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क्या इसरो में शुरू हुआ ब्रेन ड्रेन? 100+ वैज्ञानिकों ने क्यों दिया इस्तीफा?

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साल 2023 भला कौन भूल सकता है जब भारत चांद के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचा था। जब दुनिया ने देखा कि किसी हॉलीवुड फिल्म के बजट से भी कम बजट में भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान की नई इबारत लिख दी थी। कौन भूल सकता है वो तारीख जब आदित्य एल1 ने सूरज के रहस्यों को समझने की यात्रा शुरू की। और जब भारत गगनयान के जरिए इंसान को अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी कर रहा है तब पूरी दुनिया ने एक नाम को सलाम किया और वो नाम है इसरो यानी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान वो संस्था जिसने भारत को अंतरिक्ष की महाशक्ति बनने का सपना दिया। जिसने अंतरिक्ष में कामयाबी की कई इबारतें दर्ज कर दुनिया को चौंकाया। लेकिन अब इसी इसरो से एक ऐसी खबर आई है जिसने करोड़ों भारतीयों को मायूस कर दिया है। सवाल भी खड़े किए हैं। खबर है कि पिछले कुछ महीनों में 100 से ज्यादा वैज्ञानिकों ने इसरो छोड़ दिया है। खबरों के मुताबिक बेंगलुरु में यूआर राव सेटेलाइट सेंटर से लगभग 80 वैज्ञानिकों ने नौकरी छोड़ी है। जबकि केरल के तिरुवनंतपुरम [संगीत] में विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर से भी लगभग 20 लोगों के जाने की खबर है। जिन वैज्ञानिकों ने नौकरी छोड़ी है वो लॉन्च व्हीकल रॉकेट डेवलपमेंट सेटेलाइट डेवलपमेंट गगनयान प्रोजेक्ट लॉन्च मिशन जैसे कई प्रोजेक्ट्का हिस्सा बताए जा रहे हैं।

अब सवाल यह नहीं कि कुछ लोगों ने नौकरी बदली सवाल यह है कि जिस संस्थान में काम करना लाखों वैज्ञानिकों का सपना होता है वहां से वैज्ञानिक [संगीत] बाहर क्यों जा रहे हैं? मैं खड़ा हूं इस वक्त भारत के स्पेस पोर्ट पे श्री हरिकोटा में। सतीश धवन स्पेस सेंटर पर अगर रॉकेट्स ने इसरो को बनाया तो उसके पीछे कहीं ना कहीं भारत के नौजवान इंजीनियर और वैज्ञानिक हैं। आज खबर निकली कि इसरो के नौजवान वैज्ञानिक इसरो को छोड़ के और काम करने के लिए जा रहे हैं। 100 से अधिक वैज्ञानिकों ने इसरो को छोड़ा है हाल में ऐसा बताया जाता है और उनमें कुछ बड़े नाम भी हैं। अंतरिक्ष की लड़ाई सिर्फ रॉकेट और सेटेलाइट की लड़ाई तो है नहीं। यह धारदार दिमाग और मेधा की लड़ाई भी है। यह उन वैज्ञानिकों की लड़ाई होती है जो सालों तक एक मिशन पर काम करते हैं। एक-एक पुर्जे को डिजाइन करते हैं। एक-एक कैलकुलेशन को परखते हैं। एक-एक नाकामी से सीखकर अगली सफलता की दास्तान लिख देते हैं। चंद्रयान की सफलता के पीछे [संगीत] सिर्फ एक लॉन्च नहीं था बल्कि हजारों वैज्ञानिकों की दिन रात की मेहनत थी। लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि जिस संस्थान को हमारे वैज्ञानिकों ने अपनी मेधा से इतना बड़ा ब्रांड बनाया वो [संगीत] उसी संस्थान को छोड़कर क्यों जा रहे हैं? क्या भारत अपने इन्हीं वैज्ञानिकों को रोक पाने में [संगीत] खुद को असहाय महसूस कर रहा है? रिजाइन होते थे भैया। वो एक साथ ज्यादा हो रहा है क्योंकि प्राइवेट जो है फील्ड बढ़ रहा है। लोगों का एक्सपेक्टेशन ज्यादा हो और उस तरह से जो है उनको रिवॉर्ड यहां पे ना मिल रहा हो। इस ब्रेन ड्रेन ने कई चिंताएं बढ़ा दी हैं।

क्योंकि चाहे चंद्रयान 3 हो, आदित्य एल1 हो, मंगलयान हो, गगनयान हो, भारत का स्पेस प्रोग्राम लगातार आगे बढ़ रहा है। लेकिन इन बड़ी सफलताओं के पीछे एक बड़ा सवाल छिपा है कि क्या हमारे पास भविष्य के लिए, मिशनंस के लिए, पर्याप्त वैज्ञानिक और विशेषज्ञ बने रहेंगे। क्योंकि रॉकेट मशीनों से नहीं दिमाग से उड़ते हैं और इसरो से वैज्ञानिकों का यह पलायन ऐसे समय में हो रहा है जबकि इसरो कई महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है। जैसे गगनयान, चंद्रयान फोर, वीनस ऑर्बिटर, मिशन, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन और कई सेटेलाइट्स की लॉन्चिंग होनी है। [संगीत] हालांकि जानकार नहीं मानते कि इसरो से वैज्ञानिकों के बड़ी संख्या में पलायन से इन मेगा प्रोजेक्ट्स पर कोई असर पड़ेगा। थोड़े समय के लिए जो है उसको रुकने की बात हो सकती है। लेकिन रुकना नहीं बोलूंगा। थोड़ा धीरा पड़ेगा। धीरा इसलिए पड़ेगा कि वह जो 20 साल से या 25 साल से काम कर रहा है यदि वह छोड़ के जा रहा है तो देखो हमारे घर में से भी कोई विदाई ले रहा है कहीं जा रहा है तो हमें उसका थोड़ा सा जो है दुख तो रहता है उस समय पे खालीपन महसूस होता है तो यहां पे भी होगा लेकिन लोग जो है कैपेबल है उसको ओवरकम कर लेंगे सरकार ने वैज्ञानिकों के इस्तीफों और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को लेकर नियम सख्त करने का फैसला कर लिया है। मीडिया रिपोर्ट्स बता रही हैं कि केंद्र सरकार ने इसरो सेंटर्स को निर्देश दिया है कि वह गगनयान और दूसरे अहम मिशन से जुड़े ग्रुप ए के साइंटिफिक और टेक्निकल कर्मचारियों के इस्तीफे या वंटरी रिटायरमेंट की अर्जी स्वीकार ना करें। लेकिन असली सवाल नियमों से आगे का है। क्योंकि किसी वैज्ञानिक को रोका तो जा सकता है लेकिन क्या उसे संस्थान से जोड़ा भी जा सकता है? क्या सिर्फ नियमों से टैलेंट रुकेगा? या फिर जरूरत यह समझने की है कि आखिर वो कारण क्या है जिसकी वजह से वैज्ञानिक बाहर जाने का फैसला ले रहे हैं। अगर कोई इंजीनियर छोड़ के जा रहा है तो कहीं ना कहीं उसकी अपॉर्चुनिटी ज्यादा मिल रही है। इस वक्त भारत में ढेर सारे स्टार्टअप हैं। 400 से ज्यादा हैं। बड़े-बड़े स्टार्टअप हैं। स्काई रूट एरोस्पेस है जो कि यूनिकॉर्न बना। 1.1 बिलियन डॉलर का वैल्यू्यूएशन है। हजार लोग उसमें काम करते हैं। तो टैलेंट कहीं से तो आया वहां पे। लेकिन हां, किसी को रोक के बांध के इनोवेटिव रिसर्च नहीं कराई जा सकती। यह बड़ा साफ है। भारत में सरकारी संस्थानों की एक बड़ी चुनौती रही है और वो है बेहतरीन टैलेंट को बनाए रखना, बचाए रखना। एक तरफ प्राइवेट स्पेस कंपनीज तेजी से बढ़ रही हैं। दूसरी तरफ दुनिया भर में स्पेस सेक्टर में ऑप्शंस बढ़ रहे हैं, अवसर बढ़ रहे हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ वेतन का नहीं है। सवाल है काम का माहौल कैसा है?

फैसले कितनी तेजी से होते हैं? नई सोच के लिए, एक्सपेरिमेंट्स के लिए कितनी जगह है? और एक वैज्ञानिक को अपने भविष्य की कितनी उम्मीद दिखाई देती है। कल्पना कीजिए। एक वैज्ञानिक जिसने अपनी पूरी जवानी भारत के स्पेस मिशन को दे दी जिसने अपनी प्रतिभा, चंद्रयान, गगनयान या किसी बड़े प्रोजेक्ट में लगाई। अगर वही वैज्ञानिक किसी मोड़ पर इसरो को छोड़ने का फैसला करता है तो यह सिर्फ एक कर्मचारी या एक साइंटिस्ट का जाना नहीं है। यह एक अनुभव का जाना है। यह एक सोच का चले जाना है। लंबे समय की एक्सपर्टीज का चले जाना है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बड़े सपनों को सिर्फ मिशन से नहीं बल्कि मिशन बनाने वाले लोगों से ताकत मिलती है। जिस वक्त इसरो के वैज्ञानिकों के इस्तीफे की खबर सुर्खियां बनी, उसी दौरान भारत का प्राइवेट सेक्टर नई उड़ान [संगीत] तैयार कर रहा है। स्काई रूट एयररोस्पेस नाम की कंपनी पहला रॉकेट अंतरिक्ष में भेजने वाली है। 18 जुलाई को विक्रम [संगीत] नाम के रॉकेट को भेजने की पहली कोशिश होगी। इस रॉकेट का नाम स्पेस प्रोग्राम के जनक डॉक्टर [संगीत] विक्रम साराभाई के नाम पर रखा गया है।

कंपनी का मोटो है छोटा [संगीत] ही सुंदर और असरदार है। कचहरी में ग्राउंड जीरो से एनडीटीवी के साइंस सेंटर पल्लव बागला की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट। यह जो रॉकेट आप पीछे देख रहे हैं इसका नाम है विक्रम और यह वो रॉकेट था जिसने भारत को पहला प्राइवेट सेक्टर का लॉन्च दिया 2022 में। मेरा नाम है पल्लव बागला और मैं एनडीt का साइंस एडिटर हूं और मैं खड़ा हूं स्काई रूट एरोस्पेस के प्रीमाइसेस में जो कि एक स्टार्टअप कंपनी है। अगर यह छोटा रॉकेट था आने वाले टाइम में एक ऑर्बिटल लॉन्च की तैयारी में है यही स्काई रूट एरोस्पेस कंपनी जो आपने देखा था 2022 में वह तो ट्रेलर था। पिक्चर अभी बाकी है और उस पिक्चर में बड़े रॉकेट भी हैं और एक भारतीय को अंतरिक्ष में भी भेजने की तैयारी है। तो यहां स्काई रूट एरोस्पेस में एक्साइटमेंट है पहले ऑर्बिटल ल्च का और उसके बाद लंबी हनुमान छलांग लगाने का। भारत के नौजवान बहुत ही दूर की सोच रहे हैं और बड़े कदम उठा रहे हैं। कैमरा पर्सन नागराजन के साथ स्काई रूट एरोस्पेस के हेड क्वार्टर से हैदराबाद से पलव बागला एनडीt इंडिया के यहां

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