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जगन्नाथ मंदिर की पताका में कैसे लगी रहस्यमयी गांठ ?असली सच जानकर चौंक जाएंगे।

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चारों तरफ अर्नब तूफान की तबाही के बीच पूरी के जगन्नाथ मंदिर की पताका में कैसे लगी रहस्यमई गांठ? क्या भगवान ने बड़ी अनहोनी से बचा लिया? पूरी प्रकोप से बचा लेकिन चक्रवात अर्नव का अटैक अभी खत्म हो गया है क्या? 15 राज्यों में कल क्या होने वाला है? जमीन पर साइक्लोन का असर कितना होगा? और पहाड़ों पर शुरू हुई बर्बारी। केदारनाथ गंगोत्री और बद्रीनाथ धाम सब सफेद चादर में ढक गए हैं। क्यों?

लेकिन सबसे पहले धरती का बैकुंठ कहे जाने वाले जगन्नाथ पुरी की तस्वीरें आप देखिए। तूफान आया। तेज हवाएं चली। मौसम ने अपना रौद्र रूप दिखाया और पूरी के जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर लहराने वाले पतित पावन ध्वज में ब्रह्मा गांठ दिखाई। यह ब्रह्मगांठ बोलते हैं इसको। पतित पावन ध्वज को तूफानी हवाओं के बीच बदल दिया गया। और इस बीच ध्वज में गांठ जैसी आकृति बनने के बाद शून्य गांठ की धार्मिक मान्यता की चर्चा भी हो रही है। आज की पाठशाला में आपको बताने वाला हूं जगन्नाथ मंदिर के इन रेसियों के पीछे की पूरी कहानी। आस्था और सदियों से चली आ रही मान्यताओं का पूरा सिनेरियो क्या है?

चक्रवात अर्नव के असर से पूरी के कई तटीय और निचले इलाकों में भारी बारिश हुई। तेज आंधी आई। पुरी के समुद्र तट से लगभग 1.5 कि.मी. दूर यानी कि 1.5 कि.मी. दूर स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर के आसपास भी इसका असर दिखाई। अर्नव के गुजरने के बाद भी कई राज्यों में मौसम संबंधित मुश्किलें बनी हुई है और इस बीच भगवान जगन्नाथ महाप्रभु के मंदिर में दिलचस्प नजारा दिखाई। यहां आंधी तूफान सैकड़ों साल पुरानी परंपरा को रोक नहीं पाए। विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में तूफान तेज हवाओं के बावजूद मंदिर का ध्वज बदलने की परंपरा निभाई गई। करीब 214 फीट ऊंचे मंदिर के शिखर पर पहुंचकर चुनरा सेवक ने नील चक्र पर लगे पतित पावन ध्वज को बदला। इसी दौरान ध्वज पर रहस्मय गांठ दिखी। चक्रवात अर्णव के चलते तेज हवाओं ने मंदिर परिसर और आसपास के इलाकों को भी प्रभावित किया हुआ है। मंदिर के शिखर पर लगी पवित्र पतित पावन ध्वजा तेज हवा के कारण फट गई और इसी दौरान ध्वजा में शून्य गांठ बन गई।

और तो और श्रद्धालुओं की ओर से मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना के साथ नीलचक्र पर बांधी गई अन्य पताकाएं भी मंदिर के ऊपरी हिस्से पर जागी। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक इस ध्वज को हर दिन सूर्यास्त से पहले बदलना जरूरी होता है। खराब मौसम के बावजूद परंपरा निभाए जाने से श्रद्धालुओं में खूब उत्साह भी देखा। वहीं रहस्यमय गांठ को लेकर भी भक्तों में जिज्ञासा नजर आई। आप देखिए कि प्राचीन ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार पतित पावन ध्वजा में शून्य गांठ बनना शुभ संकेत माना जाता है। तेज हवा चलने पर जब दो या उससे ज्यादा ध्वजाएं आपस में उलझकर गांठ का रूप ले लेती है तो इसे शून्य गांठ कहा जाता है। आधी तूफान और भारी बारिश के दौरान ऐसा होने की संभावना रहती है। इसे ब्रह्म गांठ भी कहा जाता है। जगन्नाथ मंदिर के सेवादारों के मुताबिक अमूमन ऐसी गांठों का वजन 5 से 10 किलग्र तक हो सकता है। हालांकि अब ऐसा घटनाक्रम पहले के मुकाबले में कम देखने को मिलता है क्योंकि ध्वजाओं की लंबाई घटाकर करीब 14 हाथ तक कर दी गई। कहते हैं ना कि एक हाथ से ऐसे नापते हैं वो वाला 14 हाथ। जब रोजाना 51 हाथ और 150 हाथ लंबी ध्वजाएं चढ़ाई जाती थी पहले के जमाने में तब ऐसी गांठे ज्यादा बनती थी जिसके बारे में मैंने आपको बताया। लेकिन मान्यताओं के मुताबिक यह गांठ बनना शुभ संकेत माना जाता है।

श्रद्धालु इसे अर्नब तूफान की बड़ी विपत्ति टलने और भगवान के आशीर्वाद से भी जोड़कर देख रहे हैं। उड़ीसा में आए इन विनाशकारी महाचक्रवातों के समय भी मंदिर के नीलचक्र पर मौसम से जुड़े कई बड़े संकेत और बदलाव देखे गए थे। पानी और यास तूफान के दौरान जब तेज हवाएं चली तब भी पुराने सेवादारों के मुताबिक ऐसी ही गांठे बनी थी और मुख्य मंदिर को कोई बड़ा [संगीत] नुकसान नहीं पहुंचा था। मंदिर के सेवादार कहते हैं कि कोरोना महामारी के दौरान भी तेज हवाओं और भारी बारिश के बीच मंदिर में करीब 5.5 कि.ग्र. यानी कि 5 1/2 कि.ग्र. वजन की शून्य गांठ बनी गई। एक तरफ पूरी में चक्रवात अर्नव का असर देखने को मिला और चमत्कार देखने को मिला। तो वहीं देखिए कि उड़ीसा में हुए इस भीषण तूफान की मार के बावजूद चक्रवात अडव का असर अभी भी दिखाई दे रहा है। ऐसा नहीं है कि पूरी तरीके से उड़ीसा अभी इस चक्रपात से चक्रवात से बाहर निकल गया है। तूफान कमजोर जरूर पड़ा है लेकिन इसके बाद मूसलाधार बारिश लगातार जारी है। उड़ीसा के कई इलाकों में हालात अभी भी बिगड़े हुए हैं। ओसा के 17 जिले प्रभावित हुए हैं और इनमें से सबसे ज्यादा प्रभावित और गंभीर रूप से असर झेलने वाले आठ दक्षिणी जिले हैं। जिनमें गजपति और गंजाम जिलों से तबाही की तस्वीरें लगातार सामने आ रही हैं और सबसे ज्यादा सामने आ रहे हैं।

गजपति में गंदा वाटरफॉल का रौद्र रूप भी देखने को मिला है। यह देखिए लगातार हो रही बारिश के चलते इस झरने और पास की बने गंदा डैम में अचानक बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हुई। वाटरफॉल के खतरनाक रूप और तेज बहाव को देखते हुए जिला प्रशासन ने पर्यटकों के यहां आने पर पूरी तरीके से रोक लगा दी

। हिंदुस्तान के मैदानी इलाकों में अर्नब तूफान का असर है। तो वहीं पहाड़ी इलाकों में भी ठंड और शीत लहर की मार लोग झेलने लग गए हैं। पहाड़ों से जो तस्वीरें सामने आ रही हैं वह मौसम के एक बिल्कुल अलग अंदाज और मिजाज की गवाही दे रही है। बाबा केदार की नगरी केदारनाथ में बर्फ बारिश शुरू हो गई है। मंदिर परिसर से लेकर आसपास की पहाड़ियों तक बर्फ की सफेद चादर बिछने लग गई।

बद्री विशाल के धाम में भी मौसम ने करवट ले ली है। नीलकंठ और नर नारायण पर्वत बर्फ से ढकने लगे हैं। चमोली जिले में मौसम के बदले मिजाज के चलते ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फबारी शुरू। वहीं निचले इलाकों में भी बादलों ने डेरा जमा लिया है। गंगोत्री धाम में भी बर्फबारी ने दस्तक दे दी है।

गंगोत्री के साथ ही गोमुख ट्रैक और आसपास के ऊंचाई वाले क्षेत्र में भी तेज बर्फबारी होने से तापमान काफी गिर गया है। यानी कि उत्तराखंड के पवित्र धामों से लेकर पहाड़ों की चोटियों तक हर तरफ बर्फ ही बर्फ दिखाई आपको दे रही है। ये तस्वीर आप देखिए। चारों तरफ सफेद चादर आपको दिखाई देगी। यह बर्फ की चादर है जिसमें यह पूरे इलाके लिपटे हुए हैं। आप देखिए कि एक तरफ मैदान में बारिश और बाढ़ का खतरा है। दूसरी तरफ पहाड़ों पर बर्फबारी की शीत लहरी की प्रकोप से लोग सिहर रहे हैं। कुदरत के यह दो अलग-अलग रूप बता रहे हैं कि मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है।

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