क्या यह सच है कि एवरेस्ट पर इंसानों ने पेशाब करके 154 टन बर्फ पिघला दी? क्या यह सच है कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर हर दिन 6766 लीटर पेशाब सीधे बर्फ पर छोड़ दी जाती है? और क्या यह सच है कि जो क्लाइबर ऊपर जाकर हीरो बनते हैं वही नीचे बर्फ की उस नदी को यानी ग्लेशियर को मार रहे हैं। पेशाब से एवरेस्ट को नुकसान हो रहा है। यह सवाल इसलिए क्योंकि एक नई स्टडी आई है जिसने पूरी दुनिया को हंसा दिया है। नेपाल के एक जमीन नापने वाले अफसर ने जो खुद एवरेस्ट पर चढ़ चुके हैं। अमेरिकी वैज्ञानिकों के साथ बैठकर हिसाब लगाया कि बेस कैंप पर कितने लोग हैं, कितना पानी पीते हैं, फिर कितना पेशाब करते हैं और वो पेशाब 37 डिग्री पर बर्फ से टकराकर क्या करते हैं? और जवाब आया 154 टन और इसके बाद अखबारों में खबर छप गई कि एवरेस्ट पर जाने वाले पेशाब करके एवरेस्ट को पिघलाते रहे। मीम बनने लगे। चुटकुले बन गए। ठीक है। पहली नजर में लगता भी है। हंसी की बात है। पर उसी स्टडी के अंदर एक लाइन ऐसी भी है
जिस पर किसी की नजर नहीं गई। पेशाब का हिस्सा तो सिर्फ 6% का है। बाकी 94% कौन पिघला रहा है? जवाब उस शहर में है जो हर साल एवरेस्ट के नीचे बसता है। 1600 टेंट, महंगी कॉफी की दुकान, गर्म फर्श वाले टेंट, गर्म पानी का शार, तेज वाईफाई, बड़ी स्क्रीन वाली टीवी और यह पूरा शहर एक ग्लेशियर के ऊपर खड़ा है। इसे चलाने के लिए एक सीजन में 824 गैस सिलेंडर, 19,000 लीटर मिट्टी का तेल और 5000 लीटर पेट्रोल जलता है। इतनी गर्मी की एक ओलंपिक स्विमिंग पूल जितनी बर्फ पिघल जाए हर साल। छठ लाइट तस्वीरें कहती हैं कि बेस कैंप की जमीन हर साल 0.28 डिग्री गर्म होती है। आसपास के ग्लेशियर से दुगनी रफ्तार पूरी धरती गर्म हो रही है पर एक जगह बाकी जगह से दोगुनी और इसीलिए हमें लगा कि आज यह सारी बातें बताने के बाद आपसे यह समझे जाने कि एक माउंट एवरेस्ट को कितना नुकसान वहां जाने वालों की पेशाब कर रही है। दूसरा असली विलेन अगर फ्यूल है तो दुनिया पेशाब पर क्यों अटक गई? और तीसरा जिस बर्फ पर ये शहर बसा है वो शहर उसी बर्फ को कब तक जिंदा रखेगा? क्या एवरेस्ट पर चढ़ना ही एवरेस्ट को
मारना बन गया? नमस्कार, मैं हूं शुभांकर मिश्रा और माउंट एवरेस्ट को आपका पेशाब कर रहा बर्बाद। इस पर मीम तो आपने खूब देख लिया। अब थोड़ा सेंसिटिव होकर इस खबर को समझते हैं। माउंट एवरेस्ट को आपके साथ की जरूरत है। वैसे साथ तो हमें भी आपका चाहिए। ऐसी खबरें रिसर्च करके हम लाते हैं। मेहनत करते हैं। अगर आप हमारा साथ देंगे तो हमारी भी हौसला अफजाई होगी। हमारे चैनल को सब्सक्राइब कीजिएगा। लिंक WhatsApp पर दे रखा है हमने। कमेंट सेक्शन में WhatsApp पर जरूर जुड़िएगा। WhatsApp पर जुड़ने से क्या होगा? हमारा आपका रिश्ता मजबूत हो जाएगा और आप तक यह वीडियोली पहुंच जाएंगे जिससे आप देख भी सकते हैं और शेयर भी कर सकते हैं। तो हो सके तो जुड़िएगा। लिंक डिस्क्रिप्शन में कमेंट में और आपकी स्क्रीन पर लगा दिया गया है। अब शुरुआत करते हैं। माउंट एवरेस्ट पर पेशाब नुकसान कर रहा है। यह खबर आई कहां से? तो जिस आदमी ने यह हिसाब लगाया है, उसका नाम है खेमलाल गौतम। नेपाल के सरकारी नाप जोग विभाग के बड़े अफसर हैं। 2019 में नेपाल ने एवरेस्ट की ऊंचाई दोबारा नापने का काम शुरू किया। तब गौतम उस टीम में थे और खुद चोटी तक गए थे। फिर उन्होंने लिखा कि 2022 तक वो बेस कैंप पर 365 से ज्यादा रातें बिता चुके हैं। मतलब एक पूरा साल बर्फ के ऊपर टेंट में और इतने साल वहां रहने के बाद उन्होंने लिखा कि जो कुछ वहां देखा उससे लगा कि इस बस्ती की खुद जांच होनी चाहिए। उन्होंने अमेरिकी वैज्ञानिकों के साथ मिलकर सवाल पूछा कि इस पिघलने में इंसानों का कितना हिस्सा है?
और इसके लिए 2023 अप्रैल मई का सीजन चुना। यही वो दो महीने होते हैं जब एवरेस्ट पर सबसे ज्यादा भीड़ होती है। उस सीजन में बेस कैंप पर करीब 1600 टेंट लगे। 2000 से अधिक लोग क्लाइबर, शेरपा गाइड, रसोइए, सामान ढोने वाले, डॉक्टर और करीब 50 दिन ही सब लोग वहां रहे। बेस कैंप कोई मैदान नहीं। यह खंभू ग्लेशियर के ऊपर है। 5364 मीटर की ऊंचाई पर। 1 कि.मी. से लंबी पट्टी यानी नीचे जिंदा बर्फ है जो सरकती है, पिघलती है, दरखती है और उसके ऊपर एक पूरा शहर। अब पेशाब वाला हिस्सा बचिए। ऊंचाई पर सांस लेना मुश्किल होता है। हवा सूखती है। शरीर से पानी तेजी से निकलता है। इसलिए क्लाइबर को हर दिन बहुत ज्यादा पानी पीना पड़ता है। नहीं तो शरीर में पानी की कमी हो जाती है। और ज्यादा पानी मतलब ज्यादा पेशाब। तो माउंट एवरेस्ट बेस कैंप पर एक आदमी दिन में औसतन 3 लीटर से ज्यादा पेशाब करता है। आप 2000 लोग हैं तो दिन के 6766 लीटर। 50 दिन में 338,000 लीटर। बेस कैंप पर टॉयलेट होते हैं। बड़े ड्रम वाले जिनमें ठोस कचरा इकट्ठा होकर नीचे ला है। स्टडी कहती है कि ज्यादातर पेशाब सीधे बर्फ पर ही जाता है और वो पेशाब शरीर से 37° पर निकलता है। बर्फ 0° पर तो गर्म पानी बर्फ पर गिरेगा तो क्या होगा? वैज्ञानिकों ने सिंपल सा हिसाब लगाया। इतना गर्म पानी इतनी बर्फ पिघलाएगा। जवाब आया 154 टन यानी 154000 किलो बर्फ सिर्फ एक सीजन में आदमी के पेशाब से कम हो जा रही है। यहीं से हेडलाइन और सच अलग होते हैं। स्टडी के अंदर एक ही बात साफ लिखी है। 154 टन से ज्यादा का आंकड़ा इससे ऊपर नहीं। असल में पेशाब की सारी गर्मी बर्फ तक नहीं पहुंचती। कुछ हवा में भी उड़ जाती है।
कुछ पत्थरों और मलवे में जाती है। कुछ पानी बनकर बह जाती है। तो असली आंकड़ा 154 से कम होगा। दूसरी बात कुंभू ग्लेशियर कई किलोमीटर लंबी बर्फ की नदी है। 154 टन उसके सामने सिर्फ एक बूंद है। तो सवाल कि सिर्फ पेशाब क्यों गिना गया? क्योंकि वैज्ञानिकों ने बेसकम की हर चीज गिनी थी। हर टेंट, हर सिलेंडर, हर आदमी और पेशाब भी उस लिस्ट में था। लेकिन दुनिया ने बाकी सारी चीजें हटा दी। पेशाब क्योंकि मसालेदार खबर थी इसलिए मसाले के बारे में बात शुरू हो गई। उसी स्टडी का असली दूसरा आंकड़ा है। 2023 के उसी सीजन में बेस कैंप पर 824 एलपीजी सिलेंडर जले। 18935 लीटर का तेल जला। 5130 लीटर पेट्रोल जला खाना पकाने के लिए टेंट गर्म करने के लिए जनरेटर चलाने के लिए। और ये जनरेटर क्या चला रहे? वाईफाई, बड़े स्क्रीन वाले टीवी, हीटर, चार्जर। पहले एवरेस्ट बेस कैम का मतलब था बर्फ में टेंट और सूखा खाना। आज वहां महंगी कॉफी है, गर्म पानी का शार है और कुछ महंगी कंपनी तो टेंट में गर्म फर्श तक लगाने लगे हैं। इसी सबकी गर्मी को जोड़ें तो वैज्ञानिकों का एक बड़ा हिस्सा है जो कहता है कि इंसानों के रहने खाने से 2500 टन बर्फ पिघलने लायक गर्मी निकालती है। एक ओलंपिक स्विमिंग पूल जितनी और इस 2500 में पेशाब का हिस्सा है 6% ओनली 6% बाकी 95% तो आप आराम में बर्बाद कर रहे हैं। अब सवाल कि माउंट एवरेस्ट को अगर पेशाब नुकसान पहुंचा रही है 6% और 94% दूसरी चीजें तो दुनिया पेशाब पर क्यों अटके? जवाब क्योंकि पेशाब पर हंसा जा सकता है। एवरेस्ट पिघल रहा है क्योंकि लोग वहां सुसु कर रहे हैं। यह लाइन शेयर करने में मजा आता है। करना किसी को कुछ नहीं है। पर एवरेस्ट पिघल रहा है क्योंकि आप वहां पर गर्म पानी, कॉफी पी रहे हैं। गर्म शावर से नहा रहे हैं। टीवी देख रहे हैं। गर्म बिस्तर बनवा रहे हैं और बहुत सारी व्यवस्थाएं कर रहे हैं जिससे आपको आराम मिले। और यह एवरेस्ट को मार रहा है। इस बात पर कोई नहीं हंसता। इस पर कोई जिम्मेदार नहीं बनता। वो क्लाइबर जो लाखों रुपए देकर आराम खरीदता है, वह चढ़ाई करवाने वाली कंपनी जो यहां आराम बेचती है और वो सरकार जो इन सब की परमिशन देती है कोई नहीं। और ये खबर आती भी नहीं। अगर यह पेशाब वाली बात नहीं होती तो हमें आपको फर्क भी नहीं पड़ता। पर आपको सोचना है कि ये जो बर्फ पिघल रही है, यह कब तक उस शहर को जिंदा रखेंगे? वैज्ञानिकों ने सेटाइट की हेल्प ली। लैंडसेट नाम की अमेरिकी सेटेलाइट 1991 से एवरेज की तस्वीरें ले रही है। उसमें जमीन का तापमान दिखता है। 1991 से 2023 तक 32 साल की तस्वीर और पता चला कि बेसकम वाली जमीन हर साल उसन 0.28° गर्म हुई। सुनने में छोटा लग रहा है पर हिसाब लगाएं तो 32 साल में करीब 9 डिग्री और आसपास के उस ग्लेशियर से करीब दोगुनी रफ्तार है जहां कोई नहीं रुकता यानी पूरा हिमालय गर्म हो रहा है। यह सच है। 2019 की स्टडी कहती है कि 2000 के बाद हिमालय की बर्फ पहले से दोगुनी तेजी से पिघली। पर उस गर्म होते हिमालय में से एक टुकड़ा जहां हर साल शहर बसता है बाकी से डबल स्पीड से बिखर रहा है। यह सिर्फ धरती का गर्म होना नहीं यह हम है। अब सवाल इस बर्फ का पानी जाता कहां है?
तो कुंबू ग्लेशियर से दूध कोसी नदी निकलती है। दूध कोसी नीचे जाकर कोसी मिलती है और कोसी बिहार की कोसी वही नदी जिसे बिहार का शोक कहते हैं। यानी एवरेस्ट के बेस कैंप पर जो हो रहा है उसका पानी आखिर में सुपौल, सहरसा, मधेपुरा के खेतों में पहुंचता है। यह दुनिया के ऊपर ही खबर नहीं है, हमारे घर की खबर है। सवाल कि अब कर क्या सकते हैं? कैसे बचाएं माउंट एवरेस्ट को? तो बचाने के तीन रास्ते हैं। पहला जनरेटर की जगह सूरज की बिजली। धूप वहां भरपूर है। दूसरा कचरे का खासतौर पर पेशाब का सही इंतजाम जैसे ठोस कचरे का होता है। तीसरा सबसे बड़ा बेस कैंप को ग्लेशियर से हटाकर पत्थर की जमीन पर ले जाना। वैज्ञानिकों ने दो जगह सुझाई है। अभी वाले कैंप से दक्षिण पश्चिम में यह बात नई नहीं है। 2022 में नेपाल सरकार ने खुद कहा था कैंप हटाने पर सोच रहे पर हुआ कुछ नहीं। दिसंबर 2025 में नेपाल ने एवरेस्ट की सफाई का पहला 5 साल का प्लान निकाला। उसमें लिखा कैंप हटाने पर एक स्टडी करवाएंगे। स्टडी पर स्टडी। 2024 में एक नियम आया कि बेस कैंप से ऊपर हर क्लाइबर को अपना मल बैग में भरकर नीचे लाना होगा।
पेशाब पर कोई नियम नहीं। फ्यूल पर कोई नियम, गर्म फर्श पर कोई नियम नहीं। और कैंप हटाना आसान भी नहीं है क्योंकि स्टडी खुद कहती है कि इससे नई मुश्किलें होंगी। जैसे नई जगह से चढ़ाई के रास्ते तक पहुंचने में ज्यादा वक्त। शेरपाम और लंबा चढ़ाई करवाने वाली कंपनी खर्च और ज्यादा और जिस धंधे से नेपाल को हर साल करोड़ों कमाई होती है सरकार शायद उसे आसानी से ना छोड़े। शायद इसीलिए यह हर साल हो रहा है। अप्रैल आता है, शहर बसता है, टीवी चलते हैं, कॉफी बनती है, जनरेटर गरजते हैं और बर्फ पिघलती रहती है। अब सवाल क्या माउंट एवरेस्ट पर इंसानों ने पेशाब करके 154 टन बर्फ पिघला दी? जवाब है आपका कागज पर। पर यह कहानी पेशाब की नहीं थी। पेशाब तो बस हंसी वाली बात थी जिसके पीछे असली बात छिपा दी गई। असली बात यह है कि हमने दुनिया की सबसे ऊंची, सबसे पवित्र मानने वाली जगह पर भी आराम करने का शहर बसा दिया और वो शहर उसी बर्फ उखा रहा है जिस पर वो खड़ा है। जिस दिन ग्लेशियर नहीं बचेगा उस दिन एवरेस्ट तो रहेगा पर उस तक पहुंचने का रास्ता नहीं रहेगा। और हम कहेंगे हमने तो सिर्फ पेशाब की थी। नहीं भाई साहब सीरियस मसला है। सोचिएगा बाकी WhatsApp पर जुड़िएगा आपका इंतजार करेंगे।