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औरतों को लेकर ये क्या बोल गए ग्रैंड मुफ्ती कथापुरम? विवादित बयान ने मचाया बवाल!

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30 अगस्त 2026 जगह कोच्ची एक इस्लामी सम्मेलन का मंच है और माइक पर हैं शेख अबू बकर अहमद जिन्हें केरल के काथापुरम एपी अबू बकर मुसलियार के नाम से जाना जाता है। उन्हें ग्रैंड मुफ्ती ऑफ इंडिया भी कहा जाता है। यह कोई सरकारी पद नहीं है बल्कि एक धार्मिक हैसियत है जिसमें मुफ्ती यानी कि इसका मतलब होता है इस्लामी कानून का जानकार। अपने भाषण में वो पार्क की एक दुकान का उदाहरण देते हैं जो कि पत्थर के सिलबट्टे देखती है।

उनका कहना है कि सिलबट्टे सड़क के किनारे यूं ही पड़े रह सकते हैं। लोग उनके ऊपर से गुजर भी जाए तो कोई खास फर्क नहीं पड़ता। लेकिन सोने का हार सड़क पर नहीं रखा जा सकता है। उसे वहां रखोगे तो हर गुजरने वाला उसे छुएगा। उसकी चमक घिसेगी और उसकी कीमत कम हो सकती है।

इसलिए वह कहते हैं कि अगर हार की खूबसूरती और कीमत को बचाए रखना है तो उसे एक डिब्बे में संभाल कर रखना होगा। ग्रैंड मुफ्ती ने इसी उदाहरण के जरिए महिलाओं की तुलना सोने के हार से की है। यानी कि औरतें जो है वह हार हैं और घर उनका डिब्बा। इस बात को कहने के बाद मुसलियार का कहना है कि यह पाबंदी नहीं है बल्कि इज्जत है। उनके मुताबिक पर्दे का हुक्म औरतों की हिफाजत के लिए आया है और कुरान यही सिखाता है कि औरतें जो हैं घर के भीतर रहें। उनके शब्दों में औरतों को सार्वजनिक मंचों पर लाने से बड़ी होती है।

वह देश का कानून नहीं लिख रहे बल्कि अपने मजहब के मानने वालों से अपनी धार्मिक समझ के मुताबिक एक बात कह रहे हैं। लेकिन सवाल तो यहीं से शुरू होता है ना कि यह बात कैसी सीख दे रही है? क्या 21वीं सदी में यह कहा जा सकता है कि लड़कियों को घर के अंदर रहना चाहिए। वो भी केरल जैसी जगह पर जहां पर महिलाओं की साक्षरता करीब 92% है।

2011 की जनगणना के मुताबिक ये देश में सबसे ज्यादा थी और अगर इसी केरल का इतिहास देखें तो तस्वीर और भी ज्यादा दिलचस्प हो जाती है। पतन केरल का एक जिला है और यहीं 1927 में एक मुस्लिम लड़की पैदा हुई थी। एम फातिमा बेबी उन्होंने 1950 में वकालत शुरू करी। फिर मुंसिफ बनी, जिला जज बनी और 1983 में केरल की हाईकोर्ट की जज भी रही। इसके छ साल बाद यानी कि 6 अक्टूबर 1989 को वो सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचे। भारत के सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला जज और देश की किसी भी ऊंची अदालत में बैठने वाली पहली मुस्लिम महिला। रिटायरमेंट के बाद तमिलनाडु की राज्यपाल भी बनी है वो और 2023 में 96 साल की उम्र में उनका इंतकाल भी हुआ। अब जरा सोचिए कि अगर वो घर के दायरे में रहती तो क्या यह सब मुमकिन हो पाता। यहां पर एक और नाम है नजमा हब्दुल्लाह का। मौलाना अबुल कलाम आजाद के परिवार से आने वाली हफ्तुल्लाह 1988 से 2004 तक लगातार 16 साल राज्यसभा की उपसभापति रही। यानी कि देश की संसद के ऊपरी सदन की कार्यवाही चलाने वाली कुर्सी पर एक मुस्लिम महिला बैठी रही।

बाद में वो केंद्रीय मंत्री बनी और फिर मणिपुर की राज्यपाल भी रही। और यह सिर्फ कुछ नामों की कहानी नहीं है। केरल में 2010 से स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आधी सीटें और आधे अध्यक्ष पद आरक्षित है। आज स्थानीय निकायों में महिलाओं की हिस्सेदारी 53 से 54% के आसपास है। यानी कि जिस राज्य के मंच से यह बात कही जा रही है, वहां हर दूसरी पंचायत की कमान एक महिला के हाथ में हो सकती है। जिस केरल में महिलाएं अदालत से लेकर संसद और पंचायत तक सार्वजनिक जीवन का हिस्सा रही हैं। उसी केरल में यह सवाल उठ रहा है कि क्या महिलाओं को सार्वजनिक जगहों से दूर रहना चाहिए? और यह सिर्फ एक भाषण की बात नहीं है। पिछले हफ्ते समस्ता केरल जमीयतुल उलमा यानी कि केरल के सुन्नी शाफई इस्लामी विद्वानों की सबसे बड़ी और पुरानी संस्थाओं में से एक के कांतापुरम गुट ने एक सर्कुलर जारी किया था और इसमें कहा गया था कि जवान लड़कियों का गैर रिश्तेदार पुरुषों के बीच सार्वजनिक सड़कों और मंचों पर मौजूद रहना जायज नहीं है।

यहीं वह दलील भी कमजोर पड़ती है कि सिर्फ अपने लोगों के बीच कही गई एक धार्मिक राय है क्योंकि यह सिर्फ तकरीर नहीं है बल्कि एक सर्कुलर था महल, कमेटियों, मस्जिदों, मदरसों और दूसरी संस्थाओं के लिए। इसमें निगरानी रखने की बात भी कही गई थी। और इससे पहले भी जनवरी 2020 में जब सीएए के खिलाफ देश भर में प्रदर्शन हो रहे थे तब काथापुरम अबू बबकर मुसलियार ने एक चैनल से यह भी कहा था कि औरतों को मर्दों की तरह मुट्ठी भीकर और नारे लगाते हुए सड़कों पर नहीं उतरना चाहिए। फिर मई 2022 में मल्लापुरम जिले में एक मदरसे की नई इमारत के उद्घाटन का कार्यक्रम था। दसवीं की एक छात्रा को इनाम लेने के लिए मंच पर बुलाया गया। समस्ता के वरिष्ठ पदाधिकारी एमटी अब्दुल्ला मुसलियार ने आयोजकों को वहीं टोक दिया।

उनसे पूछा गया कि लड़की को किसने बुलाया और कहा कि अगली बार उनके माता-पिता को बुलाया जाए। इस घटना के बाद विवाद हुआ तो केरल के जो तत्कालिक श्रम मंत्री बिंदु कृष्णन थे उन्होंने कहा कि संविधान सबको बराबर मानता है। देश की राष्ट्रपति खुद एक महिला है। आस्था अपनी जगह है लेकिन संविधान का सम्मान करना भी जरूरी है। कांतापुरम गुट पीछे नहीं हटा।

उनका कहना है कि उन्होंने धर्म पढ़ा है। इसलिए यह बात कहना उनका फर्ज है और वह कहते रहेंगे। उन्हें रोकने का अधिकार किसी के पास नहीं है। चलिए एक बारी को मान लेते हैं कि उनका यह कहना बिल्कुल सही है कि संविधान हर नागरिक को अपनी बात रखने की आजादी देता है। लेकिन उसी संविधान की एक और बुनियादी बात है। इस देश में हर नागरिक चाहे वो किसी भी धर्म का हो, पुरुष हो या महिला हो वो कानून के सामने बिल्कुल बराबर है। अनुच्छेद 14 इसे समानता का अधिकार कहता है और अनुच्छेद 15 साफ करता है कि सिर्फ धर्म या लिंग के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता है।

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