी भूमिका थी ताकि भारत के खिलाफ उसे एक स्ट्रेटेजिक डेप्थ मिल सके। 2021 में जब तालिबान दोबारा सत्ता में आया तो उसका स्वागत भी किया गया था। तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा था कि अफगानों ने गुलामी की जंजीरें तोड़ दी हैं। उस वक्त उम्मीद थी कि दोनों के रिश्ते और मजबूत होंगे
लेकिन हुआ एकदम उल्टा। तालिबान अब पाकिस्तान के हिसाब से नहीं चल रहा और दोनों के बीच दूरी बढ़ती जा रही है। पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल तहरीक तालिबान पाकिस्तान यानी टीटीपी और बलूच अलगाववादी समूह कर रहे हैं। यह वही संगठन है जो पाकिस्तान के अंदर हमले करते हैं। कभी सेना पर, कभी पुलिस पर तो कभी आम लोगों पर। पाकिस्तान बार-बार कहता रहा कि इन लोगों को अफगानिस्तान में पनाह मिल रही है।
लेकिन अफगानिस्तान इन आरोपों को गलत बताता है। उसका कहना है कि वो अपनी जमीन किसी के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होने देता। उल्टा अफगान तालिबान पाकिस्तान पर आरोप लगाता है कि उनके दुश्मन जैसे आईएसआईएस के लड़ाकों को जगह दे रहा है। यानी दोनों तरफ से एक दूसरे पर इल्जाम है लेकिन भरोसा किसी को नहीं है। तहरीक तालिबान पाकिस्तान यानी टीटीपी।
इसकी बात की जाए तो यह 2007 में कई आतंकी संगठनों को मिलाकर बना था। इसे आमतौर पर पाकिस्तानी तालिबान कहा जाता है। इस संगठन ने पाकिस्तान के बाजारों, मस्जिद, एयरपोर्ट, सेना के ठिकानों और पुलिस स्टेशन पर हमले किए हैं। इसने अफगानिस्तान सीमा के पास के इलाकों के साथ-साथ पाकिस्तान के अंदरूनी हिस्सों जैसे स्वाद घाटी तक अपनी पहुंच बनाई है। 2012 में मलाला युसुफजई पर हमला भी इसी संगठन ने किया था।
टीटीपी ने अफगान तालिबान के साथ मिलकर अमेरिकी नेतृत्व वाली सेनाओं के खिलाफ भी लड़ाई लड़ी थी और अफगान लड़ाकों को पाकिस्तान में पनाह भी दी थी। पाकिस्तान ने अपने देश के अंदर टीटीपी के खिलाफ कई सैन्य अभियान चलाए लेकिन पूरी तरह सफलता अभी तक नहीं मिली है। हालांकि 2016 तक एक बड़े ऑपरेशन के बाद हमले काफी कम हो गए थे। लेकिन पिछले कुछ सालों में फिर से यह लगातार बढ़ रहे हैं।
समस्या की जड़ यह भी है कि दोनों देशों के बीच करीब 2600 कि.मी. लंबी सीमा है जिसे डूरंड लाइन कहा जाता है। यह काफी अस्थिर और खुली हुई है। पाकिस्तान में लाखों अफगान शरणार्थी रहते हैं। ऐसे में अगर यह संघर्ष लंबा चलता है तो इसका असर सिर्फ इन दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता पर पड़ सकता है। सबसे बड़ी चिंता यह है
कि अगर यह टकराव ऐसे ही बढ़ता रहा तो इसका फायदा बड़े आतंकी संगठन उठा सकते हैं। जैसे अलकायदा या आईएसआईएस जो पहले से ही इस इलाके में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। अगर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच पूरी तरह युद्ध छिड़ता है तो इससे एक बड़ा सिक्योरिटी वॉइड पैदा हो सकता है.