हिंदी सिनेमा का इतिहास ऐसे ऐसे दिलचस्प किस्सों से भरा पड़ा है जिनमें कहीं सुपरस्टार राजेश खन्ना का जादू दिखाई देता है। कहीं अपने बेबाक अंदाज के लिए मशहूर राजकुमार की अखड़ शख्सियत की चर्चा होती है। तो कहीं माला सिन्हा और प्राण जैसे दिग्गज कलाकारों की यादें पुराने बॉलीवुड की तस्वीर सामने ला देती है। उस दौर में फिल्में केवल कहानियों और गानों के लिए नहीं जानी जाती थी। बल्कि उनके पीछे काम करने वाले कलाकारों के व्यक्तित्व, उनकी आदतों और शूटिंग के दौरान होने वाली दिलचस्प घटनाओं को लेकर भी लोगों में जबरदस्त उत्सुकता रहती थी। राजेश खन्ना का नाम आते ही उनके चाहने वालों को उनकी मुस्कान, उनका रोमांटिक अंदाज और पर्दे पर भावनाओं को व्यक्त करने की अनोखी शैली याद आती है। वहीं राजकुमार का नाम सुनते ही उनकी भारी आवाज, संवाद बोलने का खास अंदाज और किसी के सामने आसानी से ना झुकने वाला व्यक्तित्व आंखों के सामने आ जाता है। माला सिन्हा अपनी खूबसूरती और दमदार अभिनय के लिए जानी जाती थी। जबकि प्राण ने खलनायक और चरित्र भूमिकाओं के जरिए हिंदी सिनेमा में एक अलग ही मुकाम बनाया। इन सभी कलाकारों के नाम एक साथ आते हैं तो ऐसा लगता है जैसे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के सुनहरे दौर का कोई पुराना दरवाजा खुल गया हो। इस कहानी के केंद्र में है फिल्म मर्यादा। राजेश खन्ना की लोकप्रियता और उस दौर के कलाकारों से जुड़े वह किस्से जिन्हें आज भी बॉलीवुड के पुराने प्रशंसक दिलचस्पी से सुनते हैं। 1971 में रिलीज हुई फिल्म मर्यादा इस पूरे दौर की एक महत्वपूर्ण फिल्म थी। इसका निर्देशन अरविंद सेन ने किया था और इसमें राजेश खन्ना, राजकुमार, माला सिन्हा तथा प्राण जैसे दिग्गज कलाकार एक साथ दिखाई दिए थे।
फिल्म की कहानी में प्रेम, पहचान, पारिवारिक रिश्ते और रहस्य जैसे कई तत्व शामिल थे। सबसे दिलचस्प बात यह थी कि दर्शकों को एक ही फिल्म में दो अलग-अलग अंदाज के बड़े अभिनेताओं को देखने का अवसर मिला। एक तरफ राजेश खन्ना का सहज और रोमांटिक व्यक्तित्व था तो दूसरी तरफ राजकुमार की प्रभावशाली आवाज और गंभीर स्क्रीन प्रेजेंस थी। माला सिन्हा ने भी फिल्म में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और प्राण ने अपने अभिनय से कहानी के नाटकीय पक्ष को मजबूत किया। मर्यादा को राजेश खन्ना के सफल दौर की फिल्मों में गिना जाता है। उस समय राजेश खन्ना की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही थी और दर्शक उनकी नई फिल्मों का बेसब्री से इंतजार करते थे। ऐसे में मर्यादा जैसी फिल्म में राजकुमार जैसे अनुभवी अभिनेता के साथ उनका नजर आना अपने आप में दर्शकों के लिए खास आकर्षण था। फिल्म की कहानी की बात करें तो इसमें माला सिन्हा, ललिता और लक्ष्मी की भूमिकाओं में दिखाई देती हैं। जबकि राजेश खन्ना का किरदार राजन राम बहादुर और राजकुमार का किरदार राजा बहादुर की कहानी से जुड़ा है। कहानी में पहचान को लेकर एक रहस्य है जो धीरे-धीरे सामने आता है। ललिता की मुलाकात राजन से होती है और दोनों के बीच प्रेम का रिश्ता विकसित होता है। लेकिन परिस्थितियां इस रिश्ते को आसान नहीं रहने देती। जब ललिता को पता चलता है कि जिस व्यक्ति से वह प्रेम करती है उसकी जिंदगी में कई ऐसी बातें हैं जिनसे वह अनजान थी तो कहानी एक नया मोड़ लेती है। दूसरी ओर परिवार के भीतर चल रही उलझने और प्राण के किरदार से जुड़ा संघर्ष घटनाओं को और जटिल बना देते हैं। फिल्म की खासियत यह थी कि इसमें केवल प्रेम कहानी नहीं दिखाई गई बल्कि रिश्तों की जिम्मेदारी, सच को छिपाने के परिणाम और परिवार के भीतर पैदा होने वाले तनाव को भी जगह दी गई। यही वजह थी
कि फिल्म में राजेश खन्ना और राजकुमार की मौजूदगी कहानी को दो अलग-अलग रंग देती थी। राजेश खन्ना की बात करें तो उस समय तक वह हिंदी सिनेमा में एक असाधारण मुकाम हासिल कर चुके थे। उनकी सफलता का सबसे बड़ा कारण यह था कि वह अपने किरदारों में भावनाओं को बहुत ही सहजता से व्यक्त करते थे। उनके चेहरे के भाव, संवाद बोलने का अंदाज और गीतों में दिखाई देने वाला रोमांटिक व्यक्तित्व दर्शकों को आकर्षित करता था। आराधना और दो रास्ते जैसी फिल्मों ने उनकी लोकप्रियता को नई ऊंचाई दी। इसके बाद सच्चा झूठा, आनंद और कटी पतंग जैसी फिल्मों ने यह साबित किया कि वह केवल रोमांटिक भूमिकाओं तक सीमित नहीं थे। वह गंभीर और भावनात्मक किरदारों को भी प्रभावशाली तरीके से निभा सकते थे। यही कारण था कि जब राजेश खन्ना किसी फिल्म में नजर आते थे, तो दर्शकों की उम्मीदें काफी बढ़ जाती थी। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके गानों और संवादों को लोग लंबे समय तक याद रखते थे।
वह पर्दे पर आते ही अपने अभिनय के जरिए दर्शकों का ध्यान खींच लेते थे। लेकिन इसी फिल्मी दुनिया में राजकुमार जैसे कलाकार भी थे। जिनकी शख्सियत अपने आप में एक अलग पहचान रखती थी। उनका संवाद बोलने का तरीका इतना खास था कि दर्शक उनकी आवाज से ही उन्हें पहचान लेते थे। वह अपने किरदारों को एक अलग ठहराव और प्रभाव के साथ प्रस्तुत करते थे। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस में एक प्रकार का आत्मविश्वास दिखाई देता था। जिसके कारण उनके निभाए किरदार अक्सर दर्शकों के मन में रह जाते थे। हिंदी सिनेमा में राजकुमार की पहचान एक ऐसे कलाकार की थी जो अपनी विशिष्ट शैली के साथ काम करता था। उनके बारे में कई तरह के फिल्मी किस्से प्रचलित रहे। जिनमें उनके बेबाक स्वभाव और आत्मसम्मान की चर्चा होती है। हालांकि किसी विशेष घटना को सच मानने से पहले उसके प्रमाणित स्रोत को देखना जरूरी है। मर्यादा में राजकुमार और राजेश खन्ना का एक साथ होना इसीलिए भी दिलचस्प था क्योंकि दोनों कलाकारों की अभिनय शैली एक दूसरे से अलग थी। एक की ताकत भावनात्मक सहजता थी तो दूसरे की ताकत संवादों की प्रभावशाली प्रस्तुति। यही अंतर फिल्म को देखने का अनुभव और रोचक बनाता है। अब बात करते हैं उस शीर्षक के एक और दिलचस्प हिस्से की जिसमें कहा गया है कि राजेश खन्ना माला सिन्हा को देखकर सीटी बजाते थे।
पुराने बॉलीवुड की दुनिया में कलाकारों के बीच हंसीज़ाक, शरारतों और शूटिंग के दौरान होने वाली हल्की-फुल्की घटनाओं के कई किस्से सुनने को मिलते हैं। फिल्मी सेट पर लंबे समय तक साथ काम करने वाले कलाकारों के बीच दोस्ताना माहौल बन जाना स्वाभाविक था। उस दौर की फिल्मों में गीतों, रोमांटिक दृश्यों और मनोरंजक परिस्थितियों का विशेष महत्व रहता था। माला सिन्हा भी अपने समय की जानीमानी अभिनेत्री थी। उन्होंने अनेक फिल्मों में अपनी अभिनय क्षमता का परिचय दिया और दर्शकों के बीच सम्मान हासिल किया। लेकिन राजेश खन्ना द्वारा माला सिन्हा को देखकर सीटी बजाने वाली इस घटना की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं होने के कारण इसे वास्तविक घटना के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा। इसे फिल्मी दुनिया से जुड़ी एक प्रचलित शैली के किस्से के रूप में ही देखना बेहतर है। जब तक कि इसके समर्थन में कोई मूल इंटरव्यू या विश्वसनीय रिकॉर्ड सामने ना आए। माला सिन्हा की अपनी कहानी भी कम दिलचस्प नहीं थी। उन्होंने हिंदी सिनेमा में लंबे समय तक काम किया और कई यादगार फिल्मों का हिस्सा रहीं। उनकी अभिनय शैली में भावनात्मक दृश्यों को प्रभावशाली बनाने की क्षमता थी। वह ऐसे समय में लोकप्रिय हुई थी जब महिला कलाकारों को फिल्मों की कहानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ती थी और दर्शक [संगीत] उनसे अभिनय के साथ-साथ व्यक्तित्व की मजबूती की भी उम्मीद करते थे। माला सिन्हा ने अपनी मेहनत और अभिनय से दर्शकों के बीच पहचान बनाई। मर्यादा में उनका दो भूमिकाओं से जुड़ा किरदार कहानी के रहस्य को आगे बढ़ाता है। एक ही अभिनेत्री द्वारा अलग-अलग परिस्थितियों में रहने वाली दो पात्रों को निभाना उस दौर के दर्शकों के लिए खासा आकर्षण था। इस तरह फिल्म में राजेश खन्ना और राजकुमार के साथ माला सिन्हा की मौजूदगी कहानी को एक व्यापक रूप देती है। फिल्म की सफलता में कलाकारों के अभिनय के साथ-साथ उनकी कहानी और संगीत का भी योगदान था। और फिर आते हैं प्राण जिनका नाम सुनते ही हिंदी सिनेमा के उन खलनायकों की याद आती है जिनकी मौजूदगी से कहानी में तनाव पैदा हो जाता था। प्राण ने अपने लंबे करियर में खलनायक से लेकर चरित्र भूमिकाओं तक कई तरह के किरदार निभाए। उनकी खासियत यह थी कि वह अपने अभिनय के जरिए किसी भी भूमिका को अलग पहचान दे सकते थे। उनके चेहरे के भाव, संवाद बोलने का तरीका और किरदार के अनुसार बदलती शारीरिक भाषा उन्हें दूसरे कलाकारों से अलग करती थी। मर्यादा में प्राण बहादुर का किरदार कहानी के संघर्ष से जुड़ा हुआ है। फिल्म में उनके किरदार की वापसी के बाद घटनाएं और जटिल होती हैं। जिससे दर्शकों की उत्सुकता बनी रहती है। उस दौर में प्राण जैसे अनुभवी कलाकारों का किसी फिल्म में होना कहानी को मजबूत बनाने में मदद करता था। वह केवल नायक के सामने खड़े होने वाले खलनायक नहीं थे। बल्कि अपने किरदारों में एक अलग व्यक्तित्व भर देते थे। इसी वजह से उनके अभिनय को आज भी हिंदी सिनेमा के इतिहास में महत्वपूर्ण माना जाता है। अगर हम मर्यादा को आज के नजरिए से देखें तो यह फिल्म उस समय के हिंदी सिनेमा की कई विशेषताओं को एक साथ प्रस्तुत करती है। इसमें पारिवारिक रिश्ते हैं, प्रेम है, पहचान का रहस्य है, नाटकीय मोड़ है और संगीत भी है। उस दौर में फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने के लिए इन सभी तत्वों का उपयोग किया जाता था। दर्शक सिनेमाघरों में केवल किसी एक सितारे को देखने नहीं आते थे बल्कि वह पूरी कहानी के साथ जुड़ना चाहते थे। हालांकि राजेश खन्ना का स्टारडम फिल्म के आकर्षण का बड़ा हिस्सा था। लेकिन राजकुमार, माला सिन्हा और प्राण जैसे कलाकारों ने भी फिल्म को अपनी अलग शैली में समृद्ध किया। किसी फिल्म की यादगार पहचान अक्सर इसी सामूहिक योगदान से बनती है। एक कलाकार दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ता है। दूसरा कहानी में गंभीरता लाता है।
तीसरा रहस्य को मजबूत करता है और चौथा अपने किरदार के जरिए कहानी को आगे बढ़ाता है। मर्यादा में भी कलाकारों की अलग-अलग शैलियां देखने को मिलती हैं। तो आखिर में जब भी हम राजेश खन्ना की सुपरहिट फिल्मों और राजकुमार के अखड़ अंदाज की बात करते हैं तो हमें यह याद रखना चाहिए कि हिंदी सिनेमा का सुनहरा दौर केवल सितारों की लोकप्रियता से नहीं बना था। इसके पीछे निर्देशकों, लेखकों, संगीतकारों, गीतकारों और उन सभी कलाकारों की मेहनत थी। जिन्होंने फिल्मों को यादगार बनाया। माला सिन्हा और प्राण जैसे कलाकारों का योगदान भी इसी इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मर्यादा आज भी इसीलिए चर्चा में रहती है क्योंकि इसमें उस दौर के कई बड़े नाम एक साथ दिखाई देते हैं। जहां राजेश खन्ना की लोकप्रियता दर्शकों को आकर्षित करती है। वहीं राजकुमार का अभिनय, माला सिन्हा की भूमिका और प्राण की मौजूदगी कहानी को अलग आयाम देते हैं। और शायद यही पुराने बॉलीवुड की सबसे बड़ी खूबी थी। हर फिल्म अपने साथ एक कहानी लेकर आती थी और हर कलाकार उस कहानी में अपनी एक अलग छाप छोड़ जाता था।