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इंडस्ट्री के सारे नियमों को कैसे तोड़ा इस फिल्म ने? सक्सेस का क्या है राज?

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भाई बवाल कर दिया। हनुमान अंश ने बवाल कर दिया। सीताराम बोलते हुए वेलकम कर रहा हूं आप लोगों को। डे वन पे 8 से 10 लाख का कलेक्शन। और 26वें दिन पर 8.5 करोड़ का कलेक्शन। 50 करोड़ पार कर चुकी है ये फिल्म। कुछ लोगों के लिए यह कलेक्शन है। पर एक्चुअली में यह बाबा जी से लोगों का कनेक्शन है। और जब कनेक्शन हो जाए ना तो कलेक्शन इम्पोर्टेन्ट नहीं होता दोस्तों। अरे आवारापन बॉलीवुड, बॉलीवुड सब छोड़ो यार। एक फिल्म आई है हरमान आंटी। आई वास नॉट प्रिपेयर फॉर व्हाट आई फेल्ट। हर एक सीन आपके अंदर एक अलग ही डेप्थ ऐड करता है। दोस्तों, जीतने का मजा तब नहीं आता जब लोगों को पता हो कि आप जीतने वाले हो और आप जीत जाओ। ना, मजा तब डबल हो जाता है जब पता ही ना चले कि आप खेल रहे हो और खेलतेखेलते आप पेल जाओ। अभी 2 महीने पहले आयरलैंड की टीम ने इंडिया को टी20 सीरीज में दो जीरो से हराया। टीम इंडिया नहीं, वर्ल्ड चैंपियन टीम इंडिया को। तब तक लोगों को पता भी नहीं था बहुत सारे लोगों को कि आयरलैंड के साथ हमारा मैच भी है। सोचिए आयरलैंड के लिए ये जीत इतनी बड़ी हो गई क्योंकि लोगों को पता भी नहीं था और उन्होंने वर्ल्ड चैंपियन टीम इंडिया को हरा दिया। सेम सिमिलर सिचुएशन है। मैक्सिमम जनता को पता ही नहीं चला कि कब हनुमान अंश मूवी रिलीज हुई। आज कई सारे सेलिब्रिटीज, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंजाज और मीडिया वाले हनुमान अंश हनुमान अंश के गुणगान कर रहे हैं। इस तरह की मूवी और बननी चाहिए ना मेरे हिसाब से। हां सेकंड पार्ट का वेट है। मुझे अभी गोज़ों्स आ रहे हैं। वाह भैया वाह! सीताराम सीताराम। इसीलिए ऐसे जब जीत होती है मतलब सक्सेसफुल जब ऐसी कोई चीज होती है तब मजा और ज्यादा बढ़ जाता है। है कि नहीं? इनफैक्ट कई ऐसे लोग भी थे जिन्होंने फिल्म देखने के 2 मिनट के अंदर ही ये बोल दिया

कि भैया इस फिल्म में जीरो प्रोडक्शन वैल्यू है। फिल्म खत्म है नहीं चलेगी आप इसको भूल जाओ। हम तो बहता पानी है। कहीं भी रम जाएंगे। जी हां, फिल्म के डायरेक्टर विशाल चतुर्वेदी के साथ हमने एक और पॉडकास्ट किया है। हमारे टीआरपी चैनल पर वो पॉडकास्ट अभी-अभी रिलीज़ हुआ है। जाकर इस एपिसोड को जरूर देखना। उन्होंने यह बताया इस पॉडकास्ट में कि कई ऐसे लोग थे जिनको जब फिल्म रिलीज़ होने से पहले दिखाई गई और बोला गया कि भ आप फिल्म देखिए और इसको सपोर्ट करिए। तो लोगों ने ऐसे नाक सिकोड़े मुंह बनाए जैसे पता नहीं उन्होंने क्या देख लिया हो। ऐसे ही लोग इंडिया और भारत में फर्क नहीं समझते। जी हां, सही सुना आपने। इस देश में दो देश रहते हैं मेरे भाई। इंडिया अलग और भारत अलग। ये फिल्म भारत की फिल्म है। और अब भारत इस फिल्म को लेकर आगे बढ़ रहा है। अपने कंधे पर उठा चुका है। ये फिल्म ना मैं बता रहा हूं आपको। मेकर्स के हाथों से निकल चुकी है। प्रोड्यूसर्स, डायरेक्टर, राइटर इन सबके हाथ से ये फिल्म निकल चुकी है और जनता ने हाथों में इस फिल्म को उठा लिया है और लोगों तक जनता अपने ही वर्ड ऑफ माउथ से फैला रही है। एक व्यक्ति 10 लोगों को थिएटर लेकर जा रहा है या वीडियो बनाकर या अपने घर के सोसाइटी के आरडब्ल्यूएस के WhatsApp ग्रुप पर लोगों से कह रहा है, अपील कर रहा है कि भैया फिल्म देखने जाओ, जाओ जाओ और जाओ। हनुमान अंश ने चौथे रविवार कमाई के मामले में स्त्री 2, छावा और जवान जैसी बड़ी फिल्मों को पीछे छोड़ दिया है। तो जब फिल्म जनता अपने हाथों पर उठा लेती है और जनता इसको अपनी पर्सनल रिस्पांसिबिलिटी समझ लेती है और फिल्म के कलेक्शन को जनता अपना पर्सनल अचीवमेंट समझने लगती है क्योंकि लोग ना अब ये बोल रहे हैं आप रस्ते में किसी को मिलोगे हनुमान अंश देगी। हां हनुमान अंश की। अरे भाई उसका तो देखा ना ये 50 करोड़ हो गया उसका कलेक्शन।

अरे 25 करोड़ हो गया उसका कलेक्शन। अरे लोग लाइन लगा के फिल्में देखने जा रहे हैं। इसका मतलब ये है कि फिल्म लोगों के दिल में उतर चुकी है और अब फिल्म की सक्सेस लोगों को अपनी पर्सनल सक्सेस लग रही है। इसीलिए तो फिल्म इतना भाग रही है। सी टियर्स इन माय आईज इट्स मिसमराइजिंग मतलब 14 साल का बेटा और ये 17 साल की बेटी आई है। इनको भी बहुत अच्छी लगी है। इतनी अच्छी है, इतनी अच्छी है कि सभी को देखनी चाहिए। अब दोस्तों बॉक्स ऑफिस पर हनुमान अंश जैसी फिल्म की सक्सेस ने पूरी फिल्म इंडस्ट्री को एक बहुत बड़ा मैसेज दिया है। अगर इस फिल्म के इंपैक्ट को ध्यान से एनालाइज करें तो तीन जरूरी बातें हमें समझ में आती है कि आखिर कहां बॉलीवुड और अब साउथ की इंडस्ट्री भी बुरी तरह पिछड़ रही है। तो चलिए बात करते हैं। पहला इंपैक्ट है अक्सर कहा जाता है फला फिल्म बहुत छोटी है या फला फिल्म बहुत बड़ी है। उसके तो पहले ही दिन 100 करोड़ हो जाने चाहिए। लेकिन इसका क्या हर बार इंपैक्ट पड़ता है? हनुमान अंश सबसे बड़ा एग्जांपल है कि छोटे को छोटा नहीं समझना चाहिए और हमेशा बड़े को बड़ा नहीं समझना चाहिए। तू समझा? हां। नहीं तू समझा नहीं। बिना किसी बहुत बड़े बजट या भारी भरकम स्टार कास्ट के भी एक फिल्म क्या कमाल कर सकती है ये हमने इस फिल्म में देखा। अगर आपके कंटेंट में विज़न और दम है तो वो छोटा बॉक्स ऑफिस पर बहुत बड़ा बन सकता है। इस फिल्म के पास बजट इतना लिमिटेड था कि मार्केटिंग के लिए इन्हें भंडारे करवाने पड़े और कई थिएटर्स में तो पोस्टर तक भिजवाने का पैसा इस फिल्म के पास नहीं था। लेकिन आज देखो सो कॉल्ड बड़ी फिल्मों के शोज़ आधी कैपेसिटी पर चल रहे हैं और ये फिल्म लगभग हर शो हाउसफुल या फास्ट फीलिंग में भगा रही है। किसी बड़े बजट या बड़े सुपरस्टार के नाम पर ये मान लेना कि फिल्म तो हिट होगी ही अब एक पुरानी सोच हो गई है। अगर कहानी में दम नहीं है तो वो बड़ा प्रोजेक्ट भी दर्शकों के सामने छोटा बन सकता है। इसका सबसे बड़ा एग्जांपल टॉक्सिक है। इससे पहले सबसे बड़ा एग्जांपल आदि पुरुष था और मेरे हिसाब से तो हमेशा एक एग्जांपल रहेगी कि करोड़ों रुपए को आग कैसे लगाते हैं। ऐसी कई सारी फिल्में हैं

जिनके पास करोड़ों का बजट था लेकिन इंटेंट और कंटेंट दोनों नहीं था। बात तो सही है। अब आते हैं दूसरे पॉइंट पर। बॉलीवुड की चुप्पी। भाई साहब ये हिंदी फिल्म ही है। टेक्निकली ये बॉलीवुड में ही आती है। आपकी फिल्में अपना बजट रिकवर नहीं कर पा रही है। और वहां एक ऐसी फिल्म आ रही है जो अभी तक 500% प्रॉफिट में चल रही है। और आप लोग चुप हैं। फिर आप कहेंगे कि इंडस्ट्री में एकता नहीं है। इंडस्ट्री को हमेशा एक बनकर रहना चाहिए। ये फिल्म हमें यही सिखाती है। जब कोई अच्छी फिल्म आती है, चलती है तो उससे सिर्फ डायरेक्टर या प्रोड्यूसर का फायदा नहीं होता बल्कि पूरी इंडस्ट्री का फायदा होता है। याद है कैसे हिंदी फिल्म वाले लगातार शिकायत करते थे कि भाई लोग थिएटर में नहीं आ रहे हैं। सिनेमा हॉल में नहीं पहुंच रहे हैं। लेकिन आज सच्चाई क्या है? थिएटर में लोग आ रहे हैं। अगर फिल्में अच्छी बनेगी तो डिस्ट्रीब्यूटर्स का भी फायदा होगा। सिनेमाघरों में भी रौनक लौटेगी और दर्शक खुशी-खुशी थिएटर आएंगे और वहां से जाएंगे। अनुराग कश्यप साहब ने भी यही बात बोली थी कि मेरी फिल्मों को स्क्रीन नहीं मिलती। भाई ये फिल्म भी ना जो इस वक्त भाग रही है हनुमान अंश ये भी सिर्फ 200 प्लस स्क्रीनंस पर उतरी थी और आज 5500 के करीब स्क्रीन्स पर चल रही है। भाई कंटेंट बनाएंगे तो स्क्रीनंस तो मिलेगी। शर्त यही है कि बनाओ तो सही। अब मिलियंस ऑफ़ फॉलोवर्स लेकर रखे हुए एक्टर्स लोग इस बारे में बात ही नहीं कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इस फिल्म को उनके सपोर्ट की जरूरत है। लेकिन उनको इस फिल्म की जरूरत है। क्योंकि उनकी ही इंडस्ट्री को ये फिल्म आगे बढ़ा रही है। अगर आप सच में एक आर्टिस्ट हैं तो उस आर्टिस्ट की रिस्पेक्ट करिए ना। जिसने लिमिटेड रिसोर्सेज में वो करके दिखा दिया जो आप नहीं कर पाए। जितने का आप वैनिटी का खर्चा उठाते थे उससे कई गुना कम में ये फिल्म का पूरा बजट है। एंड टू एंड इस पर तारीफ नहीं बन रही है। लिखने को तो आप फर्रे भर देते हैं। ऐसा क्यों है दोस्त? मैं लोगों से कमेंट चाहता हूं कि आप जरा कमेंट करके बताएं कि इतने बड़े-बड़े प्रोडक्शन हाउसेस हैं। इतने बड़े-बड़े एक्टर्स हैं, इतनी बड़ी-बड़ी उनकी पीआर एजेंसीज हैं। इन सारे लोगों को आकर इस फिल्म को,

इस फिल्म के मेकर्स को अप्रिशिएट करना चाहिए। और पब्लिकली थैंक यू बोल के ये धन्यवाद बोलना चाहिए। कि भाई साहब आप लोगों की वजह से सिनेमाघरों में फिर से रौनक लौट आई है और लोग लाइन लगाकर फिल्म देख रहे हैं। तो ये सिर्फ एक फिल्म की जीत नहीं ये पूरी इंडियन फिल्म इंडस्ट्री की जीत है। पर अनफॉर्चुनेटली यहां कोई ऐसा करता नहीं है। क्यों नहीं करता? बोलो बोलो टेल टेल। खैर इसका जवाब तो आप कमेंट करके बताना। फिलहाल हम तीसरे पॉइंट की बात करते हैं। वही तीसरी चीज समझानी पड़ेगी कि भावना से बड़ी भव्यता कुछ नहीं होती। अगर आपकी फिल्म बनाने की भावना सही है तो वो स्क्रीन पर चलेगी। ये बात अगर स्क्रीन पर नजर नहीं आई तो नहीं चलेगी। साउथ वालों को भी देखना पड़ेगा क्योंकि उनकी ही इंडस्ट्री से टॉक्सिक नाम की फिल्म थिएटर में पड़ी है और हर दिन बुरी तरह से गिर रही है। उस फिल्म में किसी को क्या ये नहीं पता था क्या बना रहे हैं। लेकिन इस फिल्म में पहले दिन से क्लेरिटी थी कि इनको नीम करोली बाबा जी की जर्नी दिखानी है। अपने कंटेंट और थीम को अच्छे से समझना बहुत जरूरी होता है। इस फिल्म में अंदर वो दिखता है। अगर आप कास्ट उठाकर देख लीजिए तो बिना Google किए एक नाम नहीं बता सकते आप। हैं? लेकिन बड़े नामों से भरी फिल्में अपना बजट भी तरीके से रिकवर नहीं कर पाती। क्यों? क्योंकि भावना नहीं होती। हैं? इमोशन भैया इमोशन जब फिल्मों को सिर्फ एक कमर्शियल सक्सेस को दिमाग में लेकर बनाते रहेंगे जब तक तो आप बस एक फार्मूला को कॉपी कर रहे होते हैं। हनुमान वंश में ऐसा कोई फार्मूला नहीं था। बस एक सोच थी कि हमको एक कहानी दिखानी है। ईमानदारी से दिखानी है।

फिल्म के अंदर टेक्निकल चैलेंजेस जरूर आए होंगे और खुद इसके डायरेक्टर विशाल चतुर्वेदी ने हमारे पॉडकास्ट में ये बात बताई भी है। वो पॉडकास्ट हमने अभी रिसेंटली आज ही रिलीज़ किया है। कुछ ही घंटे पहले, कुछ ही मिनट पहले। डिस्क्रिप्शन में लिंक दिया है। जाकर इस पॉडकास्ट को जरूर देखना। हमारे TRP चैनल पर है। लेकिन डायरेक्टर ने और मेकर्स ने उन चैलेंजेस को पार किया। इसलिए करते गए पार क्योंकि उनका मकसद एक कमर्शियल सक्सेस बनाने से ज्यादा इस बात पर था कि वो लोगों को कैसे अपने साथ कनेक्ट कर पाए। आज जब फिल्म लोगों से कनेक्ट हुई है तो देखिए डिस्ट्रीब्यूटर्स और एग्बिटर्स की लाइन लग गई और टॉक्सिक की स्क्रीनंस इनको मिलने लगी है। आपसे मैं जानना चाहता हूं आपने फिल्म देखी कैसी लगी? कमेंट करके जरूर बताइएगा। और लोगों का आपके अगल-बगल जो लोग थे चाहे वो फिल्म देखते हुए आपको मिले थे आपके सोसाइटी में आपके आजू-बाजू में रहते हैं उनका रिएक्शन क्या है? इस फिल्म में ऐसी कौन सी चीज है जो उनसे कनेक्ट कर गई? क्या नीम करोली बाबा जी की कहानी? क्या हनुमान जी की भक्ति की शक्ति या फिर जितनी इंटेंसिटी और जितनी ऑनेस्टी के साथ मेकर्स ने इस फिल्म को बनाया है वो बात या इसके अलावा भी कोई ऐसी बात होगी जो आपको कनेक्ट कर गई होगी कमेंट करके जरूर बताना फिल्म का बेस्ट पार्ट आपको क्या लगा वो भी जरूर बताना और डिस्क्रिप्शन में फिर से याद दिला दूं लिंक दिया है हमारे लेटेस्ट पॉडकास्ट का हनुमान अंश इतनी बड़ी सक्सेसफुल फिल्म कैसे बनी कितने चैलेंजेस आए क्या-क्या हुआ इसके ऊपर डायरेक्टर इस फिल्म के डायरेक्टर राइटर एंड प्रोड्यूसर हैं विशाल चतुर्वेदी उनसे हमारे एक पॉडकास्ट में बातचीत हुई है आप जरूर देखना लिंक डिस्क्रिप्शन में दिया है थैंक यू फॉर वाचिंग जल्दी मिलते जय हिंद। सीताराम, सीताराम।

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