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आखिर 6 साल बाद मिल ही गया सुशांत सिंह राजपूत का आरोपी?

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दोस्तों कभी आपने सोचा है कि किसी इंसान की मौत के बाद भी उसकी कहानी खत्म क्यों नहीं होती? कुछ लोग चले जाते हैं और उनके जाने के बाद कुछ सवाल ऐसे छोड़ जाते हैं जो सालों तक पीछा नहीं छोड़ते। सुशांत सिंह राजपूत के साथ भी शायद कुछ ऐसा ही हुआ। 14 जून 2020 मुंबई एक ऐसा दिन जिसे शायद कोई भी भूल नहीं सकता। उस दिन एक खबर आई थी और कुछ ही मिनटों में पूरे देश में फैल गई थी। सुशांत सिंह राजपूत नहीं रहे। बस इतना सुनना था कि हर किसी के दिमाग में एक ही सवाल आया। कैसे? क्यों? और आखिर ऐसा क्या हुआ था? शुरुआत में जो तस्वीर सामने आई, उसमें कहानी बहुत सीधी लग रही थी। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, वैसे-वैसे सवाल बढ़ते गए। एक सवाल का जवाब मिलता, तो उसके पीछे दो नए सवाल खड़े हो जाते। फिर परिवार ने सवाल उठाए। फिर लोगों ने सवाल उठाए। फिर सोशल मीडिया पर बहस शुरू हुई और देखते ही देखते सुशांत की मौत भारत के सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाले मामलों में शामिल हो गई। लेकिन आज 6 साल बाद भी क्या हमारे पास उस आखिरी दिन की पूरी तस्वीर है? यही सबसे बड़ा सवाल है। और आज की इस पूरी कहानी में हम किसी को दोषी साबित करने नहीं जा रहे। हम किसी के खिलाफ फैसला सुनाने नहीं जा रहे। हम सिर्फ उन सवालों को समझेंगे जो इस केस के साथ लगातार जुड़े रहे हैं। क्योंकि एक बात समझना बहुत जरूरी है। आरोप अलग चीज है। दावा अलग चीज है और अदालत में साबित हुआ सच अलग चीज। इसलिए जहां कोई बात सिर्फ दावा है, हम उसे दावा ही कहेंगे। जहां कोई सवाल है, उसे सवाल ही रखेंगे और जहां कोई आधिकारिक तथ्य मौजूद है, उसे उसी तरह समझेंगे। क्योंकि अगर हमें सच चाहिए तो हमें अपनी पसंद की कहानी नहीं सच की कहानी चाहिए। अब जरा कुछ सेकंड के लिए सुशांत की मौत से बाहर निकलकर उस लड़के को याद कीजिए जो कभी बिहार से निकला था। जिसके पास फिल्मी खानदान का नाम नहीं था। कोई बड़ा स्टार पिता नहीं था। कोई ऐसा परिवार नहीं था जो पहली फिल्म से पहले ही उसके लिए रास्ता बना देता। लेकिन उसके पास एक चीज थी बहुत बड़ा सपना। सुशांत सिर्फ अभिनेता बनना नहीं चाहते थे। उनका दिमाग बाकी लोगों से थोड़ा अलग तरीके से काम करता था। उन्हें सितारों में दिलचस्पी थी, स्पेस में दिलचस्पी थी, साइंस में दिलचस्पी थी, टेक्नोलॉजी में दिलचस्पी थी। वो जिंदगी को सिर्फ एक फिल्मी करियर की तरह नहीं देखते थे। वो आगे की दुनिया के बारे में सोचते थे। शायद यही वजह है कि जब उन्होंने एक्टिंग में पहचान बनाई, तो लोगों को उनमें कुछ अलग दिखाई दिया। पहले टीवी, फिर पवित्र रिश्ता। फिर फिल्मों की दुनिया का पोछे और फिर एमएस धोनी द अनटोल्ड स्टोरी जैसी फिल्म एक ऐसा अभिनेता जो धीरे-धीरे अपनी जगह बना रहा था और यहां एक बात बहुत दिलचस्प है जब कोई आउटसाइडर सफल होता है तो उसकी सफलता सिर्फ उसकी नहीं रहती वो बहुत सारे युवाओं के लिए उम्मीद बन जाती है।

सुशांत भी ऐसे ही लोगों में शामिल हो गए थे। लाखों युवाओं को लगता था अगर यह लड़का कर सकता है तो शायद मैं भी कर सकता हूं। लेकिन फिर आया 2020 और सब कुछ बदल गया। सुशांत की मौत के बाद सबसे पहले जो चीज सामने आई वो थी एक सामान्य सी दिखने वाली कहानी। लेकिन लोगों ने सवाल पूछना शुरू कर दिया। कुछ लोगों ने कहा क्या शुरुआती जांच ठीक तरीके से हुई थी? क्या क्राइम सीन को सही तरीके से सुरक्षित किया गया? क्या वहां मौजूद हर चीज का रिकॉर्ड बनाया गया? क्या सभी डिजिटल डिवाइसेस को तुरंत सिक्योर किया गया? क्या सीसीटीवी फुटेज पूरी तरह प्रिजर्व की गई? और क्या उस दिन वहां मौजूद हर व्यक्ति की मूवमेंट को ठीक से दर्ज किया गया? देखिए किसी भी सस्पिशियस डेथ में यह सवाल छोटे नहीं होते क्योंकि शुरुआत में की गई एक छोटी सी गलती बाद में बहुत बड़ी समस्या बन सकती है। मान लीजिए किसी कमरे में कोई घटना हुई और वहां सीसीटीवी लगा था लेकिन फुटेज सुरक्षित नहीं की गई तो 6 महीने बाद कोई जांच एजेंसी उस फुटेज को कहां से लाएगी? अगर किसी फोन का डाटा समय पर प्रिजर्व नहीं हुआ तो बाद में डिलीटेड इन कैसे मिलेगी? इसीलिए फॉरेंसिक इन्वेस्टिगेशन में शुरुआती घंटे और शुरुआती दिन इतने महत्वपूर्ण होते हैं। और यही वजह है कि सुशांत केस में भी क्राइम सीन और डिजिटल एविडेंस को लेकर लोगों के सवाल लगातार बने रहे। कुछ दावों में कहा गया कि बिल्डिंग की सीसीटीवी फुटेज को लेकर सवाल थे। कुछ लोगों ने एंट्री और एग्जिट रिकॉर्ड्स को लेकर भी बातें कही। यह तक कहा गया कि उस समय कौन आया और कौन गया। उसकी पूरी तस्वीर सामने नहीं आई। लेकिन यहां फिर वही बात किसी रिकॉर्ड का मिसिंग होना अपने आप में मर्डर का प्रूफ नहीं है। लेकिन अगर वह रिकॉर्ड इन्वेस्टिगेशन के लिए महत्वपूर्ण था तो उसका मिसिंग होना एक जांच का सवाल जरूर बन सकता है। और शायद यही सवाल इस केस में बार-बार सामने आया। उस दिन कौन वहां था? किससे बात हुई? किसका फोन कब एक्टिव था? कौन कब आया? कौन कब गया? और सबसे जरूरी उस कमरे में वास्तव में क्या हुआ। अब इसी जगह से कहानी का सबसे कंट्रोवर्शियल हिस्सा सामने आता है। स्टन गन का दावा। कुछ स्टिंग ऑपरेशन और कुछ लोगों के इंटरव्यू में यह दावा किया गया कि सुशांत के शरीर पर ऐसे निशान थे जिन्हें कथित तौर पर किसी इलेक्ट्रिकल डिवाइस से जोड़ा जा सकता है। और इसी संदर्भ में स्टन गन का नाम सामने आया। अब सुनने में यह बात बहुत शॉकिंग लगती है। लेकिन हमें यहां थोड़ा रुकना होगा क्योंकि किसी भी शरीर पर कोई निशान दिखाई देना इसका मतलब यह नहीं कि वह निशान निश्चित रूप से किसी खास वेपन से बना है। इसके लिए साइंटिफिक फॉरेंसिक एग्जामिनेशन जरूरी है। अगर वास्तव में किसी इलेक्ट्रिकल वेपन का इस्तेमाल हुआ था तो उसकी पुष्टि सिर्फ तस्वीर देखकर नहीं हो सकती। फॉरेंसिक टेस्टिंग चाहिए, मेडिकल डॉक्यूमेंटेशन चाहिए, इंजरी पैटर्न का एनालिसिस चाहिए और अगर कोई वेपन मिला हो तो उसकी फॉरेंसिक मैचिंग चाहिए। लेकिन सवाल फिर भी अपनी जगह है। अगर शरीर पर असामान्य निशान थे तो उन निशानों की पूरी साइंटिफिक जांच हुई थी या नहीं? अगर हुई थी तो उसका निष्कर्ष क्या था? और अगर नहीं हुई थी तो क्यों नहीं हुई? यही सवाल महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी इन्वेस्टिगेशन में किसी संभावना को सिर्फ इसीलिए खत्म नहीं किया जाना चाहिए कि वह सुनने में अजीब लगती है। लेकिन दूसरी तरफ किसी संभावना को सिर्फ इसलिए सच भी नहीं मान लेना चाहिए कि वह ड्रामेटिक है। यही फर्क है इन्वेस्टिगेशन और इंटरनेट थ्योरी में।

अब आते हैं पोस्टमार्टम पर। शायद इस केस के सबसे संवेदनशील हिस्सों में से एक। किसी इंसान के शरीर पर मौत से पहले क्या हुआ? उसका सबसे महत्वपूर्ण साइंटिफिक रिकॉर्ड पोस्टमार्टम होता है। कहां चोट है? कितनी चोट है? चोट की दिशा क्या है? गर्दन पर निशान किस प्रकार के हैं? शरीर के अंदर क्या डैमेज हुआ? क्या कोई केमिकल या ड्रग मौजूद था? यह सारी चीजें जांच के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती हैं। और इसी वजह से पोस्टमार्टम की ट्रांसपेरेंसी को लेकर उठे सवालों को गंभीरता से देखना जरूरी है। कुछ लोगों ने दावा किया कि पोस्टमार्टम की वीडियो रिकॉर्डिंग को लेकर सवाल थे। कुछ ने कहा कि पूरी प्रक्रिया को रिकॉर्ड नहीं किया गया। कुछ लोगों ने यह भी दावा किया कि मेडिकल स्टाफ पर प्रेशर था। लेकिन फिर वही बात इन दावों और आधिकारिक रूप से सिद्ध तथ्यों के बीच अंतर करना जरूरी है। अगर किसी स्टाफ मेंबर ने बाद में कोई बयान दिया तो उसका ऑफिशियल रिकॉर्ड क्या है? क्या वह बयान जांच एजेंसी के सामने दर्ज हुआ? क्या उसे अदालत में टेस्ट किया गया? क्या उसकी पुष्टि किसी दूसरे एविडेंस से हुई? अगर नहीं, तो उसे एलगेशन की तरह देखना चाहिए। एस्टैब्लिश्ड फैक्ट की तरह नहीं। और शायद यही सबसे ईमानदार तरीका है इस केस को देखने का। अब कहानी में एक और नाम आता है बिहार पुलिस। सुशांत के परिवार की शिकायत के बाद बिहार पुलिस की टीम मुंबई पहुंची और इसके बाद महाराष्ट्र और बिहार पुलिस के बीच विवाद शुरू हो गया। एक आईपीएस अधिकारी के क्वारेंटीन में रखे जाने को लेकर भी बड़ा राजनीतिक विवाद हुआ। लोगों ने सवाल पूछा, “अगर एक राज्य की पुलिस दूसरे राज्य में जांच करने आती है, तो उसे इतनी मुश्किलों का सामना क्यों करना पड़ा? क्या जुरिसडिक्शन का मामला था? क्या प्रोसीजर का मामला था? या कुछ और? उस समय इन सवालों ने पूरे देश का ध्यान खींच लिया। और फिर मामला सीबीआई तक पहुंचा। लोगों को लगा अब शायद हर सवाल का जवाब मिलेगा। अब शायद सच सामने आएगा। लेकिन समय गुजरता गया। 1 साल, 2 साल, 3 साल, 4 साल, 5 साल और फिर छ साल। और आज भी लोगों का एक हिस्सा पूछता है। आखिर फाइनल आंसर कहां है? यहीं पर सुशांत केस सिर्फ एक मर्डर मिस्ट्री नहीं रह जाता। यह इन्वेस्टिगेशन ट्रांसपेरेंसी का सवाल बन जाता है। क्योंकि जब किसी मामले को लेकर इतनी बड़ी पब्लिक इंटरेस्ट हो तो लोगों को कम से कम यह जानने का अधिकार महसूस होता है कि जांच किस दिशा में गई। क्या मिला? क्या नहीं मिला। क्या साबित हुआ और क्या साबित नहीं हो सका। अब एक बार फिर 8 जून 2020 पर चलते हैं। दिशा सालियान उनकी मौत ने भी अपने पीछे कई सवाल छोड़े। कुछ ही दिनों बाद सुशांत की मौत हो गई और इसके बाद दोनों घटनाओं को जोड़ने वाली कई थ्यरीज इंटरनेट पर सामने आई। लोगों ने टाइमलाइंस कंपेयर करनी शुरू की। लोगों ने पूछा क्या दोनों मामलों के बीच कोई कनेक्शन था? क्या सुशांत को दिशा की मौत के बारे में कुछ पता चला था? क्या उन्होंने कुछ जानने की कोशिश की थी? क्या दोनों घटनाओं के बीच कोई वास्तविक लिंक था? या यह सब बाद में बनाई गई थ्योरीज थी? यहां भी सबसे जरूरी चीज एविडेंस है। क्योंकि छ दिन का अंतर अपने आप में किसी कास्परेसी का प्रमाण नहीं है। लेकिन अगर दोनों मामलों के बीच कोई वास्तविक कम्युनिकेशन रिकॉर्ड, कोई विटनेस स्टेटमेंट, कोई वेरीिफाइड डिजिटल एविडेंस या कोई फॉरेंसिक कनेक्शन मिलता है, तभी वह लिंक मजबूत माना जा सकता है। और यही वजह है कि दिशा सालियान का मामला भी इस पूरी कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। अब सोचिए, एक तरफ दिशा की मौत। दूसरी तरफ 6 दिन बाद सुशांत की मौत और इनके बीच सोशल मीडिया पर फैलती हजारों थ्यरीज। किसी ने कहा पार्टी में बड़े नाम थे। किसी ने कहा सीसीटीवी फुटेज मिसिंग थी। किसी ने कहा कुछ लोगों के बयान सामने नहीं आए। किसी ने कहा टाइमलाइन में सवाल हैं। लेकिन इनमें से कौन सी बात सच है? कौन सी आधी सच है और कौन सी पूरी तरह गलत है? यही पता लगाना इन्वेस्टिगेशन का काम है। और यही वह हिस्सा है जहां हमें इमोशंस को थोड़ा पीछे रखना पड़ता है। क्योंकि जितना ज्यादा मामला इमोशनल होता है, उतना ही ज्यादा जरूरी हो जाता है कि हम फैक्ट से चिपके रहें। अब एक और सवाल। उस रात सुशांत के घर तक कौन पहुंचा? किसने दरवाजा खोला? किसने अंदर जाकर बॉडी देखी? किसने पुलिस को फोन किया? किसने एंबुलेंस को बुलाया? और वह व्यक्ति जिसने लॉक खोला, उसका स्टेटमेंट क्या था? कुछ वर्जनंस में लॉक स्मिथ यानी चाबी वाले के बारे में भी सवाल उठे। कहा गया कि उसे बुलाया गया था। काम खत्म हुआ और फिर वह वहां से चला गया। बाद में उसके बारे में कई बातें कही गई। लेकिन किसी व्यक्ति का बाद में सामने ना आना अपने आप में क्राइम का एविडेंस नहीं है। अगर उसका स्टेटमेंट ऑफिशियली रिकॉर्ड हुआ हो तो वही ज्यादा महत्वपूर्ण होगा। यानी हर कहानी में हमें इमोशन से वापस एविडेंस पर आना पड़ता है। इसी तरह एंबुलेंस स्टाफ को लेकर भी अलग-अलग क्लेम सामने आए। कुछ लोगों ने कहा कि बॉडी की कंडीशन को देखकर उन्हें कुछ अनयूजुअल लगा। कुछ स्टेटमेंट्स में इंजरीज और मार्क्स का जिक्र किया गया। लेकिन यहां भी वही सवाल क्या यह ऑब्जरवेशन मेडिकल एविडेंस के साथ मैच करता है?

क्या डॉक्टर्स की रिपोर्ट इससे एग्री करती है? क्या फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स ने वही कंक्लूजन निकाला? अगर नहीं तो किसे सही माना जाए? यही जांच का असली काम है और यहीं से एक बड़ा लेसन सामने आता है। किसी भी हाई प्रोफाइल केस में 10 लोग 10 बातें कह सकते हैं। लेकिन अदालत में आखिरकार वही बात टिकती है जिसके पीछे एविडेंस हो। अब बात करते हैं उन थ्योरीज की जिनमें बॉलीवुड और पावर नेटवर्क का नाम लिया गया। सुशांत को लेकर लंबे समय से नेपोटिज्म की बहस चली। कई लोगों का मानना था कि इंडस्ट्री में आउटसाइडर्स को आसानी से जगह नहीं मिलती। कुछ पुराने इंटरव्यूज और घटनाओं को देखकर लोगों ने यह सवाल भी उठाया कि क्या सुशांत को प्रोफेशनलली आइसोलेट किया गया था? क्या उन्हें फिल्मों से हटाया गया? क्या उनके खिलाफ पीआर कैंपेन चला? क्या कुछ बड़े लोगों के साथ उनके संबंध खराब हुए? यह सब सवाल पब्लिक डिबेट का हिस्सा बने? लेकिन यहां भी हमें एक सीमा समझनी होगी। इंडस्ट्री पॉलिटिक्स और किसी व्यक्ति की हत्या दो अलग बातें हैं। किसी एक्टर का फिल्म से हटना, किसी प्रोड्यूसर से विवाद या किसी पीआर कैंपेन का होना अपने आप में मर्डर कंस्परेसी साबित नहीं करता। अगर इन चीजों का कोई क्रिमिनल कनेक्शन था तो उसके लिए डायरेक्ट एविडेंस चाहिए। किसने क्या किया, कब किया, किसे आदेश दिया, किसे फायदा हुआ? और सबसे जरूरी उस एक्शन का सुशांत की मौत से सीधा कनेक्शन क्या था? जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते तब तक यह सिर्फ थ्योरी रहेगी और यही वजह है कि गॉड फादर पॉलिटिकल नेक्सेस या लॉबी जैसे शब्दों को लेकर भी सावधानी जरूरी है। किसी का नाम लेना आसान है। लेकिन किसी को अपराधी साबित करना बेहद अलग बात है। अब जरा उन छह दिनों को समझिए। 8 जून से 14 जून तक दिशा की मौत के बाद सुशांत की जिंदगी में क्या चल रहा था? क्या उन्होंने किसी से बात की? क्या कोई अनयूजुअल कॉल हुआ? क्या कोई अनयूजुअल मैसेज हुआ? क्या उनके डिजिटल डिवाइसेस में कोई बदलाव आया? क्या उन्होंने कोई सर्च की? क्या कोई ऐसा व्यक्ति उनसे मिलने आया जिसके बारे में पहले जानकारी नहीं थी? इन सवालों का जवाब अगर किसी रिलायबल डिजिटल रिकॉर्ड में मिलता है तो वह बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है और यही कारण है कि फॉरेंसिक इन्वेस्टिगेशन इतनी जरूरी है क्योंकि याददाश्त बदल सकती है। गवाही बदल सकती है। लोग अपने स्टेटमेंट्स बदल सकते हैं। लेकिन डिजिटल टाइम स्टैंप्स अगर प्रॉपर्ली प्रिजर्व हो तो बहुत कुछ बता सकते हैं। किस समय फोन एक्टिव था, किस समय मैसेज गया, किस समय लोकेशन बदली, किस समय डिवाइस अनलॉक हुआ? और कभी-कभी एक छोटा सा टाइम स्टैंप पूरी कहानी बदल देता है। यही वजह है कि इस मामले में डिजिटल एविडेंस को लेकर उठे हर जेन्युइन सवाल की जांच महत्वपूर्ण है। लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि डिजिटल डाटा का गायब होना हमेशा मर्डर का प्रमाण नहीं होता। कई बार टेक्निकल रीजंस होते हैं। कई बार डाटा ओवराइड हो जाता है। कई बार डिवाइस एक्सेस बदल जाता है। और कई बार यूजर खुद भी डाटा डिलीट करता है। इसलिए डाटा नहीं मिला से सीधे डाटा मिटाया गया तक पहुंच जाना भी सही नहीं है। बीच में फॉरेंसिक वेरिफिकेशन जरूरी है। और शायद इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा जरूरत इसी चीज की है। एक ऐसी इन्वेस्टिगेशन की जो किसी थ्योरी को प्रूफ करने के लिए नहीं सिर्फ ट्रुथ फाइंड करने के लिए काम करे। अगर सुसाइड था तो एविडेंस उसे साबित करें। अगर होमिसाइड था तो एविडेंस उसे साबित करें। अगर इन्वेस्टिगेशन में नेगिजेंस हुई तो उसकी जिम्मेदारी तय हो। और अगर कंस्परेसी का कोई प्रमाण नहीं है तो वह भी साफ कहा जाए क्योंकि सच किसी कैंप का नहीं होता। सच सिर्फ सच होता है। अब सुशांत की कहानी का एक और इमोशनल हिस्सा है उनके फैंस। वे लोग जिन्होंने उन्हें सिर्फ फिल्मों में नहीं देखा था। उन्होंने उनमें अपना सपना देखा था। एक छोटे शहर से निकलकर बड़ा बनने का सपना। एक आउटसाइडर होकर अपनी पहचान बनाने का सपना, कुछ अलग करने का सपना और जब सुशांत चले गए तो बहुत सारे लोगों को लगा जैसे उनके अपने सपने का एक हिस्सा भी टूट गया। यही वजह है कि हैशटग जस्टिस फॉर सुशांत सिर्फ एक हैशटैग नहीं रहा। यह लोगों की इमोशन से जुड़ गया। लेकिन यहां भी एक बात याद रखना जरूरी है। जस्टिस का मतलब यह नहीं कि हमें पहले से तय कर लेना चाहिए कि दोषी कौन है। जस्टिस का मतलब है जिसने अपराध किया है उसे एविडेंस के आधार पर सजा मिले। और जिसने अपराध नहीं किया उसे सिर्फ आरोपों के आधार पर दोषी ना बनाया जाए। यही असली न्याय है। अब सवाल आता है 6 साल बाद क्या कोई नया एविडेंस सामने आ सकता है? हां, अगर ओरिजिनल डिजिटल डाटा सुरक्षित है तो फॉरेंसिक टेक्नोलॉजी आज पहले से कहीं ज्यादा एडवांस्ड है। अगर पुराने स्टेटमेंट्स में कंट्राडिक्शंस हैं तो इन्वेस्टिगेटर्स उन्हें फिर से एग्जामिन कर सकते हैं। अगर कोई नया विटनेस सामने आता है तो उसकी क्रेडिबिलिटी जांची जा सकती है। अगर कोई पुराना एविडेंस पहले प्रॉपर्ली एनालाइज नहीं हुआ तो उसे इंडिपेंडेंट एक्सपर्ट्स देख सकते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर नया दावा ऑटोमेटिकली केस बदल देगा। नहीं। हर नए क्लेम को एविडेंस के सामने टिकना होगा और यही सबसे बड़ा टेस्ट होगा। अगर किसी कथित फॉरेंसिक एक्सपर्ट ने कहा कि इंजरी किसी वेपन से बनी तो उस कंक्लूजन की साइंटिफिक बेसिस क्या है? अगर किसी एडवोकेट ने कोई बड़ा दावा किया तो उसके पास कौन से डॉक्यूमेंट्स हैं? अगर किसी स्टिंग ऑपरेशन में कोई व्यक्ति कुछ कहता है तो क्या वो व्यक्ति फर्स्ट हैंड विटनेस है? क्या उसकी आइडेंटिटी वेरीिफाइड है? क्या उसका स्टेटमेंट कोरबोरेट होता है? इन सवालों के जवाब के बिना कोई भी दावा सिर्फ दावा है और यही शायद इस पूरे मामले की सबसे ईमानदार तस्वीर है। हमारे पास सवाल बहुत हैं लेकिन हर सवाल का जवाब हमारे पास नहीं है। कुछ आंसर्स इन्वेस्टिगेशन से मिल सकते हैं। कुछ अदालत से और कुछ शायद कभी ना मिले। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सवाल पूछना बंद कर दिया जाए। सवाल पूछना जरूरी है। बस सवाल पूछते समय यह भी जरूरी है कि हम किसी इनोसेंट व्यक्ति को बिना प्रूफ के विलेन ना बना दें। क्योंकि किसी की जिंदगी में आरोप लगाना आसान है। लेकिन उस आरोप का बोझ बहुत भारी हो सकता है। सुशांत सिंह राजपूत की कहानी हमें यही सिखाती है। एक इंसान की जिंदगी को सिर्फ उसके आखिरी दिन से मत देखिए। उसकी पूरी यात्रा देखिए। एक ऐसा लड़का जिसने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की जिसे स्पेस पसंद था। जिसने टेलीविजन से शुरुआत की जिसने फिल्मों में अपनी पहचान बनाई जिसने करोड़ों लोगों को इंस्पायर किया और जिसने अपने पीछे इतना बड़ा सवाल छोड़ दिया कि 6 साल बाद भी लोग उसके जवाब की तलाश कर रहे हैं।

शायद यही कारण है कि आज भी उनकी तस्वीर सामने आते ही लोग कुछ सेकंड के लिए रुक जाते हैं। क्योंकि उनके जाने में सिर्फ दुख नहीं था। एक अधूरापन भी था। एक फीलिंग थी कि कहानी अभी खत्म नहीं हुई। लेकिन अब अगर सच में कोई नया एविडेंस सामने आता है तो उसे सेंसेशनल हेडलाइन बनाने के बजाय प्रॉपर्ली इन्वेस्टिगेट करना चाहिए। अगर कोई क्लेम गलत है तो उसे भी एक्सपोज किया जाना चाहिए। अगर कोई ऑफिशियल कंक्लूजन है तो जनता को उसके आधार के बारे में समझाया जाना चाहिए और अगर कोई जेन्युइन अनआंसर्ड क्वेश्चन है तो उसे दबाया नहीं जाना चाहिए। क्योंकि किसी भी लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं है। लेकिन बिना सबूत किसी को अपराधी कहना भी न्याय नहीं है। यही बैलेंस हमें रखना होगा। और शायद आने वाले समय में सबसे महत्वपूर्ण चीज कोई बड़ा नाम नहीं बल्कि कोई छोटा सा एविडेंस होगा। एक फोन रिकॉर्ड, एक टाइम स्टैंप, एक सीसीटीवी फ्रेम, एक फॉरेंसिक रिपोर्ट, एक वेरीिफाइड स्टेटमेंट या कोई ऐसा डॉक्यूमेंट जो पहले किसी ने ठीक से नहीं देखा। क्योंकि बड़े रहस्य अक्सर बड़े डॉक्यूमेंट से नहीं छोटी सी डिटेल से खुलते हैं। एक ऐसी डिटेल जिसे बाकी सब ने नजरअंदाज कर दिया हो और अगर कभी ऐसा हुआ तो शायद 6 साल से चली आ रही यह कहानी एक नए मोड़ पर पहुंच सकती है। लेकिन तब तक हमें इंतजार करना होगा और सबसे जरूरी हमें अफवाह और तथ्य के बीच फर्क बनाए रखना होगा। क्योंकि सुशांत सिर्फ एक सेलिब्रिटी नहीं थे। उनकी मौत का असर एक पूरी जनरेशन पर पड़ा। इसलिए उनकी कहानी को सेंसेशनलाइज करना आसान है। लेकिन सम्मान के साथ बताना मुश्किल और शायद हमें मुश्किल रास्ता ही चुनना चाहिए। क्योंकि असली सवाल यह नहीं है कि हमारी बनाई हुई थ्योरी कितनी एक्साइटिंग है। असली सवाल यह है कि एविडेंस क्या कहता है? अगर एविडेंस कहता है कि यह सुसाइड था तो हमें उस ट्रुथ को स्वीकार करना होगा। अगर एविडेंस होमिसाइड की तरफ जाता है तो दोषियों को कानून के सामने आना चाहिए। अगर एविडेंस इन्वेस्टिगेशन की कमजोरी दिखाता है तो अकाउंटेबिलिटी होनी चाहिए और अगर कोई कांस्परेसी साबित नहीं होती तो उस बात को भी स्वीकार करना होगा क्योंकि जस्टिस किसी व्यक्ति की इच्छा के मुताबिक नहीं चलता। जस्टिस एविडेंस के मुताबिक चलता है। सुशांत के फैंस ने 6 साल इंतजार किया है। किसी ने उनकी तस्वीर के सामने दिया जलाया। किसी ने उनकी फिल्में देखी। किसी ने उनकी पुरानी बातें सुनी। किसी ने हर साल 14 जून को उन्हें याद किया। और शायद इन सबके पीछे सिर्फ एक भावना थी। काश सच सामने आ जाए। काश जो हुआ उसकी पूरी तस्वीर मिल जाए। काश यह पता चले कि आखिरी दिनों में वास्तव में क्या चल रहा था और काश अगर कोई अपराध हुआ था तो जिसने किया उसे कानून सजा दे। बस शायद यही मांग है। ना किसी से बदला ना किसी को बिना वजह बदनाम करना। सिर्फ सच। और अगर सच हमारी उम्मीद के मुताबिक नहीं भी निकलता तब भी हमें उसे स्वीकार करना होगा। क्योंकि सुशांत को न्याय दिलाने का सबसे सही तरीका यही है कि उनकी कहानी को अफवाहों के हवाले ना किया जाए। उसे फैक्ट्स के साथ देखा जाए। एविडेंस के साथ देखा जाए और पूरी ईमानदारी से देखा जाए। 6 साल बाद भी उनकी कहानी हमारे सामने खड़ी है।

एक तरफ एक बेहद प्रतिभाशाली अभिनेता की यादें। दूसरी तरफ उसकी मौत से जुड़े सवाल और इनके बीच एक लंबा इंतजार। शायद आने वाला समय बताएगा कि इस कहानी की आखिरी लाइन क्या होगी। शायद कोई नई फॉरेंसिक फाइंडिंग सामने आए। शायद कोई पुराना एविडेंस दोबारा सामने आए। शायद कोई विटनेस कुछ ऐसा बताए जिसे पहले नजरअंदाज कर दिया गया था या शायद जांच आखिरकार उसी निष्कर्ष पर पहुंचे जिसे पहले से बताया जाता रहा है। लेकिन जब तक अंतिम और वेरीिफाइड आंसर सामने नहीं आता तब तक सबसे जिम्मेदार बात यही है। सवाल पूछते रहिए लेकिन फैसला एविडेंस पर छोड़िए क्योंकि सच को हमारी आवाज की जरूरत नहीं होती। सच को सिर्फ सामने आने का मौका चाहिए। और सुशांत सिंह राजपूत की कहानी में शायद अब सबसे जरूरी चीज भी यही है। एक ऐसी जांच जो किसी दबाव में ना हो। किसी थ्योरी के पक्ष में ना हो। किसी व्यक्ति के खिलाफ पहले से फैसला लेकर ना बैठे। सिर्फ एक सवाल लेकर आगे बढ़े। उस दिन वास्तव में हुआ क्या था? क्योंकि जब इस सवाल का जवाब पूरी तरह सामने आएगा तभी शायद छ साल से चल रहा यह इंतजार खत्म होगा। तब शायद लोगों के मन में चल रही वह बेचैनी भी खत्म होगी जो 14 जून 2020 से शुरू हुई थी। सुशांत चले गए लेकिन उनके सपने रह गए। उनकी फिल्में रह गई। उनकी यादें रह गई और एक सवाल भी रह गया। एक ऐसा सवाल जिसका जवाब किसी YouTube वीडियो से नहीं। बल्कि सच और सबूत से मिलना चाहिए। और अगर वह सच कभी सामने आता है तो उम्मीद बस इतनी होनी चाहिए कि वह किसी की कहानी को तोड़ने के लिए नहीं बल्कि उस परिवार को जवाब देने के लिए सामने आए जो छ साल से अपने सवालों के साथ जी रहा है। अगर आपको भी लगता है कि इस मामले में जो भी अंतिम सच्चाई है वह पूरी ट्रांसपेरेंसी के साथ सामने आनी चाहिए तो इस वीडियो को लाइक कीजिए। इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक शेयर कीजिए और चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकन जरूर दबाइए क्योंकि यहां हमारा मकसद किसी को बिना सबूत दोषी ठहराना नहीं बल्कि उन सवालों को आपके सामने रखना है जिनके जवाब जानना जरूरी है और कमेंट में लिखिए सच सामने आना चाहिए क्योंकि छ साल बहुत लंबा वक्त होता है और इतने लंबे इंतजार के बाद कम से कम इतना तो होना ही चाहिए जो सच है वो सच के रूप में सामने

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