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अनुराधा पांडवाल ने क्यों छोड़ दिया बॉलीवुड? साजिश या खुद लिया था फैसला?

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जिस आवाज को सुनकर कभी लोगों को सुकून मिलता था, उसी आवाज के पीछे छिपी कहानी में इतना दर्द था, इसका अंदाजा शायद किसी को नहीं था। एक आवाज जो धीरे-धीरे करोड़ों दिलों तक पहुंची, जिसके सुरों में मोहब्बत थी, दर्द था और एक ऐसा खिंचाव था, जिससे चाहकर भी कान दूर नहीं हो पाते थे। लेकिन क्या आप जानते हैं? इस आवाज को पहचान मिलने से पहले इसे ठुकराया भी गया था। जिसे आज लोग एक बेहद सुरीली और मनमोहक आवाज के तौर पर याद करते हैं। कभी उसी आवाज को लेकर सवाल उठाए गए थे। फिर वक्त बदला। एक के बाद एक गाने आए और देखते ही देखते संगीत की दुनिया में एक नया नाम तेजी से उभरने लगा। लेकिन असली कहानी कामयाबी की नहीं है। असली कहानी उस सफर की है जहां एक तरफ थी हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी और सबसे ताकतवर आवाजें और दूसरी तरफ एक ऐसी गायिका जिसने बिना किसी बड़े संगीत प्रशिक्षण के अपनी जगह बनाने की कोशिश की। फिर हालात ऐसे बदले कि उनकी आवाज की चर्चा सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रही। मुकाबला बढ़ा, विवाद बढ़े, रिश्तों को लेकर सवाल उठे और फिर जिंदगी ने उन्हें एक के बाद एक ऐसे झटके दिए जिनकी कीमत शायद सिर्फ वही जानती हैं। लेकिन सबसे बड़ा रहस्य आज भी वही है। आखिर उस आवाज ने एक दिन फिल्मों से मुंह क्यों मोड़ लिया? जिस दुनिया में उनके लिए सफलता के दरवाजे खुले थे, उसी दुनिया को उन्होंने पीछे छोड़ने का फैसला क्यों किया? और क्या वजह थी कि इसके बाद उनकी वही आवाज एक बिल्कुल अलग दुनिया में करोड़ों लोगों की आस्था और सुकून का हिस्सा बन गई। यह कहानी सिर्फ एक गायिका के मशहूर होने की कहानी नहीं है। यह कहानी है एक ऐसी आवाज की जिसने पहले लोगों के दिल जीते फिर वक्त से लड़ाई लड़ी और आखिर में खुद अपनी ज़िंदगी की दिशा बदल दी।

तो चलिए उस सफर की शुरुआत वहीं से करते हैं जहां इस आवाज ने पहली बार दुनिया को अपना परिचय देना शुरू किया था। एक ऐसी मखमली आवाज जिनकी आवाज में एक अनोखा मंत्रमुग्ध करने वाला जादू है। जिनकी आवाज सुनने के बाद सुकून मिलता है। जिसकी मधुर आवाज के सामने स्वर्ग कोकिला लता मंगेशकर जी की आवाज का जादू भी धुंधला देखने लगा था। जिसने आशा भोसले जैसी गायिका का सिंहासन भी हिल दिया। अपने करियर को अचानक इन्होंने विराम लगा दिया। क्यों इन्होंने अचानक फिल्मों में गाना गाना ही बैन कर दिया। संगीत की दुनिया की किस बड़ी हस्ती के साथ इनकी प्यार मोहब्बत की चर्चाएं सरेआम हुई? अनुराधा पडवाल की आवाज को बचपन में लोगों ने कर्कश और भक्ति का कहकर नेगलेक्ट कर दिया था। आखिर क्या ऐसा जादू हुआ कि यह भक्ति और कर्कश आवाज एकदम से इतनी सुरीली और मनमोहन हो गई। तो आज हम इस वीडियो में आपको अनुराधा पौडवाल जी से जुड़े कुछ ऐसे ही आश्चर्यजनक और मनोरंजक तथ्यों को बताएंगे। अनुराधा पौडवाल का जन्म 27 अक्टूबर 1952 को कर्नाटक के उत्तरकर्णी जिले में एक कुंकड़ी परिवार में हुआ। इनके बचपन का नाम अलकन नंदाकर्णी था। इनके जन्म के कुछ ही दिनों बाद इनका परिवार मुंबई आ गया। जब यह कक्षा चार में थी तभी इन्हें लता मंगेशकर जैसी महान गायिका को लाइव सुनने का मौका मिला। यह शायद वही दिन था जब इनका संगीत के प्रति पहला झुकाव हुआ एवं संगीत सुंदरवादी था। इनके पिता का तो यह मानना था कि सब परिवार की लड़कियां फिल्मों वगैरह में गाना नहीं गाती। अनुराधा पौड़वाल जी अपने एक साक्षात्कार में कहती हैं कि बचपन में उनकी आवाज बेहद कर्कश थी और इतनी सुरीली और मीठी नहीं हुआ करती थी जो आज अटपका है जब उन्हें बचपन में ही निमोनिया हो गया। वे गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। उन्होंने अपनी पूरी आवाज इस बीमारी के चलते खो दी और यह लगभग 40 दिनों तक बिस्तर में ही पड़ी रही। इस दौरान इनके चाचा जी ने इन्हें लता जी की आवाज में भागवत गीता की रिकॉर्डिंग भेजी। अनुराधा पडवाल जी लता जी की इस रिकॉर्डिंग को दिन में कई-कई बार सुनती। कहते हैं जब यह ठीक हुई, तो इनकी आवाज पूरी तरीके से बदल गई थी।

बड़ा नहीं कोई दूजा कि लता जी को अनुराधा जी ने हमेशा अपना गुरु ही माना और तो और अपने सिंगर बनने का श्रेय भी हमेशा उन्होंने लता मंगेशकर जी को ही दिया। अनुराधा पौड़वाल ने जो अपना पहला पुरस्कार जीता वो था मीरा का भजन। यह पुरस्कार उन्हें इस स्कूल में मिला था। जहां कभी उन्हें जजों ने कर्कश आवाज कहकर रिजेक्ट कर दिया था और यह मीरा का भजन उन्होंने रेडियो से लता जी की आवाज में सुनसुनकर ही सीखा था। इस मीठी और सुरीली आवाज की सभी जगह तारीफ की तारीफ हो रही थी। ऐसे में एक पार्टी के दौरान उनकी मुलाकात अरुण जी से हुई और यह मुलाकात कब प्यार में बदल गई यह पता ही नहीं लगा। कुछ ही दिनों में इन दोनों के बीच का प्यार पवित्र शादी के बंधन में बदल गया। संगीतकार और गायक एच डी बर्मन के सहायक थे। पिया बिना पिया। दोनों की शादी हुई तो अनुराधा जी 17 वर्ष की थी और उनके पति अरुण 27 वर्ष के थे। अरुण जी अनुराधा को हमेशा ही गाने के लिए प्रोत्साहित करते। इन दोनों का वैवाहिक जीवन बहुत ही सुखमय था। इनके तीन बच्चे हुए जिसमें से एक बच्चे की मृत्यु महज एक साल की उम्र में ही हो जाती है। अब इनका एक बेटा आदित्य और बेटी कविता थी। एक महीने के बच्चे की मृत्यु से वह बहुत टूट गई थी। इसलिए अरुण जी अनुराधा का मां बदलने के लिए उन्हें एक स्टूडियो में ले जाते हैं। जहां पर लता मंगेशकर लाइव रिकॉर्डिंग कर रही थी। अरुण जी के अच्छे संबंधों के कारण उन्हें एक बार रेडियो में गाने का मौका मिला और उन्होंने इस लता मंगेशकर जी के गाने को फिर से गुनगुना दिया। कुछ लोगों ने इनकी आवाज की तुलना लता मंगेशकर से करी। अनुराधा पडवाल के लिए यह बहुत खुशी का पल था। इस गाने को जब लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जी और बप्पी लहरी जैसे संगीतकारों ने सुना तो उन्होंने खुद रेडियो स्टेशन पर फोन कर पूछा कि यह सुरीली आवाज आखिर थी किसकी? इतनी वाहवाही के बाद इनके पति अरुण जी ने इन्हें फिल्मों में गाने के लिए कहा। अनुराधा जी इसके लिए बिल्कुल राजी नहीं थी। पर बहुत दिनों तक समझाने के बाद अनुराधा पडवाल जी फिल्मों में गाने के लिए राजी हो गई। इतनी पहले फिल्म मिली अभिमान जिसमें अमिताभ बच्चन जी और जय भादुड़ी जी ने अभिनय किया था। इस फिल्म में इनका गाया एक छोटा सा श्लोक था। इसके बाद इन्हें एक अकाल गाने को गाने का मौका मिला। यह फिल्म थी आपबीती जिसमें शशि कपूर जी और हेमा मालिनी जी पर अभी तक कोई भी बड़ा ब्रेक नहीं मिला था। अनुराधा जी अभी तक सिर्फ छोटे-मोटे गीत, आलाप और डमी गीत ही गा रही थी। यह संघर्ष लगभग 7 वर्षों तक चल ही रहा था। फिर 1976 में निर्देशक सुभाष गई के द्वारा निर्देशित फिल्म कालीचरण ने मिली और इस फिल्म के बाद शायद अनुराधा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। फिर कुछ ही दिनों बाद सुभाष गई के द्वारा निर्देशित हीरो फिल्म आई। इस फिल्म में इनका एक गाना था तू मेरा जानू है और इस गाने ने इन्हें आसमान की बुलंदियों पर पहुंचा दिया। कहते हैं शुरुआत में यह गाना लता मंगेशकर जी गाने वाली थी। पर कुछ कारणवश यह गाना अनुराधा जी को मिला। मानो यह गाना उसके बाद इतिहास बन गया। इसके बाद अनुराधा पडवाल जी सुभाष गई की सिग्नेचर गायिका बन गई थी। जहां नदीम श्रवण जी भी संघर्ष कर रहे थे। उन्होंने उनके साथ मिलकर तेज गानों की रिकॉर्डिंग लीला में बेचैनी तड़प आएगा। रथ भी है मेरे महबूब में। इन गानों का इस्तेमाल महेश भट्ट द्वारा निर्देशित फिल्म आशिकी दिल है कि मानता नहीं और सड़क फिल्में किया गया। इन तीनों फिल्मों के रिलीज़ के बाद भारतीय सिनेमा में संगीत का एक नया बवंडर आ गया था और यह बवंडर ऐसा उठा कि भारतीय सिनेमा के

बड़े से बड़े निर्माता निरीक्षकों का सफर अनुराधा पौडवाल की चौखट पर आकर समाप्त होता। दोस्तों आपको बता दें कि वह समय था जब दो दिग्गज गायन लता मंगेशकर और आशा भोसले की फिल्मी दुनिया में तूती बोलती थी। दिल है कि मानता नहीं एक के बाद एक जिस फिल्म में गाने गाती वो सुपरहिट हो रही थी। चाहे वह राम लखन हो। बाहर आने तक हो कुर्बान साजन साथी फूल और कांटे तेजाब और दिल है कि मानता नहीं सड़क और आशिकी जैसी फिल्में हो। सनम इस नई और सुरीली आवाज ने बड़ी-बड़ी गायकों के सिंहासन हिला दिए थे। अनुराधा पडवाल जी ने कभी भी शास्त्रीय संगीत की कोई ट्रेनिंग नहीं ली थी। उन्होंने तो सिर्फ अपनी लता दीदी के गानों को सुनकर और घंटाघंटा रियाज करके इतनी सफलता पाई थी। दिल है कितनी गली तुम कितने दिन बाद मिले। लता मंगेशकर जी जहां 12 13 साल की उम्र से गाने गा रही थी। लेकिन उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा कि मानो कल की आई है यह लड़की उनके लिए कांटे की टक्कर साबित होगी और देखते ही देखते ऐसा समय भी आया जब इंडस्ट्री में लता जी और आशा जी से ज्यादा अनुराधा जी को तवज्जो दी जाने लगी जहां लता मंगेशकर जी का सिंहासन टोल रहा था वहीं अनुराधा जी का करियर आसमान हो रहा था। तभी अनुराधा जी की मुलाकात तीसरी श्रेस के मालिक गुलशन कुमार से हुई जो कि नए लोगों को खूब चांस देते थे। गुलशन जी ने जब अनुराधा जी की आवाज सुनी तो उन्होंने फैसला कर लिया कि अब अनुराधा को वह दूसरी लता बनाकर रहेंगे। तुम्हें तुमसे हर खुशी। अब गुलशन कुमार जी के लिए अनुराधा जी ने कई ब्लॉकबस्टर गाने गाए। अनुराधा जी की बढ़ती लोकप्रियता के कारण एक समय गायिका आशा भोसले ने अनुराधा जी के पति अरुण पडवाल की बुरी तरह बेइज्जती कर उन्हें स्टूडियो से भगा दिया था। किस्सा कुछ यूं है कि उन दिनों अनुराधा पडवाल जी से बड़े-बड़े म्यूजिक कंपोजर गाना गवाना चाहते थे। उन्हीं दिनों आशा भोसले जी अपने ससुर एचडी बर्मन के पास गाना रिकॉर्ड करवाने पहुंची। जैसा कि आप जानते हैं कि एचडी बर्मन के सहायक थे अनुराधा पौडवाल के पति अरुण पडवाल। आशा भोसले जी की नजर जब अरुण जी पर पड़ी, तो एकदम से आग बबूला हो गई। अगले ही पल उन्होंने अपने हस्बैंड आर डी बर्मन से कह दिया, यह आदमी जब तक आंखों के सामने रहेगा मैं गाना रिकॉर्ड नहीं कर सकती। इसके बाद अनुराधा जी के पति को सबके सामने बेइज्जत कर निकाल दिया गया। इतना प्यार करें। फिल्मी रिपोर्ट्स की मानें तो लता जैसी गायिका ने अनुराधा के गाने अपनी आवाज से रिप्लेस कर दिए। ऐसा युवा फिल्म नागिन के दौरान आपको इस फिल्म का गाना मैं तेरी दुश्मन अच्छी तरह याद होगा। आज जब मुझे कोई हिट मिलती है तो अच्छा लगता है। लेकिन बस इतना ही दर्शन तो दर्शन संगीत के जानकार भी कहते हैं कि भक्ति संगीत में अनुराधा पौवाल के सामने कोई टिकता ही नहीं। न जाने कितने दर्शकों का यह मानना है कि इनके भक्ति गीतों और भजनों से न जाने कितने घरों में सुबह का सूरज उगता है। नमः शिवाय। ओम नमः शिवाय। हर हर भोले। अनुराधा पौड़वाल जी ने अपने फिल्मी गीतों, भजनों, भक्ति गीतों और आरतियों के साथ-साथ भारत देश के न जाने कितने महान कवियों को अपनी आवाज दी। मीराबाई, तुलसीदास, रसखान, सूरदास आदि। विधाओं में गानों में पारंगत दिखती थी।

तभी तो मशहूर गायक गुलाम अली और जगजीत सिंह जी ने कहा था कि अनुराधा पौडवाल जैसी गायिका कई-कई युगों में सिर्फ एक ही पैदा होती हैं। अनुराधा पौडवाल जी की अगर आज के दिनों की बात करें तो साल 2020 में इनके पुत्र आदित्य पडवालों की किडनी खराब होने से मृत्यु हो गई और अनुराधा पौडवाल एक बार फिर बहुत टूट गई थी। परिणाम कुछ ना रहा। आपको जानकर हैरानी होगी और उनके प्रति सम्मान बढ़ेगा कि अनुराधा पौडवाल जी अपने गाय गीतों से मिलने वाली रॉयल्टी से युद्ध में शहीद सैनिकों के परिवारजनों की मदद करती हैं और गरीब और कुपोषण का शिकार बच्चों की भी सहायता होती है। उन्होंने अपने पति अरुण पौडवाल की याद में एक सूर्योदय नामक फाउंडेशन की स्थापना की जिसके लिए वह खूब बढ़-चढ़कर काम करती हैं। अनुराधा पौडवाल जी ने कोविड महामारी के दौरान भी लोगों की खूब बढ़-चढ़कर मदद की। पर पता नहीं क्यों ईश्वर भी इतने नेक दिल इंसान की इतनी परीक्षा लेता है कि उन्हें इतना कष्ट देता है कि अनुराधा पडवाल जी का नाम आते ही आपके कानों में सबसे पहले वह कौन सा गाना गुनगुनाने लगता है। लेकिन इस सफर की सबसे बड़ी खूबसूरती शायद उनकी कामयाबी नहीं बल्कि हर मुश्किल के बाद उनका खुद को संभालना है। उन्होंने जिंदगी में बहुत कुछ देखा। कुछ रिश्ते मिले कुछ हमेशा के लिए छूट गए। कई ऊंचाइयां मिली तो कई ऐसे मोड़ भी आए जहां शायद कोई दूसरा इंसान टूट जाता। लेकिन अनुराधा जी की आवाज कभी खामोश नहीं हुई। बस उसका रास्ता बदल गया और शायद यही जिंदगी का सबसे खूबसूरत सच है। कभी-कभी मंजिल बदलती नहीं है। इंसान की नजर बदल जाती है। आज भी जब उनकी आवाज किसी भजन, आरती या पुराने गीत के जरिए हमारे बीच आती है तो लगता है जैसे वक्त कुछ पलों के लिए ठहर गया हो। अगर आपको यह कहानी सच में कुछ महसूस करवा पाई हो तो वीडियो को लाइक करें, शेयर करें और हमारे चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूलें क्योंकि कुछ आवाजें सिर्फ सुनी नहीं जाती। कुछ आवाजें वक्त गुजर जाने के बाद भी दिल के अंदर गूंजती रहती

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