साथिया मैंने माना कि जीना लगे श्याम मस्त सानी मदहोश किए जा और दिया जा [संगीत] प्यार दीवाना होता है मस्ताना होता है जरा सोचिए एक ऐसी अभिनेत्री जिसने अपने बंगले के पीछे ऐसा बगीचा सजाया कि खुद ही गुनगुनाने लगी लगी बंगले के पीछे तेरी मेरी के नीचे हाय रे पिया अब कल्पना कीजिए उस रूप की जिसके प्रेम में डूबकर शशि कपूर जैसे सदाबहार अभिनेता भी खत लिखने बैठ गए। लिखे जो खत तुझे [संगीत] वो तेरी याद में हजारों रंग मानो उनकी हर चिट्ठी में प्यार के हजारों रंग उतर आए हो। इतना ही नहीं इस हसीना की फिल्में एक के बाद एक सुपरहिट होती चली गई। जा के फिर सो गई सपनों में खो गई। सफलता का ऐसा सिलसिला बना कि दर्शकों ने उन्हें प्यार से हिट गर्ल और हिट मशीन कहना शुरू कर दिया। अच्छा तो हम चलते हैं। [संगीत] फिर कब मिलोगे? जब तुम कहो और सुनिए यह वही चुलबुली अदाकारा थी जो अपने प्रिय से मिलने के लिए मंदिर जाने का बहाना भी बना लेती थी। मैं तुझसे मिलने आई मंदिर जाने के बहाने। यानी मंदिर में भगवान के दर्शन हो या ना हो लेकिन अपने हीरो के दीदार जरूर हो जाते थे। जी हां दोस्तों आज हम बात करने जा रहे हैं 60, 70 और 80 के दशक की सबसे खूबसूरत सबसे लोकप्रिय और सबसे सफल अभिनेत्रियों में शुमार आशा पारे की जिनकी अदाकारी मासूमियत और सुपरहिट फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा की अमर नायिकाओं में शामिल कर दिया। क्यों आ गए उनके यहां लेकिन रुकिए असली सस्पेंस तो अभी बाकी है। सोचिए आशा पारे और दिलीप कुमार की जोड़ी कभी बनी ही नहीं। क्यों? आखिर ऐसा क्या [संगीत] हुआ कि यह दोनों कभी साथ नहीं आए। जहां हर बड़ा एक्टर उनकी खूबसूरती और अदाओं के चक्कर में लाइन लगाकर शादी का फॉर्म भर रहा था। वहीं आशा जी ने सबको बेटर लक नेक्स्ट टाइम बोलकर सीधा दिल दे दिया। एक शादीशुदा दो बच्चों के बाप प्रोड्यूसर नासिर हुसैन को कितना प्यारा वादा है हिम्मत वाली आंखों का किस मस्ती क्या बात कर दी ना और सुनिए इतना ही नहीं कहते हैं
कि आशा जी के डर से धर्मेंद्र ने शराब तक छोड़ दी फिर आई पुरवाई [संगीत] आई है अरे भाई इतना असर तो डॉक्टरों की दवा का भी नहीं होता जितना जितना आशा जी की आंखों का हुआ। अब सोचिए जिस एक्ट्रेस से शादी के लिए बड़े-बड़े स्टार्स और डायरेक्टर्स गिड़गिड़ा रहे थे उसी ने एक शादीशुदा इंसान को अपना दिल दे दिया। लेकिन उसका घर तोड़ा नहीं बल्कि खुद ही जिंदगी भर अकेली कुंवारी [संगीत] रही। ये शाम मस्तानी मदहोश की यही तो है असली कहानी और फिर जिंदगी भर गाती रह गई। क्यों आ गए उनके यहां? तो दोस्तों आज हम जानेंगे आखिर क्यों आशा पारिक ने अपने दौर के सबसे बड़े सुपरस्टार्स को नकार दिया। क्यों उन्होंने शादी नहीं की और आज वह कहां है? कैसी जिंदगी जी रही है। बस आप दिल थाम कर बैठ जाइए और इस वीडियो को लाइक और चैनल को सब्सक्राइब जरूर कीजिए [संगीत] क्योंकि आगे कहानी में है कॉमेडी, सस्पेंस और इमोशन का फुल डोज। तो चलिए शुरू करते हैं। [संगीत] ना कोई उमंग है ना कोई [संगीत] [संगीत] पर्दे में रहने दो पर्दा ना उठाओ [संगीत] पर्दा आपको बता दें आशा पारिक का जन्म 2 अक्टूबर 1942 को गुजरात के एक छोटे से शहर में हुआ था। अब 2 अक्टूबर का जिक्र आते ही दो बातें याद आ जाती है। एक तो महात्मा गांधी का जन्मदिन और दूसरी अरे वही दृश्यम वाला यादगार कांड। आशा जी का जन्म एक हिंदू मुस्लिम मिलन से हुआ था। उनके पिता का नाम था बाचू भाई पारे और उनकी मां जो शादी से पहले सलमा थी विवाह के बाद सुधा पारेख बन गई। बचपन में आशा का सपना डॉक्टर बनने का था लेकिन उनकी मां ने उन्हें समझाया बेटा तुम्हारा जन्म लोगों की धड़कन चेक करने के लिए नहीं हुआ बल्कि लोगों
की धड़कनें बढ़ाने के लिए हुआ है। वह क्या शानदार सोच थी। छोटी उम्र से ही आशा को नृत्य का बहुत शौक था। उनकी मां ने उन्हें बचपन से ही कथक नृत्य की शिक्षा दिलानी शुरू कर दी। धीरे-धीरे आशा इतनी बेहतरीन क्लासिकल डांसर बन गई कि बहुत कम उम्र में ही वे बड़े-बड़े मंचों पर प्रस्तुति देने लगी। इसी तरह एक बार स्टेज पर नृत्य करते हुए आशा पारिक पर मशहूर फिल्म निर्देशक विमल राय की नजर पड़ी। उन्होंने आशा को अपनी फिल्म में बाल कलाकार यानी चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में साइन किया। साल 1952 में आई फिल्म मां से आशा पारिक ने अपने फिल्मी करियर की पहली पारी शुरू की। हालांकि उनकी मां को ना तो यह फिल्म पसंद आई और ना ही अपनी बेटी का काम। लेकिन सच यह था कि अब निर्देशक और निर्माता उनकी प्रतिभा को पहचान चुके थे। जल्द ही आशा को लगातार फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में ऑफर मिलने लगे। आशा पारिक एक के बाद [संगीत] एक, बाप बेटी, आसमान, ज्वाला, अयोध्यापति, चैतन्य महाप्रभु जैसी कई फिल्मों में नजर आई। देखते-देखते वह आठ से भी ज्यादा फिल्मों में काम कर चुकी थी। लेकिन आशा की मां नहीं चाहती थी कि इतनी छोटी उम्र में ही उनकी बेटी पूरी तरह से फिल्मों में खो जाए और पढ़ाई लिखाई को भूल जाए। उन्होंने साफ कहा पहले पढ़ाई पूरी करो फिर हीरोइन बनने के सपने देखना। यह बात आशा ने मान ली और फिर उन्होंने आखिरी बार अपने ही नाम की फिल्म आशा में बतौर बाल कलाकार काम किया। इसके बाद आशा ने फिल्मों से थोड़ी दूरी बना ली और अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने लगी। अब आशा पारिक पढ़ाई लिखाई तो कर रही थी लेकिन अब उनका मन पढ़ाई में नहीं लग रहा था। उनके दिलो दिमाग में तो बस हीरोइन बनने का कीड़ा जाग चुका था। जैसे ही उनकी शुरुआती पढ़ाई पूरी हुई और वह 16 साल की हुई उनसे रहा नहीं गया।
उन्होंने सोचा जब सपने पूरे करने हैं तो वह पर्दे पर ही पूरे होंगे। फिर मैथ्स, साइंस और इंग्लिश पढ़ने का क्या फायदा? बात भी कुछ हद तक सही थी। बस फिर क्या था? था। आशा ने पढ़ाई को अलविदा कहा और सीधे हीरोइन बनने के सफर पर निकल पड़ी। किस्मत भी उनकी मेहरबान निकली। उन्हें एक साथ तीन फिल्मों का ऑफर मिल गया। उनमें से पहली फिल्म थी गूंज उठी शहनाई जिसमें उनके हीरो थे राजेंद्र कुमार। फिल्म के शूटिंग शुरू हुई लेकिन अफसोस सिर्फ तीन-चार दिन की शूटिंग के बाद ही डायरेक्टर ने उन्हें यह कहकर फिल्म से निकाल दिया तुम में हीरोइन वाली अदाकारी है ही नहीं और फिर आशा की सारी आशाओं का दीपक बुझ गया। जब यह खबर फैली कि आशा एक्टिंग में कमजोर है और इतनी खराब अदाकारी करती है कि पहली ही फिल्म से बाहर कर दी गई तो नतीजा यह हुआ कि बाकी की दो फिल्मों से भी उन्हें निकाल दिया गया। उनके दिल की हालत कुछ ऐसी थी मानो कह रही हो। लेकिन दोस्तों आशा पारिक ने हार नहीं मानी। वो अलग-अलग डायरेक्टर्स और प्रोड्यूसर्स के ऑफिस [संगीत] के चक्कर लगाने लगी। इसी दौरान उनकी मुलाकात हुई आमिर खान के चाचा और मशहूर फिल्मकार नासिर हुसैन से। नासिर हुसैन ने आशा को देखते ही पसंद कर लिया और अपनी फिल्म में साइन कर लिया। फिल्म का नाम था दिल दे के देखो। और इस तरह साल 1959 में आशा पारे ने शम्मी कपूर के साथ बतौर हीरोइन अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की। यह फिल्म जबरदस्त हिट हुई। गानों की बात करें तो मजा ही आ गया। जब अच्छे बोल नहीं मिले तो गायक ने सीधा दो का पहाड़ा गा दिया। कमाल की बात यह थी कि उस वक्त आशा पारिक सिर्फ 16 साल की थी और उनके हीरो शम्मी कपूर उनसे लगभग 25 साल बड़े थे। यानी उनकी पिता की उम्र के। और तो और शूटिंग के दौरान शम्मी कपूर की पत्नी खुद आशा को अपनी बेटी की तरह तैयार करती थी। आशा भी शमी कपूर को अंकल कहकर बुलाती थी। अब फिल्म में दोनों हीरो हीरोइन थे और पर्दे पर रोमांस कर रहे थे।
यह तो केवल हिंदी फिल्मों में ही मुमकिन है। यानी सोचिए पहली ही फिल्म में आशा को अपने बाप की उम्र के हीरो के साथ रोमांस करना पड़ा और दिलचस्प बात यह थी कि यह फिल्म रिलीज हुई थी आशा पारिक के जन्मदिन के दिन ही यानी 2 अक्टूबर को। 1959 की सफलता के बाद आशा पारिक का फिल्मी सफर तेजी से आगे बढ़ा। 1960 में वह पहली बार सुनील दत्त की हीरोइन बनी। फिल्म थी हम हिंदुस्तानी। [संगीत] यह फिल्म बड़ी हिट साबित हुई। खासकर इसका गाना इतना लोकप्रिय हुआ कि आज भी यह गीत 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर देशभक्ति गीत के रूप में बजाया जाता है। इसके बाद आशा पारिक की फिल्म घूंघट आई और यह भी सफल रही। फिर 1961 में आशा जुबली कुमार यानी राजेंद्र कुमार की हीरोइन बनी। फिल्म थी घराना। [संगीत] यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर धूम मचा गई। इसके गाने भी बेहद हिट रहे। राजेंद्र कुमार और आशा की जोड़ी ने दर्शकों का दिल जीत लिया। इस फिल्म में रामायण की कथा को भी जोड़ा गया था। जहां मंथरा नाराज बैठी थी और उसके पोते उसे मनाते हुए गा रहे थे। [संगीत] यह गीत भी बच्चों से लेकर बड़ों तक सबकी जुबान पर चढ़ गया। फिल्म इतनी बड़ी हिट हुई कि कई हफ्तों तक थिएटर्स [संगीत] में चलती रही। इसके बाद आशा एक बार फिर सुनील दत्त की हीरोइन बनी फिल्म थी छाया। इस [संगीत] फिल्म का मशहूर गीत आज भी हर मौके पर गुनगुनाया जाता है। इसके बाद आई फिल्म जब प्यार किसी से होता है जिसमें भी आशा पारिक ने दर्शकों का दिल जीता। फिर मनोज कुमार के साथ उनकी जोड़ी बनी फिल्म अपना बनाकर देखो में। मजेदार बात यह थी कि पहले के जमाने में फिल्मों के नाम ही ऐसे होते थे मानो हीरो- हीरोइन आपस में बातचीत कर रहे हो। इसके बाद आशा ने लगातार एक से बढ़कर एक फिल्मों में काम किया। [संगीत] भरोसा बिन बादल बरसात मेरी सूरत तेरी आंखें फिर वही दिल लाया हूं जिद्दी [संगीत] मेरे सनम तीसरी मंजिल और हर फिल्म के साथ उनकी लोकप्रियता और भी बढ़ती चली गई। वह वाकई सबकी चहेती अदाकारा बन चुकी थी। 1966 में आशा पारिक ने पहली बार धर्मेंद्र के साथ काम किया। फिल्म थी आए दिन बहार के। यह फिल्म सुपरहिट हुई और इसके गाने [संगीत] जैसे नगमे आज भी याद किए जाते हैं। इसके बाद इन्होंने मनोज कुमार के साथ फिल्म दो बदन की जिसने उन्हें और भी लोकप्रिय बना दिया। फिर उनकी जोड़ी राजेश खन्ना के साथ बनी फिल्म [संगीत] थी बहारों के सपने। यह राजेश खन्ना की दूसरी फिल्म थी और उस समय तक लोग उन्हें ज्यादा नहीं जानते थे। [संगीत] लेकिन आशा पारिक के साथ काम करने के बाद राजेश खन्ना भी धीरे-धीरे सुपरस्टार बनने की राह पर चल पड़े और फिर तो जैसे नगमे हमेशा हमेशा के लिए अमर हो गए।
1967 में आशा पारिक और मनोज कुमार की शानदार फिल्म उपकार आई। यह वही फिल्म थी जिसे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। फिल्म का मशहूर गीत आज भी लोगों की जुबान पर है। दरअसल यह फिल्म लाल बहादुर शास्त्री जी के जय जवान जय किसान नारे से प्रेरित होकर बनाई गई थी। [संगीत] कहानी भी ऐसी थी जिसमें तलवार की नोक या एटम बम की धमकी से भी देश को झुकाया नहीं जा सकता। यही फिल्म लोगों के दिलों में देशभक्ति का जुनून [संगीत] भर गई। इसके बाद आशा पारिक ने धर्मेंद्र के साथ फिल्म शिखर की और यह ब्लॉकबस्टर साबित हुई। [संगीत] इसके गाने भी खूब लोकप्रिय हुए। फिर कन्यादान, साजन, चिराग जैसी फिल्में आई। इसके बाद आई आया सावन झूम के और एक बार फिर धर्मेंद्र और आशा की जोड़ी ने पर्दे पर कमाल कर दिखाया। इस फिल्म का गाना आज भी ओल्ड इज गोल्ड की लिस्ट में शामिल है। इसके बाद प्यार का मौसम और महल जैसी फिल्में भी आई। 1970 में आशा पारिक ने राजेश खन्ना के साथ फिल्म आन मिलो सजना की। यह फिल्म सुपरडुपर हिट रही और गाने लोग आज भी प्यार से याद करते हैं। [संगीत] जब आशा ने गाया तो राजेश खन्ना ने भी शरारत भरे अंदाज में कहा और यह गाना उस दौर के प्रेमी जोड़े खूब गुनगुनाते थे। इसके बाद आई फिल्म कटी पतंग। इस फिल्म ने राजेश खन्ना को सुपरस्टार बना दिया और आशा पारिक के करियर की भी यह सबसे बेहतरीन फिल्मों में गिनी जाती है। इसके गाने या फिर आज भी अमर [संगीत] है। 1971 में आशा पारख जितेंद्र के साथ फिल्म कारवा में नजर आई। इसके गाने ने लोगों का दिल जीत लिया। इसके बाद धर्मेंद्र और विनोद खन्ना के साथ उनकी फिल्म मेरा गांव मेरा देश आई। इस फिल्म के गाने भी जबरदस्त हिट हुए। [संगीत] और धर्मेंद्र को बांधने वाले सीन ने तो लोगों की सांसे थमा दी थी। इसके बाद 1972 में धर्मेंद्र के साथ फिल्म समाधि आई। इसका मशहूर गाना इतना हिट हुआ कि आज भी लोग इस पर डांस करने लगते हैं। इस गाने के बाद तो इसके कई रिमेक भी बने। अक्षय कुमार और शेफाली जरीवाला का वर्जन और बाद में टोनी कक्कड़ का रिकक्रिएटेड गाना। इसके बाद आशा ने सुनील दत्त और शत्रुघ्न सिन्हा के साथ फिल्म हीरो की। इस फिल्म में आशा का डायलॉग। इस फिल्म में आशा का डायलॉग लड़कियों का फेवरेट बहाना बन गया। फिल्म बड़ी हिट नहीं हुई लेकिन शूटिंग के दौरान विवाद खूब हुआ। [संगीत] दरअसल इसी फिल्म के सेट पर आशा पारक और शत्रुघ्न सिन्हा में झगड़ा हो गया। [संगीत] किसी ने शत्रुघ्न सिन्हा के कान भर दिए कि आशा कह रही थी कि यह नया लड़का बहुत अकड़ू और घमंडी है। बस फिर क्या था?
शत्रुघ्न सिन्हा भड़क गए और मीडिया के सामने कह डाला, “मुझे आशा पार्क बिल्कुल भी पसंद नहीं है। उसके साथ सीन करने के बाद मैं अपने हाथ साबुन से धोता हूं। ताकि उसकी बदबू ना आए। यह सुनकर आशा भी नाराज हो गई और दोनों की यह दुश्मनी सालों तक चर्चा में रही। इसके बाद भी आशा पारिक फिल्मों में काम करती रही। कई फिल्में सुपरहिट रही और कुछ फ्लॉप भी रही लेकिन उनकी लोकप्रियता लगातार बनी रही। साल 1978 में रिलीज हुई फिल्म मैं तुलसी तेरे आंगन की ने आशा पारिक को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया। इस फिल्म के गाने भी बहुत लोकप्रिय हुए। इसके बाद उन्होंने बिन फेरे हम तेरे प्रेम विवाह, बदला, बलिदान, गुनहगार, 100 दिन, सांसे जैसी कई फिल्मों में काम किया। लेकिन अब धीरे-धीरे उनकी उम्र ढलने लगी थी और वह [संगीत] मेन हीरोइन की बजाय सपोर्टिंग भूमिकाएं निभाने लगी थी। अब आशा पारिक, बहन, भाभी और मां के किरदारों में दिखाई देने लगी। जैसे फिल्मों में संवाद आता था [संगीत] तो जवाब मिलता जो बेगानों ने भी नहीं किया। धीरे-धीरे दर्शक भी उन्हें ऐसे ही गंभीर किरदारों में देखने लगे। इसके बाद आशा पारिक ने बुलंदी कालिया पाखंडी धर्म और कानून सागर संगम हम तो चले परदेश हमारा खानदान उस्ताद बंटवारा जैसी फिल्मों में सहनायिका की भूमिकाएं निभाई लेकिन अब उनके फिल्मों में होने या ना होने से कोई खास फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि इंडस्ट्री में नई-नई हीरोइनें आ चुकी थी और आशा पारक उनके लिए मां या सास के रोल करने लगी थी। इसके बाद साल 1995 में आई फिल्म आंदोलन में उन्होंने गोविंदा और संजय दत्त की मां का किरदार निभाया और अपने अभिनय की गहरी छाप छोड़ी। उनकी आखिरी फिल्म थी सर आंखों पर जो साल 1999 में रिलीज हुई थी। इसके बाद उन्होंने हमेशा के लिए फिल्मों से दूरी बना ली। अब बात करते हैं उनकी निजी जिंदगी की और उन सच्चाइयों की जिनके बारे में कम [संगीत] लोग जानते हैं। आशा पारिक शुरू से ही बहुत नटखट और शरारती स्वभाव की थी। वह अक्सर फिल्म के सेट पर मस्तीमजाक करती रहती। कई बार उनकी यही आदत फिल्म मेकर्स को पसंद नहीं आती थी। एक किस्सा मशहूर है फिल्म घूंघट का जिसके निर्देशक थे रामानंद सागर जिन्होंने बाद में रामायण बनाई थी। फिल्म में एक सीन था जिसमें आशा पारिक को रोना था। लेकिन वह उस समय मस्ती के मूड में थी और रोने की बजाय हंसने लगती थी। करीब 30 बार रिटेक हुए लेकिन सीन शूट नहीं हो पाया। रामानंद सागर खुद सीन की भावनाओं में डूब गए और उनकी आंखों से आंसू निकल आए। लेकिन आशा उन्हें देखकर और जोर-जोर से हंसने [संगीत] लगी। बस फिर क्या था? रामानंद सागर का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने सबके सामने आशा को बच्चा दिमाग और लापरवाह कहकर जमकर फटकार लगाई। इस फटकार का असर इतना गहरा हुआ कि आशा पारक सेट पर ही रोने लगी और उसी हालत में सीन शूट कर लिया गया। यानी डायरेक्टर ने अपना लक्ष्य पा लिया। [संगीत] इसके बाद आशा पारिक ने ठान लिया कि वह कभी भी अब काम को हल्के में नहीं लेगी और अपने अभिनय को पूरी गंभीरता से करेगी। [संगीत] आपको बता दें फिल्म मेरा गांव मेरा देश में काम करने के लिए आशा पारिक ने उस दौर में ₹3 लाख एडवांस लिए थे। यह रकम इतनी बड़ी थी कि उस समय किसी भी हीरोइन को इतनी फीस नहीं मिलती थी।
इसी के साथ आशा पारिक बॉलीवुड की सबसे महंगी हीरोइन बन गई थी। उस वक्त उनकी लोकप्रियता इतनी जबरदस्त थी कि उनकी फिल्में लगातार 25 हफ्तों तक थिएटर में चलती [संगीत] रहती थी। इसी कारण उन्हें बॉलीवुड की पहली जुबली गर्ल कहा गया। जैसे अभिनेता राजेंद्र कुमार को जुबली कुमार कहा जाता था वैसे ही आशा पारिक बनी जुबली गर्ल। आशा का इतना आशा का इतना नाम और दबदबा था कि कोई भी छोटा अभिनेता उनकी बात काटने की हिम्मत नहीं करता था। फिल्म में वही होता था जो वह चाहती थी। वह अपनी शर्तों पर काम करती थी और कई बार किसी दूसरी हीरोइन का सीन भी कटवा देती थी। राज कपूर उस समय बॉलीवुड का बड़ा नाम थे और लगभग हर हीरोइन उनके साथ काम करने का सपना देखती थी। लेकिन उनकी एक आदत थी कि वह फिल्मों में हीरोइन को बोल्ड और अंग प्रदर्शन वाले सीन करने के लिए मजबूर करते थे। यही कारण था कि आशा पारिक ने कभी भी राज कपूर की फिल्म में काम नहीं किया। उन्होंने साफ कह दिया कि वह किसी भी तरह का बोल्ड सीन नहीं करेंगी। यहां तक कि जब उनके करियर का ग्राफ नीचे जाने लगा तब भी उन्होंने अपने असूलों से समझौता नहीं किया। इसी तरह दिलीप कुमार भी उस दौर के बड़े सुपरस्टार थे। हर अभिनेत्री उनके साथ काम करना चाहती थी। लेकिन आशा पारिक ने कभी दिलीप कुमार के साथ फिल्म नहीं की। कारण क्या था, यह केवल आशा ही जानती [संगीत] है। शशि कपूर आशा पारिक को बहुत पसंद करते थे और शायद उन्हें दिल से चाहते भी थे, लेकिन आशा ने कभी उन्हें उस तरह का मौका नहीं दिया। शशि कपूर जल्दी समझ गए कि आशा उन्हें केवल एक अच्छा दोस्त मानती है और उन्होंने अपने दिल की बात दिल में ही दबा ली। [संगीत] आपको बता दें धर्मेंद्र के साथ आशा ने कई फिल्में की लेकिन धर्मेंद्र की एक आदत आशा को बिल्कुल पसंद नहीं थी। शूटिंग से पहले शराब पीना। शराब की बदबू छिपाने के लिए धर्मेंद्र प्याज खा लेते थे। जब आशा को यह बात पता चली तो उन्होंने धर्मेंद्र को सख्त चेतावनी दी। अगर वह शराब पीकर शूटिंग पर आए तो वह सबके सामने उनका राज खोल देंगी, और उनका करियर खत्म कर देंगी। इसके बाद धर्मेंद्र ने वादा किया कि वह कभी भी आशा के सामने शराब पीकर नहीं आएंगे। बॉलीवुड के तमाम हीरो उन पर फिदा थे। लेकिन आशा का दिल एक ऐसे शख्स पर आया जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। फिल्म निर्माता नासिर हुसैन जो आमिर खान के चाचा थे। आशा ने नासिर हुसैन की कई फिल्मों में काम किया और धीरे-धीरे उनसे गहरा लगाव हो गया। [संगीत] लेकिन जब उन्हें बाद में पता चला कि नासिर शादीशुदा हैं और दो बच्चों के पिता हैं तो उनका दिल टूट गया। फिर भी आशा ने नासिर हुसैन से प्यार करना कभी नहीं छोड़ा। मगर उन्होंने कभी अपने दिल की बात उनसे नहीं कही क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि उनकी [संगीत] वजह से किसी और का परिवार टूटे। इसी सोच के चलते आशा ने जिंदगी भर शादी ना करने का फैसला लिया। [संगीत] आशा पारिक ने बाद में खुद की एक प्रोडक्शन कंपनी अकृति भी खोली।
जिन्होंने उन्होंने प्लास के फूल, बाजे पायल, कोरा कागज, दाल में काला जैसे कई टीवी सीरियल्स बनाए। वह 1994 से 2000 तक सिने आर्टिस्ट एसोसिएशन की चेयर पर्सन रही और बॉलीवुड की पहली महिला सेंसर बोर्ड प्रमुख भी बनी। [संगीत] सेंसर बोर्ड की चीफ के तौर पर उन्होंने कई फिल्मों के आपत्तिजनक सीन हटवाए। निर्देशक शेखर कपूर की फिल्म एलिजाबेथ और महेश भट्ट की फिल्म जख्म में भी उन्होंने कई सीन हटाने के आदेश दिए। इस वजह से उनकी महेश भट्ट से तीखी नोकझोंक हुई। महेश भट्ट इतने नाराज हुए कि उन्होंने उनके घर के बाहर नारेबाजी तक की लेकिन अंततः कोर्ट में उन्हें आशा से माफी मांगनी पड़ी। इसके बाद 2002 में आशा पारिक इस पद से रिटायर हो गई। आज वह लगभग 82 वर्ष की उम्र में भी सिंगल हैं। वह फिल्मों से दूर रहकर सामाजिक कार्यों में अपना समय लगाती हैं। उनके नाम से एक अस्पताल और एक डांस एकेडमी भी है। आशा पारिक को उनके योगदान के लिए पद्मश्री दादा साहब फाल्के अवार्ड और लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड जैसे बड़े सम्मान मिल चुके हैं। इस तरह आशा पारिक ने अपने अभिनय, अपने असूलों और अपने साहस से बॉलीवुड में एक अनोखी पहचान बनाई। वह सही मायनों में बॉलीवुड की असली जुबली गर्ल है। अगर आपको हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर की ऐसी ही अनसुनी कहानियां और दिग्गज सितारों के दिलचस्प किस्से पसंद आते हैं तो वीडियो को लाइक जरूर करें। अपने विचार कमेंट में लिखें और हमारे चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकन दबाना बिल्कुल ना भूलें ताकि हमारी हर नई डॉक्यूमेंट्री सबसे पहले आप तक पहुंचे। मिलते हैं अगले वीडियो में। थैंक यू सो मच।