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ईरान इजराइल यु!!द्ध में वो क्या चीज है जिससे एक देश जीत जाएगा और दूसरे की हार तय होगी?..

Hindi Post

2026 के बढ़ते ईरान यूएस इजराइल कॉन्फ्लिक्ट के बीच स्ट्रेट ऑफ हर्मस एक डिसाइसिव बैटल ग्राउंड बनकर उभर गया है। कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि संकरे समुंदरी रास्ते पर जिसका कंट्रोल होगा वही इस युद्ध की दिशा और नतीजा तय [संगीत] करेगा। यूएस इजराइल स्ट्राइक्स के बाद ईरान की प्रतिक्रिया और ब्लॉकेड की स्थिति ने ग्लोबल ऑयल सप्लाई को झटका [संगीत] दिया है। जिससे पूरी दुनिया की इकॉनमी पर असर पड़ रहा है।

यही वजह है कि हरमोस को लेकर वॉर डिसाइडर वाली बहस अब तेज हो गई है। सबसे पहले समझना जरूरी है कि स्ट्रेट ऑफ हरमोस की स्ट्रेटेजिकेंस क्या है? यह लगभग 39 कि.मी. चौड़ा है और यह एक चोक पॉइंट है जो पर्शियन गल्फ को अरेबियन सी से जोड़ता है। दुनिया के कुल ऑयल ट्रेड [संगीत] का तकरीबन 20 से 25% इसी रास्ते से गुजरता है। हर दिन लगभग 20 से 21 मिलियन बैरल ऑयल इसी रूट से ट्रांसपोर्ट होता है। इसके अलावा क़तर से निकलने वाला एलएनजी भी लार्जली इसी रूट पर डिपेंड करता है,

यानी एशिया, यूरोप और कई अन्य रीजंस की एनर्जी सिक्योरिटी सीधे इसी नैरो पैसेज पर टिकी हुई है। भारत जैसे देशों के लिए यह लाइफलाइन है। भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा क्रूड ऑयल गल्फ [संगीत] देशों से आयात करता है। हॉर्मोस में डिस्ट्रक्शन का सीधा असर भारत की इकॉनमी, फ्यूल प्राइसेस और इनफ्लेशन पर पड़ता है। हाल ही के घटनाक्रम में भारत को अल्टरनेटिव सप्लायर्स की ओर जाना पड़ा। लेकिन यह पूरी तरह इस डिपेंडेंसी को खत्म नहीं कर पाया। तो अब बात करते हैं इकोनॉमिक इंपैक्ट की। जब हॉर्मोंस में टेंशन बढ़ती है

या ब्लॉकेज की आशंका बनती है, ग्लोबल ऑयल प्राइसेस तेजी से बढ़ जाते हैं। हालिया हालात में ब्रैंड क्रूड $120 प्रति बैरल के पार चला गया। जबकि एशिया में एलएजी प्राइसेस में 100%  से ज्यादा उछाल देखा गया। अगर यह ब्लॉकेड लंबे समय तक जारी रहता है तो ग्लोबल रिसेशन का खतरा बढ़ सकता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसी स्थिति में ग्लोबल जीडीपी 1.5% से [संगीत] 3% तक गिर सकता है।

और तो और इनफ्लेशन 1970 जैसे स्तर तक पहुंच सकता है। एक्सपर्ट्स क्यों कह रहे हैं कि जो हॉर्मोस को कंट्रोल करेगा वही जीतेगा। [संगीत] इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है लेवरेज। इन्वेस्टर रे डालियो का कहना है कि हॉर्मोस की लड़ाई ही [संगीत] फाइनल निर्णायक बैटल साबित हो सकती है। अगर ईरान इस पर कंट्रोल बनाए रखता [संगीत] है तो यूएस और उसके एलआई की क्रेडिबिलिटी को बड़ा झटका लग सकता है।

वहीं जॉन्स हॉपकिंस के एनालिस्ट [संगीत] मानते हैं कि हरमोस ईरान का सबसे बड़ा स्ट्रेटेजिक वेपन है। न्यूक्लियर प्रोग्राम से भी ज्यादा यह एक पावरफुल डेटरेंट है। मिलिट्री टर्म्स में देखें तो हरमोस एक एसिमिट्रिक बैटल फील्ड [संगीत] है। ईरान की ज्योग्राफिकल पोजीशन उसे एडवांटेज देती है क्योंकि वो इस ट्रेड के दोनों किनारों के करीब मौजूद है। वो नेवल माइंस बिछा सकता है। फास्ट अटैक बोट्स डिप्लॉय कर सकता है।

और मिसाइल स्ट्र्राइप के जरिए शिपिंग को डिस्ट्रप्ट कर सकता है। इसके मुकाबले यूएस और उसके एलआई को इस रूट को सिक्योर करने के लिए मैसिव नेवल डिप्लॉयमेंट और हाई कॉस्ट ऑपरेशंस की जरूरत पड़ती है। सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर यूएस थर्मोस को फोर्सफुली ओपन करने की कोशिश करता है तो कॉन्फ्लिक्ट और भी ज्यादा बढ़ सकता है। ईरान ड्रोंस, मिसाइल्स और स्वाम टैक्टिक्स का इस्तेमाल कर सकता है

जिससे सिचुएशन और भी डेंजरस हो सकती है। यही कारण है कि कई कंट्रीज डायरेक्ट कॉन्फेशन से बचती हैं। लेकिन इस बीच ट्रंप ने तो सीधी-सीधी चुनौती ही दे दी है। इसलिए आज भी तेल के दाम बढ़े और इंटरनेशनल मार्केट पर असर दिखा। जियोपॉलिटिकली भी हॉर्मोस का कंट्रोल बहुत ही बड़ा गेम चेंजर है। गल्फ कंट्रीज जैसे कि सऊदी अरेबिया, यूएई, इराक और कुवैत अपनी ऑयल इंपोर्ट्स के लिए इसी रूट पर डिपेंड करते हैं।

अगर यह रूट बंद होता है तो उनकी इकॉनमीज़ पर भारी असर पड़ेगा। वहीं चीन और रूस जैसे देश इस सिचुएशन का इनडायरेक्ट फायदा उठा रहे हैं। जिससे ग्लोबल पावर बैलेंस बदल सकता है। भारत के लिए भी यह सिर्फ एनर्जी क्राइसिस नहीं बल्कि स्ट्रेटेजिक चैलेंज है। अगर सप्लाई लंबे समय तक प्रभावित होती है तो फर्टिलाइजर प्रोडक्शन, ट्रांसपोर्टेशन और ओवरऑल इकोनॉमिक ग्रोथ पर असर पड़ेगा। इससे डोमेस्टिक इनफ्लेशन और बढ़ सकती है।

यानी कि यह तो साफ है कि स्ट्रेट ऑफ हर्मोस सिर्फ एक समुंदरी रास्ता नहीं बल्कि अब ग्लोबल पावर इक्वेशन का केंद्र बन चुका है। यह इकोनॉमिक चोक पॉइंट है। मिलिट्री फ्लैश पॉइंट है और जियोपॉलिटिकल लेवरेज का सबसे बड़ा हथियार [संगीत] है। इसीलिए एक्सपर्ट्स बार-बार यह कह रहे हैं कि जो इस ट्रेड को कंट्रोल करेगा वही ना सिर्फ इस युद्ध का परिणाम तय करेगा बल्कि आने वाले समय में ग्लोबल एनर्जी और पावर स्ट्रक्चर को शेप भी देगा.

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