कहते हैं मुंबई में किस्मत और जमीन दोनों एक बार ही मौका देती हैं। जो उस मौके को पहचान ले उसकी आने वाली पीढ़ियां भी उसका फल खाती हैं। बॉलीवुड के जंपिंग जैक जीतेंद्र की कहानी इस बात की सबसे दिलचस्प मिसाल है। एक ऐसा बंगला जिसे खरीदने के बाद उन्हें अपना करियर डूबता नजर आया जिसे उन्होंने मनहूस मानकर छोड़ दिया।
वही बंगला आज करीब ₹450 करोड़ की जमीन के रूप में उनकी सबसे बड़ी प्रॉपर्टी है और उसी के सदके उन्होंने पिछले दो सालों में 1400 करोड़ से ज्यादा के रियलस्टेट सौदे किए हैं। आइए इस पूरी कहानी को शुरुआत से एक-एक पड़ाव पर समझते हैं। जितेंद्र का जन्म रवि कपूर के नाम से हुआ था। उनका परिवार लोअर मिडिल क्लास ग्रुप से आता था और मुंबई के गिरगांव इलाके की एक चोल में रहता था। जितेंद्र ने खुद एक इंटरव्यू में बताया था कि वह आठ लोगों के साथ महज 20 * 10 फीट के एक कमरे में रहते थे। जहां ना अलग जगह थी ना प्राइवेसी। ऐसे माहौल में पला लड़का जब फिल्मों में किस्मत आजमाने निकला तो उसके लिए अपना घर सिर्फ एक सपना नहीं बल्कि एक जिद थी। जितेंद्र ने अपनी फिल्मी सफर की शुरुआत 1964 में गीत गाया पत्थरों ने से की और 1967 की फिल्म फर्ज ने उन्हें घर-घर में मशहूर कर दिया। आगे चलकर [संगीत] उन्होंने छह दशकों से ज्यादा के करियर में 200 से ज्यादा फिल्में की। लेकिन इस कहानी में मोड़ किसी फिल्म के सुपरहिट होने से नहीं बल्कि एक बंगले के सौदे से आया।
उस दौर में भारत भूषण का नाम फिल्म इंडस्ट्री में बड़े सम्मान से लिया जाता था। 1950 के दशक के इस बड़े सितारे ने बैजू बावरा और मिर्जा गालिब जैसी यादगार फिल्मों में काम किया था। लेकिन समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। जितेंद्र के मुताबिक भारत भूषण उस वक्त आर्थिक तंगी से गुजर रहे थे। उन्हें अपना पाली हिल का बंगला बेचना पड़ रहा था। पाली हिल आज बांद्रा का सबसे महंगा और प्रतिष्ठित इलाका माना जाता है। यहां बड़े-बड़े सितारे रहते हैं। भारत भूषण ने अपना यह बंगला जितेंद्र को बेचने की पेशकश की। जितेंद्र के लिए यह प्रस्ताव किसी सपने के सच होने जैसा था। लेकिन साथ ही डरावना भी।
चोल में पले बड़े एक नौजवान के लिए बंगला खरीदना बहुत बड़ी बात थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस फैसले के पीछे उनके पिता का हौसला था। जिन्होंने उन्हें यह छलांग लगाने के लिए प्रेरित किया। आखिरकार सौदा ₹5 लाख में तय हुआ। इस कीमत में सिर्फ इमारत ही नहीं बल्कि 3450 स्क्वायर फुट का प्लॉट भी शामिल था। आज के जमाने में यह रकम सुनकर यकीन करना मुश्किल लगता है क्योंकि पाली हिल में इतने पैसों में शायद एक पार्किंग की जगह भी ना मिले। जितेंद्र का परिवार चोल की तंग गलियों से निकलकर एक खुले हवादार बंगले में पहुंच गया था। यह उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा दिन था। लेकिन कहानी में असली ट्विस्ट यहीं से शुरू होता है। बंगले में रहने के कुछ ही वक्त बाद जितेंद्र की लगातार चार फिल्में फ्लॉप हो गई। उस दौर में फिल्म इंडस्ट्री अंधविश्वासों के लिए बदनाम थी और लगातार नाकामी ने जितेंद्र को भीतर तक हिला दिया। उनके मन में यह बात घर कर गई कि शायद बंगले में ही कोई गड़बड़ है।
जिस घर के पिछले मालिक भारत भूषण पैसों की तंगी में आ गए थे, उसी घर में अब उन्हें भी अपना करियर खतरे में दिखने लगा। जितेंद्र ने जो डर महसूस किया वो यही था कि कहीं उनका हाल भी भारत भूषण जैसा ना हो जाए। उन्होंने अपने पिता से कहा कि भारत भूषण इस घर को छोड़कर जा चुके हैं और अब उनकी बारी है। अगर यही सिलसिला चलता रहा तो उनका करियर खत्म हो जाएगा। पिता ने भी बेटे की बात मान ली। वही पिता जिन्होंने कभी बंगला खरीदने का हौसला दिया था। अब उसे छोड़ने की सहमति दे रहे थे। परिवार ने बंगला खाली कर दिया। यहां एक दिलचस्प बात ध्यान देने लायक है। जितेंद्र ने बंगला बेचा नहीं बस उसमें रहना छोड़ दिया। एक छोटी सी बात आगे चलकर पूरी कहानी का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुई। बंगला उनके पास ही रहा। जमीन उनके पास ही रही। अंधविश्वास ने उन्हें घर से दूर किया लेकिन प्रॉपर्टी से नहीं। अगर उन्होंने डर के मारे उसे बेच दिया होता तो शायद आज यह कहानी लिखी ही ना जाती। कई सालों बाद जब उस बंगले के रीडवलपमेंट का ऑफर आया तो जितेंद्र ने बिना हिचकिचाहट के हामी भर दी। पुरानी इमारत गिराई गई और तभी एक हैरान करने वाली बात सामने आई। उस पुराने बंगले में बर्मा टीक की लकड़ी लगी हुई थी जो अपनी मजबूती और कीमत के लिए जानी जाती है। जब इमारत तोड़ी गई तो सिर्फ इस लकड़ी की बिक्री से ही जितेंद्र को ₹1.5 लाख मिले।
यानी पूरे बंगले के लिए उन्होंने जो ₹5 लाख दिए थे उसके करीब पौने तीन गुना रकम सिर्फ लकड़ी ने लौटा दी। सोचिए जिस घर को मनहूस कहकर छोड़ा गया उसने ढहते ढहते भी अपनी कीमत से कई गुना ज्यादा दे दिया। जितेंद्र ने इसे याद करते हुए यही बताया कि लकड़ी की [संगीत] कमाई ने उनकी मूल इन्वेस्टमेंट को कई गुना कर दिया था। फिर पुराने बंगले की जगह एक नई इमारत खड़ी हुई जिसे गौतम अपार्टमेंट्स नाम दिया गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक इसमें दो बेडरूम वाले कुल 82 फ्लैट बने। शुरुआत में इन फ्लैटों की बिक्री ₹85 पर स्क्वायर फुट के रेट से हुई थी। आज उस इलाके में यही प्रॉपर्टी करीब ₹85,000 पर स्क्वायर फुट के भाव पर बिकती है। यानी कीमत में लगभग 1000 गुना उछाल आया। यह मुंबई की जमीन की ताकत का सबसे बड़ा सबूत है। जहां सही जगह पर खरीदी गई प्रॉपर्टी वक्त के साथ कई गुना महंगी हो जाती है। जितेंद्र ने इस पूरे सफर का सार बताते हुए कहा कि जिस जमीन पर आज ये इमारत खड़ी है, उसकी कीमत अब करीब ₹450 करोड़ है। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक पूरी प्रॉपर्टी की वैल्यू ₹500 करोड़ से भी ऊपर की बैठती है। यानी ₹5 लाख का सौदा आज अरबों का हो चुका है। इसे अगर सीधे गणित में देखें तो यह कीमत करीब 1 लाख गुना बड़ी है। एक ऐसा आंकड़ा जो किसी भी शेयर मार्केट इन्वेस्टर को ईर्ष्या से भर दे और यही वो नीव थी जिस पर जितेंद्र ने आगे अपनी जमीन जायदाद वाली सोच [संगीत] को खड़ा किया। उन्होंने प्रॉपर्टी में पैसा लगाना शुरू किया और इसका उन्हें भरपूर रिटर्न मिला। पाली हिल का बंगला जितेंद्र की रियलस्टेट यात्रा का सिर्फ पहला पड़ाव था। लेकिन कपूर परिवार की असली बड़ी छलांग बाद में आई। जितेंद्र की बेटी एकता कपूर जो बालाजी टेली फिल्मs के जॉइंट एमडी और क्रिएटिव हेड हैं और बेटे तुषार कपूर के साथ परिवार का नाम अंधेरी के बालाजी आईटी पार्क से जुड़ा हुआ है। मई 2025 में परिवार की दो कंपनियों पैंथियन बिल्टकॉन प्राइवेट लिमिटेड और तुषार इंफ्रा डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड ने अंधेरी की 2.39 एकड़ की जमीन का एक हिस्सा जापान की एनटीटी ग्लोबल डाटा सेंटर्स को ₹855 करोड़ में बेच दिया। स्क्वायरार्ड्स द्वारा देखे गए रजिस्ट्रेशन दस्तावेजों के मुताबिक यह सौदा दो सटी हुई जमीनों का था।
जिनका टोटल एरिया 9664 स्क्वायर मीटर था। इस पर तीन इमारतें बनी थी। जिनका टोटल बिल्ट अप एरिया करीब 4.9 लाख स्क्वायर फीट था। इस सौदे पर करीब 8.69 करोड़ की स्टैंप ड्यूटी चुकाई गई। यह उस साल किसी बॉलीवुड परिवार का सबसे बड़ा रियलस्टेट सौदा माना गया। सिलसिला यहीं नहीं रुका। जनवरी 2026 में जितेंद्र की कंपनी पैंथियन बिल्ट कॉर्न और तुषार कपूर की कंपनी ने चांदी में स्थित बालाजी आईटी पार्क की एक और प्रॉपर्टी एनटीटी ग्लोबल डाटा सेंटर्स को 559 करोड़ में बेच दी। इस बार बिकी प्रॉपर्टी में 30195 स्क्वायर मीटर का एरिया शामिल था जिसमें 10 मंजिला डाटा सेंटर इमारत और उससे जुड़ी चार मंजिला डीजल जनरेटर की इमारत थी।
यह सौदा 9 जनवरी को रजिस्टर हुआ। इसके अलावा जून 2025 में जितेंद्र और एकता ने मुंबई के वली में एक अपार्टमेंट भी ₹1.5 करोड़ में बेचा। अगर सिर्फ दोनों बड़े सौदों को जोड़े तो 855 करोड़ और 559 करोड़ मिलाकर कुल 1414 करोड़ बनते हैं। यही वह आंकड़ा है जिसकी वजह से कहा जा रहा है कि पिछले दो सालों में जितेंद्र के परिवार ने ₹1400 करोड़ से ज्यादा के सौदे किए। यहां एक बात साफ कर देना जरूरी है। ₹1400 करोड़ के ये दोनों सौदे सीधे पाली हिल के बंगले से नहीं आए। वो बालाजी आईटी पार्क की प्रॉपर्टीज से आए जो कपूर परिवार की अलग-अलग कंपनियों की मिल्कियत थी।
लेकिन कहानी का असली रिश्ता सोच से है। जिस नौजवान ने कभी चोल से निकलकर जमीन में पैसा लगाने का जोखिम उठाया था, उसने आगे भी वही रास्ता अपनाया। रियलस्टेट एक्सपर्ट्स भी मानते हैं कि जितेंद्र का रिकॉर्ड बार-बार खरीद-बेच का नहीं बल्कि सब्र के साथ लंबे समय तक इन्वेस्टमेंट बनाए रखने का रहा है। जिसका फायदा मुंबई जैसे शहर के दुर्लभ और महंगी जमीन के दशकों तक बढ़ते दामों ने उन्हें दिलाया। जितेंद्र की यह यात्रा तीन बड़ी बातें सिखाती है। पहली अंधविश्वास आपको घर से दूर कर सकता है लेकिन प्रॉपर्टी से नहीं। उन्होंने बंगले में रहना छोड़ा मगर उसका मालिकाना हक नहीं छोड़ा। दूसरी जमीन में किया गया इन्वेस्टमेंट सब्र मांगता है। चार फ्लॉप फिल्मों का डर, दशकों का इंतजार, रीडेवलपमेंट की प्रक्रिया इन सबके बाद ही फल मिला। तीसरी किस्मत कभी मनहूस नहीं होती। नजरिया होता है।
जिस बंगले को कभी दुर्भाग्य की निशानी समझा गया वही आखिर में परिवार की सबसे बड़ी दौलत की नींव बना। चोल के आठ लोगों वाले उस 20 * 10 के कमरे से लेकर 450 करोड़ की जमीन और 1414 करोड़ के सौदों तक का यह सफर बताता है कि कभी-कभी जिस चीज से हम सबसे ज्यादा डरते हैं वही हमारी सबसे बड़ी पूंजी बन जाती है। जितेंद्र ने जिस बंगले को मनहूस कहकर छोड़ा था उसी ने उन्हें और उनके परिवार को वो हैसियत दे दी जिसका सपना शायद ही चोल के उस छोटे कमरे में बैठकर कभी देखा गया होगा।