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पूरा बर्बाद हो गया खान गैंग?सरकार ने लिया चौंकाने वाला फैसला,मचा चकचार

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देश को तबाह करने पर। दोस्तों 9 साल बाद आखिरकार दिल्ली से आया एक ऐसा फैसला जिसने मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री के सबसे ताकतवर लोगों के बीच खलबली मचा दी है। दावा किया जा रहा है कि मोदी सरकार के एक नए कानून के बाद बॉलीवुड के उन बड़े चेहरों पर शिकंजा कसने की तैयारी शुरू हो गई है जिनके नाम लंबे समय से इंडस्ट्री के अंदर प्रभाव और दबदबे से जोड़कर देखे जाते रहे हैं। बांद्रा के समुद्र किनारे बने आलीशान बंगलों से लेकर जूहू के करोड़ों के पेंट हाउस तक अचानक बड़ी हलचल ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि जिन लोगों के एक इशारे पर बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स की दिशा तय होने की बातें कही जाती थी, आज वही लोग इस नए सरकारी फैसले को लेकर परेशान नजर आ रहे हैं। कहा जा रहा है कि इस आदेश का असर सिर्फ कुछ चुनिंदा अभिनेताओं या निर्देशकों तक सीमित नहीं रहने वाला बल्कि उन पूरे नेटवर्क पर पड़ सकता है जिन पर सालों से बॉलीवुड के फैसलों को प्रभावित करने के आरोप लगते रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर मोदी सरकार का वो कौन सा कानून है जिसके बाद मुंबई से दिल्ली तक हलचल तेज हो गई है? वकीलों की धड़कनें तेज हो गई और आधी रात को निजी जेट बुक करके दिल्ली तक जुगाड़ लगाने की कोशिशें शुरू हो गई। लेकिन इस बार मामला इतना कड़ा है कि ऊपर से साफ संदेश आ चुका है। कोई सिफारिश नहीं चलेगी। कोई पीछे की सेटिंग नहीं होगी और कोई समझौता नहीं होगा। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर ऐसा कौन सा नियम आ गया जिसने कई सालों से चले आ रहे इस पूरे परिवार राज्य की नींव हिला दी है। क्या यह कर चोरी का कोई नया मामला है? क्या पुराने गैंगस्टर कनेक्शनों पर कोई बड़ी छापेमारी हुई है या फिर सरकार ने सीधे उन प्रोडक्शन हाउसों के बैंक खाते ज्त कर दिए हैं जो करोड़ों का घपला करने के लिए बदनाम थे।

नहीं यह वार उससे भी कहीं ज्यादा गहरा है। यह चोट सीधे उस कुर्सी पर की गई है जिसके दम पर यह सिंडिकेट पिछले 9 सालों से अपनी मनमानी चला रहा था। जिस व्यवस्था को उन्होंने अपने बाप दादा की जागीर समझ लिया था। जहां बैठकर यह तय करते थे कि कौन सी फिल्म जनता देखेगी और किस फिल्म को इतने कट लगाकर कचरे के डिब्बे में फेंक दिया जाएगा कि वह थिएटरों का मुंह भी ना देख पाए। उसी व्यवस्था की जड़े रातोंरात काट दी गई हैं। पिछले 9 सालों में पर्दों के पीछे क्या खेल चल रहा था। कैसे दिल्ली की व्यवस्था को अंधेरे में रखकर मुंबई की यह लॉबी अपनी निजी दुकान चला रही थी। इसका पूरा कच्चा चिट्ठा जैसे ही सरकारी फाइलों में सामने आया तो बड़े-बड़े अधिकारियों के भी होश उड़ गए। इस पूरी हलचल की शुरुआत होती है शुक्रवार की उस शाम से जब बांद्रा के एक बहुत बड़े सुपरस्टार के बंगले पर अचानक तीन-चार लग्जरी गाड़ियां आकर रुकती हैं।

गाड़ियों से उतरते हैं बॉलीवुड के तीन सबसे बड़े स्टूडियो के मालिक, दो ऐसे निर्देशक जो सोशल मीडिया पर खुद को सबसे बड़ा ज्ञानी बताते हैं और तीन ऐसे बड़े वित्तक जिनका पूरे उत्तर भारत के सिनेमाघरों पर कब्जा है। कमरे का दरवाजा बंद होता है। सारे निजी सहायक और अंगरक्षक बाहर निकाल दिए जाते हैं, और टेबल पर रख दी जाती है दिल्ली से आई वह फाइल, जिस पर लाल रंग से नया सरकारी आदेश छपा हुआ था। उस कमरे में मौजूद एक बहुत बड़े निर्देशक के मुंह से सिर्फ इतना निकलता है।

अगर यह चीज लागू हो गई तो हमारा पूरा का पूरा व्यवसाय अगले 6 महीनों में बर्बाद हो जाएगा। हमारे जो 5-500 करोड़ के बड़े प्रोजेक्ट लाइन में लगे हैं, वे सब सड़क पर आ जाएंगे। यह डर कोई मामूली डर नहीं था। [संगीत] यह खौफ था अपनी उस खुली ताकत के छिन जाने का जिसके दम पर उन्होंने सालों से पूरे हिंदी सिनेमा को अपनी मुट्ठी में बंद कर रखा था। जरा पीछे जाकर उस पूरे खेल को समझिए जहां से सिंडिकेट का दबदबा शुरू हुआ था। 90 के दशक के बाद जब खुलेआम धमकियां मिलना बंद हुई तो इस तथाकथित माफिया ने बहुत चालाकी से सफेद कॉलर वाला चोला पहन लिया। इन्होंने थिएटरों, वितरण नेटवर्क, संगीत कंपनियों और यहां तक कि बड़े पुरस्कार समारोहों तक पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली। अगर कोई बाहर से आया लड़का या लड़की अपनी किस्मत आजमाने मुंबई आता, चाहे वह अभिनय में कितना भी जबरदस्त क्यों ना हो, जब तक वह इनके गुट में शामिल नहीं होता था। जब तक वह इनके आगे हाथ जोड़कर खड़ा नहीं होता था, उसे ढंग का काम मिलने ही नहीं दिया जाता था। अगर किसी नए निर्देशक ने अपनी पूरी जिंदगी की जमा पूंजी लगाकर घर बार गिरवी रखकर देश की असली मिट्टी से जुड़ी कोई जबरदस्त कहानी बना भी ली तो यह माफिया क्या करता था? सबसे पहले उसकी फाइल को ऐसे सरकारी दफ्तरों में महीनों अटका दिया जाता था। जहां बिना पहुंच के पत्ता भी नहीं हिलता था और बात सिर्फ फाइल अटकाने तक खत्म नहीं होती थी। जब कोई फिल्म निर्माता किसी तरह इन सारी मुश्किलों को पार करके अपनी फिल्म रिलीज करने के करीब पहुंचता तो यह लोग अपना सबसे गंदा खेल शुरू करते थे। अगर शुक्रवार को किसी नए अभिनेता की फिल्म रिलीज हो रही हो और उसी दिन किसी खान या किसी बड़े स्टार किड की फिल्म आ रही हो तो थिएटर वालों को खुली चेतावनी दी जाती थी। मल्टीप्लेक्स वालों से साफ कह दिया जाता था कि अगर तुमने इस नए लड़के की फिल्म को दोपहर या शाम का मुख्य समय शो दिया तो हम अपनी अगली तीन बड़ी फिल्में तुम्हारे थिएटरों में चलने ही नहीं देंगे। बेचारे थिएटर मालिक अपनी रोजी रोटी के चक्कर में झुक जाते थे और उस फिल्म को सुबह 8:00 बजे या रात के 11:30 बजे का वह शो थमा दिया जाता था जहां कोई सामान्य परिवार जा ही नहीं सकता। दूसरी तरफ उसी दिन स्टार किड्स की फिल्म को पूरे दिन में 15-15 शो दे दिए जाते थे। इसके बाद इनका पूरा प्रचार गिरोह और खरीदे हुए समीक्षक सक्रिय हो जाते थे जो सोशल मीडिया पर उस फ्लॉप और बेसिर पैर की कहानी को मास्टर पीस बताकर हिट करने में लग जाते थे। जबकि उस प्रतिभाशाली बाहरी अभिनेता की फिल्म को बिना दर्शकों के एक ही हफ्ते में थिएटर से बाहर फेंक दिया जाता था। यह पूरा धंधा इतने शातिराना तरीके से चलाया जा रहा था कि जनता को कभी असली खेल समझ ही नहीं आया। लोगों को यही लगता रहा कि शायद फिल्म में ही कोई दम नहीं था, इसलिए नहीं चली। लेकिन हकीकत तो यह थी कि जनता को वह फिल्म देखने का मौका ही नहीं मिला। सुशांत सिंह राजपूत जैसे ना जाने कितने होनहार अभिनेता इसी घुटन भरे सिस्टम के शिकार हो गए। कितने अच्छे-अच्छे निर्देशक अवसाद में चले गए और कितनों ने हमेशा के लिए मुंबई छोड़ दी। लेकिन इस लॉबी को रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ा।

यह हर साल अपने पुरस्कार समारोह में सजधज कर बैठते, एक दूसरे को ट्रॉफियां बांटते, पार्टियां करते और जनता को यह दिखाते कि बॉलीवुड का मतलब सिर्फ इनके चार परिवार हैं। जो इनकी पार्टियों में चापलूसी करेगा, वही स्टार बनेगा। बाकी देश की जनता का काम सिर्फ टिकट खरीद कर उनकी जेबें भरना रह गया था। लेकिन इस पूरे सिंडिकेट का सबसे बड़ा हथियार था एक ऐसा सरकारी सिस्टम जिसे उन्होंने अंदर ही अंदर पूरी तरह से बेकाबू कर रखा था। पिछले 9 सालों से यानी 2017 के बाद से इस सिस्टम की ऐड में एक ऐसा एकतरफ़ा खेल चल रहा था जिसकी खबर बाहर की दुनिया को लगने ही नहीं दी गई। नियम के मुताबिक जिस सिस्टम का हर 3 साल में समीक्षा होना जरूरी था।

जिसमें नए लोगों को शामिल किया जाना था। वह सिस्टम पिछले 9 सालों से एक ही धर्रे पर बिना किसी रोक-टोक के चल रहा था। हद तो यह हो गई थी कि इन 9 सालों के लंबे समय में ना तो कोई कायदे की बैठक बुलाई गई और ना ही कोई पारदर्शी रिपोर्ट ऊपर भेजी गई। दिल्ली में बैठे बड़े नीति निर्माताओं को सब कुछ ठीक-ठाक दिखाया जाता रहा। लेकिन मुंबई के बंद कमरों में यह सिंडिकेट अपने हिसाब से तय कर रहा था कि देश की जनता के सामने क्या परोसा जाएगा और क्या दबा दिया जाएगा। जब किसी के हाथ में इतने सालों तक बिना किसी हिसाब किताब के खुली छूट रहती है तो उसका घमंड सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। यही वजह थी कि उन्होंने देश के असली इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रीय नायकों पर बनने वाली फिल्मों को सीधे निशाने पर लेना शुरू कर दिया। अगर कोई निर्देशक हमारे देश के किसी सच्चे वीर, किसी महापुरुष या किसी ऐतिहासिक घटना पर फिल्म लेकर आता तो इस लॉबी के पसीने छूट जाते थे।

तुरंत उस फिल्म पर कभी 50, कभी 80 तो कभी 100 कट्स की सूची थमा दी जाती थी। उनसे ऐसे अजीब सवाल पूछे जाते थे और ऐसी अनापत्ति प्रमाण पत्र मांगी जाती थी जिसकी किसी कानून से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था। वहीं दूसरी तरफ अगर कोई ऐसी फिल्म आती जिसमें हमारी अपनी संस्कृति का मजाक उड़ाया गया हो। समाज को नीचा दिखाया गया हो तो उसे बिना किसी दिक्कत के फटाफट हरी झंडी मिल जाती थी। इस दोहरे रवैया ने इंडस्ट्री के सीधे-साधे फिल्म निर्माताओं का दम घोट कर रख दिया था। [संगीत] लेकिन इस सिंडिकेट को यह गलतफहमी हो गई थी कि उनकी यह सल्तनत कभी खत्म नहीं होगी। उन्हें लगता था कि सरकारें आती जाती रहेंगी। पर मुंबई पर हुकूमत हमेशा उन्हीं की चलेगी क्योंकि उनके पास अथाह पैसा था। मीडिया की बड़ी ताकत थी और वे सारे जुगाड़ थे जिनसे काम निकलवाया जाता था। उन्हें जरा भी भनक नहीं थी कि दिल्ली के सरकारी दफ्तरों में पिछले काफी महीनों से उनके खिलाफ एक-एक फाइल खंगाली जा रही थी। परेशान फिल्म निर्माताओं की शिकायतों, अदालत के पुराने फैसलों और अंदर चल रही मनमानियों का पूरा कच्चा चिट्ठा बहुत शांति से तैयार किया जा रहा था। जब वह पूरी फाइल तैयार होकर आखिरी टेबल पर पहुंची तो बिना किसी देरी के सीधे वह आदेश जारी कर दिया गया जिसने इस 9 साल पुराने चक्रव्यूह को एक ही झटके में तहस-नहस कर दिया। अब आप अच्छी तरह समझ सकते हैं कि बांद्रा की उस आपात बैठक में सन्नाटा क्यों पसरा हुआ था। वे सारे बड़े चेहरे जो कल तक कैमरों के सामने आकर अकड़ दिखाते थे उस रात एक दूसरे का मुंह ताक रहे थे।

कमरे में धुआं और खामोशी इतनी गहरी थी कि हर कोई सिर्फ एक ही सवाल पूछ रहा था। अब आगे क्या होगा? तभी उस टेबल पर रखी गुप्त फाइल का पहला पन्ना साफ-साफ लिखा था। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सीबीएफसी के पूरे बोर्ड को तत्काल प्रभाव से भंग किया जाता है और नए 18 सदस्यों के पैनल की नियुक्ति का आदेश दिया जाता है। बस यही वह एक पंक्ति थी जिसने उस कमरे में बैठे हर निर्देशक, निर्माता और वितर्क के पैरों तले से जमीन खींच ली। जिस सेंसर बोर्ड को यह सिंडिकेट पिछले 9 सालों से अपनी निजी संपत्ति समझकर चला रहा था। जहां इनके एक फोन कॉल पर दूसरों की फिल्मों पर कैंची चला दी जाती थी और इनकी अपनी घटिया फिल्मों को बिना किसी रोक-टोक के यूए प्रमाण पत्र मिल जाता था। वह पूरा का पूरा सेटअप एक झटके में उखाड़ कर फेंक दिया गया था। सोचिए 2017 से जो बोर्ड बिना किसी पुनर्नियुक्ति के बिना किसी कानूनी समीक्षा के खींचता चला आ रहा था जिसे कायदे से हर 3 साल में बदला जाना चाहिए था। वह 2026 तक एक ही धर्रे पर चल रहा था।

हाल ही में जब इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट सामने आई तो उसने इस पूरे सिस्टम के अंदर चल रहे भ्रष्टाचार और मनमानी की ऐसी पोल खोली कि मंत्रालय तक हड़कंप मच गया। रिपोर्ट में साफ खुलासा हुआ कि सेंसर बोर्ड के अंदर कोई लोकतांत्रिक प्रक्रिया बची ही नहीं थी। पूरे 9 सालों में ना तो कोई उचित बोर्ड बैठकें हुई और ना ही कोई वार्षिक रिपोर्ट जमा की गई। पूरा का पूरा बोर्ड बस अध्यक्ष और कुछ खास लोगों की मर्जी पर चलने वाला एक व्यक्ति का शो बनकर रह गया था। जब मन किया किसी फिल्म को हरी झंडी दे दी और जब किसी बाहरी या किसी खास विचारधारा की फिल्म सामने आई तो उस पर 100-100 कट्स की ऐसी सूची थमा दी गई कि निर्देशक खुद ही अपनी फिल्म रिलीज करने का ख्याल छोड़ दें। अब बात करते हैं उन वास्तविक मामलों की जहां इस सेंसरशिप राज का सबसे गंदा चेहरा सामने आया। याद कीजिए उड़ता पंजाब का दौर जब फिल्म से सिर्फ पंजाब का नाम और नशे की हकीकत हटाने के लिए उन कट्स की मांग कर दी गई थी। तब बॉम्बे हाईकोर्ट को बीच में आकर कहना पड़ा था कि बोर्ड का काम सिर्फ प्रमाणित करना है। निर्देशक की रचनात्मकता का हत्या करना नहीं। लेकिन फिर भी यह लॉबी सुधरने का नाम ही नहीं ले रही थी। हाल ही का सबसे चौंकाने वाला मामला था पंजाब 85 का जो मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के वास्तविक जीवन पर बनी थी और जिसमें दिलजीत दोसांज ने मुख्य भूमिका निभाई थी। इस फिल्म का नाम पहले बदलवाकर सतलुज करवाया गया और इसके बाद बोर्ड ने उस पर 127 कट्स थोप दिए।

हद तो तब हो गई जब फिल्म से पंजाब शब्द तिरंगा और यहां तक कि सच्ची घटनाओं पर आधारित का अस्वीकरण तक हटाने का आदेश दे दिया गया। निर्माता अदालत कचहरी के चक्कर काटते काटते थक गए लेकिन बोर्ड की मनमानी खत्म नहीं हुई। यही हाल हुआ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पर बनी फिल्म अजयद अनटोल्ड स्टोरी ऑफ योगी के साथ। निर्माताओं ने जब प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया तो बोर्ड ने पहले तो प्रमाण पत्र देने से ही साफ मना कर दिया। फिर 29 अजीबोगरीब कट्स मांगे और सबसे हैरान करने वाली बात यह कि योगी आदित्यनाथ के कार्यालय से अनापत्ति प्रमाण पत्र लाने को कह दिया गया। जिसका कानून में कोई प्रावधान ही नहीं था। निर्माताओं को बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा और हाईकोर्ट ने बोर्ड को कड़ी फटकार लगाते हुए बिना किसी कट के प्रमाण पत्र जारी करने का आदेश दिया। दूसरी तरफ जब इस लॉबी के अपने पसंदीदा निर्देशकों या किसी खास राजनीतिक कथा को सूट करने वाली फिल्में आती थी तो उन्हें बिना किसी सवाल जवाब के आसानी से पास कर दिया जाता था। द कश्मीर फाइल्स जैसी फिल्मों को लेकर भले ही इन्होंने थोड़ा ढोंग रचा लेकिन बाकी जो भी फिल्में जमीनी हकीकत, जाति राजनीति या वास्तविक इतिहास को ईमानदारी से दिखाना चाहती थी, उनके पीछे यह सिंडिकेट हाथ धोकर पड़ जाता था। छोटे और स्वतंत्र फिल्म निर्माता तो इस कदर परेशान हो चुके थे कि उन्हें अपनी फिल्मों की रिलीज तारीखें बार-बार टालनी पड़ती थी। जिससे उनका पूरा प्रचार बजट बर्बाद हो जाता था और आर्थिक रूप से उनकी कमर टूट जाती थी। लेकिन अब सरकार के इस नए फैसले ने पूरे खेल को 180 डिग्री घुमा दिया है। पूरे 9 साल के एक व्यक्ति के शो को खत्म करके जो नया 18 सदस्यों का पैनल बनाया गया है उसमें किसी एक लॉबी का सिक्का चलना नामुमकिन हो गया है। इस नए पैनल में सुनील शेट्टी, पंकज त्रिपाठी, प्रीति जिंटा, पल्लवी जोशी, निर्देशक प्रियदर्शन, रिकी कैज, हंसराज हंस और बंगाली सुपरस्टार प्रसंजीत चटर्जी जैसे बड़े और जमीनी नामों को शामिल किया गया है। टेलीविजन उद्योग से अनुपम खेर, रूपपाली गांगुली और मनोज जोशी, अभिषेक जैन, यंत्र मिश्रा जैसे कला, संगीत और साहित्य से जुड़े लोगों को बोर्ड की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

पुराने बोर्ड में से सिर्फ दो सदस्यों वामन केंद्रे और रमेश पतंगे को रखा गया है। बाकी पूरी टीम नए और निष्पक्ष चेहरों से भरी गई है। [संगीत] जैसे ही इस नई सूची की घोषणा हुई खान गैंग और इस मूवी माफिया के पसीने छूट गए। अब तक जो लोग फोन घुमाकर अपने प्रतिद्वंदवियों की फिल्मों पर कट्स लगवाते थे। उनकी अपनी फिल्मों का भविष्य अब खतरे में दिख रहा है। अब टेबल पर वे लोग बैठे हैं जो खुद अभिनय, निर्देशन और निर्माण की जमीनी मुश्किलों को झेलकर ऊपर आए हैं। पंकज त्रिपाठी और सुनील शेट्टी जैसे अभिनेता यह अच्छी तरह जानते हैं कि एक दृश्य को शूट करने में कितनी मेहनत और पैसा लगता है। इसलिए अब बिना किसी तार्किक कारण के बेवजह 100-100 कट्स लगाना इस सिंडिकेट के लिए नामुमकिन हो चुका है। विपक्ष और इस लॉबी से जुड़े कुछ लोग अब सोशल मीडिया पर रोना रो रहे हैं कि बोर्ड में अपनी पसंद के लोग बिठा दिए गए हैं। लेकिन पूरी इंडस्ट्री अब उनसे एक ही सवाल पूछ रही है। जब पिछले 9 सालों से एक ही आदमी पूरे बोर्ड को अपनी जागीर बनाकर चला रहा था।

जब 9 साल में एक भी बैठक तक नहीं बुलाई गई थी और प्रतिभाशाली फिल्म निर्माताओं का खून चूसा जा रहा था। तब यह तथाकथित उदारवादी और मूवी माफिया के सरदार किस बिल में छुपे बैठे थे? बांद्रा के उस बंगले में सन्नाटा अब और ज्यादा गहरा चुका था क्योंकि बैठक में मौजूद हर व्यक्ति को समझ आ चुका था कि सेंसर बोर्ड से उनका नियंत्रण जाना तो सिर्फ पहला झटका है। असली तबाही तो अब उनके पूरे व्यवसाय मॉडल पर आने वाली थी। क्योंकि थिएटरों की एकाधिकार, कॉर्पोरेट टिकट का घपला और बॉक्स ऑफिस के फर्जी संग्रह का वह अरबों का खेल जिसकी बदौलत यह खुद को भगवान समझ बैठे थे।

वह भी अब बहुत बुरी तरह उजागर होने जा रहा था। और इस घपले की सबसे बड़ी चाबी थी वह कॉर्पोरेट बुकिंग और थिएटरों की एकाधिकार जिसके दम पर यह खान गैंग और माफिया खुद को बॉक्स ऑफिस का अनक्राउंड किंग घोषित करते थे। अब तक का पूरा व्यवसाय मॉडल समझिए। यह लोग अपनी 200300 करोड़ की फ्लॉप और घटिया फिल्मों को ब्लॉकबस्टर साबित करने के लिए अपने ही काले धन से हजारों टिकट बल्क में खरीद लेते थे। बुक माय शो और बाकी ऑनलाइन प्लेटफार्म पर थिएटरों को हाउसफुल दिखा दिया जाता था। जबकि जमीनी हकीकत यह होती थी कि अंदर सिनेमा हॉल में सिर्फ 10 से 15 लोग बैठे पॉपकर्न खा रहे होते थे। फिर सोमवार सुबह को इनके भुगतान किए प्रचारक और बिकाऊ व्यापार विश्लेषक Twitter और Instagram पर फर्जी पोस्टर सांझा करते थे कि फिल्म ने पहले सप्ताहंत में 250 करोड़ का विश्वव्यापी संग्रह कर लिया है। इस झूठी हाइप के दम पर यह ओटीटी प्लेटफार्म से करोड़ों की डील साइन करते थे। ब्रांड प्रायोजन हड़पते थे और अपने नए स्टार किड्स को अगला सुपरस्टार बनाकर जनता पर थोप देते थे। लेकिन अब सरकार के इस नए ढांचे और पारदर्शी सिस्टम के आते ही यह फर्जी टिकटिंग और झूठे संग्रह का पूरा घोटाला सीधे आयकर और लेखा परीक्षा एजेंसियों के रडार पर आ चुका है।

यानी अपनी ही जेब से पैसे लगाकर फर्जी हिट का ठप्पा खरीदने का दिन अब हमेशा के लिए खत्म हो गया है। अगर आप दुनिया के बड़े फिल्म बाजारों जैसे अमेरिका और ब्रिटेन को देखें तो वहां सेंसरशिप नाम की कोई चीज ही नहीं होती। संयुक्त राज्य अमेरिका में मोशन पिक्चर एसोसिएशन और यूनाइटेड किंगडम में ब्रिटिश बोर्ड ऑफ फिल्म क्लासिफिकेशन सिर्फ फिल्म को आयु आधारित रेटिंग देते हैं। जैसे पीजी3 आर या यूए। उनका काम निर्देशक के दृश्यों पर कैंची चलाना बिल्कुल नहीं होता। वे सिर्फ दर्शकों को मार्गदर्शन करते हैं कि यह सामग्री किस उम्र के लोगों के लिए सही है। भारत में भी सालों पहले प्रसिद्ध निर्देशक श्याम बेनेगल की समिति ने यही सिफारिश की थी कि बोर्ड का काम कट्स लगाना बंद करके सिर्फ प्रमाणन तक सीमित होना चाहिए। लेकिन बॉलीवुड का यह मूवी माफिया जानबूझकर पुराने अप्रचलित 10,952 के सिनेमेटोग्राफ सिस्टम को पकड़े बैठा था।

ताकि जब भी कोई नया निर्देशक अपनी अलग और साहसिक कहानी लेकर आए तो सेंसरशिप का डंडा दिखाकर उसकी आवाज को हमेशा के लिए दबा दिया जाए। अब जब नए पैनल में प्रियदर्शन जैसे राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्माता और प्रसजीत चटर्जी जैसे दिग्गज आ चुके हैं तो सिस्टम का ध्यान अनावश्यक कट्स लगाने के बजाय एक आधुनिक निष्पक्ष और पारदर्शी रेटिंग सिस्टम की तरफ बढ़ रहा है। जिससे बॉलीवुड माफिया का वह ब्लैकमेलिंग वाला औजार हमेशा के लिए छीन चुका है। इस फैसले के बाहर आते ही इस सिंडिकेट और उनसे जुड़े कुछ राजनीतिक समर्थकों ने तुरंत पीड़ित कार्ड खेलना शुरू कर दिया। बड़े-बड़े टेलीविजन चैनलों और राष्ट्रीय मीडिया हैंडलों पर बैठकर यह कथा फैलाने की कोशिश की गई कि सरकार सिनेमा की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खत्म कर रही है और बोर्ड का राजनीतीरण हो गया है। लेकिन जनता और जमीनी स्तर के फिल्म निर्माताओं ने तुरंत इनका पाखंड दुनिया के सामने ला दिया है। लोग खुलकर पूछ रहे हैं कि जब 2021 में फिल्म प्रमाणन अपील न्यायाधिकरण को बंद किया गया था और छोटे निर्देशकों को एक छोटे से कट के खिलाफ भी करोड़ों रुपए खर्च करके सीधे उच्च न्यायालय के चक्कर लगाने पड़ते थे। तब यह माफिया लॉबी अपनी लग्जरी वैनिटी में बैठकर शैंपेन क्यों पी रही थी? जब कश्मीर, पंजाब और देश के असली वीरों पर बनी फिल्मों को रिलीज से ठीक दो दिन पहले बिना किसी वजह के लटका दिया जाता था।

तब उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहां सो रही थी? इस बार इनका कोई भी पीड़ित कार्ड काम नहीं आ रहा है। क्योंकि पूरी इंडस्ट्री का आम कर्मचारी तकनीशियन और नई पीढ़ी का सामग्री निर्माता समझ चुका है कि यह दर्द सिनेमा के लिए नहीं बल्कि अपनी जागीर छीनने की वजह से है। इस पूरे बदलाव का सबसे बड़ा फायदा अब क्षेत्रीय सिनेमा और उन स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं को मिलने वाला है जो सालों से इस रिशेदारीवाद और एकाधिकार के साए में घुट रहे थे। पिछले कुछ सालों में दक्षिण भारतीय सिनेमा चाहे वह तेलुगु हो, तमिल हो, कन्नड़ हो या मलयालम ने यह साबित कर दिया है कि अगर सामग्री में दम है तो बिना किसी खान या कपूर के भी पूरे देश की दर्शक थिएटरों की तरफ दौड़ी चली आती है। मराठी और बंगाली सिनेमा के पास विश्वस्तरीय कहानियां थी। लेकिन मुंबई का यह सिंडिकेट उन्हें कभी उत्तर भारत के मल्टीप्लेक्स में स्क्रीन ही नहीं मिलने देता था। अब जब बोर्ड और वितरण के स्तर पर समान अवसर का मैदान तैयार हो रहा है तो छोटे शहरों से आए निर्देशकों को अपनी बात रखने का पूरा मौका मिलेगा। अब किसी निर्देशक को अपने दृष्टिकोण को बचाने के लिए बांद्रा के किसी बंगले में जाकर हाथ जोड़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी। क्योंकि फैसला अब बंद कमरों की चार दीवारी में नहीं बल्कि योग्यता और कानून के हिसाब से होगा। कुल मिलाकर यह सिर्फ एक बोर्ड का पुनर्निर्माण नहीं है बल्कि उस पूरे सड़े गले सिस्टम का अंत है जिसने भारतीय सिनेमा को पिछले कई दशकों से एक निजी क्लब बनाकर रख दिया था। उस बांद्रा वाली आपात बैठक का आखिरी नतीजा यह निकला कि बड़े-बड़े धुरंधरों ने अपने वकीलों से कह दिया है कि अब पुराने तौर तरीकों से फिल्में नहीं चलेंगी। अब सिर्फ और सिर्फ असली प्रतिभा पर निवेश करना पड़ेगा।

वह द्वार जा चुका है जब सिर्फ बड़े सितारों का नाम देखकर थिएटर भर जाते थे और खराब से खराब कहानी पर 100 करोड़ का ठप्पा लग जाता था। अब 140 करोड़ की हिंदुस्तानी दर्शक जागरूक हो चुकी है और उसने साफ संदेश दे दिया है कि सिनेमा में असली राजा सिर्फ और सिर्फ सामग्री है। कोई खान गैंग, कपूर खानदान या मूवी माफिया नहीं।

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