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मुस्लिम लीग का ये नेता कैसे बना भगवान कृष्ण का ‘पुजारी’? जानकर होश उड़ जाएंगे

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चुपके-चुपके रात-द दिन आंसू बहाना याद है। इस पॉपुलर नज़्म को लिखने वाले मौलाना हसरत मोहानी एक फ्रीडम फाइटर, एक जर्नलिस्ट, एक शायर, संविधान सभा के एक सदस्य और का नारा इजाद करने वाले एक इंकलाबी शख्स के तौर पर जाने जाते हैं।

मगर उनका एक रूप जिसके बारे में लोगों को कम ही पता होता है और वह रूप है कृष्ण भक्ति का। मथुरा की नगर है आशिकी का, दम भरती है आरजू उसी का। पैगाम हयात जाविदा था हर नगमा कृष्ण बांसुरी का। यह नज़्म अपने आप में कृष्ण की भक्ति का एक शानदार एग्जांपल है।

दोस्तों हसरत मोहानी एक बार लखनऊ से दिल्ली के सफर पर थे। इस दौरान वो कृष्ण भक्ति में एक नज़्म गुनगुना रहे थे। रास्ते में किसी अजनबी शख्स ने उनसे पूछा कि मौलाना साहिब देखने से तो आप अच्छे खासे मुसलमान लगते हैं। फिर कृष्ण के गीतों को क्यों गा रहे हैं? आपका मजहब क्या है? इस मासूम से सवाल पर हसरत को हंसी आई और उन्होंने कहा दरवेशी ओ है मसलक मेरा सूफी मोमिन हूं इस्तराकी मुसलमीन इसका मतलब है मेरा मजहब फकीरी और इंकलाब है और कम्युनिस्ट मुसलमान इंकलाब जिंदाबाद वो नारा जो भगत सिंह अशफाक उल्लाह खान के साथ-साथ तमाम आजादी के मतवालों के मुंह से जंग आजादी की पहचान बना।

इस नारे को इजाद करने वाले हसरत मोहानी खुद भी एक आजादी के सिपाही थे। सिर्फ 20 साल की उम्र में अंग्रेजों के खिलाफ अपने अखबार उर्दू ए मुल्ला में एक क्रांतिकारी लेख छापा जिसके एवज़ में उन्हें ब्रिटिश हुकूमत ने एक साल के लिए जेल में डाल दिया। यह घटना 1903 की है। उस वक्त वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में अपनी पढ़ाई कर रहे थे। इसी दौरान वह स्वदेशी तहरीकों में भी हिस्सा लेते रहे। मौलाना मोहानी की पूरी जिंदगी कृष्ण प्रेम से सराबोर थी। उनका बचपन ज्यादातर मथुरा में बीता था। बचपन में वह अक्सर मथुरा के पुराने और ऐतिहासिक मंदिरों में बैठकर कृष्ण लीला के प्रवचन सुनते थे।

कृष्ण की लीलाओं को सुनने और समझने की ऐसी खुमारी चढ़ी कि फिर तामर उन्हीं के होकर रह गएlदोस्तों मौलाना हसरत मोहानी का नाम सैयद फजल उल हसन था। उनका तलखुस हसरत था। वो कस्बा मोहान जिला उन्नाव के रहने वाले थे। हसरत मोहानी के मन में भगवान कृष्ण के लिए प्रेम और भक्ति की झलकियां उनकी कविताओं और गजलों में देखने को मिलती हैं। हसरत मोहानी भगवान श्री कृष्ण को हजरत कृष्ण लिखा करते थे।

हसरत की कुछ किताबों में इस बात का जिक्र मिलता है कि वे कृष्ण को रसूल या पैगंबर समझते थे। हसरत के शब्दों में कृष्ण प्रेम और सौंदर्य के देवता थे और यही बात उन्हें कृष्ण भक्ति के रंग में रंगती थी। हसरत का वह शेर जो उनके मजहबी ख्यालों की अकासी करता है, वह कुछ इस तरह से है। मसलके इश्क है पर सतिश ए हुस्न हम नहीं जानते अज़ाब ओ सवाब। इसका मतलब है कि प्रेम करना और सौंदर्य को पूजना ही मजहब है।

मेरा पाप और पुण्य के बारे में मुझे कुछ नहीं पता। हसरत के बारे में यह बात काफी मशहूर है कि वे अपने पास सदा एक मुरली रखा करते थे। और हर साल जन्माष्टमी आने पर वह मथुरा जाया करते थे। एक बार जेल में होने की वजह से हसरत मथुरा नहीं जा पाए तो इसका दुख उन्होंने अपनी एक कविता में भी की है। हसरत एक शायर थे। यूं कहा जाए कि एक सूफी शायर भगवान श्री कृष्ण से वह बेपनाह मोहब्बत करते थे। इसी मोहब्बत को उन्होंने कविताओं और उर्दू गजलों में बड़ी खूबसूरती से दिखाया है।

हसरत के काव्य संग्रह कुलियात ए हसरत में यह कृष्ण भक्ति की सभी कविताएं और गजलें दर्ज हैं। कृष्ण भक्ति में लिखी गई हसरत की कुछ कविताओं के बोल कुछ इस तरह से हैं। मन तो से प्रीत लगाई कन्हाई काू और की सूरत अब काहे को आई।

मुझसे छेर करत नंदलाल लिए ठारे अबीर गुलाल। बिरह की रैन कटे ना पहाड़ सुनी नगररिया पड़ी उजाड़ मोह पे रंग ना डार मुरारी विनती करत हूं तिहारी मथुरा की नगर है आशिकी का दम भरती है आरजू उसी का पैगाम हयात जावेदा था हर नगमा कृष्ण बांसुरी का हसरत की शायरी और उनकी कृष्ण भक्ति हिंदुस्तान की उस गंगा जुमनी तहजीब की निशानी है जिसने दुनिया को सेकुलरिज्म का पाठ पढ़ाया है। फिल्म निकाह में गुलाम अली द्वारा गाई गई गजल चुपके-चुपके रात-दिन आंसू बहाना याद है।

बहुत मशहूर हुई यह गजल हसरत मोहानी ने ही लिखी है। इस बात के बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं। मौलाना हसरत मोहानी के सियासी सफर की अगर बात करें तो इसकी शुरुआत इंडियन नेशनल कांग्रेस से हुई। वे बाल गंगाधर तिलक के विचारों से गहरे इन्फ्लुएंस में थे। साल 1921 के अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने ही सबसे पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मंच से पूर्ण स्वराज की मांग की।

फिर उनका झुकाव कम्युनिस्ट विचारधारा की तरफ हो गया। वे 1925 के कानपुर में आयोजित भारत की पहली कम्युनिस्ट कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष बने। उन्होंने शोषितों, किसानों और मजदूरों के हक के लिए आवाज उठाई और कम्युनिस्ट आंदोलन की नींव मजबूत की।

मुसलमानों के राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों के नाम पर वह मुस्लिम लीग से भी जुड़े। लेकिन मोहम्मद अली जिन्ना के टू नेशन थ्योरी के वे कट्टर विरोधी थे। विभाजन के प्रस्ताव का उन्होंने पुरजोर विरोध किया। साथ ही 1947 में उन्होंने भारत में ही रहने का फैसला लिया। तो

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