बॉलीवुड इतिहास के उन चंद चेहरों की बात करना जरूरी है जो पर्दे पर अपनी खूंखार या गुस्से वाली छवि के लिए तो जाने जाते हैं लेकिन असल जिंदगी में उनका दिल सोने से भी ज्यादा शुद्ध होता है। नाना पाटेकर को गालियां देने वालों का मुंह बंद करने के लिए सिर्फ उनका यह एक वीडियो या उनके जीवन का यह सच ही काफी है। क्योंकि इसे देखने के बाद आपकी उनके प्रति जो भी सोच है वो पूरी तरह बदल जाएगी। फिल्म इंडस्ट्री में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो किसी की मौत के बाद भी आलोचना करने से बाज नहीं आते। लेकिन उनके लिए यह जानना बहुत जरूरी है कि आखिर नाना पाटेकर कौन है। उन्होंने अपने जीते जी क्या-क्या किया है और अपनी उम्र के इस पड़ाव पर भी वे ऐसा कर दिखाते हैं जो बड़े-बड़े सुपर हीरो भी नहीं कर पाते। ऐसा करने के लिए एक बेहद मजबूत जिगर की जरूरत होती है जो हर किसी के पास नहीं होता। एक ऐसा इंसान जिसने अपनी जिंदगी में अपार दौलत देखी, शोहरत हासिल की, सिनेमा की दुनिया की चकाचौंध देखी, लाखों चाहने वालों का बेशुमार प्यार पाया, और अपनी भारी व दमदार आवाज से पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया, जिसकी आंखों का तीखा गुस्सा देखकर पर्दे पर अच्छे-अच्छे किरदार कांप उठते थे, और जिसके चेहरे की मामूली शिकन भी अभिनय की दुनिया में एक अनोखी मिसाल रखती थी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसी इंसान ने अपनी जिंदगी का एक ऐसा स्वर्णिम अध्याय भी लिखा है जिसमें ना कोई हाई प्रोफाइल कैमरा था, ना कोई फिल्मी डायलॉग, ना तालियां बजाने वाली भीड़ और ना ही किसी पुरस्कार की कोई उम्मीद। वहां थे सिर्फ कुछ ऐसे लोग जिनकी आंखों में दर्द के आंसू थे। कुछ ऐसे परिवार जिनके घरों में खाने का चूल्हा जलना भी मुश्किल हो चुका था। कुछ ऐसी बेसहारा औरतें जिनके पतियों की मौत के बाद उनके नन्हे कंधों पर बच्चों को पालने का भारी बोझ आ गया था। और कुछ ऐसे मजबूर किसान जिनके लिए आसमान से बरसने वाली बारिश सिर्फ पानी नहीं बल्कि जिंदगी और मौत के बीच का इकलौता फासला थी। इन सभी दुखी लोगों के बीच पहुंचने वाला वो मसीहा कोई फिल्मी सुपर हीरो नहीं बल्कि हिंदी और मराठी सिनेमा के महान और दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर थे। आज की इस कहानी में हम उनकी किसी फिल्म, उनके किसी किरदार या उनके मशहूर डायलॉग्स की बात नहीं करेंगे। बल्कि उस असली नाना पाटेकर की दास्तान जानेंगे जिसने पर्दे पर भले ही कई बार ऑन स्क्रीन गुस्सा दिखाया हो लेकिन असल जिंदगी में दूसरों के दुखों को देखकर अपने भीतर की इंसानियत को हमेशा जीवित रखा है।
इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस कलाकार ने अपनी मेहनत [संगीत] की गाढ़ी कमाई से बनाए गए पैसों का इस्तेमाल सिर्फ अपनी लग्जरी जिंदगी संवारने के बजाय बेसहारा और बेकसूर लोगों की जिंदगी बचाने के लिए कैसे कर लिया? बात उस समय की है जब महाराष्ट्र के कई सूखाग्रस्त इलाके भयंकर जल संकट और कृषि तबाही से जूझ रहे थे। किसानों पर बैंक और महाजनों के कर्ज का भारी दबाव था। उनकी उम्मीद की फसलें पूरी तरह बर्बाद हो रही थी। गरीब परिवार गहरे आर्थिक संकट से गुजर रहे थे और तंग आकर कई किसान अपनी जान तक देने को मजबूर हो रहे थे। किसी सुरक्षित शहर के एयर कंडीशन कमरे में बैठकर इन दुखद खबरों को सुनना और उस भयावह दर्द को अपनी नंगी आंखों से देखना। इन दोनों स्थितियों में जमीन आसमान का फर्क होता है। नाना पाटेकर के साथ भी ठीक ऐसा ही एक वाक्या हुआ था। मीडिया में छपे उनके एक पुराने इंटरव्यू के मुताबिक उस दौर में उन्होंने अपने लिए एक बेहद महंगी लग्जरी कार खरीदने के उद्देश्य से अपने बैंक खाते में कुछ लाख रुपए बचा कर रखे हुए थे। एक तरफ उनकी बरसों की कठिन मेहनत से कमाए गए वे पैसे थे जिनसे वे अपने सपनों की शानदार गाड़ी खरीद सकते थे। एक ऐसी कार जिसे देखकर लोग उनकी सफलता के कसीदे पढ़ते। लेकिन एक शाम जब उन्होंने टेलीविजन पर अचानक एक दिल दहला देने वाली खबर देखी तो उस खबर ने उनके सामने जिंदगी का बिल्कुल दूसरा और विभत्स चेहरा लाकर रख दिया। वो खबर एक ऐसे गरीब किसान परिवार से जुड़ी थी जिसने अपने घर के मुखिया को खो दिया था। उस अभाग्ये परिवार की आंखों में सिर्फ किसी अपने के दुनिया से चले जाने का दुख नहीं था बल्कि उनके सामने तो हर पल की रोजी रोटी चलाने का संकट भी खड़ा था। बच्चों के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम कहां से होगा? उनकी अधूरी पढ़ाई कैसे पूरी होगी? घर का बाकी खर्च कौन उठाएगा? और सबसे बड़ा सवाल कि अब आगे उनकी जिंदगी कैसे कटेगी? नाना पाटेकर ने बाद में एक इंटरव्यू में खुद यह बात साझा की थी कि उस परिवार की सूखी आंखों में उन्हें भयानक भूख और बेबसी साफ दिखाई दी थी और उस दृश्य ने उन्हें अंदर तक बुरी तरह झकझोर कर रख दिया था। उस वक्त उनके सामने सिर्फ दो ही रास्ते थे। पहला यह कि वे अपनी सफलता का भरपूर आनंद लें। अपनी मनपसंद लग्जरी कार खरीदें और अपनी शानदार जिंदगी में आगे बढ़ जाएं। और दूसरा रास्ता यह था कि वे उस दर्द को खुद महसूस करें जो उनसे मीलों दूर किसी लाचार किसान के घर में पसरा हुआ था। नाना ने अपने सामने खड़े इसी मानवीय सवाल का जवाब ढूंढना शुरू कर दिया और वे सोचने लगे कि जिस रकम से वे अपने लिए एक महंगी कार खरीदने जा रहे हैं, क्या उसी पैसे से किसी तबाह परिवार की जिंदगी में थोड़ी सी राहत नहीं लाई जा सकती? क्या उस नेक काम से किसी बेसहारा बच्चे की पढ़ाई फिर से शुरू नहीं हो सकती? क्या किसी विधवा मां को अपने परिवार का पेट पालने का कोई स्थाई सहारा मिल सकता है? और यहीं से उनकी सोच और जीवन की दिशा ने एक क्रांतिकारी मोड़ ले लिया। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने शुरुआत में लगभग 1000 किसान परिवारों को अपनी ओर से आर्थिक सहायता देने का मन बनाया था।
लेकिन जब वे जमीन पर उतर कर उन प्रभावित परिवारों से मिले तो उन्हें यह बात अच्छे से समझ आ गई कि संकट सिर्फ पैसों की तंगी का नहीं है बल्कि इन टूटे हुए परिवारों को सामाजिक सम्मान भावनात्मक सहारे और लंबे समय तक साथ निभाने वाले अपनों की भी उतनी ही जरूरत है। किसी जरूरतमंद को चंद पैसे दे देना एक तात्कालिक मदद हो सकती है। [संगीत] लेकिन जब वही इंसान दोबारा अपने पैरों पर मजबूती से खड़ा होने का हौसला पा लेता है, तब उस मदद का असली अर्थ और भी बड़ा हो जाता है। नाना पाटेकर के इन महान सामाजिक कार्यों की पूरी कहानी इसी पवित्र सोच के इर्द-गिर्द आगे बढ़ती है। [संगीत] जहां एक लग्जरी गाड़ी खरीदने की योजना को दरकिनार कर उन्होंने उन पैसों को दूसरों की पीड़ा कम करने के काम में लगा दिया और धीरे-धीरे उनका यह व्यक्तिगत फैसला एक बहुत बड़ा सामाजिक आंदोलन बन गया। महाराष्ट्र के तमाम सूखाग्रस्त क्षेत्रों में नाना पाटेकर ने ऐसे ही भयंकर संकट [संगीत] से जूझ रहे किसानों और उनके परिवारों के कल्याण के लिए दिन-रा काम किया। उस दशक के मध्य में उन्होंने अपने साथी अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर एक ऐतिहासिक पहल की नींव रखी। जिसका मुख्य उद्देश्य सूखे, पेयजल की भयंकर किल्लत और कृषि से जुड़ी समस्याओं से त्रस्त ग्रामीण समुदायों को संभालना था। यह कोई ऐसी सामान्य कहानी नहीं थी जिसमें कोई नामी अभिनेता किसी मंच पर आकर चंद भावुक बातें बोलकर अपने घर लौट जाए। बल्कि इस नेक पहल के पीछे एक ऐसी गहरी और जटिल समस्या थी जिसका समाधान एक दिन में संभव नहीं था। किसानों को फरी तौर पर आर्थिक सल चाहिए था। उनके परिवारों को ढांडस बंधाना था। गांवों में पानी के स्रोतों को गहरा करना था और सबसे अहम बात यह थी कि ऐसी परिस्थितियां तैयार करनी थी जिससे ग्रामीण परिवार भविष्य में कभी लाचार ना हो। नाना पाटेकर और उनकी समर्पित टीम ने इसी दिशा में पूरी निष्ठा के साथ काम [संगीत] किया। उन्होंने पीड़ित परिवारों तक सीधे आर्थिक मदद पहुंचाई और देश के आम नागरिकों से भी इस महा अभियान में बढ़-चढ़कर सहयोग करने की अपील की। इस पूरी पहल की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि यह किसी एक सेलिब्रिटी के बूते पर चलने वाला काम नहीं बन गया बल्कि इसमें समाज के हर वर्ग के लोगों को जोड़ा गया। नाना ने उस दौर में इस मिशन के बारे में बात करते हुए कहा था कि यह किसी एक व्यक्ति के अकेले के बस का काम नहीं है। इसके लिए हम सबको मिलकर आगे आना होगा। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि लातूर के एक पुराने और जजर सामुदायिक हॉल में जब सैकड़ों बेसहारा परिवारों के बीच नाना खुद अपने हाथों से नकद सहायता के चेक बांट रहे थे। तभी अचानक एक तेज आंधी आ गई और पूरे इलाके की बत्ती गुल हो गई। उस हॉल में चारों तरफ घना अंधेरा छा गया और लोग घबराकर इधर-उधर देखने लगे। लेकिन तभी वहां मौजूद स्थानीय ग्रामीणों ने अपने-अपने पुराने और टूटे फूटे मोबाइल फोन की टॉर्च जला ली। मोबाइल की उस छोटी सी रोशनी में नाना की आंखें भर आई, और उन्होंने कांपते हुए गले से माइक पर कहा कि आज इस अंधेरे के बीच मुझे मेरी बची हुई जिंदगी का असली मकसद मिल गया है।
उसी भीड़ के बीच से एक बेहद कमजोर और लाचार महिला खड़ी हुई और उसने कांपती हुई आवाज में कहा कि नाना साहब आपने यह चंद रुपयों की मदद तो हमारे कुछ महीनों का चूल्हा जलाने के लिए कर दी है। लेकिन इसके बाद हमारा क्या होगा? हमें किसी भी तरह की खैरात या टुकड़ों पर पलने वाला सहारा नहीं चाहिए। हमें तो अपने दम पर इज्जत से खड़े होने की पक्की हिम्मत चाहिए। वो बेचारी महिला अपनी पूरी बात भी ठीक से नहीं कह पाई थी कि चक्कर खाकर वहीं जमीन पर बेहोश होकर गिर पड़ी। उस गरीब औरत के कहे गए उन चंद तीखे शब्दों ने नाना पाटेकर की आत्मा को गहराई तक हिला कर रख दिया और उसी संवेदनशील मिट्टी से प्रेरणा लेकर आगे चलकर एक मजबूत संस्था का विज़न तैयार हुआ। नाना पाटेकर की साफ सुथरी और बेदाग छवि का जादू ऐसा था कि जैसे ही उन्होंने और मकरंद ने इस मिशन की विधिवत घोषणा [संगीत] की, देश की आम जनता ने पहले ही दिन भारी मात्रा में स्वैच्छिक योगदान उनके हाथों में सौंप दिया और देखते ही देखते यह राहत अभियान करोड़ों के फंड में बदल गया। जिससे सूखे इलाकों के सैकड़ों गांवों में तालाब गहरे हुए और नदियां फिर से जीवंत होने लगी। आपको यह भी बता दें कि किसानों के इस अथाह दर्द को अपना बनाने के अलावा नाना का दिल हमेशा से भारतीय [संगीत] सेना के वीर जवानों के लिए एक अलग ही अद्भुत सम्मान और देशभक्ति के साथ धड़कता आया है। अपने करियर के शुरुआती दौर में जब उन्होंने अपनी आइकॉनिक और देशभक्ति से ओतप्रोत फिल्म का निर्देशन किया था तब उस आर्मी ऑफिसर के किरदार को पूरी शिद्दत से निभाने के लिए उन्होंने भारतीय सेना की मराठा लाइट इनफेंट्री के साथ बकायदा हफ्तों तक कड़ी फौजी ट्रेनिंग ली थी और उनकी इस निष्ठा से प्रभावित होकर उन्हें सेना की ओर से मानत कैप्टन की रैंक से भी सम्मानित किया गया था। कारगिल युद्ध के दौरान जब टाइगर हिल और बर्फीली चोटियों पर दुश्मनों की तरफ से तोपों के गोले बरस रहे थे, तब नाना अपनी जरा सी भी जान की परवाह न करते हुए सीधे माइनस तापमान वाले बेहद खतरनाक फॉरवर्ड बंकरों में अपने फौजी भाइयों का हौसला बढ़ाने के लिए जा पहुंचे थे। उन्होंने अपने दिवंगत माता-पिता की पवित्र स्मृति में एक ऐसा सामाजिक ट्रस्ट भी शुरू किया जो सीधे तौर पर सीमा पर तैनात वीर जवानों, उनके परिवारों और युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के आश्रितों के कल्याण के लिए समर्पित होकर काम करता है। हाल ही के वर्षों में जब सीमा पार से भारी गोलाबारी और हमलों के बाद जम्मू-कश्मीर के राजौरी और पुछ के सीमावर्ती इलाके पूरी तरह दहल उठे थे,
तब अपनी उम्र के 70 पार के पड़ाव और सीने की गंभीर तकलीफ के बावजूद नाना खुद हवाई जहाज पकड़ कर जम्मू पहुंचे [संगीत] और वहां से दुर्गम सड़क मार्ग तय करते हुए सीधे राजौरी के संवेदनशील बॉर्डर पर जा पहुंचे। उन्होंने वहां भारतीय सेना की वाइट नाइट कॉप्स के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठकर उन परिवारों से मुलाकात की जिनके घर उजड़ चुके थे और उन्हें मौके पर ही भारी राहत राशि के पैकेज सौंपे। इतना ही नहीं उन्होंने दर्जनों आर्मी गुडविल स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की पूरी पढ़ाई का सारा खर्च अपने कंधों पर उठा लिया और वहीं एक साधारण फौजी लंगर में बैठकर किसी आम सेवादार की तरह खुद अपने हाथों से झूठे बर्तन तक साफ किए। तो दोस्तों, यह है पर्दे के पीछे के असली हीरो नाना पाटेकर की असल जिंदगी की कहानी। अगर आपको उनके जीवन का यह मानवीय और प्रेरणादायक पहलू छू गया हो, तो इस कहानी को उन लोगों तक जरूर शेयर करें, जो अक्सर यह सोचते हैं कि जीवन में सफलता का असली मतलब सिर्फ खुद की तरक्की करना है। जबकि असल मायनों में अपनी क्षमता के अनुसार समाज के लिए कुछ अच्छा करना ही सबसे बड़ा धर्म है। क्योंकि कभी-कभी किसी एक नेक इंसान का साहसी फैसला दूसरों को भी अच्छे कार्यों के लिए प्रेरित कर देता है। और जब ऐसे प्रयासों में कारवां जुड़ जाता है तो समाज में सकारात्मक बदलाव की उम्मीद कई गुना बढ़ जाती है। अगर आपको यह जानकारी वाकई पसंद आई हो तो इस वीडियो को लाइक करें और हमारे चैनल को सब्सक्राइब सब्सक्राइब करना मत भूलिएगा। हमारे साथ वीडियो में अंत तक बने रहने के लिए आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया। मिलते हैं ऐसी ही किसी और कहानी के साथ। तब तक के लिए, जय हिंद, जय