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जब फरवरी 1986 क्यों सितारें बंबई की सड़कों पर उतर आये?

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10 अक्टूबर 1986 बंबई की सड़कों पर फिल्मी सितारों का सैलाब उमड़ पड़ता है। वही सितारे जो अपनी फिल्मों से दर्शकों को मनोरंजित करते थे। आज उनके चेहरे पर गुस्से की लहर थी। सुनील दत्त, राजेश खन्ना, दिलीप कुमार, राज कपूर, दारा सिंह, देवांद, मिथुन चक्रवर्ती, धर्मेंद्र और बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन। यह वो नाम थे जिनकी मौजूदगी में [संगीत] अपने आप में किसी फिल्म से कम नहीं लगता था समय। लेकिन उस दिन कैमरे बंद थे और सड़कों पर हकीकत चल रही थी। ना कोई पीआर स्टंट और ना ही कोई लोकप्रियता की अपेक्षा। बस एक मांग और इन सितारों के साथ खड़ा था 1 लाख लोगों का जन सैलाब जो एक ऐसे आंदोलन की आवाज बन चुका था जो कुछ ही दिनों में मुंबई के माफिया और महाराष्ट्र सरकार को हिला देने वाला था। हेलो नौजवान साथियों आज हम आपको वो बात समझाने आए हैं। अभी हम बेवकूफ हैं कि वो सही हैं। इसका फैसला आपके हाथों में है। मगर ऐसा तो क्या हुआ कि [संगीत] इन बॉलीवुड सुपरस्टार्स को एक साथ सड़क पर उतरना पड़ा। क्यों मिथुन दा को इस आंदोलन की आवाज कहा जाता है?

कैसे उन्होंने लाखों लोगों समेत खुद बालासाहेब ठाकरे को भी सरकार के खिलाफ खड़ा कर दिया था और सरकार ने ऐसा तो क्या किया था कि हजारों करोड़ की यह इंडस्ट्री बंद होने के कगार पर पहुंच चुकी थी। जानने के लिए बने रहिए इस वीडियो के अंत तक क्योंकि आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं बॉलीवुड की सबसे ऐतिहासिक लड़ाई की कहानी। साल था 1986 बॉलीवुड का सबसे सुनहरा दौर जब फिल्मों की लाइनें लगी रहती थी। थिएटरों के बाहर भीड़ उमड़ती थी और सितारों [संगीत] की दीवानगी आसमान छू रही थी। एक फिल्म रिलीज़ होती तो अगले दिन अखबारों में उसकी हेडलाइन [संगीत] होती हाउसफुल ब्लॉकबस्टर रिकॉर्ड तोड़ कलेक्शन। लेकिन पर्दे के पीछे की हकीकत कुछ और [

संगीत] थी। जिस इंडस्ट्री ने लाखों लोगों को रोजगार दिया था, उसी इंडस्ट्री के रगों में धीरे-धीरे सरकारी नीतियों [संगीत] और पाइरेसी का जहर फैलने लगा था। हर हिट फिल्म के साथ करोड़ों रुपए का नुकसान हो रहा था। क्योंकि फिल्म थिएटर में लगने से पहले ही उसकी पाइरेटेड कॉपी [संगीत] ब्लैक मार्केट में बिक जाती थी। लोग गलियों में बैठकर वही फिल्म वीसीआर पर देख रहे होते और प्रोड्यूसर सिर्फ अपने नुकसान की गिनती कर रहे थे। फिल्में चल रही थी लेकिन पैसा गायब था। ऊपर से सरकार की नीतियां उस आग में घी डाल रही थी। फिल्म पर सर्विस टैक्स लागू कर दिया गया वो सीधा 177% तक। यानी अगर कोई निर्माता 1 करोड़ की फिल्म लगाता है तो सरकार पहले ही 1 करोड़ 77 लाख तक मांग लेती थी। ऊपर से 4% सेल टैक्स अलग। यह टैक्स सिर्फ एक्टर्स या डायरेक्टर्स पर नहीं था बल्कि उन कैमरा उठाने वालों, लाइन टांगने वालों, मेकअप करने वालों और सेट पर मेहनत करने वाले हर मजदूर पर भी बड़ा बोझ बनकर गिरा जो अपनी दो वक्त [संगीत] की रोजी रोटी के लिए फिल्म सिटी पर निर्भर थे। देखते ही देखते फिल्में बनाना एक घाटे का सौदा बन गया। इंडस्ट्री के गलियारों में बस एक ही सवाल गूंजने लगा। क्या सरकार हमें खत्म करना चाहती हैं? प्रोड्यूसर्स के पास कोई रास्ता [संगीत] नहीं बचा था। उन्होंने सरकार से मिलना चाहा, फाइलें भेजी, आंकड़े [संगीत] दिखाएं। लेकिन जवाब मिला बस हम देख रहे हैं। वो देखना इतना लंबा खच गया

कि इंडस्ट्री [संगीत] के सब्र के बांध टूट गए। और फिर जूहू के एक होटल में बुलाई गई एक मीटिंग ने बॉलीवुड की तकदीर बदल दी। उस मीटिंग में ना कोई [संगीत] कैमरा था ना कोई स्क्रिप्ट। वहां सिर्फ सिनेमा को बचाने की लड़ाई की तैयारी थी। राज कपूर, यश चोपड़ा, रमेश, सिप्पी, सुभाष गई, वह सब जो अब तक सिनेमा को सपनों की दुनिया में ले गए थे, अब वही सिनेमा को हकीकत में बचाने की रणनीति बना रहे थे। और वहां एक बात तय हुई। अब वक्त है पर्दे से उतर कर सड़कों पर आने का। अब वक्त है अपनी आवाज उठाने का। [संगीत] 27 फरवरी 1986 की सुबह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बड़े सितारों और निर्माताओं ने शुरू किया अपना पहला प्रोटेस्ट। कई सितारे बंबई की सड़कों पर उतर आए। फिल्म का प्रोडक्शन आधे में ही बंद कर दिया गया और 1350 सिनेमाघर शटडाउन हो गए। लेकिन सत्ता में बैठी कांग्रेस सरकार ने सोचा कि ये सितारे हैं कुछ फोटो निकलवा कर चले जाएंगे। [संगीत] सरकार की ये विचारधारा धीरे-धीरे बॉलीवुड के लिए मौत का फरमान बन गई थी। हर फिल्म मेकिंग यूनिट पर घाटे का ताला लटक गया था। कैमरे धूल खा रहे थे। साउंड रिकॉर्ड्स खामोश थे और मेकअप [संगीत] रूम्स में सिर्फ सन्नाटा था। इंडस्ट्री में सवाल उठने लगा कि क्या हमारे चेहरे सिर्फ लोगों को हंसाने के लिए हैं? सरकार को हमारी मेहनत नहीं दिखती। बड़े-बड़े नाम मैदान में थे। राज कपूर, दिलीप कुमार, धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन, सुनील दत्त सब सड़कों पर उतर आए। लेकिन सत्ता के कान में जू तक नहीं रेंगी। मुख्यमंत्री और कैबिनेट को लगा कि यह बस कुछ दिनों की हड़ताल है। सभी थक कर लौट जाएंगे।

मीडिया को यह मजाक लग रहा था। वो हेडलाइंस दे रहे थे बॉलीवुड ऑन द स्ट्रीट्स। मगर इस बार समस्या वाकई गहरी थी। पहले कुछ दिन फिर महीने बीत गए। इंडस्ट्री का काम रुका ही [संगीत] पड़ा रहा। लेकिन सरकार अब भी मौन थी। और जब हर तरह से दरवाजे बंद होने लगे तभी कहानी में वो मोड़ आया जिसने इस आंदोलन को ऐतिहासिक बना दिया। सुबह का वक्त था। [संगीत] अंधेरी वेस्ट के एक बंगले के बाहर एक कार रुकी। अंदर से निकला एक लंबा साधारण कपड़ों में लिपटा शख्स जिसने अपनी जिंदगी की शुरुआत जमीन से की थी और अब आसमान छू रहा था। वो थे [संगीत] हमारे मिथुन दा चक्रवर्ती जो बाकी सितारों की तरह टीवी इंटरव्यू देने नहीं गए बल्कि इस आंदोलन का रुख बदलने सीधा पहुंच गए मातोश्री यानी बाला साहेब [संगीत] ठाकरे के बंगले पर। क्योंकि वह जानते थे कि बंबई में सरकार चाहे किसी की भी क्यों ना हो चलती सिर्फ बाला साहेब की है। मिथुन दा ने बिना किसी झिझक के उनसे कहा बाला साहब यह सिर्फ फिल्म वालों की लड़ाई नहीं यह मुंबई की आत्मा [संगीत] की लड़ाई है। अगर फिल्में रुक गई तो इस शहर की धड़कन रुक जाएगी। आगे वह बोले कि फिल्मों ने ही हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, पारसी, जैन, बौद्ध सब धर्मों के लोगों को जोड़ [संगीत] रखा है। यह इंडस्ट्री लाखों लोगों को दो वक्त की रोटी देती है। सरकार को करोड़ों का फायदा करवाती है। लेकिन इन हालातों में एक भी फिल्म बनाना मुमकिन ही नहीं है। बाला साहब ने उनकी पूरी बात सुनी और फिर मिथुन दा को आशीर्वाद देते हुए बोले, “इस हड़ताल में मैं तुम्हारे साथ हूं। जाओ। अब अगर कोई धरातल पर तकलीफ हो तो बाला साहब तुम्हारे पीछे खड़ा है। अब सबसे ऊपर तो सपोर्ट मिल चुका था। लेकिन आगे क्या? तब मिथुन दा के दिमाग में घंटी बजी और वह सीधा [संगीत] पहुंच गए फिल्म इंडस्ट्री के यूनियन टेक्नशियन लाइटमैन स्पॉटबॉय और सेट पर काम करने वाले मजदूरों के पास और भारी आवाज में बोले दोस्तों यह सिर्फ स्टार ही नहीं तुम्हारी भी लड़ाई है। अगर सिनेमा रुका तो फिर अपने घर कैसे चलाओगे? अपने बच्चों को कैसे पढ़ाओगे? क्या उन्हें भूखे सुलाओगे? मिथुन दा की बातों में वो दर्द और गहराई थी जो वो आम लोगों के लिए महसूस करते थे और बस फिर क्या था? फिल्म सिटी के काम करने वाले लाखों लोग इस हड़ताल का हिस्सा बन गए। अब यह सिर्फ एक फिल्म इंडस्ट्री स्ट्राइक नहीं थी। यह एक आंदोलन बन चुका था। मुंबई की सड़कों पर करीब 1 लाख लोग थे। आगे धर्मेंद्र, मिथुन, अमिताभ, दिलीप कुमार, सुनील दत्त और पीछे खड़े थे वे लोग जो सिनेमा के असली रूप देने वाले थे। वो दिन था 10 अक्टूबर 1986 जब सिनेमा ने अपने कैमरे खुद पर घुमा दिए। मरीन ड्राइव से लेकर जूहू तक सड़कों पर सिनेमा बह रहा था और नारे गूंज रहे थे हम फिल्म बनाते हैं सरकार लूट लेती है। जो स्टार कभी मनोरंजन चेहरा था। अब वह समाज के जिम्मेदार नागरिक की तरह अपील कर रहा था। हाथों में कोई बंदूक नहीं थी। सिर्फ एक पोस्टर था जिस पर लिखा था हम कलाकार [संगीत] हैं। आतंकवादी नहीं। बस इंसाफ चाहिए। यह नजारा कैमरे के लेंस को भी नम कर गया। जो भी कामयाबी होगी वो किसी एक शख्स की कामयाबी नहीं होगी। वो सारी फिल्म इंडस्ट्री भी कामयाबी होगी। कई सितारों ने मंच पर आकर आवाज उठाई। तुमने मशीनें इंपोर्ट की है।

तुमने टेक्नोलॉजी इंपोर्ट की है। तुमने कंप्यूटराइजेशन एक्सपोर्ट किया है। लेकिन तुम कल्चर हरगिज़ एक्सपोर्ट इंपोर्ट नहीं कर सकते। इस आंदोलन की चर्चा पूरे विश्व भर में होने लगी [संगीत] और मीडिया ने भी इसे गंभीरता से लेते हुए सितारों की आवाज को पूरे देश तक पहुंचा दिया। ये कहने के लिए कि हमसे इंसाफ किया जाए जो हम खुद ही मालिक हैं। हम खुद ही तो इंसाफ देने वाले हैं। इंसाफ करने वाले हम किससे इंसाफ मांग रहे हैं? अपने आप से इंसाफ मांग रहे हैं। अगले कुछ दिनों तक ये आंदोलन चलता रहा और सत्ता के गलियारों में हलचल मच गई। मुख्यमंत्री [संगीत] कार्यालय से फोन गया। बॉलीवुड के प्रतिनिधियों को बुलाइए। बातचीत करते हैं। मीटिंग बुलाई गई। एक तरफ सरकार के मंत्री और सामने बैठे बॉलीवुड के दिग्गज यश चोपड़ा, राज कपूर, सुभाष गई, अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र और सुनील दत्त माहौल भारी था। [संगीत] एक लंबी खामोशी के बीच यश चोपड़ा ने कहा, “अगर सरकार सच में हमें सम्मान देती है तो ऐसे टैक्स क्यों? जो हमारी सांसे रोक रहे हैं। फिर राज कपूर बोले हम हर शुक्रवार देश को खुश करते हैं लेकिन हमारी खुशी सरकार छीन रही है। कैमरे की हवा थम गई है और तभी अमिताभ बच्चन ने अपनी गहरी आवाज में जो लाइनें कही वो इतिहास बन गई। बिग बी बोले अगर सरकार ने फिल्म इंडस्ट्री की आवाज नहीं सुनी तो हम फिल्में बनाना बंद कर देंगे। पूरा कमरा सन रह गया। यह कोई डायलॉग नहीं था। यह सदी के सबसे बड़े सुपरस्टार की चेतावनी थी। अगले दिन यह लाइन अखबारों की हेडलाइन बन गई। अमिताभ्स वार्निंग शेक्स स्टेट्स और सच में राज्य हिल गया। 3 दिन के भीतर मुख्यमंत्री ने दोबारा मीटिंग बुलाई। इस बार माहौल अलग था। सरकार सुनने को तैयार थी। सामने मुख्यमंत्री बैठे थे और सामने वह चेहरे जिन पर जनता का भरोसा था। मीटिंग लंबी चली। फाइलें खोली गई। आंकड़े रखे गए। लिखा था हर साल करीब 200 करोड़ पाइरेसी में जा रहे हैं और सरकार सिर्फ टैक्स बढ़ा रही है। सरकार को पहली बार एहसास हुआ कि यह सिर्फ पैसे की लड़ाई नहीं यह इंडस्ट्री के सम्मान की अस्तित्व की और देश के सांस्कृतिक [संगीत] पहचान की लड़ाई है और फिर मुख्यमंत्री ने वो लाइन कही जिसने सबका गुस्सा ठंडा कर दिया। हम इस टैक्स [संगीत] पर पुनर्विचार करेंगे और पाइरेसी पर सख्त कानून बनाएंगे। बस इतना कहना था पूरा कमरा तालियों से गूंज [संगीत] उठा। इंडस्ट्री की ऐतिहासिक हड़ताल खत्म हुई और बॉलीवुड ने अपनी पहली असली जीत दर्ज की।

सरकार ने टैक्स फिलहाल के लिए टाल दिया और पायरेसी पर कार्यवाही के आदेश दे दिए गए। जैसे ही यह खबर बाहर आई तो फिल्म सिटी फिर लाइटों से जगमगा उठा। [संगीत] क्लैप बोर्ड की आवाजें गूंजी और कैमरे घूमने लगे। मुंबई फिर मुस्कुराने लगी और सिनेमा ने साबित कर दिया कि वह सिर्फ मनोरंजन नहीं भारत की आत्मा है। लेकिन इस पूरी कहानी में एक बात हमेशा याद रखी गई राज कपूर ने आंदोलन की रणनीति बनाई। अमिताभ ने सरकार को झुकाया। मगर इस क्रांति को जन आंदोलन में बदलने वाला सिर्फ एक नाम था मिथुन चक्रवर्ती। जिन्होंने बाला साहब ठाकरे की शिवसेना को अपने साथ खड़ा किया और इंडस्ट्री से जुड़े लोगों को सड़कों पर ले आए। तो दोस्तों हमारे मिथुन दाह, शहंशाह, अमिताभ बच्चन और बॉलीवुड के बाकि सितारों ने जिस तरह न्याय के खिलाफ आवाज उठाकर फिल्म इंडस्ट्री को नया जीवन दान दिया, उसे लेकर आपकी राय क्या है? क्या बॉलीवुड [संगीत] उस वक्त आवाज नहीं उठाता तो आज इंडियन फिल्म इंडस्ट्री खत्म हो चुकी होती और आपके पसंदीदा रेट्रो सुपरस्टार कौन है? कमेंट्स में बताइए। उम्मीद है आपको हमारी ये पेशकश पसंद आई होगी। अगर हां तो वीडियो को लाइक और शेयर करके 1111 लाइक्स जरूर करवा दीजिए। और ऐसे ही अनसुने अनकहे किस्से कहानियों के लिए हमारे चैनल को सब्सक्राइब करके पास वाली घंटी जरूर बजा दीजिए। मिलते हैं अगली वीडियो में। धन्यवाद।

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