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संजय दत्त की माँ का वो सबसे गहरा राज: मुस्लिम थीं या हिंदू? कोर्ट में क्यों उछला ‘धर्म’ का विवाद!

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काहे कोयल शोर [संगीत] मचाए रे माहे अपना एक ऐसी अभिनेत्री जिसकी दिलकश खूबसूरती पर पूरा हिंदुस्तान फिदा था जिसकी अदाकारी ने उसे [संगीत] सिनेमा की सबसे बड़ी ऊंचाइयों तक पहुंचाया। लेकिन नरगिस की [संगीत] जिंदगी की चमक के पीछे कई ऐसे राज और रिश्ते छिपे [संगीत] थे जिन पर आज भी कई सवाल उठते हैं। क्या वो तवायफ की बेटी थी? सुपरस्टार संजय दत्त की मां नरगिस का राज कपूर के साथ क्या रिश्ता था? एक शादीशुदा मर्द के प्यार में पड़ने की वो कहानी जिसमें नरगिस को दूसरी औरत बनकर रहना बिल्कुल मंजूर नहीं था। फिर उनकी जिंदगी से जुड़ा धर्म का वो बड़ा विवाद जिसने बरसों बाद उनके [संगीत] बेटे संजय दत्त को भी अदालत में अपनी मां के धर्म का जिक्र करने पर मजबूर कर दिया। आखिर कौन थी नरगिस? क्या [संगीत] थी उनकी असली पहचान और उनकी जिंदगी के पीछे की छिपी वो सच्चाई जिसे दुनिया ने सिर्फ एक फिल्मी सितारे के तौर पर देखा। आज खोलेंगे नरगिस की जिंदगी के वो पन्ने जो शायद उनकी चमक से कहीं ज्यादा अंधेरे में थे। [संगीत] पंछी बनूं उड़ते फिरूं मस्त गगन में आज मैं आजाद हूं [संगीत] दुनिया के लगभग चार दशक तक अपनी प्रतिभा से [संगीत] सिनेमा प्रेमियों के दिलों पर राज करने वाली एक अभिनेत्री आपने अपने बयान में मुलजिम को जन्म का चोर डाकू चक्का कहा है।

इससे आपका क्या मतलब? जिसने सैकड़ों फिल्मों में हर तरह के किरदार निभाए और अपने अभिनय का लोहा मनवाया। हंसो नहीं। संसार का भार उठा लोगे देवी। ममता का बोझ ना उठाया जाएगा। कला के क्षेत्र का वो बड़ा नाम जो [संगीत] अपने चाहने वालों के लिए किसी मजहब या जाति से ऊपर बस एक उम्दा कलाकार थी। जागो मोहन [संगीत] प्यारे जागो लेकिन क्यों फिर उनके धर्म को लेकर अचानक सवाल उठने लगे थे और लोगों ने इसे लेकर हंगामा शुरू कर दिया था। सवाल पैदा होता है कि क्यों किया? मैं अपनी जिरा से इसी सवाल का जवाब देना चाहती हूं। अगर थोड़ी देर के लिए आप हुजूरवाला और जज रघुनाथ साहब दोनों मुझ पर भरोसा रख सके। क्यों उनके बेटे संजय दत्त ने अपने एक मुकदमे के दौरान [संगीत] यह कहकर बहस छेड़ दी थी कि उनकी मां क्योंकि मुस्लिम थी इसलिए उन्हें लगातार प्रताड़ित किया जा रहा है। मैं गीता की कसम तो नहीं खा सकता क्योंकि मेरे लिए गीता, कुरान, बाइबल जो भी है वो खड़ी वो औरत मेरी मां है।

आखिरकार उनके यह कहने की वजह क्या थी? और इस विवाद का नरगिस के धर्म से क्या ताल्लुकात था? अपने आज के इस शो में हम आपको देंगे इससे जुड़ी तमाम जानकारियां। साथ ही बताएंगे नरगिस से जुड़े और भी कई राज। कौन थी नरगिस? क्या था उनका वास्तविक धर्म? उनकी आस्था किस धर्म में थी? क्यों एक कलाकार के धर्म को लेकर छिड़ गई थी बड़ी बहस? और नेहरू गांधी परिवार से उनका क्या नाता था? आज के अपने शो में मैं आपको बताऊंगा ये तमाम बातें। साथ ही होंगी कुछ और दिलचस्प जानकारियां। आप बस बने रहिए हमारे साथ। नमस्कार दोस्तों, मैं प्रियंक वाजपेई हूं और आप देख रहे हैं डार्क बॉलीवुड बाय प्रियंक। घर आया [गाना गाने की आवाज़] मेरा परदेसी [संगीत] प्यास बुझी मेरी। हिंदी फिल्मों की मशहूर अदाकारा नरगिस का जन्म कोलकाता में 1 जून 1929 को हुआ था। उनकी मां का नाम जदनबाई जो एक उच्च स्तर की कलाकार मानी जाती थी। दरअसल उनकी पहचान नरगिस की मां की नहीं थी बल्कि वह खुद काफी मशहूर थी। वो एक उम्दा शास्त्रीय गायिका, नृत्यांगना, संगीतकार, फिल्म निर्माता और एक बेहद साहसी महिला भी थी।

इसे पूरी तरह से समझने के लिए उनकी कहानी को और गहराई से जानना होगा। दरअसल, जद्दन बाई की मां दलीपा बाई इलाहाबाद के पास मेजा की रहने वाली एक ब्राह्मण कन्या थी। बताया जाता है कि वह बाल विधवा थी और नाचने गाने वाले मिराकियों के गैंग ने उनका अपहरण [संगीत] कर लिया था। इसके बाद उनकी शादी उनके पिता की उम्र के मुस्लिम सारंगी बजाने [संगीत] वाले से कर दी गई। जिस शख्स का नाम था मियां जान। हालांकि यह सिर्फ नाम की शादी थी और उन्हें मिराकियों ने मोटी रकम लेकर एक हिंदू वकील के पास उनकी बिनविही पत्नी के तौर पर रख दिया था। इस रिश्ते के बारे में हम आगे चर्चा करेंगे। इन दोनों की एक बेटी हुई जिसका नाम रखा गया जद्दन बाई। जद्दन को बचपन से ही नाचने गाने का शौक था। [संगीत] लेकिन उन्हें कुछ खास तालीम नहीं मिली थी। जिससे उन्हें अपने प्रदर्शन में कुछ कमी महसूस होती थी। फिर उन्होंने उस समय के जानेमाने कलाकार भैया साहब गणपत राव से संपर्क किया और कोलकाता में उनके पास जाकर उनकी शिष्या बन गई। बताते हैं कि साल 1920 में गणपत राव के निधन के बाद जद्दन बाई ने फिर उस्ताद मोइनुद्दीन खान और चड्डू खान और लाभ खान से तालीम हासिल की। इन तालीम का फायदा यह हुआ कि जद्दन बाई एक आला दर्जे की कलाकार बन गई। तब रेडियो का जमाना चरम पर था जिस पर जद्दन बाई ने गीतों से खूब तहलका मचाया।

भारत में बड़े स्तर पर कारोबार करने वाली ब्रिटेन की कोलंबिया ग्रामोफोन कंपनी ने उनके गानों को रिकॉर्ड किया तो उनकी ख्याति भी दूर-दूर [संगीत] तक जा पहुंची। उनकी शोहरत ऐसी फैली कि बड़े-बड़े राजा महाराजाओं के दरबार और नवाबों की महफिल में उन्हें गाने के लिए बुलाया जाता था। रामपुर, लखनऊ, [संगीत] बीकानेर, ग्वालियर, इंदौर, कश्मीर, जोधपुर और इसके अलावा भी कई राजघरानों से उन्हें बुलावा [संगीत] आता था। जिसके लिए वह भारीभरकम फीस भी लेती थी। इस बीच जद्दन बाई को कोलकाता के एक गुजराती व्यापारी, नरोत्तम दास खत्री यानी कि बच्ची बाबू से प्यार हो गया। बच्ची बाबू ने इस्लाम धर्म अपना लिया और नाम रख लिया मोहम्मद नज़र हुसैन। फिर दोनों ने शादी कर ली और एक बेटा हुआ अख्तर हुसैन जो बाद में एक मशहूर कलाकार भी बना। लेकिन यह शादी ज्यादा दिनों तक चल ना सकी। आगे जद्दन बाई ने दूसरी शादी की एक हारमोनियम बजाने वाले [संगीत] उस्ताद इरशाद मीर खान से। इस शादी से भी एक बेटा हुआ जिसका नाम रखा गया अनवर हुसैन। जो 1940 के दशक से 1980 के दशक तक हिंदी फिल्मों में जाने-माने चरित्र अभिनेता रहे। फिर जद्दन बाई ने तीसरी शादी की लखनऊ के एक नामी व्यापारी के [संगीत] लड़के मोहनचंद उत्तमचंद त्यागी से। अब जद्दन बाई के इस तीसरे पति को लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं। कुछ लोगों का कहना है कि मोहनचंद ने इस्लाम अपनाकर अब्दुल रशीद अपना नाम रख दिया था। तो कुछ लोगों का यह कहना है कि अपने नए पति से शादी के समय जद्दन बाई ने हिंदू धर्म अपना लिया था। क्योंकि कुछ आधिकारिक दस्तावेजों में उनका नाम जया देवी त्यागी पाया गया है। खैर सच चाहे जो हो दोनों की एक बेटी हुई जिसे जद्दन बाई ने बेबी रानी और बेबी फातिमा का नाम दिया। लेकिन पिता ने बेटी का नाम रखा तेजस्वरी उत्तमचंद मोहनचंद। उन दिनों हिंदुस्तान में दो जगहों पर हिंदी फिल्में बनती थी। एक बॉम्बे और दूसरा लाहौर। जद्दन भाई को 1930 के दशक में लाहौर से कुछ खास ऑफर मिले और उन्होंने वहां की कुछ फिल्मों में बतौर कलाकार अभिनय किया और गीत भी गाए। [संगीत] फिर उन्होंने बॉम्बे का रुख किया जहां शुरुआत में गायिका और म्यूजिक डायरेक्टर बनी और जल्द ही फिल्म निर्माण में भी जुट गई। कुछ दिनों बाद उन्होंने बेटी बेबी रानी को बतौर बाल कलाकार फिल्मों में उतार दिया। फिल्म का नाम था तलाश ए हक और इन्हीं बेबी रानी का नाम रखा गया बेबी नरगिस। परर्शियन भाषा में डेफोडिल फूल को नरगिस कहते हैं। कुछ दिनों बाद महज 14 साल की उम्र में नरगिस को लीड एक्ट्रेस बनाकर फिल्मों में लॉन्च किया गया। ये थी साल 1943 में आई फिल्म महबूब खान की तकदीर। हाय बाबू दरोगा। [संगीत] को कसूर पे धर ले सैया मो इस फिल्म में लीड एक्टर थे मोतीलाल। यह फिल्म सुपरहिट रही और इसके बाद नरगिस का जादू दर्शकों पर ऐसा चला कि उन्हें खूब सारी हिट फिल्में मिली। फिल्म मेला और अनोखा प्यार में उनकी जोड़ी दिलीप कुमार के साथ बनी तो फिल्म आग में राज कपूर के साथ। काहे कोयल शोर मचाए रे मांहे अपना कोयल साल 1949 में महबूब [संगीत] खान ने नरगिस को अपनी फिल्म अंदाज में मौका दिया जिसमें दो लीड एक्टर थे दिलीप कुमार और राज कपूर। नरगिस इस फिल्म में राज कपूर की पत्नी बनी [संगीत] थी और ये फिल्म ऐतिहासिक हिट साबित हुई। डरना मोहब्बत कर ले, डरना मोहब्बत [संगीत] कर ले। इसके बाद राज कपूर ने नरगिस के साथ एक और फिल्म बनाई जो थी बरसात। यह फिल्म भी सुपर डुपर हिट रही। ओ मुझे किसी से प्यार हो गया। प्यार हो गया दिल बेरार। कहते हैं इसी के बाद राज कपूर उनके फैन हो गए।

उन्होंने नरगिस को लेकर आवारा बनाई जो भारत ही नहीं पूरे [संगीत] वर्ल्ड में सुपरहिट हुई। और नरगिस और राज कपूर की जोड़ी भी वर्ल्ड फेमस हो गई। दम भर दो उधर [संगीत] मुंह फेरे ओ चंदा। इसके बाद तो नरगिस ने राज कपूर के साथ दर्जनों फिल्मों में काम किया। बताया जाता है कि इसी दौरान नरगिस और राज कपूर एक दूसरे के काफी करीब आ गए। लेकिन बताते हैं कि राज कपूर अपनी पत्नी कृष्णा को छोड़कर नरगिस से शादी करने को तैयार नहीं थे और नरगिस को दूसरी औरत बनकर रहना बिल्कुल मंजूर नहीं था। एक बेवफा [संगीत] से प्यार किया। उसे नजर को प्यार किया। फिर आई फिल्म मदर इंडिया। दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा। साल 1957 में आई महबूब खान की इस फिल्म में उनके [संगीत] तीन कोस्टार्स थे। राजेंद्र कुमार, राजकुमार और सुनील दत्त। यह फिल्म नरगिस के करियर की सबसे सफल, सबसे यादगार और क्लासिक फिल्म रही। मैं देवी को बताऊंगी कि रास्ता दिखाना सहल है पर रास्ते पर चलना [हंसी] बहुत कठिन है। स्थान पर बैठकर तमाशा देखना आसान पर खुद तमाशा बनकर जीवन बिताना बहुत इसे ऑस्कर में नॉमिनेशन मिला जो उस वक्त बहुत बड़ी [संगीत] बात थी। उस समय के कला समीक्षकों ने उनकी तारीफ में लिखा कि फिल्म में राधा के सशक्त किरदार को नरगिस ने जिस प्रभावशाली ढंग से निभाया उतना कोई और निभा ही नहीं सकता था। इस फिल्म ने कई अवार्ड जीते लेकिन इसने नरगिस की निजी जिंदगी को भी एक अवार्ड दिया और वो थे जीवन साथी के तौर पर सुनील दत्त। कहा जाता है कि फिल्म के सेट पर लगी आग में नरगिस [संगीत] बुरी तरह से घिर गई थी। जिन्हें लंबे चौड़े मजबूत सुनील दत्त ने [संगीत] जान पर खेलकर बाहर निकाला और आग से उनकी जान बचाई। इस घटना के बाद नरगिस ने कहा कि पुरानी नरगिस की मौत हो गई है। एक नई नरगिस का जन्म हुआ है। लोग दावा करते हैं कि नरगिस ने उसी दिन से [संगीत] सुनील दत्त को अपना जीवन साथी चुन लिया। हालांकि बाद में सुनील दत्त ने बताया था कि नरगिस ने उनकी बहन का बहुत अच्छी तरह से इलाज करवाया और इससे उन्हें यकीन हो गया कि नरगिस उनके परिवार का अच्छी तरह से ख्याल रख सकती हैं। शादी के बाद नरगिस ने फिल्मों में काम करना बंद कर दिया और वो अपने परिवार पर ध्यान देने लगी। करीब 10 साल बाद अपने भाई अनवर हुसैन और अख्तर हुसैन के कहने पर नरगिस ने साल 1967 में फिल्म रात और दिन में काम किया। दिल की गिरह खोल दो चुप ना बैठो कोई गीत [संगीत] गा इस फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। यह पहला मौका था जब किसी अभिनेत्री को राष्ट्रीय पुरस्कार [संगीत] दिया गया। नरगिस को अपने सिने करियर में मानसान बहुत मिला। वो पहली अभिनेत्री थी जिन्हें पद्मश्री से नवाजा गया और वह राज्यसभा सदस्य भी बनाई गई। बताया जाता है कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से वह काफी करीब थी और सिनेमा जगत में चर्चा थी कि दोनों में खून का रिश्ता है। कहा जाता है कि नरगिस [संगीत] की नानी दलीपा बाई जिस वकील की दूसरी औरत के तौर पर रहती थी वो कोई और नहीं बल्कि तत्कालीन कांग्रेसी नेता और इंदिरा गांधी के दादा मोतीलाल नेहरू थे। विकपीडिया समेत कई वेबसाइट्स और किताबों में इसका जिक्र मिलता है। बहरहाल इस दावे में कितना दम है यह तो कहना मुश्किल है।

लेकिन इतना जरूर है कि इस पूरी कहानी में नरगिस और उनके पुरखों की बार-बार हिंदू और मुस्लिम धर्म के बीच चलती [संगीत] और आपस में मिलती आस्थाओं का असर उनके पूरे परिवार पर पड़ा। जैसा कि नरगिस ने भी एक बार कहा था कि कलाकार की कला धर्म और जाति से परे होती है। लेकिन इन सबके बावजूद नरगिस के बेटे संजय दत्त ने जब अदालत में अपनी मां के धर्म को लेकर जब खुद को टारगेट किए जाने की बात की तो लोगों में इसे लेकर बहस छिड़ना लाजमी था। हालांकि बाद में इस पर हंगामा होता देखकर और खुद को घिरता [संगीत] देखकर संजय दत्त ने खेद जता दिया था। खैर नरगिस के आगे की जिंदगी की बात करें तो [संगीत] उन्हें स्टेज फोर का कैंसर डिटेक्ट हुआ और इलाज के लिए उन्हें अमेरिका के एक बड़े अस्पताल में भर्ती किया गया। जब वहां भी डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए तो उन्हें वापस ले आया गया। वो अपने बेटे [संगीत] संजय दत्त से काफी प्यार करती थी और उनकी इच्छा थी कि उनकी पहली फिल्म रॉकी के प्रीमियर पर वह जरूर जाएं लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर [संगीत] था। फिल्म के प्रीमियर की तारीख 8 मई 1981 रखी गई। लेकिन इससे पहले [संगीत] ही 3 मई को नरगिस इस दुनिया को अलविदा कह गई। उनकी मौत के बाद उनके शरीर को उनकी मां जद्दन बाई की कब्र के पास मुस्लिम रीति रिवाज से दफना दिया गया। मैं ना रहूंगी तुम ना रहोगे फिर भी रहेंगी निशानियां। फिलहाल प्यारे दर्शकों नरगिस की फिल्मी लाइफ और पर्सनल जिंदगानी को लेकर आपकी व्यक्तिगत राय क्या है? [संगीत] अपनी कीमती राय आप कमेंट बॉक्स के जरिए हम तक जरूर पहुंचाएं। साथ ही बॉलीवुड [संगीत] से जुड़े ऐसे ही तमाम डार्क सीक्रेट्स यूं ही जानते रहने के लिए आपके अपने चैनल डार्क बॉलीवुड बाय प्रियंक को आप यूं ही प्यार देते रहें और उसे लाइक, सब्सक्राइब और शेयर करना ना भूलें। साथ ही अलग-अलग बॉलीवुड स्टार्स से जुड़ी ऐसी ही [संगीत] दिलचस्प कहानियां जानते रहने के लिए हमारे अलग-अलग वीडियोस भी देखते रहें। मैं प्रियंक वाजपेयी हूं आपके साथ। जल्द मिलता हूं किसी और एपिसोड में। तब तक के लिए शुक्रिया। नमस्कार। [संगीत]

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