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60 साल पुरानी सूखी नदियों में पानी लाकर, भारत के राजेंद्र सिंह ने उड़ा दिए वैज्ञानिकों के होश

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जरा सोचिए आप सुबह सोकर उठते हैं और नल चालू करते हैं। लेकिन उसमें से पानी की एक बूंद भी नहीं टपकती। आप बाहर जाकर कुएं में झांकते हैं पर वहां सिर्फ अंतहीन अंधेरा और सूखी मिट्टी दिखाई देती है। आप अगले दिन इंतजार करते हैं। फिर अगले हफ्ते और फिर महीनों लेकिन पानी वापस नहीं आता। धीरे-धीरे आपके आसपास के पेड़ सूखने लगते हैं। पालतू जानवर प्यास से तड़पने लगते हैं और आपके अपने लोग पानी की तलाश में घर छोड़कर जाने को मजबूर हो जाते हैं। यह कोई डरावनी फिल्म की कहानी नहीं है बल्कि आज से करीब 40 साल पहले राजस्थान के अलवर जिले के सैकड़ों गांवों की खौफनाक हकीकत थी। जमीन इतनी बंजर हो चुकी थी कि उसे डार्क जोन यानी मौत का इलाका घोषित कर दिया गया था। लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ जिसने विज्ञान के बड़े-बड़े दावों को पीछे छोड़ दिया। कैसे एक सूख चुकी नदी दोबारा बहने लगी? कैसे उजाड़ हो चुके गांवों में रौनक वापस आ गई और क्या था वह पारंपरिक रहस्य जिसे आधुनिक इंजीनियर भी नहीं समझ पाए। इस वीडियो को आखिर तक जरूर देखिएगा क्योंकि आज हम पानी की जंग और उस पर मिली एक ऐतिहासिक जीत की ऐसी कहानी जानेंगे जो आपको अंदर तक झोर देगी। लेकिन आगे बढ़ने से पहले अगर आप हमारे चैनल पर पहली बार आए हैं तो प्लीज इसे सब्सक्राइब जरूर कर लीजिएगा और अगर वीडियो पसंद आए तो लाइक करना मत भूलिएगा।

एक अजनबी का आगमन और वो कड़वा सच। यह कहानी शुरू होती है साल 1985 में। राजस्थान की तपती धूप और सूखी धूल के बीच चार पांच नौजवान बस से अलवर के एक छोटे से गांव भीखामपुरा में उतरते हैं। इन नौजवानों के पास कुछ दवाइयां थी। समाज सेवा का जज्बा था और आंखों में बदलाव के सपने थे। इन्हीं में से एक थे राजेंद्र सिंह जो पेशे से आयुर्वेद के डॉक्टर थे। वे गांव के लोगों का इलाज करना चाहते थे और बच्चों के लिए स्कूल खोलना चाहते थे। लेकिन जब वे गांव पहुंचे तो वहां का नजारा देखकर दंग रह गए। गांव में सिर्फ बूढ़े और बच्चे बचे थे क्योंकि सभी नौजवान काम की तलाश में शहर भाग चुके थे। तभी गांव के एक समझदार बुजुर्ग मंगूलाल पटेल ने राजेंद्र सिंह के कंधे पर हाथ रखा और एक ऐसी बात कही जिसने उनकी पूरी जिंदगी का मकसद ही बदल दिया। मंगूलाल ने कहा, बेटा हमें तुम्हारी दवाइयों या किताबों की जरूरत बाद में पड़ेगी। पहले हमें पानी दो। इस सूखी जमीन पर बिना पानी के ना तो कोई बीमारी ठीक होगी और ना ही कोई बच्चा स्कूल जा पाएगा। अगर पानी नहीं ला सकते तो यहां से चले जाओ। यह बात राजेंद्र सिंह के दिल में चुभ गई। उन्हें समझ आ गया कि असली समस्या बीमारी नहीं बल्कि प्यास थी। जब नदियां केवल सरकारी नक्शों पर रह गई। अलवर जिले की हालत उस समय इतनी खराब थी कि सरकारी अधिकारियों ने भी वहां से उम्मीदें छोड़ दी थी। पहाड़ों पर मौजूद जंगलों को बेरहमी से काटा जा चुका था। जिससे बारिश का पानी पहाड़ों पर रुकने के बजाय मिट्टी को बहाते हुए बह जाता था।

भूजल का स्तर इतना नीचे चला गया था कि कुएं खोदना बेकार साबित हो रहा था। इस इलाके की मुख्य नदी अरवरी नदी। पिछले 60 सालों से पूरी तरह सूख चुकी थी। वह नदी सिर्फ सरकारी नक्शों और बुजुर्गों की यादों में जिंदा थी। लोग मान चुके थे कि अब उनकी किस्मत में सिर्फ पलायन और लाचारी ही लिखी है। लेकिन राजेंद्र सिंह हार मानने को तैयार नहीं थे। उन्होंने तय किया कि वे पारंपरिक तरीकों से इस समस्या का हल निकालेंगे। भले ही इसके लिए उन्हें कितनी भी मेहनत क्यों ना करनी पड़े। जहड पानी रोकने का वह जादुई तरीका जो किताबों में नहीं था। राजेंद्र सिंह ने जब पानी बचाने के तरीकों पर रिसर्च शुरू की तो उन्हें राजस्थान की पुरानी और पारंपरिक जल संरक्षण प्रणाली के बारे में पता चला जिसे जौहर कहा जाता है। जौहर कोई बहुत बड़ी या आधुनिक कंक्रीट की संरचना नहीं है। यह मिट्टी और पत्थरों से बना एक छोटा अर्धचंद्राकार बांध होता है। इसे ढलान वाली जगहों पर इस तरह बनाया जाता है कि बारिश का बहता हुआ पानी इसमें आकर रुक जाए। जौहर का असली काम पानी को जमा करके रखना नहीं है बल्कि बहते हुए पानी की रफ्तार को धीमा करना है। जब पानी एक जगह ठहरता है तो वह धीरे-धीरे रिसकर जमीन के अंदर चला जाता है। इससे जमीन की प्यास बुझती है और आसपास के कुओं का जलस्तर अपने आप बढ़ने लगता है। यह तकनीक पूरी तरह से प्रकृति के नियमों पर काम करती है। बिना किसी बिजली, बिना किसी मोटर और बिना किसी कंक्रीट के। अपनों का अविश्वास और कानून से अनोखी जंग। जब राजेंद्र सिंह ने ग्रामीणों को जौहर बनाने का सुझाव दिया तो

शुरुआत में लोगों ने उनका मजाक उड़ाया। लोग कहने लगे जब सरकार की बड़ी-बड़ी मशीनें यहां पानी नहीं ला सकी तो मिट्टी का यह छोटा सा ढांचा क्या करेगा? लेकिन राजेंद्र सिंह ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने खुद फावड़ा उठाया और तसल्ले में मिट्टी भरकर जौहर बनाने का काम शुरू कर दिया। उनकी लगन देखकर धीरे-धीरे गांव के अन्य लोग भी उनके साथ जुड़ने लगे। पुरुष, महिलाएं और यहां तक कि बच्चे भी इस काम में श्रमदान करने के लिए आगे आए। लेकिन असली मुश्किल तब आई जब सरकारी सिंचाई विभाग ने उन्हें कानूनी नोटिस भेज दिया। सरकार का कहना था कि पानी पर केवल सरकार का अधिकार है और ग्रामीण इस तरह अपनी मर्जी से पानी रोकने के लिए जौहर नहीं बना सकते। सरकार ने इन ढांचों को अवैध घोषित कर दिया। लेकिन ग्रामीणों ने साफ कह दिया कि जो पानी हमारी प्यास बुझा रहा है, उस पर पहला हक हमारा है। यह कानून और जनहित के बीच एक अनोखा संघर्ष था। जिसमें आखिरकार जीत जनता की ही हुई। जब 60 साल पुरानी सूखी नदी में फिर से पानी बहने लगा। साल दर साल मेहनत रंग लाई। भीखामपुरा और उसके आसपास के गांवों में एक के बाद एक सैकड़ों जौहर बनकर तैयार हो गए। फिर आया मानसून। जब आसमान से बारिश की बूंदे गिरी तो जहड़ पानी से भरने लगे। वह पानी मिट्टी में समाने लगा और चमत्कार की शुरुआत हुई। जिन कुओं में सालों से धूल उड़ रही थी, उनमें अचानक पानी का स्तर ऊपर आने लगा। लेकिन सबसे बड़ा चमत्कार होना अभी बाकी था। धीरे-धीरे जमीन के अंदर का पानी इतना समृद्ध हो गया कि जो अरवरी नदी 60 साल पहले पूरी तरह सूख चुकी थी, उसमें साल 1990 में फिर से पानी की पतली धारा बहने लगी। साल 1995 आते-आते अरवरी नदी 12मासी नदी बन गई।

यानी वह साल के 12 महीने बहने लगी। इसके बाद रूपरेल, सरसा, भगानी और जहाज वाली जैसी चार और सूखी नदियां दोबारा जीवित हो उठी। वैज्ञानिक और पर्यावरण विशेषज्ञ हैरान थे कि बिना किसी बड़ी सरकारी परियोजना के केवल मिट्टी और पत्थरों की मदद से पांच नदियों को कैसे जिंदा किया जा सकता है। उजड़े हुए आशियानों की वापसी और नया सवेरा नदियों के दोबारा बहने और कुओं के रिचार्ज होने से अलवर के गांवों की पूरी तस्वीर बदल गई। जो खेत सालों से बंजर पड़े थे वहां अब गेहूं, सरसों और चने की हरी-भरी फसलें लहने लगी। जो लोग काम की तलाश में शहरों की गंदी बस्तियों में रहने को मजबूर थे, वे अपने गांवों में वापस लौट आए। महिलाओं को अब पानी के लिए मीलों पैदल नहीं चलना पड़ता था। जिससे उनका समय बचने लगा और वे अन्य रचनात्मक कार्यों में हाथ बंटाने लगी। बच्चों को स्कूल जाने का पूरा समय मिलने लगा क्योंकि अब उन्हें पानी लाने के काम में नहीं जुटना पड़ता था। जानवरों के लिए चारा और पानी आसानी से उपलब्ध होने लगा जिससे दूध का उत्पादन बढ़ा और ग्रामीणों की आमदनी में भारी सुधार हुआ। जो गांव कभी भुखमरी और गरीबी के आंसू रो रहे थे वे अब आत्मनिर्भर बन चुके थे। अरवरी संसद पानी का अपना लोकतंत्र जब नदियों में पानी वापस आ गया तो एक नई चुनौती सामने खड़ी हुई। अब पानी के सही उपयोग और उसके बंटवारे को लेकर आपस में विवाद होने का खतरा था। इस समस्या से निपटने के लिए राजेंद्र सिंह और ग्रामीणों ने एक बहुत ही अनोखा और लोकतांत्रिक तरीका निकाला। उन्होंने साल 1999 में अरवरी संसद का गठन किया। यह 72 गांवों की एक साझा पंचायत थी जिसमें हर गांव के प्रतिनिधि शामिल थे।

इस संसद का काम पानी के उपयोग के लिए कड़े नियम बनाना था। उदाहरण के लिए इस संसद ने फैसला किया कि कोई भी व्यक्ति नदी से पानी खींचने के लिए भारी मोटरों का इस्तेमाल नहीं करेगा। पानी की अधिक खपत करने वाली फसलों को उगाने पर रोक लगा दी गई। पानी के किसी भी विवाद को कोर्ट कचहरी ले जाने के बजाय इसी संसद में आपसी बातचीत से सुलझाया जाने लगा। यह दुनिया के लिए एक मिसाल थी कि कैसे समाज खुद अपने प्राकृतिक संसाधनों का सही ढंग से प्रबंधन कर सकता है। क्या हम आज भी बहुत देर होने से बच सकते हैं? राजेंद्र सिंह जिन्हें आज पूरी दुनिया आदर्श से वाटरमैन ऑफ इंडिया कहती है और उनके साथियों ने यह साबित कर दिया कि असली विकास प्रकृति को नष्ट करके नहीं बल्कि उसके साथ तालमेल बिठाकर ही हासिल किया जा सकता है। उन्हें पर्यावरण के क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार माने जाने वाले स्टॉकहोम वाटर प्राइज से भी सम्मानित किया गया। लेकिन उनका सबसे बड़ा पुरस्कार वह बहती हुई नदियां और मुस्कुराते हुए ग्रामीण हैं। आज जब हमारे देश के कई बड़े शहर पानी की भारी किल्लत से जूझ रहे हैं तब राजस्थान के इन गांवों की कहानी हमें एक बहुत जरूरी सबक देती है। समाधान हमेशा महंगी मशीनों या विशाल बांधों में नहीं होता बल्कि हमारी पारंपरिक सूझबूझ, हमारी मिट्टी और हमारे सामूहिक प्रयासों में छिपा होता है। अगर हम आज भी नहीं संभले तो आने वाली पीढ़ी को शायद पानी की हर बूंद के लिए तरसना पड़ेगा। आपको क्या लगता है? क्या हमारे शहरों में भी जल संरक्षण के ऐसे पारंपरिक तरीकों को अपनाना चाहिए? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें। अगर आपको यह वीडियो जानकारी पूर्ण और प्रेरणादायक लगी हो तो इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ जरूर शेयर करें ताकि पानी बचाने की यह मुहिम हर घर तक पहुंच सके। चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूलें। धन्यवाद।

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