रात के 12:00 बजे जब पूरी महाकाल नगरी उज्जैन नींद के आगोश में थी तब कंठाल चौराहे से गोपाल मंदिर मार्ग पर सरकारी गाड़ियों के पहहिए थमे। सन्नाटे को चीरते हुए कुछ लोग निकले। हाथों में भारीभरकम आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक मशीनें थी। साथ में प्रशासनिक अमला था और निशाना प्राचीन खड़े हनुमान जी की वो मूर्ति जो पिछले डेढ़ महीने से खुले आसमान के नीचे प्रशासनिक फैसलों का इंतजार कर रही है?
सवाल सीधा है जो काम दिन के उजाले में सीना ठोक कर होना चाहिए उसके लिए आधी रात का अंधेरा क्यों चुना गया? वो कौन सी रिपोर्ट है जिसे तैयार करने के लिए भोपाल से एक्सपर्ट्स की टीम को आधी रात को गुपचुप तरीके से जमीन पर उतारना पड़ा। और सबसे बड़ा सवाल जब प्रशासन सब कुछ नियमानुसार करने का दावा करता है तो फिर इस जांच पर इतनी चुप्पी इतना पर्दा क्यों? मामले की पूरी क्रोनोलॉजी को समझिए। उज्जैन में कंठाल चौराहे से गोपाल मंदिर तक सड़क चौड़ीकरण का प्रोजेक्ट चल रहा है। शहर के विकास के नाम पर 172 मकान और दुकानें हटा दी गई। लगभग 10 धार्मिक स्थलों को भी विस्थापित कर दिया गया है।
नियम सबके लिए बराबर है। यहां तक कि किसी को कोई आपत्ति नहीं थी। लेकिन पेच फंसा प्रख्यात खड़े हनुमान मंदिर पर डेढ़ महीने पहले नगर निगम का बुलडोजर पहुंचा। मंदिर का पूरा मुख्य ढांचा तोड़ दिया गया। मलवा साफ कर दिया गया। लेकिन जब बात आई हनुमान जी की प्राचीन प्रतिमा की तो प्रशासन के हाथ रुक गए।
आस्था का दबाव कहिए या तकनीकी मजबूरी ढांचा तो गायब हो गया। लेकिन प्रतिमा वहीं सड़क की जद में बिना छत के खड़ी रह गई। डेढ़ महीने तक फाइलें दबी रही। मामला ठंडे बस्ते में जाता दिखा। लोग सोचने लगे कि शायद प्रशासन ने कोई बीच का रास्ता निकाल लिया है। लेकिन फिर रात 12:00 बजे जो हुआ उसने नए विवाद को हवा दे दी। एसडीएम लक्ष्मी नारायण गर्ग के नेतृत्व में भोपाल से आई एक स्पेशल टेक्निकल टीम वहां पहुंचती है। आधुनिक सेंसर्स और स्कैनिंग डिवाइसेस लगाए जाते हैं। मूर्ति के बेस यानी उसकी नींव की गहराई मापी जाती है।
3D मैपिंग जैसी तकनीकी से मूर्ति की संरचनात्मक स्थिति की जांच होती है। अब जरा सोचिए क्या यह जांच मूर्ति को सुरक्षित कहीं और शिफ्ट करने के लिए की जा रही थी? क्या इस बात का डर है कि अगर मूर्ति को हिलाया गया तो उसका प्राचीन ढांचा खंडित हो सकता है या फिर प्रशासन कोई ऐसा कदम उठाने जा रहा है जिसकी भनक को आम जनता श्रद्धालुओं और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को नहीं लगने देना चाहता। अगर नियत साफ है तो फिर इस जांच का मकसद सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? किस विभाग के आदेश पर यह टीम भोपाल से रातोंरात बुलाई गई और उस स्कैनिंग की रिपोर्ट में क्या निकला? प्रशासन ने साधी है चुप्पी ना कोई प्रेस नोट ना कोई आधिकारिक बयान लेकिन लोकतंत्र में जब हुकूमत मुंह से ले तो सवाल उठाना लाजमी है और इस बार सवाल किसी विरोधी दल ने नहीं उठाया सवालों की झड़ी लगाई है।
खुद सत्ताधारी पार्टी यानी बीजेपी के पार्षद शिवेंद्र तिवारी ने उन्होंने खुलेआम पूछा है आखिर शहर से छिपाकर रात के अंधेरे में यह ऑपरेशन क्यों चलाया गया अगर कुछ गलत नहीं था तो दिन के उजाले में स्थानीय लोगों पुजारियों और जनप्रतिनिधियों को भरोसे में लेकर जांच क्यों नहीं कराई गई क्या धर्म और आस्था से जुड़े संवेदनशील मामलों को रात के 12:00 बजे इलेक्ट्रॉनिक मशीनों से नापा जाएगा? विकास जरूरी है। महाकाल की नगरी को चौड़ी सड़कें चाहिए, जाम से मुक्ति चाहिए, इससे किसी को इंकार नहीं है। लेकिन विकास और आस्था के बीच जो संतुलन होना चाहिए, क्या प्रशासन उस संतुलन को खो चुका है, डेढ़ महीने तक जिस प्रतिमा को खुले में छोड़ दिया गया, उसकी नींव नापने के लिए आधी रात का वक्त ही क्यों मुफीद लगा?
उज्जैन प्रशासन को इन तीखे सवालों का जवाब देना ही होगा क्योंकि यह सिर्फ एक सड़क चौड़ीकरण का प्रोजेक्ट नहीं है। यह आस्था, पारदर्शिता और जनता के भरोसे का इम्तिहान है।