Cli

53 साल की उम्र में सगाई… फिर क्यों कुंवारी विधवा बनकर रही एक्ट्रेस नंदा,जानकर रूह कांप उठेगी।

Uncategorized

इस खूबसूरत हसीना को करोड़ों लोग चाहने वाले थे। लेकिन उन्होंने जिससे प्यार किया उसे सगाई करने के लिए 53 वर्ष की उम्र तक इंतजार किया। इसलिए मैंने प्यार किया। दिल को यूं ही बेकरार किया। और आखिरकार उनसे भी शादी नहीं हो सकी। सजना के तेरे मेरे सजना।

कौन थी वो अभिनेत्री और क्यों वह रह गई? सारी उम्र अकेली जानेंगे और भी बहुत कुछ बस बने रहिए हमारे साथ आज हम रूपले पर्दे की एक ऐसी अदाकारा के बारे में बात करने जा रहे हैं जो अपनी सीधी साधी भूमिका में ग्लैमरस हीरोइनों पर भी भारी पड़ती थी। यह मशहूर अभिनेत्री थी नंदा। झुकती घटा गाती हवा सपने जगाए।

नन्हा सा दिल मेरा मचल। 8 जनवरी 1939 कोल्हापुर के एक फिल्मकार परिवार में जन्मी नंदिनी उर्फ नंदा के पिता का नाम था विनायक दामोदर कर्नाटकी। और उन्हें मराठी फिल्मों में मास्टर विनायक के नाम से जाना जाता था।

वह मराठी फिल्मों के जानेमाने एक्टर, डायरेक्टर व प्रोड्यूसर थे। नंदा सात भाई बहनों में तीसरे नंबर की थी। उनके परिवार में कई फिल्मकार थे जो मराठी व हिंदी फिल्मों में जाना माना नाम थे। बाबूराव पिंडारकर, भाईजी पिंडारकर और वी शांताराम उनके करीबी रिश्ते में भाई थे। मास्टर विनायक मंगेशकर परिवार के भी काफी करीबी थे और उन्होंने ही अपनी फिल्म पहली मंगला गौर में लता मंगेशकर जी को बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट उतारा था। नंदा की फिल्मों में एंट्री की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। वर्ष 1944 में वो 5 साल की थी।

एमतो एक दिन जब वह स्कूल से लौटी तो उनके पिता ने कहा कल तैयार रहना। फिल्म के लिए तुम्हारी शूटिंग है। इसके लिए तुम्हारे बाल भी काटने होंगे। दरअसल फिल्म में उनकी भूमिका एक लड़के की थी। बाल काटने की बात सुनकर नन्ही नंदा नाराज हो गई। उन्होंने कहा, “मुझे कोई शूटिंग नहीं करनी। बड़ी मुश्किल से मां के समझाने पर वह शूटिंग पर जाने को राजी हुई। वहां उनके बाल लड़कों की तरह छोटे-छोटे काट दिए गए।

इस फिल्म का नाम था मंदिर। इसके निर्देशक नंदा के पिता विनायक दामोदर ही थे। फिल्म पूरी होती उससे पहले ही नंदा के पिता का निधन हो गया। बाद में उनके पिता के एक मित्र डायरेक्टर ने इस फिल्म को पूरा किया। घर की आर्थिक हालत बिगड़ने के चलते नंदा के छोटे कंधों पर जिम्मेदारी का बोझ आ गया। मजबूरी में उन्होंने फिल्मों में अभिनय करने का फैसला किया। चेहरे की सादगी और मासूमियत को उन्होंने अपने अभिनय की ताकत बनाया। वह रेडियो और स्टेज पर भी काम करने लगी। नन्हे कंधों पर परिवार की जिम्मेदारी उठाते हुए नंदा महज 10 साल की उम्र में हीरोइन बन गई।

लेकिन हिंदी सिनेमा की नहीं बल्कि मराठी सिनेमा की। मराठी डायरेक्टर दिनकर पाटिल की निर्देशित फिल्म कुलदेवता के लिए नंदा को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने विशेष पुरस्कार से भी नवाजा था। नंदा ने कई मराठी और गुजराती फिल्मों में काम किया। हिंदी फिल्मों में उन्होंने बतौर हीरोइन 1956 में अपने चाचा वी शांताराम की फिल्म तूफान और दिया में काम किया था। कहते हैं शांताराम जी ने उन्हें एक पारिवारिक समारोह में साड़ी में देखा था और उसी वक्त उन्हें अपनी फिल्म में साइन कर लिया था।

1959 में नंदा ने फिल्म छोटी बहन में एक ऐसी लड़की का किरदार निभाया था जिसकी आंखें एक हादसे में चली जाती हैं। उनका अभिनय दर्शकों को बेहद पसंद आया था। अंधेरा क्यों है? ये घर के किसने बंद कर दी? उस दौरान लोगों ने उन्हें सैकड़ों राखियां भेजी थी। देखो ये नाता निभाना निभाना भैया मेरे इसी साल राजेंद्र कुमार के साथ उनकी फिल्म धूल का फूल सुपरहिट रही आंखों पे है छाए तेरे जलवों के साए झुकती घटा गाती हवा सपने जग इस फिल्म ने नंदा को बुलंदियों पर पहुंचा दिया हालांकि इस भूमिका से वो परेशान भी थी लेकिन इसके बावजूद एक बार फिर 1960 की फिल्म कालाबाजार में वो देव आनंद की बहन बनी। तेरे चरणों की धूल मिल जाए तोमैं तर जा। इस फिल्म के पीछे भी एक दिलचस्प वाक्या है। जब देव आनंद साहब ने काला बाजार में बहन की भूमिका निभाने के लिए उनसे संपर्क किया तो उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि पर्दे पर बहन बन जाने के बाद वह इस हैंडसम हीरो की हीरोइन कभी नहीं बन पाएंगी।

लेकिन देव साहब ने उन्हें आश्वासन दिया कि वह अपनी अगली फिल्म में उन्हें अपने ऑोजिट लेंगे और कहा देव अपना वादा निभाएगा। अगले साल यानी 1961 में फिल्म हम दोनों में नंदा ने उनकी आदर्श पत्नी की भूमिका निभाई। अल्लाह तेरो नाम [संगीत] ईश्वर तेरो नाम। नंदा ने कभी नए अदाकारों के साथ अभिनय करने में संकोच नहीं किया। जगदीप के साथ फिल्म भाभी में, महमूद के साथ फिल्म कैदी नंबर 911 में, मनोज कुमार के साथ फिल्म बेदाग में, धर्मेंद्र के साथ मेरा कसूर क्या है में? जितेंद्र के साथ फिल्म परिवार में और संजीव कुमार के साथ फिल्म पति पत्नी में, उन्होंने बेझिझक होकर काम किया। सजरे बदरमर्जी तेरी है क्या।

उन्होंने राज कपूर साहब के साथ फिल्म आशिक में बेहद सशक्त अभिनय किया है। ये तो कहो कौन हो तुम? कौन हो तुम? मुझसे पूछे [संगीत] बिना। इस फिल्म में वो राज कपूर की पत्नी बनी थी। नंदा ने सबसे ज्यादा आठ फिल्में शशि कपूर के साथ की थी।

दोनों ने 1961 में चार दीवारी और 1962 में मेहंदी लगी मेरे हाथ जैसी फिल्में की। लेकिन शशि कपूर के साथ सुपरहिट फिल्म रही 1965 में आई जबजब फूल खिले। एक था गुल और एक थी बुलबुल दोनों चमन में। वर्ष 1965 में तीन देवियां और गुमनाम उनकी सुपरहिट फिल्में रही। जाने चमन शोला बदन पहलू में आ जाओ। अगले साल यानी वर्ष 1966 में उनकी फिल्में पतिप और नींद हमारे ख्वाब तुम्हारे ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन किया। कभी तेरा नाम तोड़ेंगे हम। वर्ष 1967 में परिवार और वर्ष 1968 में अभिलाषा व जुड़ी आदि फिल्मों ने उन्हें लोकप्रियता की नई ऊंचाइयां दी। सफर अब ये सफर बट जाएगा।

वर्ष 1969 में उनकी पांच फिल्में आई। ये फिल्में थी बेटी राजा साहेब, इत्तेफाक, बड़ी दीदी और धरती कहे पुकार के। उलझा के मैं तो गई हां मोहे ऐसे। कई हिट फिल्में देने के बावजूद नंदा की अभिनय प्रतिभा का सही इस्तेमाल कम ही हो पाया। शायद उनके अभिनय का पारखी निर्देशक उनकी किस्मत में नहीं था। नाजुक चुइमुई और प्यारी सी लड़की की छवि तोड़ने के लिए नंदा छटपटा रही थी। राजेश खन्ना के साथ फिल्म इत्तेफाक में उन्होंने नेगेटिव किरदार तक निभाया।

मालूम होता है आप सोते जागते दिलीप राय के ही सपने देखा करती हैं। मैंने उसकी लाश देखी थी। कुछ नहीं देखा तुम पागल हो। कहते हैं इस रोल के लिए साधना और माला सिन्हा दोनों ने इंकार कर दिया था। लेकिन नंदा ने चैलेंज स्वीकार किया। खास बात यह थी कि उन्हीं दिनों फिल्म द ट्रेन में नंदा राजेश खन्ना के साथ एक सीधी साधी आदर्श नारी की भूमिका में काम कर रही थी। गुलाबी आंखें जो तेरी देखी ये दिल हो गए। जब बी आर चोपड़ा साहब ने इस बारे में चर्चा की तो नंदन ने मुस्कुराते हुए कहा आप फिक्र मत करें। मैंने पहले ही शॉट में अपनी अलग पहचान बना ली है। फिल्म खासी लोकप्रिय रही। बताते हैं कि इसके 2 साल बाद राजेश खन्ना की नंदा के साथ एक और फिल्म जोरू का गुलाम रिलीज हुई। हम तो मोहब्बत के मारेकहां जाए।

हम तो मोहब्बत के मारे। तब तक राजेश खन्ना सुपरस्टार बन चुके थे। फिल्म के डिस्ट्रीब्यूटरों ने इस बात का फायदा उठाते हुए पोस्टरों पर उनका नाम बड़े अक्षरों में नंदा से ऊपर छपवा दिया था। राजेश खन्ना को इस बात का पता चला तो उन्होंने फोन करके डिस्ट्रीब्यूटरों से पोस्टरों को बदलवाया और नंदा का नाम ऊपर करवाया।

वर्ष 1973 में रिलीज हुई इस फिल्म में नंदा ने ड्रग एडिट की भूमिका निभाई थी। नैनों में है माथे पे इंडिया है बालों [संगीत] में नजरा है हालांकि उनका अभिनय सशक्त था लेकिन फिल्म फ्लॉप हो गई। उन्हें समझ में आ गया कि उनके सहज और स्वाभाविक अभिनय को ग्लैमर का रंग देने की कोशिश में उनकी अपनी पहचान भी खत्म हो जाएगी। इसके बाद नन्ना ने उसी साल रिलीज छलिया वर्ष 1974 में आई फिल्म असलियत व जुर्म और सजा और वर्ष 1977 में आई फिल्म प्रायश्चित जैसी फिल्में की जिसमें उनका रोल सरल और घरेलू हीरोइन का था।

क्षमा चाहे ना चाहे [संगीत] परवाने चले ही आते हैं। आप मुझे गलत समझ रहे हैं। इन फिल्मों के लिए उन्हें प्रशंसा भी मिली। लेकिन धीरे-धीरे निंदा का समय खत्म हो रहा था। इसका एहसास भी उन्हें हो रहा था। इसलिए बेहद शालीनता से उन्होंने खुद को रुपैले पर्दे की चकाचौंध से अलग कर लिया। 80 के दशक में वह एक बार फिर सिल्वर स्क्रीन पर लौटी। लेकिन कैरेक्टर रोल में 1981 में आई आहिस्ता-आहिस्ता 1982 में आई प्रेम रोग और 1983 में रिलीज हुई मजदूर में उन्होंने हीरोइन की मां की भूमिका निभाई थी। मैं तेरी मां हूं। सच तो यह है। तू उसे प्यार करती है। इसे तू भी जानती है।

लेकिन मानती नहीं। यह एक दिलचस्प सहयोग ही था कि तीनों ही फिल्मों में उनकी बेटी की भूमिका पद्मिनी कोल्हापुरे ने ही निभाई थी। निजी फ्रंट पर देखें तो परिवार में मौजूद भाई-बहनों की जिम्मेदारियां उठाने में उन्हें अपने बारे में सोचने का कभी मौका ही नहीं मिला। उन्हें कई अभिनेताओं और निर्देशकों से विवाह के प्रस्ताव मिले। लेकिन वह शादी के लिए तैयार नहीं हुई। कहते हैं कि फिल्म जबजब फूल किले की शूटिंग के दौरान उन्हें एक बेहद हैंडसम मराठी फौजी अधिकारी ने देखा और उन पर फिदा हो गया। बताया जाता है कि वह अधिकारी शादी का प्रस्ताव लेकर नंदा के घर वालों तक भी पहुंचा था। लेकिन यह अभिनेत्री इस रिश्ते के लिए कभी तैयार नहीं हुई। डायरेक्टर मनमोहन देसाई उन्हें पसंद करते थे। लेकिन बेहद शर्मीली नंदा ने उन्हें कभी अपने प्यार का इज़हार करने का मौका ही नहीं दिया। कहते हैं।

मनमोहन देसाई ने वर्ष 1969 में जीवन प्रभा गांधी नाम की युवती के रिश्ते को महज इसलिए स्वीकार किया क्योंकि इनकी शक्ल नंदा से बहुत मिलती जुलती थी। नंदा को सब पता था लेकिन उन्होंने कभी उनकी घरेलू जिंदगी में दखल नहीं दिया। मनमोहन की शादी के बाद नंदा भावनात्मक तौर पर अंधेरों में खो गई। मनमोहन भी अपनी शादीशुदा जिंदगी में व्यस्त हो गए। लेकिन कुछ समय बाद ही वर्ष 1979 में उनकी पत्नी का निधन हो गया। इसके बाद नंदा की करीबी दोस्त वहीदा रहमान ने दोनों के बीच पुल का काम किया और उन्हें आपस में मिलवाया। वही रहमान के ही जोर देने पर वर्ष 1992 में 53 साल की नंदा ने 55 साल के मनमोहन देसाई से सगाई कर ली। दोनों जल्दी ही शादी भी करने वाले थे।

लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। सगाई के कुछ ही दिनों बाद नंदा की मां गंभीर रूप से बीमार पड़ गई और शादी कुछ महीनों के लिए टल गई। वर्ष 1994 में मनमोहन देसाई की एक हादसे में मौत हो गई। दोनों कभी भी एक नहीं हो पाए और नंदा अविवाहित रह गई। नंदा की आखिरी फिल्म थी प्रेम रोग। क्योंकि वो गरीब है, अनाथ है और तू इन महलों की चार दीवारी में पली ठाकुरों की बेटी। जिसे बचपन से यही सिखाया जाता है। धर्म, आचार, नीति, समाज की मर्यादा, पवित्रता। कहा जाता है कि नंदा जब भी बाहर जाती थी तो वह सफेद साड़ी में जाती थी क्योंकि वह मन ही मन मनमोहन देसाई को अपना पति मान चुकी थी। उनके निधन के बाद से नंदा अकेली हो गई।

उन्होंने ज्यादा किसी से बात करने भी बंद कर दिया। उनकी खास दोस्तों में माला सिन्हा और वहिदा रहमान थी। 75 साल की उम्र में 25 मार्च 2014 को नंदा का निधन हो गया। तो दोस्तों, यह वीडियो आपको कैसा लगा, हमें कमेंट करके अवश्य बताएं। अगर आपके पास अभिनेत्री नंदा से जुड़ी कोई और जानकारी हो, तो वह भी कमेंट करके बताएं। अब दीजिए अपने होस्ट और दोस्त धीरज को इजाजत।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *