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बारिश हुई, ज़मीन धंसी और नीचे मिली खौफना!क चीज देख पुरातत्व अधिकारी चौंक गए

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रायबरेली के उई गांव में जमीन के नीचे आखिर क्या छिपा है? बारिश के बाद अचानक धंसी जमीन ने ऐसा रहस्य उजागर किया है जिसने पूरे इलाके में सस्पेंस पैदा कर दिया है। एक हफ्ते पहले हुई इस घटना के बाद अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी की शुरुआती जांच में ऐसे संकेत मिले हैं जो इस जगह को करीब 2000 साल पुराने इतिहास से जोड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। हालांकि इस रहस्य का अंतिम सच अभी भी वैज्ञानिक जांच और डिटेल्ड रिपोर्ट पर टिका हुआ है।

रायबरेली जिले के हरचंदपुर थाना क्षेत्र के ओई गांव में पिछले हफ्ते बारिश के बाद एक निजी खेत की जमीन अचानक धंस गई। जमीन धंसने से करीब 1 मीटर चौड़ा गड्ढा बन गया। जब ग्रामीण मौके पर पहुंचे तो उन्हें नीचे पक्की दीवार जैसी संरचना और एक प्राचीन सुरंग जैसी आकृति दिखाई दी। देखते ही देखते इस अनोखी संरचना को देखने के लिए गांव में लोगों की भीड़ जुट गई और पूरे इलाके में चर्चा शुरू हो गई। मामले की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने तुरंत कार्यवाही की।

एसडीएम महाराजगंज और एएसआई लखनऊ मंडल की टीम मौके पर पहुंची। सहायक आर्कियोलॉजिस्ट डॉ. मनोज कुमार यादव के नेतृत्व में टीम सीढ़ी के सहारे सुरंग के भीतर उतरी और शुरुआती जांच पर लग गई। [संगीत] जांच के दौरान टीम को कई महत्वपूर्ण प्राचीन अवशेष मिले। जिनमें प्राचीन काल की ईंटें, मिट्टी की सुराही और एक हैंडल वाली धूपदानी शामिल है।

शुरुआती आकलन के मुताबिक यह सभी अवशेष कुषाण कालीन संरचनाओं से मिलते जुलते बताए जा रहे हैं। जिनमें यह संभावना मजबूत हुई है कि यह जगह किसी प्राचीन बसावट या ऐतिहासिक संरचना का हिस्सा हो सकता है। हालांकि इससे जुड़े पुख्ता रिपोर्ट वैज्ञानिक जांच के बाद ही सामने आएंगे। इस बीच मामले में एक नया अपडेट भी सामने आया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण लखनऊ मंडल की टीम गांव के रहने वाले अशोक प्रताप मौर्य के घर भी पहुंची है। वहां उनके पास सालों से सुरक्षित रखे गए प्राचीन अवशेषों का बारीकी से निरीक्षण किया गया।

बताया गया कि अशोक प्रताप मौर्य 1985 से इन ऐतिहासिक अवशेषों को संभाल कर रखे हुए हैं। उनका दावा है कि ओईट पुरातत्व विभाग के रिकॉर्ड्स में दर्ज एक ऐतिहासिक जगह है। फिलहाल सुरक्षा के मद्देनजर प्रशासन ने पूरे इलाके को सील कर दिया है। मौके पर भारी पुलिस बल तैनात है और ग्रामीणों को गड्ढे के पास जाने से मना कर दिया गया है। अब सभी की नज़र भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की वैज्ञानिक रिपोर्ट पर टिकी हुई है क्योंकि उसी के बाद इस रहस्यमई सुरंग और यहां से मिले प्राचीन अवशेषों का पूरा इतिहास सामने आ सकेगा। ये रायबरेली जनपद अंतर्गत ये ओईडी के नाम से ये क्षेत्र जाना जाता है। तो कुछ दिन पूर्व बारिश के कारण वर्षा हुआ यहां पे तो लोगों ने ये सूचना दी कि यहां पे सुरंग निकला है। तो उस सूचना के अंतर्गत हम अपने निदेशालय से प्राप्त आदेश के क्रम में यहां निरीक्षण करने आए थे और निरीक्षण के दौरान हम लोगों ने यहां पे देखा तकरीबन 15 से 20 फीट की है। नीचे जमीन धसी हुई है जिसके अंदर कुछ ईंटों के संरचना मिले.

जिनका ओरिएंटेशन उत्तर से लेकर के दक्षिण की तरफ है और जब नीचे जाकर के ईंटों को हम लोगों ने देखा तो उनकी साइज 40 * 28 * 8 सेंटीमीटर है जो कुषाण कालीन संरचना से मिलती जुलती है। तो वो सारी जो संरचना है वो कुषाण काल से संबंधित है और यहां पे बहुत सारे पुरवशेष देखने को मिले जो सरफेस पे भी है और यहां पे स्थानीय लोगों को के द्वारा संग्रह भी किया गया है तो जिसमें मृदा पात्र बनाने के थपकी होती है ड्राइवर है और मृ मूर्तियां है और ये है कि प्रस्तर के कुछ अवशेष हैं जो ये सारी जो संरचना है ये कुषाण काल के समय जो बनती थी सब उससे मिलती जुलती है और यह कुषाण काल से संबंधित है। किस संघ का माना जाए? यह संघ अगर देखेंगे तो 2000 साल पहले का है।

2000 वर्ष हां 2000 वर्ष पहले अभी क्या स्थिति इस समय है? आगे क्या कारवाई इस पर होगी? अभी तो निरीक्षण के उपरांत इसकी रिपोर्ट सबमिट की जाएगी। फिर उसके बाद जैसे शासन या निदेशालय आदेश करेगा उसके क्रम में कारवाई की जाएगी। क्या खुदाई की भी संभावनाएं हैं? संभवत ऐसे जो क्षेत्र होते हैं रिकॉर्ड के बाद उसकी एक ऑब्जेक्टिव होते हैं।

उसके एक उद्देश्य होते हैं। तो उद्देश्य को लेकर के अगर भविष्य में कभी ऐसी संभावनाएं बनती हैं तो उत्खनन होंगे शोध विषय को लेकर के और यहां के जितनी जो लोकल संस्कृति है उसको उद्घटित करने के लिए ये संस्कृति और सभ्यता यहां कैसी रही हैं और इसके नीचे और भी कितनी संस्कृतियां संचित हैं उसको भी उद्घटित किया जा सकता है। लेकिन ये सारे चीजें जो है निर्भर करती है विभाग और शासन के उद्देश्यों पर। रायबरेली से शैलेंद्र प्रताप की रिपोर्ट [संगीत] यूपी तक।

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