Cli

कैसे इस आउटसाइडर ने बॉलीवुड के दिग्गज डायरेक्टर्स का सिंहासन हिला दिया?

Uncategorized

मुंबई के किसी अंधेरे सिंगल स्क्रीन थिएटर में अपनी सीट पर खामोश बैठा एक लड़का जब पर्दे की तरफ घूर रहा था तो सामने 100 करोड़ की ब्लॉकबस्टर फिल्म चल रही थी और पूरा सिनेमा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था। लेकिन वो लड़का उस जश्न के बीच खून के आंसू रो रहा था। पर्दे पर चल रही वो करोड़ों की कहानी दरअसल इसी लड़के की अपनी लिखी हुई थी। जिसे बिना कोई क्रेडिट दिए, बिना कोई पैसा दिए इंडस्ट्री की एक बहुत बड़ी और ताकतवर मशीनरी ने बड़ी चालाकी से चुरा लिया था और इसे गुमनामी के अंधेरे में धक्के खाने के लिए छोड़ दिया था। अगर मैं अपने देश अपने भाइयों के लिए अब नहीं लड़ा तो मैं अपनी नजरों में फर्जी बन के रह जाऊंगा और वैसे मैं जी नहीं पाऊंगा सर। आई प्रॉमिस यू आप मुझे कहीं भी भेज दीजिए। मैं अपने हर एक सिपाही को जिंदा सही सलामत वापस लाऊंगा। एक स्ट्रगलिंग और एस्पायरिंग राइटर के लिए यह वो मोड़ होता है जहां इंसान टूट कर बिखर जाता है।

अपना बोरिया बिस्तर बांधता है और अपने शहर वापस लौट जाता है। यह मानकर कि माया नगरी में बिना गॉड फादर के सिर्फ और सिर्फ इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन सालों तक इस भयंकर फ्रस्ट्रेशन, रिजेक्शन और धोखे को अपने सीने में एक ज्वालामुखी की तरह दबाकर रखने वाले इस कश्मीरी लड़के ने हार मानने के बजाय अपना रिवेंज मोड ऑन कर लिया। और जब आखिरकार इन्होंने कैमरे के पीछे खड़े होकर एक्शन बोला तो इंडियन सिनेमा के इतिहास में एक ऐसा भूचाल आया जिसने बॉलीवुड के पूरे पॉपकॉर्न स्पाई यूनिवर्स की धज्जियां उड़ा कर रख दी। लुट गया मेनु लुट गया। इनके लिए असली अवार्ड बॉक्स ऑफिस का वो 400 करोड़ का कलेक्शन नहीं था। बल्कि वह पल था जब एक स्क्रीनिंग के दौरान आर्मी के परिवारों ने नम आंखों से इनके पास आकर कहा कि आज तक किसी ने उनके बलिदान और उनके परिवार के दर्द को इतने सच्चे रूप में पर्दे पर नहीं उतारा था और जब 15 16 साल के बच्चों ने इन्हें मैसेज करके कहा कि इनकी फिल्म देखने के बाद उन्होंने अपनी जिंदगी इंडियन आर्मी को समर्पित करने का फैसला लिया है। यह वो मुकाम था जहां इस आउटसाइडर ने यह साबित कर दिया कि यह इंडियन सिनेमा में सिर्फ पैसा कमाने नहीं बल्कि एक लेगसी छोड़ने आए हैं। ना तो कारवा की तलाश है ना तो कारवा की आज बेबाक बॉलीवुड के इस डायरेक्टर स्पेशल एपिसोड में हम बात कर रहे हैं उस फिल्म मेकर की जिसने उरी द सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर मेगा ब्लॉकबस्टर धुरंधर तक इंडियन सिनेमा की पूरी ग्रामर को बदल कर रख दिया। हम बात कर रहे हैं मास्टर ब्लास्टर डायरेक्टर आदित्य धर की।

लेडीज एंड जेंटलमैन यू आर नॉट रेडी फॉर दिस। हम देखेंगे कि कैसे 12 दिन के एक पागलपन ने 400 करोड़ की आंधी पैदा की। कैसे नौ स्टंट मैन और 12 स्ट्रीट लैंप्स के जुगाड़ से एक नेशनल अवार्ड विनिंग वॉर फिल्म शूट की गई और कैसे धुरंधर के उस रूह कपा देने वाले रेड स्क्रीन सीन और 2611 के असली खौफनाक ऑडियो टेप्स ने बॉलीवुड के फेक स्पाई एक्शन को हमेशा के लिए दफन कर दिया। रहमानत की दी हुई मौत बड़ी कसाईनुमा होती है। कुर्सी की पेटी कस कर बांध लीजिए क्योंकि एक आउटसाइडर की ये खून पसीने से लिखी गई दास्तान किसी भी थ्रिलर फिल्म से 100 गुना ज्यादा इंटेंस और इंस्पायरिंग है। हाउ द जोश इस कहानी की शुरुआत होती है 5 सितंबर 2006 को जब सपनों के बोझरेले दबे हुए आदित्य मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर उतरे थे। लेकिन इनका यहां होना अपने आप में किसी मेडिकल चमत्कार से कम नहीं था। आदित्यधर बचपन से ही सिवियरली डिस्लेक्सिक थे। एक ऐसी न्यूरोलॉजिकल कंडीशन जहां इंसान के लिए अक्षरों को पहचानना, उन्हें जोड़कर पढ़ना और समझना किसी पहाड़ तोड़ने जितना मुश्किल काम के बराबर होता है। और आज भी अगर इन्हें किसी किताब या स्क्रिप्ट के दो-तीन पन्ने पढ़ने हो तो उस काम में इन्हें पूरा एक दिन लग जाता है जो कि एक आम इंसान के लिए महज कुछ मिनटों का काम है। एक ऐसा इंसान जिसके लिए पढ़ना और लिखना एक भयंकर डिसेबिलिटी थी। उसी इंसान का स्क्रिप्ट राइटिंग के प्रोफेशन में अपना करियर बनाने का फैसला समझ से परे था। पढ़ाई में यह बेहद कमजोर थे। क्लास में हमेशा पीछे छूट जाते थे। इनका कश्मीरी पंडित परिवार भले ही किसी फिल्मी बैकग्राउंड से नहीं था लेकिन इनके घर में हमेशा क्लासिकल म्यूजिक की महफिलें सजती थी। नाटकों की चर्चा होती थी और बड़े-बड़े आर्टिस्ट्स का आना-जाना लगा रहता था। जिसने इनके अंदर की उस आर्टिस्टिक आग को शायद कभी बुझने नहीं दिया और इन्हें कहानियों की दुनिया से जोड़े रखा। मतलब आप पीओ के और अक्षर जिनको भारत देश का हिस्सा नहीं मानते। क्या बात कर रहे हैं आप? जान दे देना मुश्किल है। मुंबई आने के बाद का इनका सफर किसी भी आउटसाइडर की तरह ही बेहद क्रूर और दर्दनाक था। जहां यह अपनी लिखी हुई ओरिजिनल कहानियों को लेकर बड़े प्रोड्यूसर्स और स्टूडियोज के चक्कर काटते थे। उन्हें अपने पूरे कांसेप्ट्स नैरेट करते थे। लेकिन वो स्टूडियोज इन्हें रिजेक्ट करके बाहर निकाल देते थे और कुछ ही

महीनों बाद वही स्टूडियोज हूबहू उसी कहानी पर 100-100 करोड़ की फिल्में बनाकर किसी और राइटर के नाम से रिलीज़ कर देते थे। अपनी आंखों के सामने अपनी दिन रात की मेहनत और अपने आइडियाज को दूसरों के नाम पर बिकता हुआ देखकर एक एस्पायरिंग राइटर के तौर पर इनका धैर्य पूरी तरह से जवाब दे चुका था। यह थक चुके थे, टूट चुके थे और इनके मन में बार-बार यह ख्याल आने लगे कि अब इस माया नगरी को छोड़कर वापस लौट जाने का वक्त आ गया है। लेकिन मुंबई के इस क्रूज शहर में सर्वाइव करने के लिए जब इन्होंने छोटे-मोटे काम करना शुरू किया। गानों के लिरिक्स लिखे। फिल्मों में बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर काम किया। तो इसी संघर्ष के दौरान आक्रोश और तेज जैसी फिल्मों के सेट पर इनकी मुलाकात इंडस्ट्री के उन दिग्गजों से हुई जिन्होंने इनके टैलेंट की असली कीमत पहचानी। यारी यारी तेरी मेरी एक विशाल भारद्वाज, प्रियदर्शन और रॉबिन दा जैसे सिनेमा के दिग्गजों ने आदित्य के काम को देखकर इनसे कहा कि तेरे अंदर कुछ अलग बात है। रुक जा तू कर पाएगा। बस थोड़ा और इंतजार कर ले। देर है लेकिन अंधेर नहीं है और इसी भरोसे ने इन्हें उस दलदल में डूबने से बचा लिया। भले ही इनके सामने अभी सबसे बड़ा और सबसे खौफनाक प्रोफेशनल हार्ट ब्रेक आना बाकी था। मैं लड़ जाना मैं लड़ जाना है लहू में एक चिंगारी तुझसे। बॉलीवुड में कहा जाता है कि अगर आपकी किस्मत में जिंक्स यानी पनौती लग जाए तो आप चाहे जितनी भी मेहनत कर लें आपका प्रोजेक्ट कभी फ्लोर पर नहीं जा पाता और आदित्यधर के साथ भी यह सिलसिला सालों तक चलता रहा। साल 2013 में यह अपनी पहली फिल्म डायरेक्ट करने वाले थे। लेकिन वह प्रोजेक्ट शुरू होने से पहले ही बंद हो गया। फिर साल 2016 में इन्हें dharma प्रोडक्शनंस के बैनर तले एक बहुत बड़ी फिल्म डायरेक्ट करने का मौका मिला जिसका नाम था रात बाकी। यह एक शानदार रोमांटिक एक्शन फिल्म होने वाली थी जिसमें उस वक्त के सबसे बड़े आर्ट थ्रो फवाद खान और सुपरस्टार कैटरीना कैफ लीड रोल में थे। शूटिंग शुरू होने में महज 15 दिन बाकी थे। सेट्स बन चुके थे। क्रू तैयार था और इनका डायरेक्टर बनने का वह सालों पुराना सपना आखिरकार सच होने जा रहा था। लेकिन 18 सितंबर 2016 की उस मनहूस सुबह जम्मू कश्मीर के उरी में एक भयंकर आत्मघाती आतंकी हमला हुआ जिसमें इंडियन आर्मी के कई जवान शहीद हो गए। इस हमले ने पूरे देश के साथ-साथ बॉलीवुड के भी समीकरण रातोंरात पलट कर रख दिए। जम्मू कश्मीर के उरी में सेना की 12 यूनिट के बेस पर हुए आत्मघाती हमले में सेना के 17 जवान शहीद हो गए हैं। इस हमले के ठीक दो दिन बाद 20 सितंबर को राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ताओं ने धर्मा प्रोडक्शनंस के ऑफिस पर धावा बोल दिया। वहां जमकर पत्थरबाजी की और खुली धमकी दी कि अगर धर्मा के किसी भी फिल्म में पाकिस्तान का कोई भी एक्टर दिखा, तो वह उन फिल्मों को बनने ही नहीं देंगे। एक तरफ धर्मा का ऑफिस और पूरा क्रू इस बात को लेकर पैनिकिक में था कि महज 15 दिन में फवाद खान का रिप्लेसमेंट कहां से लाया जाए और दूसरी तरफ आदित्य समझ चुके थे कि इनकी किस्मत ने एक बार फिर इनके साथ बहुत भद्दा मजाक किया है और यह फिल्म अब कभी नहीं बन सकेगी। यहां धर्मा ऑफिस में लोग फवाद के रिप्लेसमेंट को लेकर माथापच्ची कर रहे थे। और वहां दूसरी तरफ इंडियन आर्मी ने उस हमले का बदला सर्जिकल स्ट्राइक करके ले लिया और इसी के बाद आदित्य के दिमाग में एक ऐसी बिजली कौंधी जिसने इनके करियर की दिशा हमेशा के लिए मोड़ दी। उरी हमले का हैंडलर कौन था? प्लानिंग कहां हुई थी? मैडम हमें कुछ नहीं पता। हम तो बटमोल में अखरोट का बिज़नेस करते हैं। ज्यादा नाटक किया ना तो तेरे अखरोट तेरे मुंह से बाहर निकाल दूंगी। एक कश्मीरी होने के नाते इन्होंने घाटी की खौफनाक हकीकत को दिन रात जिया था। इन्होंने उन आर्मी वालों का वह दर्द सुना था जो हमेशा कहते थे कि उन्हें कभी वापस जवाब देने का या बदला लेने का मौका नहीं दिया जाता और आखिरकार जब वो मौका सेना को मिला तो इनका वो ऑब्सेशन जाग उठा कि ये नामुमकिन ऑपरेशन आखिर अंजाम कैसे दिया गया। उन्हें कश्मीर चाहिए और हमें उनका सर। आर यू रेडी बॉयज? जय हिंद। जय। इन्होंने तय कर लिया कि जिस आतंकी हमले की वजह से इनकी फिल्म डब्बे में गई है, यह उसी हमले और उसके करारे जवाब पर एक ऐसी फिल्म लिखेंगे जो इंडियन सिनेमा के इतिहास में अमर हो जाएगी। भले ही इसके लिए इन्हें अपनी जिंदगी की आखिरी जमा पूंजी तक ही क्यों ना दांव पर लगानी पड़े। बनके तन के 1 अक्टूबर 2016 से इन्होंने इस क्लासिफाइड और गुप्त ऑपरेशन की रिसर्च शुरू कर दी जो किसी फिल्म की स्क्रिप्टिंग से ज्यादा एक खतरनाक इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म का काम था। क्योंकि सर्जिकल स्ट्राइक से जुड़ी हर जानकारी टॉप सीक्रेट थी। इनके पास किसी प्रोड्यूसर का बैकिंग नहीं था। कोई सपोर्ट नहीं था बल्कि ये अपनी खुद की सेविंग्स उड़ाकर मुंबई से दिल्ली के अनगिनत चक्कर काट रहे थे। बड़े-बड़े जर्नलिस्ट, रिटायर्ड आर्मी ऑफिसर्स और डिफेंस एनालिस्ट से छुप-छुप कर मिल रहे थे ताकि इस ऑपरेशन की असलियत को दुनिया के सामने ला सकके। मैं आपको उरी में हुए शहीद भाइयों के मौत का बदला लेने का मौका देने जा रहा हूं। उनका सर धड़ से अलग करने का मौका देने जा रहा हूं। पूरे 6 महीने तक यह खामोश और थका देने वाला सिलसिला चलता रहा और हर दिन इन्हें यह डर सताता रहा कि अगर यह फिल्म भी रुक गई। अगर यह आखिरी सेविंग्स भी डूब गई तो इनका क्या होगा? यह एक ऑब्सेशन के शिकार हो चुके थे। जहां इन्हें दुनिया को कम से कम एक बार अपना टैलेंट साबित करके दिखाना ही था। और तभी आया 1 मार्च 2017 का वो दिन जिसने इन्हें एक भयंकर पैनिकिक अटैक दे दिया। जब इनके एक दोस्त ने फोन करके बताया कि बॉलीवुड का कोई और बड़ा बैनर सर्जिकल स्ट्राइक पर फिल्म बनाने जा रहा है। आई थिंक समबडी इस ट्राइंग टू मेक अ फिल्म ऑन सर्जिकल स्ट्राइक। एंड आई हैव आई वास लाइक डूड इट दिस दिस कांट बी हैप्पनिंग टू बी अगेन। इतनी बार अपनी फिल्मों को बनते बनते टूटते हुए देखने वाले आदित्य बुरी तरह घबरा गए कि कहीं यह कहानी भी इनके हाथ से ना निकल जाए और इसी खौफ ने इनके अंदर एक ऐसे क्रेजी मॉन्सर को जन्म दिया जिसने इन्हें एक कमरे में 12 दिन के लिए पूरी तरह से कैद कर दिया। उन 12 दिनों में इन्हें पता नहीं था कि इन्होंने खाना कब खाया है।

यह कब सोए हैं या बाहर की दुनिया में क्या चल रहा है। यह सिर्फ और सिर्फ उस रिसर्च को एक पावरफुल स्क्रीन प्ले में तब्दील कर रहे और यकीन मानिए एक डिस्लेक्सिक इंसान के लिए महज 12 दिन में एक पूरी फिल्म का ड्राफ्ट तैयार कर देना किसी अलौकिक चमत्कार से कम नहीं था। स्क्रीन प्ले पूरा होते ही इन्होंने इसे अपने मैनेजर चैतन्य को भेजा जिसने इसे आर एसबीपी की प्रोड्यूसर सानिया कवर को थमाया और हिदायत दी कि इसे अगले 2 घंटों के अंदर पढ़ना ही होगा क्योंकि कोई और भी इस सब्जेक्ट पर फिल्म बनाने की फिराक में है। सोनिया ने वो स्क्रिप्ट पढ़ी और वो इतनी इंप्रेस हुई कि उन्होंने तुरंत रोनी स्क्रू वाला को फोन घुमाया जो उस वक्त विजाग जाने की एक फ्लाइट में बोर्ड कर रहे थे और जो आमतौर पर किसी भी स्क्रिप्ट को पढ़ने के लिए 15 से 20 दिन का वक्त लेते थे। लेकिन सोनिया की ज़िद पर रोनी ने उस फ्लाइट में ही उस स्क्रिप्ट का पहला पन्ना पड़ा। फिर दूसरा फिर तीसरा और जब तक वह फ्लाइट विजाग में लैंड हुई रोनी स्क्रू वाला उस स्क्रिप्ट को खत्म कर चुके थे और उन्होंने तुरंत सोनिया को फोन करके कहा कि चाहे कुछ भी हो जाए यह फिल्म बना रहा है। बाद में जब यह स्क्रिप्ट अप्रूवल के लिए इंडियन आर्मी के पास गई तो पता चला कि इंडस्ट्री के करीब 12 प्रोड्यूसर्स इस टॉपिक पर फिल्म बनाना चाहते थे। लेकिन किसी के पास अभी कहानी तैयार नहीं थी। सब सिर्फ आर्मी से परमिशन मांग रहे थे। जबकि इनकी वो 6 महीने की खून पसीना एक कर देने वाली रिसर्च आर्मी के हर चेक लिस्ट पर खरी उतर चुकी थी। तहसिद है मेरी दर्द चीर के निकल चुका मौका मिले तो घर में यह दोबारा लेकिन स्क्रिप्ट पास होना सिर्फ आधी जंग थी। असली लड़ाई तो सेट पर लेडी जानी थी जहां एक फर्स्ट टाइम डायरेक्टर को एक वॉर फिल्म बनानी थी। वो भी उस बेहद लिमिटेड बजट में जिसमें आमतौर पर बॉलीवुड के नए डायरेक्टर सिर्फ एक हल्की-फुल्की कॉमेडी ही बना पाते। यह फिल्म इनके और इनके क्रू के लिए किसी असली सर्जिकल स्ट्राइक से कम नहीं थी। जहां इन्हें हर दिन पैसे बचाने के लिए नए-नए और नामुमकिन जुगाड़ खोजने पड़ते थे। और जहां इनके पास बड़े स्टंट मैन या हॉलीवुड के एक्शन डायरेक्टर्स की फौज हायर करने का बजट बिल्कुल भी नहीं था। पूरी फिल्म में कुल पांच बहुत बड़े और विशाल एक्शन सीक्वेंसेस थे। चंदेल का एंबुश, म्यांमार का अटैक, पूरी का आतंकी हमला और पाकिस्तान के अंदर B1 और B2 लॉन्चपड पर किया गया फाइनल स्ट्राइक। लेकिन इनके पास इन सभी सीक्वेंस को शूट करने के लिए सिर्फ नौ स्टंट मैन की एक छोटी सी टीम थी। मेरे घर में घुस के मेरे भाइयों को मारा था ना। आज मैं तेरे घर में घुस के तेरे भाइयों को मार रहा हूं। इंडियन आर्मी कहते हैं हमें। इन्होंने पूरे शूट के दौरान उन्हीं नौ लोगों को बार-बार रिपीट किया। कभी उनके सर पर पगड़ी बांध दी जाती, कभी उनके चेहरे पर कोई गहरा स्कार बना दिया जाता, तो कभी उन्हें अलग-अलग तरह की दाढ़ी पहनाकर कैमरे के सामने खड़ा कर दिया जाता। और ऑडियंस को कभी भनक तक नहीं लगी कि पूरी पाकिस्तानी और आतंकी फौज दरअसल सिर्फ नौ लोगों की ही एक टीम थी। पीओके में घुसना तो आसान होगा।

लेकिन मुश्किल होगा अटैक के बाद वहां से वापस आना। आई अंडरस्टैंड सर। इतना ही नहीं क्योंकि फिल्म के ज्यादातर और सबसे अहम एक्शन सीक्वेंसेस गुप्त अंधेरे में रात के वक्त शूट होने थे और प्रोडक्शन के पास बड़े और महंगे लाइट्स हायर करने का बजट नहीं था तो इन्होंने एक ऐसा मास्टर स्ट्रोक खेला जो फिल्म मेकिंग के इतिहास में दर्ज हो गया। इन्होंने अपनी टीम से कहकर सिर्फ 12 स्ट्रीट लैंप्स तैयार करवाए और शूटिंग के दौरान उन्हीं 12 खंभों को चकोटी विलेज के सेट से उखाड़कर B1 लॉन्च पैड के बाहर लगाया जाता और फिर वहां से उखाड़कर B2 के सेट पर खड़ा कर दिया जाता। पूरी फिल्म में उन 12 स्ट्रीट लैंप्स ने वह जादुई रोशनी दी जिसने 250 करोड़ से ज्यादा का डोमेस्टिक और 400 करोड़ का वर्ल्ड वाइड कलेक्शन करके बॉलीवुड के सारे गणित ही फेल कर दिए। यह सिर्फ एक डायलॉग नहीं रहा दोस्तों। यह पूरे हिंदुस्तान का नेशनल एंथम बन गया। पूरी की उस मॉन्सर सक्सेस के बाद इंडस्ट्री के नियम के मुताबिक इन्हें बॉलीवुड के सबसे बड़े और सबसे रिस्पेक्टेड डायरेक्टर्स के तख्त पर बिठा दिया जाना चाहिए था। जहां यह अपनी शर्तों पर कोई भी फिल्म बना सकें। इन्होंने एक ऐसे प्रोजेक्ट की नीव रखी जो इंडियन सिनेमा का सबसे बड़ा और सबसे एंबिशियस विजुअल स्पेक्टिकल होने वाला था। द इम्मोर्टल अश्वत्थामा। सालों तक इस प्रोजेक्ट का प्रीप्रोडक्शन चला। हॉलीवुड के लेवल का कांसेप्ट आर्ट तैयार किया गया। वीएफएक्स की टीम्स हायर की गई और इन्होंने इस फिल्म के लिए अपने कई साल झोंक दिए। इस उम्मीद में कि ये इंडियन सिनेमा को एक ग्लोबल ओडीएम पर लेकर के जाएंगे। लेकिन बॉलीवुड की पॉलिटिक्स एक बार फिर इनके आड़े आ गई। जब अचानक बिना किसी ठोस वजह के रातोंरात बजट और कास्टिंग का हवाला देकर इस ड्रीम प्रोजेक्ट को बंद कर दिया गया। इट वाज़ टू बिग फॉर द मैथमेटिक्स टू वर्क इन फॉर इंडियन सिनेमा बिकॉज़ द काइंड ऑफ़ वीएफएक्स क्वालिटी वी वर लुकिंग एट नोबडी हैज़ इवन स्ट्र्राइप्ड फॉर इट येट। जिस डायरेक्टर ने इंडस्ट्री को 400 करोड़ की ब्लॉकबस्टर दी हो,

उसी इंडस्ट्री की साजिशों ने इनका सबसे बड़ा सपना इनके हाथों से छीनकर इन्हें यह एहसास दिलाने की कोशिश की कि यह शायद सिर्फ एक वन हिट वंडर थे और यह अश्वत्थामा जैसे महाकाव्य को हैंडल करने के लायक ही नहीं है। इंडस्ट्री के कई लोगों ने मान लिया था कि यह भयंकर साइकोलॉजिकल झटका इनके करियर को हमेशा के लिए खत्म कर देगा। लेकिन वह लोग भूल गए कि यह वही इंसान है जिसने 12 दिन के पागलपन में पूरी लिख डाली अश्वत्थामा के बंद होने ने इन्हें तोड़ा नहीं बल्कि इनके अंदर उस वेंजियंस मोड को पूरी तरह एक्टिवेट कर दिया। जहां इन्होंने कसम खा ली कि अब यह एक ऐसा मैगम ओपस प्रोजेक्ट बनाकर दिखाएंगे जो बॉलीवुड के सारे खोखले स्पाई यूनिवर्स को पैरों तले रौंद कर रख देगा। और इसी बदले की आग और परफेक्शन की कोख से जन्म हुआ उस फिल्म का जिसने पूरे इंडियन सिनेमा को हिला कर रख दिया। धुरंदर जब धुरंदर की स्क्रिप्ट और इसका विज़न पहली बार एक्टर्स को सुनाया गया तो सब हक्केबक्के रह गए क्योंकि इन्होंने साफ कर दिया था कि यह बॉलीवुड की उन पॉपकॉर्न स्पाई मूवीज की तरह कोई हल्कीफुल्की फिल्म नहीं बनाने वाले जहां स्पाई कैमरे के सामने चश्मा पहनकर नाचते हैं और बिना खरोच के सैकड़ों लोगों को मार कर निकल जाते हैं। इनका मकसद था कि ये जीरो डार्क 30 और अमेरिकन गैंगस्टर जैसी एलिट और डार्क फिल्मों के लेवल का एक ऐसा स्ट्रावलिंग सिनेमा बनाएंगे जो 3 सा 3 घंटे के रन टाइम के बावजूद ऑडियंस को अपनी सीट से हिलने भी नहीं देगा।

ड्रेमांड डकेस की दी हुई मौत बड़ी कसाईनुमा होती है। धुरंधर में इन्होंने जिस तरह का चैप्टर वाइज ट्रीटमेंट दिया, जिस तरह से कैरेक्टर्स को इंट्रोड्यूस किया और जिस तरह से फिल्म के फोकस को हमारी टेरिटरी से हटाकर दुश्मनों की टेरिटरी में सेट किया वो हिंदी सिनेमा के लिए काफी अलग था। लेकिन इस फिल्म का सबसे बड़ा मास्टर स्ट्रोक और सबसे रूह कपा देने वाला हिस्सा वो था जहां इन्होंने 2611 के मुंबई आतंकी हमलों के उन असली और खौफनाक ऑडियो रिकॉर्डिंग्स का इस्तेमाल किया। जहां पाकिस्तान में बैठे हैंडलर्स अपने आतंकियों को निर्देश दे रहे थे। थिएटर के गुप्त अंधेरे में जब सामने स्क्रीन पूरी तरह से खून जैसी लाल हो जाती है और बैकग्राउंड में वो असली ऑडियो घुसता है जहां हैंडलर कह रहा है इसको ऐसे बिठाकर सर पर ऐसे गोली मार और आतंकी पूछ रहा है कि इसको कैसे मारूं? ऐसे मारूं या वैसे मारूं। काफिरों को मारने की वो असली नफरत भरी आवाजें सीधे थिएटर्स में बैठे लोगों का खून खोला कर रख देती है और उस रेड स्क्रीन के भयंकर इंपैक्ट से पूरी ऑडियंस सिहर उठती है। अरे कोई अल्टीमेटम दे दे। ये तो हमारा अभी तो ट्रेलर है। अभी असल फिल्म का अभी बाकी है। इन्होंने कोई फिक्शन नहीं बेचा था। बल्कि उस रियल टाइम ट्रॉमा को अपनी कहानी में इतनी परफेक्शन के साथ इंटीग्रेट किया था कि बॉलीवुड के तमाम स्पाई थ्रिलर्स इसके सामने कार्टून नेटवर्क लगने लगे। आदित्यधर की इस पूरी जर्नी में एक आउटसाइडर के स्ट्रगल से लेकर धुरंधर के इस ऐतिहासिक मुकाम तक के सफर में आक्रोश के सेट का एक हिस्सा बड़ा ही मशहूर है जो इनकी असली पहचान को बयान करता है।

तमिलनाडु के करकुड़ी के बीहड़ में 50° की भयंकर गर्मी में यह एक डायलॉग राइटर होने के बावजूद डायरेक्शन टीम को पागलों की तरह असिस्ट कर रहे थे। पसीने से लथपथ होकर इधर से उधर भाग रहे थे। क्योंकि इनकी फितरत में ही था कि किसी भी प्रोजेक्ट में घुसो तो अपनी पूरी जान झोंक दो। उस दिन इनके सीनियर रॉबिन दा ने इन्हें पास बुलाकर एक ऐसी बात कही थी जो आज धुरंधर की इस अपार सफलता के बाद एक पक्की भविष्यवाणी की तरह लगती है। रॉबिन दा ने कहा आदित्य इस इंडस्ट्री में बहुत कम लोगों की पीठ बोलती है। तुम्हारे में वह बात है कि तुम्हारी जिंदगी भर के लिए पीठ बोलेगी। बस एक बात का ध्यान रखना कि तुम कभी बदलना मत और यह बिल्कुल नहीं बदले। इन्होंने बॉलीवुड के फेक और बनावटी सिस्टम के सामने कभी घुटने नहीं टेके बल्कि इन्होंने अपनी मेहनत और अपनी रिवेंज मोड वाली आग से उस पूरे सिस्टम को ही अपने हिसाब से झुकने पर मजबूर कर दिया। हिंदुस्तानी काफिर का सर काटकर मुशर्रफ के दस्तरखान पर रखा था मेजर इकबाल ने। आज जब संजय दत्त और अक्षय कन्या जैसे दिग्गज धुनंदर 2 के लिए इनके इशारों पर काम करने को बेताब हैं। तो यह इस बात का सबूत है कि जहां कुछ डायरेक्टर्स सिर्फ बॉक्स ऑफिस के कलेक्शन के लिए फिल्में बनाते हैं।

आदित्य धर जैसे डायरेक्टर्स इंडियन सिनेमा के इतिहास में एक ऐसा टाइमलेस पन्ना जोड़ने के लिए फिल्में बनाते हैं जिसकी मिसाल सदियों तक दी जाएगी। दोजक में अपने भाइयों को सलाम बोलना। कहना दावत पर इंतजार करें। आज बहुत सारे मेहमान भेजने वाले हैं। दोस्तों, आपको इनकी यह बेबाक और अनफिल्टर्ड कहानी कैसी लगी? क्या आपको भी लगता है कि धुरंधर ने बॉलीवुड के बाकी तमाम स्पाई यूनिवर्स को हमेशा के लिए फीका कर दिया है? कमेंट्स में बताइएगा। और अगर एक डिस्लेक्सिक आउटसाइडर से इंडियन सिनेमा के चैंपियन बनने की यह दास्तान आपको पसंद आई हो तो वीडियो को एक लाइक जरूर करें और अपने दोस्तों के साथ शेयर करें। ऐसे ही बॉलीवुड के सबसे रियल, सबसे डार्क और सबसे बेबाक सच को गहराई से जानने के लिए सब्सक्राइब करें हमारा चैनल बेबाक बॉलीवुड। मिलते हैं अगले वीडियो में एक और बेबाक दास्तान के साथ। तब तक के लिए नमस्कार। तर ते

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *