Cli

स!जा के बाद मुस्कान ने दोनों बेटियों पर लिया अंतिम फैसला! जे!ल में रोता रहा साहिल?

Uncategorized

नीले ड्रम वाली मुस्कान की बेटियों की जिम्मेदारी उठाएगा कवि दंपति। जी हां, अब पूरा मामला क्या है, मैं आपको समझाती हूं। गुनाह की सजा मिले या यह इंसाफ का तकाजा है। मगर मासूमों के बचपन को बचाना भी जरूरी है। जिस जुर्म में उनका कोई कसूर नहीं उस जुर्म की सजा से उन्हें बचाना भी जरूरी है। सोचिए कि एक तरफ ऐसा खौफनाक हत्याकांड है जिसने पूरे देश को झझोर कर रख दिया और दूसरी तरफ दो मासूम बच्चियां जिनकी दुनिया उनके माता-पिता के फैसलों की वजह से बदल गई। मेरठ के चर्चित नीले ड्रम हत्याकांड में मौत की सजा पाने वाली मुस्कान की आंखों में अब आंसू और फांसी का डर दिखाई देने की बात सामने आई है। इसी बीच मशहूर कवि दंपत्ति सौरभ सुमन और अनामिका अंबर ने ऐसा ऐलान किया जिसने एक नई बहस छोड़ दी। आखिर इस कवि दंपत्ति ने क्या जिम्मेदारी उठाने का फैसला किया? क्या वो मुस्कान की बेटियों की जिंदगी सवार पाएंगे और क्या मासूम बच्चियों के भविष्य को देखते हुए सजा पर रोक लगाने की मांग सही है?

आइए इस पूरी खबर को विस्तार से समझते हैं। पहला हिस्सा समझिए कि पूरा मामला क्या है? यह कहानी है मेरठ के सौरव राजपूत हत्याकांड की जिसे देश भर में नीले ड्रम कांड के नाम से जाना गया। इस मामले में सौरभ राजपूत की पत्नी मुस्कान और उसके प्रेमी ने मिलकर जो है सौरभ की हत्या की और सबूत मिटाने के मामले में दोषी ठहराया गया जब इन्हें 14 अक्टूबर को दोनों को मृत्युदंड की सजा सुना दी गई। इस मामले ने लोगों को इसीलिए भी जगझोर दिया क्योंकि एक परिवार के भीतर हुई इस वारदात का असर सिर्फ सौरभ की जिंदगी तक सीमित नहीं रहा। इससे दो मासूम बच्चियों का भविष्य भी सवालों के घेरे में आ गया। अदालत से मृत्युदंड की सजा सुनाई जाने के बाद मुस्कान ने अपनी दोनों ही बेटियों का ख्याल रखने की गुहार लगाई थी। अब सवाल यह कि इन बच्चियों की परवरिश कौन करेगा और उन्हें सुरक्षित भविष्य कैसे मिलेगा? दूसरा हिस्सा जेल में मुस्कान से मिले कवि दंपत्ति। इसी बीच कवि सौरभ सुमन और कवयत्री अनामिका अमर जेल में मुस्कान से मिलने के लिए पहुंचे। मुलाकात के बाद कवि दंपत्ति ने बताया कि मुस्कान डरी और सहमी हुई दिखाई दी थी।

उसकी आंखों में आंसू थे और मृत्युदंड को लेकर भय नजर आ रहा था। हालांकि मुस्कान के मन में वास्तव में क्या चल रहा था यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता। लेकिन इस मुलाकात के दौरान कवि दंपति का ध्यान एक ऐसे सवाल पर गया जिसका जवाब मिलना बेहद जरूरी है। आखिर उन दो बच्चियों का का क्या कसूर है जिनका इस अपराध में कोई हाथ ही नहीं है। कोई लेना देना नहीं है। बच्चियों की पढ़ाई का खर्च अब कवि दंपति उठाएगा। इस पूरे मामले में सबसे अहम बात यह है कि कवि दंपति सौरव सुमन और अनामिका अंबर ने मुस्कान की दोनों बेटियों की शिक्षा का खर्च उठाने की घोषणा कर दी है। उन्होंने कहा है कि बच्चों की पढ़ाई पर जितना भी खर्च आएगा वो उसे उठाने के लिए तैयार हैं। यानी जिस मामले ने एक परिवार को हमेशा के लिए बदल दिया उसमें अब इन बच्चियों के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए मदद का हाथ आगे बढ़ाया गया है। अनामिका अंबर ने साफ किया है कि उनकी इस पहल का मतलब मुस्कान के अपराध को माफ करना या उसे सही ठहराना नहीं है। उनका कहना है कि अपराध की सजा अपनी जगह है लेकिन बच्चियों को उस अपराध का दोषी नहीं माना जा सकता जिसमें उनकी कोई भूमिका ही नहीं है। क्या मुस्कान की फांसी टालने की भी मांग हुई है? तो इस खबर का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू भी समझिए।

कवि दंपति ने अदालत से अपील की है कि बच्चियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए उनकी मां को तब तक फांसी ना दी जाए जब तक बच्चियां इतनी बड़ी ना हो जाए कि अपना जीवन खुद संभाल सके। यहां एक बात समझना बेहद जरूरी है कि यह कवि दंपत्ति की अपील है। अदालत का फैसला नहीं है। मृत्युदंड की सजा सुनाए जाने के बाद कानूनी अपील और अन्य निर्धारित प्रक्रियाओं के विकल्प भी होते हैं। इसलिए फांसी टालने की मांग को सजा में बदलाव या फांसी पर रोक लगने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इस मुद्दे पर समाज में दो तरह की राय सामने आ सकती है। कुछ लोग कहेंगे कि जघन्य अपराध के लिए सख्त सजा जरूरी है। तो कुछ लोग यह सवाल उठाएंगे कि छोटे बच्चों के भविष्य और उनकी भावनात्मक जरूरतों को भी किस तरह ध्यान में रखा जाए। लेकिन दोनों ही बातों के बीच एक अंतर समझना जरूरी है।

बच्चियों के लिए मदद मांगना अपराध का समर्थन करना नहीं होता है। अब सवाल यह इंसाफ और इंसानियत के बीच सबसे बड़ा सवाल। तो दोस्तों इस मामले में सौरभ राजपूत के परिवार का दर्द भी उतना ही महत्वपूर्ण है। किसी की जान जाने के बाद उसके परिवार को जो नुकसान और पीड़ा झेलनी पड़ती है उसकी भरपाई कोई मदद नहीं कर सकती। लेकिन दूसरी ओर वह बच्चियां भी हैं जिन्होंने ना कोई अपराध किया ना ही अपने माता-पिता के फैसलों में उनकी कोई भूमिका थी। उनके लिए शिक्षा, सुरक्षित परवरिश, प्यार, सम्मान से भरा भविष्य सुनिश्चित करना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। कवि दंपत्ति की पहल इसी दिशा में एक कदम है। अब देखना होगा कि बच्चों की शिक्षा और देखभाल की व्यवस्था आगे किस तरह होती है और कानूनी प्रक्रिया में क्या फैसले सामने आते हैं। तो कसूरवार को उसके कर्मों का हिसाब मिलना चाहिए। मासूम बचपन को जीने का एक ख्वाब मिलना चाहिए। इंसाफ हो तो ऐसा जहां सच का सम्मान रहे और बेगुनाह बच्चों के हिस्से में भी मुस्कान रहे। आपकी इस मामले पर राय क्या है? क्या अपराध की सजा तय करते समय मासूम बच्चों के भविष्य पर भी विचार होना चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर बताइएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *