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सरदार पटेल की जगह महात्मा गांधी ने जवाहरलाल नेहरू को क्यों प्राइम मिनिस्टर बनाया?

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इन [संगीत] दिनों पाकिस्तान की जिद पर अड़े हुए थे तभी ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया कहा जाता है कि कांग्रेस के नेता चाहते थे कि जवाहरलाल नेहरू नहीं बल्कि सरदार बल्लभ भाई पटेल अंतरिम प्रधानमंत्री बने थे है क्योंकि वह नेहरू से बेहतर पटेल ही थे जो जिन्ना से पाकिस्तान को लेकर बेहतर मोलभाव कर सकते थे है लेकिन महात्मा गांधी ने नेहरू को चला आ है तो के कांग्रेस नेता और बाद में देश के पहले राष्ट्रपति बनेगा राजेंद्र प्रसाद ने कहा था गांधी

ने एक ड्रेस नेहरू के लिए अपने विश्वसनीय साथी का बलिदान कर दिया आजादी के 14 साल बाद जब बीजेपी खुले मंच सहित सरदार पटेल का समर्थन करती है कि देश से [प्रशंसा] कि तुम बड़ा कश्मीर का हिस्सा पाकिस्तान के साथ ही कांग्रेस नेता की दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति बीजेपी बनवाती है ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि क्यों सरदार पटेल प्रधानमंत्री नहीं बने हैं कर दो तो इसके लिए साल 1947 में चलते हैं देश के आजाद होने से एक साल पहले ही अंग्रेज़ों ने देश की सत्ता भारतियों के हाथ में दे दी थी तय हुआ था कि कांग्रेस का अध्यक्ष ही प्रधानमंत्री बनेगा तब

मौलाना अबुल कलाम आजाद छह सालों से कांग्रेस के अध्यक्ष थे 20 अप्रैल 1946 में महात्मा गांधी ने मौलाना को पत्र लिखकर कहा कि वे एक वक्तव्य जारी करें और कहीं कि अब वह अध्यक्ष नहीं बने रहना चाहते को कलेक्ट्रेट बॉल्स में के ज़िक्र के मुताबिक महात्मा गांधी ने साफ कर दिया था कि अगर इस बार मुझसे राय मांगी गई तो मैं जवाहरलाल कपासन करूंगा इसके कई कारण है उनका मैं जिक्र नहीं करना चाहता आचार्य जेबी कृपलानी अपनी किताब गांधी हस लाइफ एंड थॉट्स मय नेहरू के अध्यक्ष चुने जाने का जिक्र करते हुए लिखते हैं

परंपरा के मुताबिक 15 में से 12 चुनाव क्रांति कमेटियों ने पटेल का नाम और बच्ची तीन ने अचार्य कृपलानी और पट्टाभि सीतारमैया का नाम प्रस्तावित किया कि किसी ने नेहरू को नहीं चुना जब यह 80 गांधी जी के पास पहुंची तो उनका रिएक्शन देखकर कृपलानी ने अपना और सीता रमैया का नाम वापस ले लिया लेकिन पटेल ने साइन नहीं किया कि ऐसे मैं गांधी नहीं नेहरू से कहा कि जवाहर वर्किंग कमेटी के अलावा किसी भी प्रांतीय कांग्रेस कमेटी ने तुम्हारा नाम नहीं सुझाया है तुम्हारा क्या कहना है कि नेहरू खामोश रहे तभी गांधी ने पश्चात दोबारा पटेल की तरफ बढ़ा दिया पटेल समझ चुके थे उन्होंने अपना नाम वापस लेने और नेहरू के अध्यक्ष चुनने के लिए साइन कर दिया मशहूर पत्रकार दुर्गादास अपने किताब इंडिया फ्रॉम करप्शन टू नेहरू में लिखते हैं इतने विरोध के बावजूद नेहरू को चुने जाने के सवाल पर गांधी ने कहा था

कि जब बाहर दूसरे नंबर पर आने के लिए कभी तैयार नहीं होंगे वह अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को पटेल के मुकाबले अच्छे से समझते हैं वह इसमें अच्छी भूमिका निभा सकते हैं यह दोनों सरकारी बैलगाड़ी को खींचने के लिए दो बैल है इसमें अंतरराष्ट्रीय कानूनों के लिए नेहरू और राष्ट्र के कामों के लिए पटेल होंगे दोनों गाड़ी अच्छी खींचेंगे गांधी के इस प्रेस इंटरव्यू से दो बातें निकल कर आए एक यह है कि नेहरू नंबर दो नहीं होना चाहते थे जबकि गांधी को भरोसा था कि पटेल को नंबर दो होने में कोई एतराज नहीं होगा और वाकई ऐसा ही हुआ क्योंकि पटेल मुंह फुलाने की बजाय एक हफ्ते के अंदर फिर ना केवल सामान्य हो गए एक बल्कि हंसी-मजाक करने लगे कर दो

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