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अमिताभ संग फिरोज खान की क्यों कभी नहीं बनी जोड़ी?

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हिंदी सिनेमा में जब भी स्टाइल, रॉयल अंदाज और बिंदास व्यक्तित्व की बात होती है तो सबसे पहले जिन अभिनेताओं का नाम लिया जाता है, उनमें फिरोज खान सबसे आगे दिखाई देते हैं। उनकी चाल, बोलने का अंदाज, पहनावा और स्क्रीन प्रेजेंस ने उन्हें बॉलीवुड का सबसे अलग स्टार बना दिया था। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस चमकदमक के पीछे संघर्ष, जिद और अपने उसूलों पर अडिग रहने की लंबी कहानी छिपी हुई है। दोस्तों वीडियो में आगे बढ़ने से पहले प्लीज मेरे चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकन को जरूर प्रेस कर दीजिएगा। तो चलिए [संगीत] दोस्तों वीडियो को शुरू करते हैं। फिरोज खान बचपन से ही बेहद शरारती और बागी स्वभाव के थे। उन्हें पढ़ाई में रुचि थी, लेकिन [संगीत] नियमों में बंधकर रहना पसंद नहीं था। महज 11 साल की उम्र में उन्हें मोटरसाइकिल चलाने का ऐसा शौक लगा कि एक दिन वह मोटरसाइकिल लेकर सीधे स्कूल पहुंच गए। उस समय स्कूल में प्रार्थना चल रही थी। जैसे ही उनकी मोटरसाइकिल

की तेज आवाज स्कूल परिसर में गूंजी, सभी छात्रों का ध्यान प्रार्थना से हटकर उनकी ओर चला गया। इस हरकत से नाराज होकर स्कूल के प्रिंसिपल ने उन्हें स्कूल से ही निकाल दिया। दिलचस्प बात यह है कि यह पहली बार नहीं था। अपनी बागी स्वभाव के कारण उन्हें तीन बार स्कूल से निष्कासित [संगीत] किया गया। हालांकि तमाम मुश्किलों के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई खत्म करने के बाद फिरोज खान अभिनेता बनने का सपना लेकर मुंबई आ गए। शुरुआती दिनों में उन्हें वाडिया मूवी टोन में मात्र ₹300 महीने की नौकरी मिली। यहां वह सहायक के तौर पर काम करते थे और फिल्म निर्माण की बारीकियां सीखते थे। यही अनुभव आगे चलकर उन्हें एक सफल अभिनेता, निर्माता और निर्देशक बनाने में सबसे बड़ी पूंजी साबित हुआ। फिरोज खान का रहन-सहन शुरू से ही बेहद शानदार था।

₹300 [संगीत] की नौकरी में उनका गुजारा मुश्किल था। अतिरिक्त कमाई के लिए उन्होंने स्नूकर क्लब में खेलना शुरू किया। जहां जीतने पर पैसे मिलते थे। लेकिन हर दिन किस्मत साथ नहीं देती थी। कई बार हार के कारण जेब खाली हो जाती और ऐसी नौबत आती कि उन्हें भूखे पेट रात बितानी पड़ती। संघर्ष के वे दिन उन्होंने कभी नहीं भुलाए। वाडिया मूवी टोन में काम करते हुए उन्हें फिल्मों के ऑफर मिलने लगे। 1956 में उन्होंने फिल्म हम सब चोर है अभिनय की शुरुआत की। शुरुआत में छोटे-छोटे किरदार मिले। लेकिन 1962 में हॉलीवुड फिल्म टार्जन गोस [संगीत] टू इंडिया में भारतीय राजकुमार की भूमिका निभाकर उन्होंने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसी साल फिल्म रिपोर्टर [संगीत] राजू में पहली बार उन्हें मुख्य अभिनेता बनने का अवसर मिला। इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में अभिनय किया।

फिल्म एक सपेरा, एक लुटेरा में उन्होंने डबल रोल निभाया। इसी फिल्म पर मोहम्मद रफी का अमर गीत हम तुमसे जुदा होकर मर जाएंगे रो-रो कर फिल्माया गया था। आज भी बहुत कम लोग जानते हैं कि यह मशहूर गीत फिरोज खान पर चित्रित किया गया था। फिरोज खान अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं करते थे। उनका साफ नियम था कि वह रात में काम नहीं करेंगे और रविवार को शूटिंग नहीं करेंगे। इसी कारण उन्होंने 1967 की सुपरहिट फिल्म फर्ज करने से मना कर दिया। बाद में यह फिल्म जितेंद्र के पास गई और उनके करियर की सबसे बड़ी सफल फिल्मों में शामिल हुई। हिंदी सिनेमा के लगभग हर बड़े सितारे के साथ काम करने वाले फिरोज खान और अमिताभ बच्चन कभी एक साथ किसी फिल्म में नजर नहीं आए। निर्देशक प्रकाश मेहरा ने फिल्म हेराफेरी में दोनों को साथ लाने की कोशिश की थी। लेकिन रविवार को शूटिंग ना करने के अपने नियम के कारण फिरोज खान ने फिल्म ठुकरा दी। बाद में जब फिरोज खान ने अपनी फिल्म कुर्बानी बनाई तो

उन्होंने अमिताभ बच्चन को भूमिका का प्रस्ताव दिया। लेकिन अमिताभ उस समय बेहद व्यस्त थे और 6 महीने का समय चाहते थे। फिरोज खान इंतजार नहीं करना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने विनोद खन्ना को फिल्म में ले लिया। यह फैसला भी इतिहास बन गया और कुर्बानी हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी सुपरहिट फिल्मों में शामिल हुई। 1974 में रिलीज हुई फिल्म खोटे सिक्के में फिरोज खान का काऊ बॉय अंदाज इतना लोकप्रिय हुआ कि लोग उन्हें भारत का क्लिंट ईस्ट वुड कहने लगे और इसके बाद उन्होंने अभिनेता ही नहीं बल्कि निर्माता और निर्देशक के रूप में [संगीत] भी धर्मात्मा, कुर्बानी, जांबाज, दयावान और यलगार जैसी शानदार फिल्में देकर भारतीय सिनेमा को नई ऊंचाइयां दी। फिरोज खान सिर्फ अभिनेता नहीं थे बल्कि एक सोच, एक स्टाइल और एक व्यक्तित्व थे। उन्होंने हमेशा अपनी शर्तों पर जिंदगी जी। कई सुपरहिट फिल्मों का मौका गवाया लेकिन कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। [संगीत] आज भी जब हिंदी सिनेमा के सबसे स्टाइलिश सितारों की बात होती है तो फिरोज खान का नाम काफी सम्मान के साथ लिया जाता है। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सफलता केवल प्रतिभा से नहीं बल्कि अपने व्यक्तित्व और उसूलों पर अडिग रहने से भी हासिल होती है। तो दोस्तों, आज का यह वीडियो यहीं समाप्त करते हैं। मिलते हैं नेक्स्ट वीडियो में। तब तक के लिए आप सभी को टाटा बाय-ब टेक केयर।

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