‘बच्चन’ नहीं, कुछ और है अमिताभ का असली सरनेम! जानिए कैसे बदला इस परिवार का इतिहास?बॉलीवुड में जब भी किसी बुलंद आवाज, दमदार अभिनय और महान शख्सियत की बात होती है, तो सबसे पहला नाम जुबां पर आता है— अमिताभ बच्चन। सदियों में एक बार मिलने वाले इस ‘शहंशाह’ के नाम का डंका पूरी दुनिया में बजता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस ‘बच्चन’ नाम पर आज पूरा देश और दुनिया गर्व करती है, वह असल में इस परिवार का असली सरनेम (उपनाम) है ही नहीं?जी हां, आपने बिल्कुल सही सुना! अमिताभ बच्चन का असली पारिवारिक सरनेम ‘बच्चन’ नहीं है। आइए जानते हैं कि यह सरनेम आखिर आया कहां से और कैसे एक कवि के निकनेम ने पूरे परिवार का इतिहास हमेशा के लिए बदल दिया।
1. ‘बच्चन’ नहीं, तो क्या है असली सरनेम?अमिताभ बच्चन के परिवार का असली और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा सरनेम ‘श्रीवास्तव’ है।अमिताभ बच्चन के पिता और देश के महान कवि डॉ. हरिवंश राय का जन्म 27 नवंबर 1907 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुआ था। उनके पिता का नाम प्रताप नारायण श्रीवास्तव था। इस लिहाज से देखा जाए तो अमिताभ बच्चन का असली नाम अमिताभ श्रीवास्तव होना चाहिए था।
2. ‘श्रीवास्तव’ से ‘बच्चन’ बनने की दिलचस्प कहानीअब सवाल यह उठता है कि आखिर ‘श्रीवास्तव’ जैसा स्थापित सरनेम हटकर ‘बच्चन’ कैसे बन गया? इसके पीछे की कहानी काफी दिलचस्प और प्रेरणादायक है: * बचपन का निकनेम: हरिवंश राय जब छोटे थे, तो घर में सब उन्हें प्यार से ‘बच्चन’ कहकर पुकारते थे। अवधी और हिंदी भाषी क्षेत्रों में ‘बच्चन’ का अर्थ होता है— ‘छोटा बच्चा’। * कविताओं में कलम नाम (Pen Name): जब हरिवंश राय बड़े हुए और उन्होंने कविताएं लिखना शुरू किया, तो अपनी रचनाओं के अंत में उन्होंने अपने असली नाम के बजाय ‘बच्चन’ लिखना शुरू कर दिया।
देखते ही देखते साहित्य जगत में वे ‘हरिवंश राय बच्चन’ के नाम से प्रसिद्ध हो गए।3. जाति-पात के बंधन को तोड़ने का ऐतिहासिक फैसलायह बदलाव केवल साहित्यिक पसंद तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक गहरी सामाजिक सोच थी।20वीं सदी के भारत में जातिवाद की जड़ें बहुत गहरी थीं। सरनेम देखते ही इंसान की जाति का अंदाजा लगा लिया जाता था। महान कवि हरिवंश राय बच्चन जातिगत भेदभाव और छुआछूत के सख्त खिलाफ थे। वे चाहते थे कि उनकी आने वाली पीढ़ी को किसी जाति के दायरे में न बांधा जाए।> “मैं अपनी पहचान किसी जाति या वर्ग से नहीं, बल्कि अपने कर्मों से बनाना चाहता हूं।”> — हरिवंश राय बच्चन की सोच> जब अमिताभ बच्चन का स्कूल में एडमिशन कराने का समय आया,
तो हरिवंश राय जी और उनकी पत्नी तेजी बच्चन ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया। उन्होंने स्कूल के फॉर्म में जातिसूचक सरनेम ‘श्रीवास्तव’ को पूरी तरह हटा दिया और आधिकारिक तौर पर अपना सरनेम ‘बच्चन’ लिखवाया।4. स्कूल के पहले दिन से ‘अमिताभ बच्चन’जब अमिताभ बच्चन को पहली बार इलाहाबाद के बॉयज हाई स्कूल में दाखिले के लिए ले जाया गया, तो वहां के प्रिंसिपल ने सरनेम पूछा। हरिवंश राय जी ने बिना झिझक के कहा— “इनका नाम अमिताभ बच्चन होगा।”बस उसी एक फैसले के साथ भारत को ‘अमिताभ श्रीवास्तव’ नहीं, बल्कि वह नाम मिला जिसने आगे चलकर भारतीय सिनेमा के इतिहास को फिर से लिखा— अमिताभ बच्चन।
5. ‘बच्चन’— जो एक सरनेम नहीं, एक ब्रांड बन गयाहरिवंश राय बच्चन का यह प्रगतिशील फैसला इतना असरदार साबित हुआ कि आज ‘बच्चन’ सिर्फ एक पारिवारिक नाम नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा और संस्कृति का एक वैश्विक ब्रांड बन चुका है।अमिताभ बच्चन के बाद उनके भाई अजताभ बच्चन, बेटे अभिषेक बच्चन, बहू ऐश्वर्या राय बच्चन और पोती आराध्या बच्चन तक— सभी इसी पहचान को गर्व से आगे बढ़ा रहे हैं।निष्कर्षअमिताभ बच्चन का सरनेम बदलना केवल एक नाम का बदलाव नहीं था, बल्कि यह समाज की संकीर्ण जातिवादी व्यवस्था के खिलाफ एक चुपचाप की गई क्रांति थी। हरिवंश राय बच्चन के उस एक साहसी फैसले ने न सिर्फ अपने परिवार को एक नई पहचान दी, बल्कि यह भी साबित किया कि इंसान की पहचान उसके कर्मों और कला से होती है, किसी सरनेम या जाति से नहीं।