वो कैसा लिबास पहन रहा है वो उसका निजी मामला है। लेकिन लिबास ना हो। किसी को वो लिबास दिखाई देगा। किसी को उस लिबास में फैशन दिखाई देगा। किसी को उस लिबास जो है वो नॉर्मल दिखाई देगा। अब देखिए ऐसा है वो छात्रा जो हाई कोर्ट गई और हाई कोर्ट ने उसकी पिटीशन को खारिज कर दिया। हाई कोर्ट से भी ऊपर एक कोर्ट है जिसका नाम सुप्रीम कोर्ट है। और आप इतिहास उठा के देखिए।
ऐसे बहुत से फैसले जो हाई कोर्ट ने किए वो सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिए। सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। यह प्रजातंत्र है, यह लोकतंत्र है। वो बच्ची चाहे तो सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकती है। और जो सुप्रीम कोर्ट फैसला करे सर झुका कर हमें वो फैसला मान लेना चाहिए। में दो एक्ट्रेस हैं। एक सांसद है कंगना रणावत और दूसरी है कीर्ति सेनन।
दोनों के बीच में ड्रेस को लेके एक विवाद हुआ है। कैसे देखते हैं सर? देखिए यह डेमोक्रेसी है। हर इंसान को हक है वो कैसा लिबास पहन रहा है वो उसका निजी मामला है। लेकिन लिबास ना हो। किसी को वो लिबास दिखाई देगा। किसी को उस लिबास में फैशन दिखाई देगा। किसी को उस लिबास जो है वह नॉर्मल दिखाई देगा। तो ऐसी टिप्पणियां करने से विवाद बढ़ता है। हर वार पे होता है।
हर एक्शन पर रिएक्शन होता है। तो अगर आप ऐसी कोई टिप्पणी करते हैं। अगर आपको कहने की आजादी है। तो फिर आपको सुनने में भी आजादी होनी चाहिए। सामने वाला क्या कह रहा है? सामने वाले ने कैसे रीड किया? अब कोई क्या पहन रहा है? क्या खा रहा है?
उसके घर में क्या बन रहा है? ये उसका अपना निजी मामला है। किसी के किचन में घुसना, किसी की किसी के लिबास के बारे में कोई टिप्पणी करना ये जो बात है वह कहा जाता है कि झगड़ा और छाछ में आप जितना पानी मिलाएं वह उतना ही बढ़ता रहता है। तो इसकी तो कोई हद ही नहीं है। विवाद की और झगड़े की कोई हद ही नहीं है। और झगड़ा बहुत बुरी चीज है।
आपकी पूरी ताकत, आपकी पूरी एनर्जी झगड़े में निकल जाती है। तो आप काम कब करेंगे? काम के लिए भी आप थोड़ी ऊर्जा अपनी बचा कर रखिए। तो ऐसे मामलों पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए कि उसने क्या पहना है और वो क्या खा रहा है और वो क्या पी रहा है। वो उसका अपना जातीय मामला है। तो मैं ऐसी बातों पर टिप्पणी करना मैं मुनासिब नहीं समझता। और अगर मैं करता हूं तो फिर सुनने की भी मुझ में ताकत है।