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पहली ही फिल्म से ब्लॉकबस्टर, फिर अचानक गायब क्यों हो गईं महिमा चौधरी?

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दिल दीवाना ना जाने कब खो गया। कभी किसी ने सोचा भी नहीं था कि जिस लड़की की बात पर उसके अपने दोस्त भरोसा नहीं कर रहे थे वही लड़की आगे चलकर बॉलीवुड की जानी मानी अभिनेत्री बनेगी। इस दुनिया में अनजाने मिलते हैं अक्सर इस दुनिया में। कहानी शुरू होती है दार्जिलिंग से। एक दिन महिमा अपने दोस्तों से कहती हैं कि उन्होंने आमिर खान के साथ एक विज्ञापन शूट किया है। लेकिन दोस्तों ने उनकी बात पर भरोसा नहीं किया। सबको लगा महिमा मजाक कर रही हैं या फिर झूठ बोल रही हैं। महिमा बार-बार समझाती रही कि उन्होंने सच में आमिर खान के साथ शूट किया है और अगले महीने वो विज्ञापन टीवी पर आएगा। फिर वो दिन आया। टीवी पर एक सॉफ्ट ड्रिंक का विज्ञापन प्रसारित हुआ और

उसमें महिमा आमिर खान के साथ नजर आई। हाय आई एम योर न्यू नेबर। कैन आई हैव अ लेयर पेप्सी? या शोर यस। अब दार्जिलिंग में किसी के पास उन पर शक करने की कोई वजह नहीं थी। सबको मानना पड़ा कि महिमा सच कह रही थी। लेकिन शायद उस वक्त किसी को अंदाजा नहीं था कि यह छोटा सा विज्ञापन एक दिन उन्हें बॉलीवुड तक पहुंचाने वाला है। महिमा को यह पहला विज्ञापन अपने पिता के एक जानकार की मदद से मिला था। दिल्ली की एक मॉडलिंग एजेंसी को एक बिल्कुल नए चेहरे की तलाश थी। ऐसा चेहरा जिसे पहले कभी टीवी पर ना देखा गया हो और महिमा उस विज्ञापन के लिए चुन ली गई। आमिर खान को उन्होंने इससे पहले सिर्फ फिल्मों में देखा था। इसलिए उनके साथ पहली बार कैमरे के सामने खड़ा होना महिमा के लिए बेहद खास था। लेकिन एक्टिंग का यह सफर अचानक शुरू नहीं हुआ था। महिमा जब सिर्फ 4 साल की थी, तभी उन्होंने स्कूल के एक नाटक में पहली बार स्टेज पर अभिनय किया था। उस नाटक में उन्होंने बंगाली बहू का किरदार निभाया था। इसके बाद हर साल स्कूल के नाटकों में हिस्सा लेने लगी। ये दुनिया एक दुल्हन ये दुनिया और सातवीं क्लास के बाद तो उन्हें लड़कों के किरदार भी निभाने पड़ते थे क्योंकि उनका स्कूल सिर्फ लड़कियों का था।

फिर भी उस वक्त महिमा ने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वो फिल्म अभिनेत्री बनेंगे। उनका ध्यान पढ़ाई पर था। 13 सितंबर 1973 को दार्जिलिंग में जन्मी महिमा ने वहीं के बोर्डिंग स्कूल से पढ़ाई की। उनके माता-पिता उत्तर प्रदेश के बागपत जिले से थे और उनके पिता दार्जिलिंग में नौकरी करते थे। महिमा पढ़ाई में अच्छी थी। इसलिए जब उन्होंने मॉडलिंग का पहला प्रोजेक्ट किया तो उनके पिता और टीचर्स ने उन्हें साफ सलाह दी थी। ग्लैमर की दुनिया के चक्कर में पढ़ाई मत छोड़ना। और महिमा ने भी उनकी बात मानी। पहले विज्ञापन के बाद उन्हें फिल्मों के ऑफर मिलने लगे थे। लेकिन उन्होंने तुरंत फिल्मों में जाने का फैसला नहीं किया। फिर उन्हें वीडियो जॉकी बनने का एक बड़ा ऑफर मिला। मां को बताया। मां ने पिता को मनाया और आखिरकार महिमा अपनी मां के साथ मुंबई आ गई। तब तक उनकी ग्रेजुएशन पूरी हो चुकी थी। अब फिल्मों में जाने का रास्ता खुल चुका था और फिर उनकी मुलाकात हुई सुभाष घई से। सुभाष घई अपनी फिल्म परदेश के लिए एक नए चेहरे की तलाश में थे। कई लड़कियों के ऑडिशन के बाद भी उन्हें अपना चेहरा नहीं मिला था।

फिर एक पार्टी में उनकी नजर ऋतु चौधरी पर पड़ी और यहीं से कहानी में आया सबसे बड़ा ट्विस्ट। रथू चौधरी को फिल्म परदेश में मुख्य भूमिका का ऑफर मिला। लेकिन फिल्म में आने से पहले उनसे एक सवाल पूछा गया। मीडिया में तुम्हारा नाम रतू रखा जाए या कोई दूसरा नाम? महिमा के मुताबिक उन्हें अपना नाम रतु कुछ खास पसंद नहीं था। स्कूल में उनकी क्लास में भी कई लड़कियों का नाम रतु था। इसलिए उन्होंने खुद कुछ दूसरे नाम सोचे। तभी सुभाष घई ने कहा कि अगर नाम एम से शुरू हो तो बेहतर रहेगा। महिमा के मुताबिक सुभाष घई का मानना था कि एम अक्षर उनके लिए शुभ है और शायद इसके पीछे उनकी पिछली फिल्मों की सफलता भी एक वजह थी क्योंकि उनकी फिल्मों में माधुरी दीक्षित और मीनाक्षी शेषाद्री जैसी अभिनेत्रियां भी काम कर चुकी थी और इन फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया था। तू मेरा जानू है तू मेरा दिलबर है मेरे बड़ा दुख दी तेरे लखन यही वजह बताई जाती है कि सुभाष घई एम अक्षर को लेकर काफी सकारात्मक सोच रखते थे लेकिन ध्यान रहे माधुरी दीक्षित या मीनाक्षी शेषाद्री का नाम सुभाष घई ने नहीं बदला था अब वापस आते हैं रथु चौधरी पर रथु को अपने पिता के एक अच्छे दोस्त की दो बेटियों के नाम याद आए। रिद्धिमा और महिमा। उन्होंने पूछा। महिमा नाम कैसा रहेगा?

सुभाष घई को नाम पसंद आ गया। और इस तरह रथू चौधरी बन गई। महिमा चौधरी। इसके बाद आई फिल्म परदेश। तस्वीर से तू निकल के सामने आ मेरी महबूब। फिल्म सुपरहिट हुई और महिमा चौधरी रातोंरात बॉलीवुड के चर्चित चेहरों में शामिल हो गई। मिल रहे हैं मगर उन्हें फिल्म फेयर का बेस्ट डेब्यू अवार्ड भी मिला। द बेस्ट डेब्यू फीमेल फॉर द ईयर 1997 चौधरी लेकिन इस कहानी का सबसे दिलचस्प सवाल आज भी यही है। क्या सिर्फ बॉलीवुड में एक नई पहचान बनाने के लिए आरथू को अपना नाम बदलना पड़ा था? या फिर यह सुभाष घई की उस मान्यता का हिस्सा था जिसमें एम से शुरू होने वाले नाम को उनके लिए शुभ माना जाता था। महिमा ने बाद में खुद अपने नाम को लेकर बातचीत की और बताया कि समय के साथ उन्हें अपने असली नाम रथू से जुड़ाव महसूस होने लगा था। यानी जिस नाम ने उन्हें बॉलीवुड में पहचान दिलाई उसी नाम के पीछे छिपी थी एक ऐसी कहानी जिसे शायद बहुत कम लोग जानते हैं। राधु चौधरी से महिमा चौधरी बनने का यह सफर सिर्फ एक नाम बदलने की कहानी नहीं। यह उस लड़की की कहानी है जिसने दार्जिलिंग के स्कूल के मंच से शुरुआत की। आमिर खान के साथ पहला विज्ञापन किया और फिर परदेश से बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाई। नहीं होना था नहीं होना था लेकिन हो गया हो गया है मुझ

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