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भारत के लिए बड़ी खुशखबरी, सऊदी से भर-भरकर आ रहा तेल!..

Hindi Post

मिडिल ईस्ट में जंग के बीच जहां पूरी दुनिया की नजरें होरमुज स्टेट पर टिकी हुई है, वहीं भारत के लिए एक बड़ी खुशखबरी सामने आई है। जब होरमुज जलडमरू मध्य पर खतरा मंडरा रहा है, तब सऊदी अरब ने भारत तक तेल पहुंचाने के लिए एक नया रास्ता खोल दिया है। क्या है यह नया रूट? क्यों इसे बैकडोर सप्लाई कहा जा रहा है? और क्या इसमें भी खतरे कम नहीं है? चलिए आपको विस्तार से समझाते हैं।

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने दुनिया की सबसे अहम समुद्री लाइफलाइन फोरमज स्टेट को संकट में डाल दिया है। यही वो रास्ता है जहां से दुनिया का करीब 20% कच्चा तेल गुजरता है। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों के चलते इस रास्ते से गुजरना जहाजों के लिए खतरनाक होता जा रहा है। एक तरफ फ्रंट डोर यानी होमज स्टेट और अब खुल गया है

बैक डोर यानी लाल सागर का रास्ता। सऊदी अरब ने अपने यानबू पोर्ट से भारत के लिए तेल भेजना शुरू कर दिया है। यह पोर्ट लाल सागर के किनारे स्थित है। जहां तक तेल पहुंचाने के लिए सऊदी अरब के करीब 1200 कि.मी. लंबी पाइपलाइन का इस्तेमाल किया जाता है। केप्लर की रिपोर्ट्स के मुताबिक चार बड़े टैंकर करीब 60 लाख बैरल तेल लेकर भारत की ओर रवाना हो चुके हैं और महीने के अंत तक 90 लाख से 1 करोड़ बैरल अतिरिक्त तेल आने की उम्मीद जताई जा रही है।

यानी साफ है भारत की एनर्जी सिक्योरिटी को लेकर सऊदी अरब एक्टिव मोड में आ गया है। लेकिन इस राहत के साथ एक शर्त भी जुड़ी हुई है। दरअसल इस बैकडोर रास्ते की सबसे बड़ी चुनौती है इसकी सीमित क्षमता। यानबू तक तेल पहुंचाने वाली पाइपलाइन उतना तेल नहीं ढो सकती जितना होर्मज स्ट्रेट के जरिए आसानी से भेजा जा सकता है। यही वजह है कि सऊदी अरब ने साफ कर दिया है कि इस रास्ते से खरीदारों को केवल एक हिस्सा ही सप्लाई किया जा सकेगा

और मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होती हैं। लाल सागर का रास्ता भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। यह रास्ता बाब अल मंदाब जलडमरू मध्य से होकर गुजरता है। जहां यमन के हूती विद्रोही सक्रिय हैं। पहले भी इजराइल हमास युद्ध के दौरान हूतियों ने इस इलाके में जहाजों को निशाना बनाया था। हमलों के बाद कई जहाजों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ा। अफ्रीका के नीचे से होकर गुजरना पड़ा।

जिससे लागत और समय दोनों बढ़ गए। यानी एक तरफ होरमुस का खतरा तो दूसरी तरफ लाल सागर का रिस्क। दुनिया की ऊर्जा सप्लाई इस समय डबल प्रेशर में है। लेकिन इस बीच भारत के लिए यह कदम बेहद अहम है। क्योंकि भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़े देशों से ही आता है। ऐसे में सऊदी अरब का यह नया रूट भारत के लिए अस्थाई राहत जरूर लेकर आया है। हालांकि यह समाधान नहीं है बल्कि एक इमरजेंसी अरेंजमेंट है।

अगर मिडिल ईस्ट में तनाव और बढ़ता है तो सप्लाई चेन पर दबाव और गहरा सकता है। तो कुल मिलाकर भारत के लिए फिलहाल राहत की खबर है। लेकिन खतरा अभी भी टला नहीं है। मिडिल ईस्ट की जंग अब सिर्फ क्षेत्रीय नहीं है बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा की लड़ाई बन चुकी है। फिलहाल इस मामले पर आपकी क्या राय है? हमें कमेंट बॉक्स में जाकर जरूर बताइएगा।.

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