शशि कपूर के करियर का एक किस्सा उनकी सादगी और आत्ममूल्यांकन की मिसाल माना जाता है। साल 1961 में यश चोपड़ा की फिल्म ‘धर्मपुत्र’ से उन्होंने बतौर लीड एक्टर शुरुआत की थी। फिल्म में उन्होंने विभाजन और धार्मिक कट्टरता की पृष्ठभूमि में एक जटिल किरदार निभाया था।’धर्मपुत्र’ को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और शशि कपूर को उनके अभिनय के लिए नेशनल अवॉर्ड के लिए नामांकित किया गया।
लेकिन शशि कपूर ने यह सम्मान स्वीकार करने से इनकार कर दिया। वजह जानकर उनके व्यक्तित्व की एक अलग ही तस्वीर सामने आती है।बाद के एक इंटरव्यू में शशि कपूर ने बताया था कि उन्हें लगता था कि फिल्म में उनका अभिनय उस स्तर का नहीं था, जिसके लिए इतने बड़े सम्मान का हकदार माना जाए।
उन्होंने अपनी परफॉर्मेंस को खुद ही पर्याप्त सक्षम नहीं समझा और इसलिए पुरस्कार लेने से मना कर दिया।दिलचस्प बात यह है कि आगे चलकर राष्ट्रीय पुरस्कारों से उनका रिश्ता बेहद खास रहा। बतौर निर्माता ‘जुनून’ को 1979 में सर्वश्रेष्ठ हिंदी फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। बाद में ‘न्यू दिल्ली टाइम्स’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और ‘इन कस्टडी’ के लिए विशेष जूरी सम्मान भी मिला।यानी जिस सम्मान को उन्होंने शुरुआत में खुद को योग्य न मानकर ठुकराया था, उसी सम्मान ने आगे चलकर उनके शानदार फिल्मी सफर को कई बार सलाम किया।