देश को एकता के सूत्र में पिरोने वाले देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती पर देशभर में कई आयोजन हो रहे हैं. लेकिन उनके जीवन के कुछ किस्से ऐसे भी हैं, जो आज भी लोगों को प्रेरणा देते हैं. उनकी पत्नी झवेरबा के निधन से जुड़ा एक ऐसा किस्सा है, जिसकी वजह से उन्हें ‘लौह पुरुष’ भी कहा जाता है. उनकी पत्नी का निधन और उसकी खबर उनके जीवन की ऐसी अग्निपरीक्षा थी, जिसमें उन्होंने कुछ ऐसा किया जो पूरी दुनिया के लिए उदाहरण बन गया. तब एक ऐसी रहस्यमयी पर्ची आई थी, जिसकी हकीकत जब लोगों को पता चली तो उन्होंने माना कि यह जज्बा केवल सरदार पटेल में ही हो सकता है.
यह ऐतिहासिक कहानी साल 1909 की है, उस वक्त सरदार वल्लभभाई पटेल वकालत करते थे, गुजरात के आणंद में उनकी पहचान एक वकील के रूप में बन चुकी थी. उस दिन वह एक एक बेहद पेचीदा और गंभीर मर्डर केस की पैरवी कर रहे थे. वे अपने मुवक्किल को बचाने के लिए अदालत में जज के सामने दलीले दे रहे थे. पूरा कोर्ट रूम भरा हुआ था, पूरा कोर्ट रूम उनकी दलीलों को ध्यान से सुन रहा था. इसी दौरा अदालत का एक चपरासी दौड़ता हुआ आया और उसने वल्लभभाई पटेल के हाथ में पर्ची थमा दी. इस पर्ची में कुछ ऐसा लिखा था, जिसे कोई और पढ़ता तो तुरंत अपना काम छोड़कर घर की तरफ दौड़ लगा देता, क्योंकि पर्ची में उनकी पत्नी झवेरबा के निधन की खबर थी.
पर्ची में लिखा था अस्पताल में भर्ती उनकी पत्नी झवेरबा का निधन हो गया है. वह लंबे समय से बीमार चल रही थी, तब के बंबई आज के मुंबई में उनका ऑपरेशन होना था, लेकिन उसके पहले ही उनका निधन हो गया. पत्नी के अचानक चले जाने की खबर से कोई भी परेशान हो जाता, लेकिन कोर्ट रूप में सरदार पटेल के चेहरे का भाव तक नहीं बदला. पर्ची में लिखी खबर को पढ़ने के बाद सरदार पटेल ने उसे अपनी जेब में डाल लिया और अपना केस लड़ना जारी रखा. उस वक्त किसी को अंदाजा भी नहीं था कि उनके पास कितनी बड़ी खबर पहुंची है. सबको लगा कोई छोटी खबर होगी. उन्होंने जज के सामने अपनी दलीलें रखी और मुवक्किल को बरी करा लिया.
अदालत की कार्यवाही खत्म होने के बाद वह कोर्ट रूम से बाहर निकले और अपने दोस्त को बताया ‘मेरी पत्नी का अस्पताल में निधन हो गया है. यह सुनकर उनका दोस्त हैरान रह गया और उसने पूछा कि इतनी बड़ी दुखद खबर मिलने के बाद भी आपने अदालत का काम क्यों नहीं रोका?. इस पर उन्होंने जो कहा वह आज भी इतिहास में दर्ज है. सरदार पटेल ने कहा ‘मेरी पत्नी तो अब इस दुनिया से जा चुकी थी. मैं वहां तुरंत पहुंचकर भी उसे वापस नहीं ला सकता था, लेकिन उस वक्त अदालत में मेरा मुवक्किल अपनी जिंदगी और न्याय के लिए पूरी तरह मुझ पर निर्भर था. अगर मैं उस समय अपनी पैरवी रोक देता, तो शायद एक बेगुनाह को फांसी की सजा हो जाती. अपनी पत्नी के प्रति मेरा जो कर्तव्य था, वो तो अब पूरा हो चुका था. लेकिन अपने मुवक्किल के प्रति मेरा पेशेवर कर्तव्य बाकी था.’