रीत नहीं रीत नहीं नहीं डोरी डोरी नहीं गोरी देखना एक दिन ये कहानी बनेगी तू मेरे एक ऐसा अभिनेता जिसने अपनी घड़ी बेचकर फिल्मी दुनिया में कदम रखा तेरा प्यार सताता है चैन नहीं आता है रातों को यारों मेरा नाम अनजाना जो आगे चलकर बन गया जुबली कुमार आप आए बाहर आए। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह अभिनेता शादीशुदा होने के बावजूद एक ऐसी मोहब्बत में पड़ गया था जिसके लिए इन्होंने अपनी पत्नी को तलाक देने तक का मन बना लिया था। आ मेरी रानी ले जा छल्ला निशानी मुझे तेरी मोहब्बत का क्या आप जानते हैं कि एक समय ऐसा भी आया जब यह सुपरस्टार एक भूतिया बंगले में रहने को मजबूर हो गया था। बनके साथ राहों में लेकिन वही भूतिया बंगला इनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बन गया। जहां से इनकी किस्मत पलट गई। उसके बाद तो जैसे एक के बाद एक हिट फिल्मों की झड़ी लग गई। फूल बरसाओ मेरा देख के सूरत दिल थामे रह जाते आखिर कौन था वो जो इनकी सपनों में आया कौन था वो जो इनके दिल में समाया कौन है जो सपनों में आया कौन है जिसने शोहरत की हर ऊंचाई छ ली दौलत के अंबार लगा दिए लेकिन एक दिन ऐसा भी आया जब इस चमकते सितारे ने अचानक फिल्में करना छोड़ दिया। हाय दिल को चुरा कर ले गया। और वो दुखद मोड़ जब उसी अभिनेता का बेटा ही उसकी जिंदगी को अंधेरे में धकेलने का कारण बन गया। अपनी भी क्या जिंदगी है और ऐसा क्या हुआ था कि एक मशहूर अभिनेत्री ने यहां तक कह दिया कि राजेंद्र कुमार ने मेरा करियर बर्बाद कर दिया जिया जाए तो फिर जिया नहीं आखिर कैसे इस जुबली कुमार की दर्दनाक मौत हुई मधुबन खुशबू देना है इन सभी सवालों के जवाब जानेंगे आज की इस वीडियो में। लेकिन उससे पहले आपसे एक छोटी सी गुजारिश है। अगर आप हमारे चैनल पर नए हैं तो कृपया चैनल को सब्सक्राइब जरूर करें और बेल आइकन को दबाएं ताकि ऐसी ही सच्ची और दिल छू लेने वाली कहानियां आप तक सबसे पहले पहुंचे। आजा तुझको पुकारे मेरे गीत रे मैं हूं राही अनजान राहों का आज हम बात करेंगे उस अभिनेता की जिसे लोग प्यार से जुबली कुमार कहते थे ओ यारों मेरा नाम अनजाना जिसका असली नाम था
राजेंद्र कुमार तुली जहां तुम वहां होंगे हम। वीडियो को अंत तक जरूर देखिएगा क्योंकि इस कहानी में है इश्क, संघर्ष, शोहरत, अफवाहएं, दर्द और एक ऐसा अंजाम जो शायद ही किसी ने सोचा होगा। टुकड़े को छुपा लो आंचल में कहीं। राजेंद्र कुमार का जन्म 20 जुलाई 1927 को सियालकोट में हुआ था, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है। जब भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ, तब राजेंद्र कुमार का परिवार सियालकोट छोड़कर दिल्ली आ गया। दिल्ली में बसने के बाद राजेंद्र कुमार ने अपनी पढ़ाई पूरी की और पीएचडी की डिग्री हासिल की। इस तरह वे बन गए डॉ. राजेंद्र कुमार तुली। लेकिन दिल में एक सपना पल रहा था फिल्मों में हीरो बनने का। डिग्री पूरी करने के बाद भी उनका मन पढ़ाई में नहीं लगा। उनका सपना था अभिनेता बनना। इसी ख्वाब को पूरा करने के लिए उन्होंने मुंबई जाने का फैसला किया। मगर हालात ऐसे थे कि उनके पास टिकट के भी पैसे नहीं थे। मजबूरी में राजेंद्र कुमार ने अपनी कीमती घड़ी बेच दी और उसी पैसे से दिल्ली से मुंबई तक का सफर तय किया। मुंबई आने के बाद उन्होंने एक पीजी में रहना शुरू किया और संघर्षों की एक लंबी दास्तान शुरू हुई। कड़ी मेहनत और लंबे संघर्ष के बाद डायरेक्टर एच एस रवेल ने उन्हें बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर अपने साथ काम करने का मौका दिया। करीब 5 साल तक उन्होंने बतौर सहायक निर्देशक काम किया जिससे उन्हें फिल्म निर्माण की बारीकियां सीखने को मिली।
लेकिन उनका असली सपना तो अभिनेता बनने का था। आखिरकार साल 1949 में वह मौका आया जब उन्होंने फिल्म पतंगा में असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम किया जिसका निर्देशन एच एस रवेल ने किया था। इसके बाद उन्होंने सगाई और पॉकेट मार्ग जैसी फिल्मों में भी सहायक निर्देशक के तौर पर काम किया। ही दार गर्दन कोयल जाते हो पर हम भी बन जाते हो हमदम। फिर आया साल 1950 जब उन्हें फिल्म जोगन में एक छोटा सा किरदार निभाने का मौका मिला। इस फिल्म के नायक थे दिलीप कुमार। हालांकि यह भूमिका बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन यह शुरुआत थी। इसके बाद भी राजेंद्र कुमार को करीब 5 साल तक कड़ा संघर्ष करना पड़ा। फिर आया साल 1955 जब उनकी जिंदगी बदल देने वाली फिल्म वचन रिलीज हुई। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचा दिया और सिल्वर जुबली साबित हुई। देखो जी दिल तोड़ ना जाना। इसी फिल्म के बाद राजेंद्र कुमार को मिला नया नाम जुबली कुमार। इस फिल्म में उनकी हीरोइन थी गीता बाली और साथ में थे मदन पुरी। फिल्म की सफलता ने राजेंद्र कुमार को स्टार बना दिया। साल 1956 में उनकी दो फिल्में आई तूफान और दिया जो कि सेमी हिट रही और आवाज जो कि फ्लॉप हो गई। मगर फिर आया वह साल जिसने राजेंद्र कुमार को घर-घर में लोकप्रिय बना दिया। साल 1957 में रिलीज हुई मदद इंडिया। इस फिल्म में राजेंद्र कुमार, सुनील दत्त और राजकुमार जैसे सितारे थे। फिल्म की कहानी, भावनाएं और गाने सब कुछ दर्शकों के दिल को छू गए। दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा। दुख भरे दिन भी रे भैया अब सुख आयो रे। फिल्म ने वर्ल्ड वाइड 9 करोड़ की कमाई की। इस फिल्म का निर्देशन और निर्माण खुद महबूब खान ने किया था। मदर इंडिया राजेंद्र कुमार की एकमात्र ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर फिल्म साबित हुई। इसके बाद साल 1958 आया जिसमें राजेंद्र कुमार की चार फिल्में रिलीज हुई। देवर भाभी और घर संसार जो फ्लॉप रही जबकि खंजानची और तलाक औसत प्रदर्शन कर पाई। यानी इस साल कोई बड़ी हिट उनके हाथ नहीं लगी। फिर आया साल 1959 जब उनकी किस्मत एक बार फिर चमकी। इस साल उनकी पांच फिल्में रिलीज हुई जिनमें से एक थी चिराग कहां रोशनी कहां जो एक तेलुगु फिल्म मां बाबू की रिमेक थी और सेमी हिट रही। चिराग कहां रोशनी कहां? इस फिल्म के निर्माता थे देवेंद्र गोयल जिन्होंने राजेंद्र कुमार को पहली बार वचन में मुख्य भूमिका के लिए चुना था। इसी साल आई धूल का फूल जिसे डायरेक्ट किया था यश चोपड़ा ने और इसके निर्माता थे बी आर चोपड़ा। इस फिल्म में मोहम्मद रफी का गाया गीत तू हिंदू बनेगा ना मुसलमान बनेगा। इंसान की औलाद है इंसान बनेगा। बहुत मशहूर हुआ। इंसान की औलाद है इंसान बनेगा। वहीं लता मंगेशकर और महेंद्र कपूर का गाया गीत तेरे प्यार का आसरा चाहता हूं भी खूब पसंद किया गया।
तेरे प्यार का आसरा चाहता हूं। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट रही। साल 1959 में ही एक और हिट फिल्म गूंज उठी शहनाई भी रिलीज हुई जिससे राजेंद्र कुमार को खूब सराहना मिली। मेरे सुन और मेरे लिए इस तरह एक साधारण से नौजवान जिसने अपनी घड़ी बेचकर मुंबई का टिकट लिया था बन गया हिंदी सिनेमा का जुबली कुमार। साल 1960 में आई एक अनोखी फिल्म कानून जिसे बी आर चोपड़ा ने निर्देशित किया था। इस फिल्म की सबसे खास बात यह थी कि इसमें एक भी गीत नहीं था। यह एक कोर्ट रूम ड्रामा फिल्म थी जिसमें राजेंद्र कुमार एक वकील की भूमिका में नजर आए और फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता हासिल की। इसी वर्ष राजेंद्र कुमार की फिल्म आज का पंछी आई जिसमें उनके साथ वैजयंती माला थी और निर्देशन किया था जे ओम प्रकाश ने। यह फिल्म भी हिट रही। तुम रूठी रहो मैं मनाता रहूं के इन अदाओं दिल मेरा एक आस का पंछी उड़ता है धीरे कहां तक चले हाय धीरे कहां तक इसके बाद राजेंद्र कुमार घराना फिल्म में नजर आए जिसमें उनके साथ अभिनेता राजकुमार थे। इससे पहले दोनों कलाकार मदर इंडिया में साथ काम कर चुके थे। घराना ने भी जबरदस्त सफलता पाई। हुस्न वाले तेरा जवाब नहीं। फिर आई ससुराल तेलुगु फिल्म इरालिका की रिमेक। यह फिल्म भी हिट रही और इसके गाने बेहद लोकप्रिय हुए। विशेष रूप से मोहम्मद रफी द्वारा गाया गया गीत तेरी प्यारी-प्यारी सूरत को किसी की नजर ना लगी। आज भी लोगों के दिलों में बसा हुआ है। टुकड़े को छुपा लो आंचल में कहीं में इस गीत के लिए मोहम्मद रफी को सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक का पुरस्कार भी मिला। साल 1963 में आई दिल एक मंदिर जिसमें राजेंद्र कुमार, मीना कुमारी और राजकुमार मुख्य भूमिका में थे। यह फिल्म एक तमिल फिल्म की रीमेक थी और इसके सभी सात गाने सुपरहिट हुए। दिल एक मंदिर है। सबको छोड़कर आ जाओ। आ जाओ। तुम प्यार की सुंदर मूरत हो। रुक जा रात ठहर जा रे चंदा। दिल क्यों बुलाए? मोहम्मद रफी ने राजेंद्र कुमार के लिए सभी गाने गाए। राजेंद्र कुमार और मीना कुमारी को इस फिल्म के लिए बेस्ट एक्टर और एक्ट्रेस के लिए नामांकित किया गया लेकिन जीत नहीं पाए। हां, राजकुमार को इस फिल्म के लिए बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का पुरस्कार मिला। फिर इसी साल आई वह फिल्म जिसने राजेंद्र कुमार को रातोंरात सुपरस्टार बना दिया। मेरे महबूब इस फिल्म के निर्देशक थे एच एस रवेल जो राजेंद्र कुमार के गुरु भी थे। फिल्म की कहानी और राजेंद्र कुमार का किरदार इतना प्रभावशाली था कि दर्शक उन्हें मुस्लिम समझने लगे। हालांकि राजेंद्र कुमार ने साफ कहा कि वे हिंदू हैं। इस फिल्म के गाने मेरे महबूब तुझे मेरी मोहब्बत की कसम बेहद लोकप्रिय हुए। मेरे महबूब तुझे मेरे इसके बाद आई फिल्म आई मिलन की बेला जिसमें राजेंद्र कुमार सायरा बानो और धर्मेंद्र मुख्य भूमिका में थे। इस फिल्म के गीतों ने दिल जीत लिया और यह फिल्म भी ब्लॉकबस्टर रही। सनम तेरे हो गए हम प्यार में। फिर आई ऐतिहासिक फिल्म संगम जिसका निर्देशन किया राज कपूर ने।
फिल्म में राजेंद्र कुमार, राज कपूर और वैजयंती माला मुख्य किरदारों में थे। दोस्त दोस्त ना रहा प्यार मेरा प्रेम पत्र पढ़कर ना के हर किसी को बेगाना जाएगा। ये धरती है इंसानों की। बोल राधा बोल संगम होगा के नहीं इस फिल्म की शुरुआत दिलीप कुमार से करनी थी लेकिन व्यस्तता के कारण उन्होंने मना कर दिया जिसके बाद राज कपूर ने राजेंद्र कुमार को साइन किया। दिलीप कुमार और वैजयंती माला के प्रेम संबंध इस दौरान टूटे क्योंकि वैजयंती माला ने इस फिल्म में काम करने का निर्णय लिया। संगम भारतीय सिनेमा की पहली फिल्म बनी जिसे लंदन, पेरिस और स्विट्जरलैंड जैसे विदेशी स्थानों पर शूट किया गया। इस फिल्म का यह गीत यह मेरा प्रेम पत्र पढ़कर आज भी अमर है। यह मेरा प्रेम पत्र पढ़कर यह फिल्म ₹8 करोड़ की कमाई के साथ ब्लॉकबस्टर साबित हुई। संगम के बाद राजेंद्र कुमार और वैजयंती माला एक बार फिर साथ आए फिल्म जिंदगी में जिसके निर्देशक थे रामानंद सागर। फिल्म ने शानदार सफलता पाई और इसके बाद रामानंद सागर ने एक और फिल्म आरजू बनाई जिसमें फिर राजेंद्र कुमार थे। यह फिल्म भी सुपरहिट रही। आरजू के गीत जब इश्क कहीं हो जाता है और चुपकेच-चपके रात दिन आज भी सुनने में मधुर लगते हैं। जब इश्क कहीं हो जाना है पता नहीं बहलाना बस इतनी है फूलों गिराने बहारों की मलका अजी रूठ अब शराब और ज्यादा बेदर्दी बालमा तुझको मेरा मन फिर आई सूरज और अमर हुआ गीत बहारों फूल बरसाओ फूल बरसाओ मेरा साल 1966 में आई फिल्म सूरज जिसमें मोहम्मद रफी का गाया हुआ गाना बहारों फूल बरसाओ बिना का गीतमाला की सूची में सबसे ऊपर रहा। यह गीत आज भी राजेंद्र कुमार की पहचान बन चुका है। फिल्म सूरज भी ब्लॉकबस्टर रही। इसके बाद 1967 में आई अमन और 1968 में झुक गया आसमान। दोनों फिल्मों में राजेंद्र कुमार के साथ सायरा बानो थी। इन फिल्मों के दौरान दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ी और इनकी जोड़ी को दर्शकों ने खूब पसंद किया। इतनी थी बस खबर कि मेरे होश उड़ गए। कौन है जो सपनों में आया। अब मिलो सजना। अदा कहते हो तुम इसको झुक गया आसमान एक रोमांटिक फिल्म थी और यह हॉलीवुड फिल्म हेयर कम्स मिस्टर जॉर्डन की रिमेक थी। मोहम्मद रफी ने फिर से राजेंद्र कुमार के लिए दिल छूने वाले गीत गाए। इसके बाद आई फिल्में अनजाना शतरंज तलाश और गीत। गीत के गाने काफी पसंद किए गए। हालांकि फिल्म एवरेज रही। मेरे साल 1970 में आई फिल्म गवार जिसमें राजेंद्र कुमार और वैजयंती माला थी। एक दिन ये कहानी बनेगी तू मेरे इस फिल्म में राजेंद्र कुमार का डबल रोल था और उन्हें मेकअप के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। फिल्म फ्रेंच नवेल द कोर्सिकन ब्रदर्स पर आधारित थी। लेकिन इसके बाद राजेंद्र कुमार की अधिकांश फिल्में फ्लॉप होती गई। सिर्फ ललकार ही एक एवरेज हिट साबित हुई। लो मुस्कुरा लो महफिलें सजा।
तो आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक दौर के सुपरहिट हीरो राजेंद्र कुमार की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप होने लगी थी। एक जमाना था जब हर निर्माता निर्देशक की पहली पसंद हुआ करते थे राजेंद्र कुमार। कोयल क्यों गाए लेकिन वक्त बदल चुका था और इस बदलाव की वजह बना एक नया सितारा जिसने बॉलीवुड में कदम रखते ही तूफान मचा दिया था राजेश खन्ना दिल के चैन जब फिल्म आराधना ने बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रचा तब किसी को अंदाजा भी नहीं था कि यह फिल्म सिर्फ एक ब्लॉकबस्टर नहीं बल्कि बल्कि उस दौर के कई अस्थापित सितारों के करियर का सूरज डूबा देगी। रूप तेरा मस्ताना प्यार मेरा मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू कोरा कागज था ये मन मेरा। राजेश खन्ना की लोकप्रियता ऐसी बेतहाशा बढ़ी कि उनकी आंधी में कई कलाकार उड़ गए और उन्हीं में से एक थे ट्रेजडी किंग राजेंद्र कुमार। मुझे तेरी मोहब्बत का साल 1993 में राजेंद्र कुमार की आखिरी फिल्म फुल रिलीज हुई थी लेकिन अफसोस कि यह फिल्म फ्लॉप साबित हुई और इसके साथ ही एक युग खत्म हुआ। अगर राजेंद्र कुमार के फिल्मी करियर पर नजर डालें तो उन्होंने कुल 83 फिल्मों में काम किया जिनमें से एक फिल्म ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर रही। पांच फिल्में ब्लॉकबस्टर रही, तीन फिल्में सुपरहिट, नौ फिल्में हिट, छह फिल्में सेमीट और लगभग 16 फिल्में एवरेज रही। तेरे जैसी होती है और कैसी? इतने शानदार करियर और एक से बढ़कर एक हिट फिल्मों के बावजूद राजेंद्र कुमार को कभी भी बेस्ट एक्टर का अवार्ड नहीं मिला। हां, उन्हें चार बार इस अवार्ड के लिए नामांकित जरूर किया गया था। पहली बार 1954 में फिल्म दिल एक मंदिर के लिए बेस्ट एक्टर की कैटेगरी में नॉमिनेशन मिला। फिर 1965 में फिल्म संगम के लिए उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर की श्रेणी में नॉमिनेट किया गया। इसी साल आई मिलन की बेला के लिए एक बार फिर बेस्ट एक्टर की कैटेगरी में नाम आया और फिर 1966 में फिल्म आरजू के लिए भी उन्हें बेस्ट एक्टर अवार्ड के लिए नॉमिनेट किया गया। लेकिन हर बार किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया और यह प्रतिष्ठित पुरस्कार किसी और की झोली में चला गया। 70 और 80 के दशक की मशहूर और खूबसूरत अभिनेत्री विजेता पंडित ने हाल ही में एक इंटरव्यू में अपनी जिंदगी से जुड़ा एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि उनका नाम कभी मशहूर अभिनेता राजेंद्र कुमार के बेटे कुमार गौरव के साथ जुड़ा था। दोनों के बीच गहरा रिश्ता था। लेकिन यह रिश्ता राजेंद्र कुमार को कतई मंजूर नहीं था। विजेता पंडित के मुताबिक राजेंद्र कुमार इस रिश्ते से इतने नाख थे कि उन्होंने ना सिर्फ इसका विरोध किया बल्कि उनके फिल्मी करियर को भी नुकसान पहुंचाया। विजेता ने दावा किया कि जबजब उन्हें कोई अच्छी फिल्म मिलने वाली होती, राजेंद्र कुमार पर्दे के पीछे से दखल देकर उन्हें उस फिल्म से निकलवा देते थे। उन्होंने सीधे तौर पर कहा कि उनके करियर के बर्बाद होने की सबसे बड़ी वजह राजेंद्र कुमार ही थे। विजेता का यह दर्द भरा बयान उनके संघर्ष और टूटी उम्मीदों की झलक दिखाता है। जहां एक ओर प्यार था तो दूसरी ओर साजिशें और साजिशकर्ताओं की दीवारें। राजेंद्र कुमार और सायरा बानो ने आई मिलन की बेला अमन और झुक गया आसमान जैसी फिल्मों में साथ काम किया था और इन फिल्मों में दोनों की ऑन स्क्रीन केमिस्ट्री को दर्शकों ने खूब सराहा लेकिन यह केमिस्ट्री सिर्फ पर्दे तक ही सीमित नहीं रही। मीडिया रिपोर्ट्स
के अनुसार कमन और बेहद खूबसूरत सायरा बानो असल जिंदगी में भी राजेंद्र कुमार को दिल दे बैठी थी। दूसरी तरफ राजेंद्र कुमार भी सायरा के प्रति आकर्षित थे। हालांकि वे उस समय शादीशुदा थे और उनके दो बच्चे भी थे। सायरा बानो राजेंद्र कुमार से बेइंतहा मोहब्बत करने लगी थी और हर हाल में उन्हें अपना जीवन साथी बनाना चाहती थी। यह रिश्ता इतना गहरा हो गया था कि खबरों के मुताबिक राजेंद्र कुमार भी सायरा के लिए अपना बसा बसाया परिवार छोड़ने को तैयार थे। तुम ही मुझे पसंद हो, पसंद हो। लेकिन इस रिश्ते से सायरा की मां नसीमा बानो बेहद नाराज थी। उन्होंने अपनी बेटी को बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन मोहब्बत में डूबी सायरा पर किसी बात का असर नहीं हो रहा था। एक मां होने के नाते नसीम नहीं चाहती थी कि उनकी बेटी किसी शादीशुदा मर्द के साथ अपना भविष्य बनाए। आखिरकार नसीम बानो ने अपने पड़ोसी और मशहूर अभिनेता दिलीप कुमार से मदद मांगी। उन्होंने दिलीप साहब से आग्रह किया कि वह सायरा को समझाएं और राजेंद्र कुमार से दूर रखें। दिलीप कुमार जो उस समय सायरा को ज्यादा जानते भी नहीं थे।
बेमन से ही सही लेकिन सायरा को समझाने के लिए तैयार हो गए। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। कहते हैं कि जब दिलीप कुमार ने सायरा से बात की तो सायरा ने उन्हें ही शादी का प्रस्ताव दे डाला और यहीं से शुरू हुई एक नई प्रेम कहानी सायरा और दिलीप कुमार की। फिर जिंदगी ने एक और मोड़ लिया। राजेंद्र कुमार को 71 वर्ष की उम्र में कैंसर जैसी घातक बीमारी ने घेर लिया। लंबी बीमारी से लड़ते हुए आखिरकार साल 1999 में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। लेकिन राजेंद्र कुमार भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं मगर उनकी फिल्में उनके किरदार, उनका दर्द भरा अभिनय आज भी करोड़ों दिलों में जिंदा है। तो दोस्तों, यह थी हमारी एक छोटी सी लेकिन दिल से की गई कोशिश राजेंद्र कुमार के जीवन को आपके सामने लाने की। अगर आपको यह वीडियो पसंद आया हो तो वीडियो को लाइक करें, शेयर करें और चैनल को सब्सक्राइब जरूर करें ताकि हम फिर मिल सके एक और सितारे की अनसुनी दास्तान लेकर। क्या आप मानते हैं कि किस्मत का खेल सबसे बड़ा होता है? इस कहानी ने आपको सबसे ज्यादा क्या सोचने पर मजबूर किया? कमेंट में जरूर बताएं। फिलहाल के लिए इजाजत दीजिए। मिलते हैं अगले वीडियो में। धन्यवाद। [संगीत] रीत नहीं रीत नहीं नहीं डोरी डोरी नहीं गोरी देखना एक दिन ये कहानी बनेगी तू मेरी आप आए बाहर आ मेरी रानी ले जा छल्ला निशान के साथ की राहों में तेरा प्यार सताता है चैन नहीं आता है कौन है जो सपनों में आया कौन है जिया जाए तो फिर जिया नहीं मधुबन खुशबू देना है ओ यारों मेरा नाम अनजाना को छुपा लो आंचल में कहीं तुम ही मुझे पसंद हो पसंद हो मुझे तेरी मोहब्बत का [संगीत]